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अष्टावक्र गीता · प्रकरण 5: लय

पढ़ने में लगभग 5 मिनट · 711 शब्द

पाठ्य-संगति

पाँचवें-प्रकरण का नाम ‘लय’ है, यानी विलीन-हो-जाना। बौद्ध-धर्म के ‘निर्वाण’ से तुलना यहाँ रोचक है, मगर लय निर्वाण से भिन्न है। निर्वाण एक तरह की ‘बुझ-जाना’ है, लय एक तरह की ‘एक-हो-जाना’। यह अन्तर बहुत-सूक्ष्म है, और श्रद्धा-सिंह की ‘अद्वैत और बौद्ध-दर्शन’ (1981) में विस्तृत-चर्चा है।

अष्टावक्र का लय-विवरण भगवद्गीता के ‘योग’ से भी अलग है। गीता में योग एक अभ्यास है, लय एक स्थिति है, और न ही प्राप्य-वस्तु। यह दार्शनिक-स्थिति बाद में आचार्य-शंकर ने ‘विवेकचूड़ामणि’ में दोहराया।

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 5

लय

Dissolution · 4 श्लोक

सिर्फ़ चार श्लोक। हर एक का अन्त एक ही phrase से, “एवमेव लयं व्रज”, “इसी तरह लय को प्राप्त हो”। अष्टावक्र चार-चार methods बता कर कह रहे हैं, अब विसर्जित हो जा।

पाँचवें प्रकरण में “लय” शब्द आता है। यह बौद्ध-शब्दावली का “निरोध” से मिलता-जुलता है, मगर अष्टावक्र की व्याख्या इसे एक-तरह की प्राकृतिक स्थिति बताती है, अभ्यास का परिणाम नहीं। चार-तरह की लय का वर्णन, जो आगे योग-वसिष्ठ-रचना में और विस्तार पाएगा।

अब तक

अद्वय और सर्वत्र के बाद यह प्रकरण “लय” पर है। मन का settle होना।

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श्लोक 1
अष्टावक्र उवाच
न ते सङ्गोऽस्ति केनापि किं शुद्धस्त्यक्तुमिच्छसि।
सङ्घातविलयं कुर्वन्नेवमेव लयं व्रज॥
na te saṅgo’sti kenāpi kiṁ śuddhas tyaktum icchasi
saṅghāta-vilayaṁ kurvann evam eva layaṁ vraja

अर्थ“आपका किसी से कोई सङ्ग (attachment) नहीं। आप शुद्ध है, क्या छोड़ना चाहता है? पंच-संघात (शरीर) को विसर्जित करते हुए, इसी तरह लय को प्राप्त हो।”

सन्दर्भपहली method: realize करो कि सङ्ग था ही नहीं। “त्यागना” तब possible है जब कुछ “मिला हुआ” हो।तो छोड़ने का क्या? यह paradox है, मगर deep है।

पाठक के लिए“शुद्धस्त्यक्तुमिच्छसि?” “शुद्ध हो कर क्या छोड़ना चाहता है?” यह वो moment है जब साधक “त्याग” के पीछे भागना छोड़ता है। त्याग भी एक action है। ज्ञानी action से उठकर एक recognition में रहता है।

श्लोक 2
अष्टावक्र उवाच
उदेति भवतो विश्वं वारिधेरिव बुद्बुदः।
इति ज्ञात्वैकमात्मानमेवमेव लयं व्रज॥
udeti bhavato viśvaṁ vāridher iva budbudaḥ
iti jñātvaikam ātmānam evam eva layaṁ vraja

अर्थ“आपसे विश्व उठता है, जैसे समुद्र से बुलबुला। आत्मा को एक जान कर, इसी तरह लय को प्राप्त हो।”

सन्दर्भदूसरी method: देखो कि सब कुछ आप ही से निकल रहा है। बुलबुला अलग कहाँ, वो पानी ही तो है। इसे सोचने वाली बात की तरह नहीं, सीधे देखने वाली बात की तरह लो। एक direct seeing।

पाठक के लिएएक experiment। यह screen को देख रहे हैं। यह “उठ” कब रहा है? इसी moment, चेतना में। अगर चेतना न हो, screen “नहीं” है। तो screen का “होना” चेतना पर depend है। तो screen चेतना का बुलबुला है।

श्लोक 3
अष्टावक्र उवाच
प्रत्यक्षमप्यवस्तुत्वाद्विश्वं नास्त्यमले त्वयि।
रज्जुसर्प इव व्यक्तमेवमेव लयं व्रज॥
pratyakṣam apy avastutvād viśvaṁ nāsty amale tvayi
rajju-sarpa iva vyaktam evam eva layaṁ vraja

अर्थ“प्रत्यक्ष होते हुए भी, अ-वस्तुत्व के कारण, विश्व निर्मल आप में नहीं। जैसे रस्सी पर साँप दिखता हैं, इसी तरह लय को प्राप्त हो।”

सन्दर्भतीसरी method: देखो कि जो दिख रहा है, वो “real” नहीं। “प्रत्यक्षम्” का मतलब “आँख से दिखना”। पर आँख से दिखना real का प्रमाण नहीं। सपने में भी दिखता है, mirage में भी।

पाठक के लिए“रज्जु-सर्प”। अँधेरे में रस्सी, साँप जैसी। रौशनी आते ही साँप गायब। साँप कहाँ गया? वो असल में कभी था ही नहीं, सिर्फ़ देखने की एक mistake थी। संसार वैसा ही है, ज्ञान की रौशनी आते ही “साँप” गायब, बस “रस्सी” बचती है।

श्लोक 4
अष्टावक्र उवाच
समदुःखसुखः पूर्ण आशानैराश्ययोः समः।
समजीवितमृत्युः सन्नेवमेव लयं व्रज॥
sama-duḥkha-sukhaḥ pūrṇa āśā-nairāśyayoḥ samaḥ
sama-jīvita-mṛtyuḥ sann evam eva layaṁ vraja

अर्थ“सुख-दुःख में सम, पूर्ण, आशा-निराशा में सम, जीवन-मृत्यु में सम हो कर, इसी तरह लय को प्राप्त हो।”

सन्दर्भचौथी method: equanimity। यह सबसे practical है। तीन pairs में सम। इसको करने वाली चीज़ से ज़्यादा होने वाली चीज़ समझो। यह बल लगाने से भी कम, ज्ञान से ज़्यादा आती है। जब पता है “मैं” चेतना है, तो pairs अपने आप बराबर लगते हैं।

पाठक के लिए“समजीवितमृत्युः”। जीवन-मृत्यु को बराबर देखना। यह सबसे tough है, क्योंकि शरीर instinctively जीवन की तरफ़ खींचता है। पर ज्ञान deepen हो, तो यह instinct भी loose हो जाता है। मृत्यु एक event है, बस इतनी।

प्रकरण 5 ख़त्म। चार पंक्तियों में चार methods। हर एक के अन्त में “एवमेव लयं व्रज”। मतलब, बस इसी तरह घुल जा। कुछ करने या बनने की कोशिश छोड़ कर, सीधे melt हो जा।

॥ लय ॥