पाँचवें-प्रकरण का नाम ‘लय’ है, यानी विलीन-हो-जाना। बौद्ध-धर्म के ‘निर्वाण’ से तुलना यहाँ रोचक है, मगर लय निर्वाण से भिन्न है। निर्वाण एक तरह की ‘बुझ-जाना’ है, लय एक तरह की ‘एक-हो-जाना’। यह अन्तर बहुत-सूक्ष्म है, और श्रद्धा-सिंह की ‘अद्वैत और बौद्ध-दर्शन’ (1981) में विस्तृत-चर्चा है। अष्टावक्र का लय-विवरण भगवद्गीता के ‘योग’ से भी अलग है। गीता में योग एक अभ्यास है, लय एक स्थिति है, और न ही प्राप्य-वस्तु। यह दार्शनिक-स्थिति बाद में आचार्य-शंकर ने ‘विवेक–चूड़ामणि’ में दोहराया।पाठ्य-संगति
लय
Dissolution · 4 श्लोक
सिर्फ़ चार श्लोक। हर एक का अन्त एक ही phrase से, “एवमेव लयं व्रज”, “इसी तरह लय को प्राप्त हो”। अष्टावक्र चार-चार methods बता कर कह रहे हैं, अब विसर्जित हो जा।
पाँचवें प्रकरण में “लय” शब्द आता है। यह बौद्ध-शब्दावली का “निरोध” से मिलता-जुलता है, मगर अष्टावक्र की व्याख्या इसे एक-तरह की प्राकृतिक स्थिति बताती है, अभ्यास का परिणाम नहीं। चार-तरह की लय का वर्णन, जो आगे योग-वसिष्ठ-रचना में और विस्तार पाएगा।

सङ्घातविलयं कुर्वन्नेवमेव लयं व्रज॥
saṅghāta-vilayaṁ kurvann evam eva layaṁ vraja
अर्थ“आपका किसी से कोई सङ्ग (attachment) नहीं। आप शुद्ध है, क्या छोड़ना चाहता है? पंच-संघात (शरीर) को विसर्जित करते हुए, इसी तरह लय को प्राप्त हो।”
पाठक के लिए“शुद्धस्त्यक्तुमिच्छसि?” “शुद्ध हो कर क्या छोड़ना चाहता है?” यह वो moment है जब साधक “त्याग” के पीछे भागना छोड़ता है। त्याग भी एक action है। ज्ञानी action से उठकर एक recognition में रहता है।
इति ज्ञात्वैकमात्मानमेवमेव लयं व्रज॥
iti jñātvaikam ātmānam evam eva layaṁ vraja
अर्थ“आपसे विश्व उठता है, जैसे समुद्र से बुलबुला। आत्मा को एक जान कर, इसी तरह लय को प्राप्त हो।”
पाठक के लिएएक experiment। यह screen को देख रहे हैं। यह “उठ” कब रहा है? इसी moment, चेतना में। अगर चेतना न हो, screen “नहीं” है। तो screen का “होना” चेतना पर depend है। तो screen चेतना का बुलबुला है।
रज्जुसर्प इव व्यक्तमेवमेव लयं व्रज॥
rajju-sarpa iva vyaktam evam eva layaṁ vraja
अर्थ“प्रत्यक्ष होते हुए भी, अ-वस्तुत्व के कारण, विश्व निर्मल आप में नहीं। जैसे रस्सी पर साँप दिखता हैं, इसी तरह लय को प्राप्त हो।”
पाठक के लिए“रज्जु-सर्प”। अँधेरे में रस्सी, साँप जैसी। रौशनी आते ही साँप गायब। साँप कहाँ गया? वो असल में कभी था ही नहीं, सिर्फ़ देखने की एक mistake थी। संसार वैसा ही है, ज्ञान की रौशनी आते ही “साँप” गायब, बस “रस्सी” बचती है।
समजीवितमृत्युः सन्नेवमेव लयं व्रज॥
sama-jīvita-mṛtyuḥ sann evam eva layaṁ vraja
अर्थ“सुख-दुःख में सम, पूर्ण, आशा-निराशा में सम, जीवन-मृत्यु में सम हो कर, इसी तरह लय को प्राप्त हो।”
पाठक के लिए“समजीवितमृत्युः”। जीवन-मृत्यु को बराबर देखना। यह सबसे tough है, क्योंकि शरीर instinctively जीवन की तरफ़ खींचता है। पर ज्ञान deepen हो, तो यह instinct भी loose हो जाता है। मृत्यु एक event है, बस इतनी।
प्रकरण 5 ख़त्म। चार पंक्तियों में चार methods। हर एक के अन्त में “एवमेव लयं व्रज”। मतलब, बस इसी तरह घुल जा। कुछ करने या बनने की कोशिश छोड़ कर, सीधे melt हो जा।