‘तत्त्वस्वरूप’ सत्रहवाँ प्रकरण है, और संस्कृत-शब्द-निर्माण की दृष्टि से उल्लेखनीय। तत्त्व और स्वरूप मिल कर बनता है ‘मूल-स्वरूप’ या ‘सत्य का अपना रूप’। यह सामासिक पद भगवद्गीता के ‘तत्त्व-वेत्ता’ (4.34) से नाता रखता है, जहाँ कृष्ण कहते हैं कि जो तत्त्व को जानता है उसके पास जा कर सीखो। आधुनिक काल में स्वामी राम तीर्थ (1873-1906) ने अपने अमेरिका-व्याख्यानों में अष्टावक्र-गीता के इसी प्रकरण को बार-बार उद्धृत किया था। उनकी 1903 की कैलिफ़ोर्निया-यात्रा में अष्टावक्र पर तीन व्याख्यान दिए गए थे।पाठ्य-संगति
तत्त्वस्वरूप
ज्ञानी का स्वरूप · 20 श्लोक
अष्टावक्र अब एक चित्र खींच रहे हैं। बीस श्लोकों में जीवन्मुक्त ज्ञानी का स्वभाव। हर श्लोक एक रेखाचित्र है। पढ़ कर भीतर एक प्रश्न उठता है, क्या ऐसा भी सम्भव है?
यहाँ अष्टावक्र तत्त्व के स्वरूप पर विस्तार से बोलते हैं। तत्त्व का असली रूप क्या है, यह प्रश्न पतंजलि के योग-सूत्रों के बाद के दार्शनिक काल में बार-बार उठा। अष्टावक्र का उत्तर सीधा है, स्वरूप न कर्ता है, न भोक्ता, बस है।

अष्टावक्र पहले उसी पुरुष की ओर इशारा करते हैं जिसने ज्ञान का फल और योगाभ्यास का फल दोनों पा लिए। वह तृप्त है, उसकी इन्द्रियाँ निर्मल हैं, और वह नित्य अकेला ही रमता है। यह अकेलापन उदासी नहीं, पूर्णता का एक चिह्न है। आगे वे कहते हैं कि ऐसा तत्त्व-जानने वाला इस जगत में कभी खेद नहीं करता, क्योंकि वह जानता है कि उसी एक से यह सारा ब्रह्माण्ड-मण्डल भरा हुआ है। जब अकेला ही सब में व्याप्त है, तब अकेलेपन की कसक का प्रश्न ही नहीं रहता।
श्लोक 1 · 2
तेन ज्ञानफलं प्राप्तं योगाभ्यासफलं तथा।
तृप्तः स्वच्छेन्द्रियो नित्यमेकाकी रमते तु यः॥
न कदाचिज्जगत्यस्मिन्तत्त्वज्ञो हन्त खिद्यति।
यत एकेन तेनेदं पूर्णं ब्रह्माण्डमण्डलम्॥
विषय उस स्व-आराम वाले पुरुष को कभी हर्षित नहीं कर पाते, ठीक जैसे सल्लकी के मीठे पत्तों में रमे हाथी को नीम के कड़वे पत्ते नहीं लुभाते। भीतर के सुख का स्वाद एक बार लग जाए, तो बाहर के स्वाद फीके पड़ जाते हैं, और यह दमन से नहीं, अपने आप होता है। और तो और, जो भोगे हुए सुखों की स्मृति में बँधता नहीं, और न भोगे हुओं की लालसा भी नहीं रखता, ऐसा पुरुष संसार में दुर्लभ है। भोग चाहने वाले बहुत हैं, मोक्ष चाहने वाले भी दिखते हैं, पर भोग और मोक्ष दोनों से ही निराकांक्षी ऐसा महाशय विरला ही मिलता है।
श्लोक 3 · 4 · 5
न जातु विषयाः केऽपि स्वारामं हर्षयन्त्यमी।
सल्लकीपल्लवप्रीतमिवेभं निम्बपल्लवाः॥
यस्तु भोगेषु भुक्तेषु न भवत्यधिवासितः।
अभुक्तेषु निराकाङ्क्षी तादृशो भवदुर्लभः॥
बुभुक्षुरिह संसारे मुमुक्षुरपि दृश्यते।
भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी विरलो हि महाशयः॥
किसी उदार-चित्त वाले के लिए धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष, और जीवन-मरण में भी कुछ त्याज्य या ग्राह्य नहीं रहता। मनुष्य की सारी दौड़ इन्हीं छह से जूझने में बीतती है, और ज्ञानी इन छहों के पार खड़ा है। न उसे विश्व के विलीन होने की इच्छा है, न उसके बने रहने से कोई द्वेष। जो जीविका सहज मिल जाए, उसी में वह धन्य पुरुष सुख से रहता है, न अधिक की चाह, न कम का रोष। और वह तो यह जान कर कि ‘इस ज्ञान से हम कृतार्थ हो गए’ अपनी बुद्धि को वहीं गला देता है, फिर देखते, सुनते, छूते, सूँघते और खाते हुए भी वह सुख से ही रहता है। काम सब होते रहते हैं, पर ‘हम कर रहे हैं’ का भाव गल चुका होता है।
श्लोक 6 · 7 · 8
धर्मार्थकाममोक्षेषु जीविते मरणे तथा।
कस्याप्युदारचित्तस्य हेयोपादेयता न हि॥
वाञ्छा न विश्वविलये न द्वेषस्तस्य च स्थितौ।
यथा जीविकया तस्माद् धन्य आस्ते यथासुखम्॥
कृतार्थोऽनेन ज्ञानेनेत्येवं गलितधीः कृती।
पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्न् अश्नन्नस्ते यथासुखम्॥
जिसके लिए संसार-सागर क्षीण हो गया, उसकी दृष्टि शून्य-सी है, चेष्टा मानो व्यर्थ, इन्द्रियाँ शिथिल। उसमें न किसी की चाह बची, न किसी से विरक्ति। आँख देखती तो है, पर देखने में कोई आसक्ति नहीं रहती। उस मुक्त-चेता की दशा और भी विलक्षण है, वह न ठीक से जागता-सा है, न सोता-सा, न आँख खोलता है, न बन्द करता है। अहो, मुक्त-चित्त की वह परम दशा किसी और ही लोक में बीतती है, जहाँ जागने और सोने का भेद ही ढह जाता है।
श्लोक 9 · 10
शून्या दृष्टिर्वृथा चेष्टा विकलानीन्द्रियाणि च।
न स्पृहा न विरक्तिर्वा क्षीणसंसारसागरे॥
न जागर्ति न निद्राति नोन्मीलति न मीलति।
अहो परदशा क्वापि वर्तते मुक्तचेतसः॥
ऐसा मुक्त पुरुष हर जगह स्वस्थ दिखता है, हर जगह उसका आशय निर्मल है। सारी वासनाओं से छूट कर वह जहाँ भी हो, वहीं राजमान होता है। यह राजसी ठाठ बाहरी मुद्रा नहीं, भीतर की वासना–मुक्ति से अपने आप झलकता हुआ तेज है। देखते, सुनते, छूते, सूँघते, खाते, पकड़ते, बोलते और चलते हुए, इच्छा और अनिच्छा दोनों के बन्धन से छूटा हुआ वह महाशय मुक्त ही है। आठ साधारण काम चलते रहते हैं, पर भीतर कोई सूक्ष्म प्रेरणा उन्हें खींच नहीं रही होती।
श्लोक 11 · 12
सर्वत्र दृश्यते स्वस्थः सर्वत्र विमलाशयः।
समस्तवासनामुक्तो मुक्तः सर्वत्र राजते॥
पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्न् अश्नन् गृह्णन् वदन् व्रजन्।
ईहितानीहितैर्मुक्तो मुक्त एव महाशयः॥
वह न किसी की निन्दा करता है, न स्तुति; न हर्षित होता है, न क्रुद्ध; न देता है, न लेता है। हर जगह उसका मन नीरस-सा है, मानो किसी एक स्वाद की पकड़ ही न रही हो। राग भरी स्त्री सामने आ खड़ी हो या मृत्यु स्वयं द्वार पर आ जाए, उसका मन विचलित नहीं होता, वह स्वस्थ बना रहता है, और यही उसके मुक्त होने की कसौटी है। सुख हो या दुःख, पुरुष हो या स्त्री, सम्पत्ति हो या विपत्ति, उस धीर पुरुष के लिए कहीं कोई भेद नहीं, वह हर जगह सम-दर्शी है।
श्लोक 13 · 14 · 15
न निन्दति न च स्तौति न हृष्यति न कुप्यति।
न ददाति न गृह्णाति मुक्तः सर्वत्र नीरसः॥
सानुरागां स्त्रियं दृष्ट्वा मृत्युं वा समुपस्थितम्।
अविह्वलमनाः स्वस्थो मुक्त एव महाशयः॥
सुखे दुःखे नरे नार्यां सम्पत्सु च विपत्सु च।
विशेषो नैव धीरस्य सर्वत्र समदर्शिनः॥
जिसका संसार-भ्रमण क्षीण हो चुका, उस पुरुष में न हिंसा रहती है, न करुणा, न उद्धतपन, न दीनता, न आश्चर्य, न कोई विकार। करुणा भी नहीं, यह सुन कर चौंक होती है, पर अष्टावक्र की दृष्टि से करुणा भी एक भाव ही है, और ज्ञानी भावों के पार है; वह सहायता करता तो है, पर बिना भीतर किसी पीड़ा में डूबे। ऐसा मुक्त न तो विषयों से द्वेष करता है, न उनके लिए लोलुप होता है; असंसक्त मन से वह जो मिले और जो न मिले, दोनों को सहज भोगता रहता है।
श्लोक 16 · 17
न हिंसा नैव कारुण्यं नौद्धत्यं न च दीनता।
नाश्चर्यं विकृतिर्नैव क्षीणसंसरणे नरे॥
न मुक्तो विषयद्वेष्टा न वा विषयलोलुपः।
असंसक्तमना नित्यं प्राप्ताप्राप्तमुपाश्नुते॥
समाधान और असमाधान, हित और अहित, इन सब विकल्पों को वह शून्य-चित्त पुरुष जानता ही नहीं, मानो वह कैवल्य में ही बैठा हो। उसका मन अब वर्गों और निर्णयों से खाली है। ममता से रहित, अहंकार से रहित, इस निश्चय में स्थिर कि कुछ भी सार-रूप नहीं, और भीतर से सारी आशाएँ गल चुकी हैं, वह करते हुए भी कुछ नहीं करता। और अन्त में, मन के प्रकाश, सम्मोह, स्वप्न और जड़ता से छूट कर वह किसी अनिर्वचनीय दशा को पा लेता है, जहाँ मन पूरी तरह गल चुका होता है। यहीं अष्टावक्र का यह चित्र पूरा होता है, बीस रेखाचित्र, ज्ञानी के बीस कोण; इन्हें एक-एक कर अपनाने की चेष्टा नहीं, बस इतना पहचान लेना है कि यह दशा सम्भव है।
श्लोक 18 · 19 · 20
समाधानासमाधानहिताहितविकल्पनाः।
शून्यचित्तो न जानाति कैवल्यमिव संस्थितः॥
निर्ममो निरहंकारो न किञ्चिदिति निश्चितः।
अन्तर्गलितसर्वाशः कुर्वन्नपि करोति न॥
मनःप्रकाशसम्मोहस्वप्नजाड्यविवर्जितः।
दशां कामपि सम्प्राप्तो भवेद् गलितमानसः॥