पाठ्य-संगति
‘स्वास्थ्य’ सोलहवाँ प्रकरण है। स्व-में-स्थित-होना। यह शब्द आज की हिन्दी में ‘सेहत’ का पर्याय बन गया है, मगर इसका मूल अर्थ कहीं अधिक गहरा है। ‘स्थ’ धातु यानी ‘खड़े रहना’, और ‘स्व’ यानी ‘अपना’। तो ‘स्वस्थ’ का अर्थ हुआ, ‘अपने में खड़ा’।
आगे चल कर रामकृष्ण परमहंस की ‘सहज समाधि’ और रमण महर्षि की ‘स्व-स्थ-स्थिति’, दोनों का दार्शनिक आधार इसी संस्कृत शब्द में बैठा है। दोनों ने इसी आधार पर अद्वैत की प्रतिष्ठा की।
स्वास्थ्य
अपने में ठहराव · 11 श्लोक
अष्टावक्र की एक बात बार-बार लौट कर आती है, “सब भूल जाइए।” यह बड़ी निडर बात है। शास्त्र भी, अभ्यास भी, सब भुला दीजिए। तभी आत्मा का स्वास्थ्य।
सोलहवें प्रकरण में यही “स्वास्थ्य” शब्द आता है, और इसका अर्थ आज की वैद्य-शब्दावली से अलग है। यहाँ “स्व-स्थ” यानी “अपने में स्थित”, आत्म-स्थिति का संकेत। यह व्युत्पत्ति आयुर्वेद की “सुश्रुत-संहिता” में भी इसी रूप में बताई गई है।

अष्टावक्र अपने शिष्य की ओर मुड़ते हैं और बात की शुरुआत ही एक चौंका देने वाले वचन से करते हैं। बेटा, चाहे आप अनेकों शास्त्रों को बार-बार बोलते रहिए या सुनते रहिए, फिर भी आपको वह स्वास्थ्य, वह अपने में ठहराव नहीं मिलेगा, जब तक सब कुछ भुला न दें। “सब का विस्मरण”, यह बात बड़ी निडर है। क्या ज्ञान भी “भूलने” की चीज़ है? हाँ। जो ज्ञान केवल विचार में अटक गया, वह अभी ज्ञान कहाँ हुआ। पूरी विस्मृति में जब “मैं” का स्मरण भी न रहे, तभी असली स्वास्थ्य प्रकट होता है। यह भूलना भूल जाने जैसी कोई बात नहीं, यह तो उन सब धारणाओं को रख देना है जो “मैं” से चिपकी रहती हैं। शास्त्र पढ़िए, फिर रख दीजिए। उसी रख देने में स्वास्थ्य छिपा है।
श्लोक 1
आचक्ष्व शृणु वा तात नानाशास्त्राण्यनेकशः।
तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणाद् ऋते॥
फिर वे विवेकी शिष्य को एक खुली छूट देते हैं। हे विज्ञ, चाहे भोग कीजिए, चाहे कर्म कीजिए, चाहे समाधि कीजिए, तीनों कर लीजिए। पर असली बात यह है कि जब आपका चित्त सब आशाओं से रहित हो जाएगा, तभी वह अत्यंत आनन्द में रमेगा। भोग, कर्म और समाधि, तीनों रास्ते खुले हैं, मगर आनन्द तभी आता है जब “आशा” छूट जाती है। असल अड़चन तो चिपकाव की है। आप जो भी कर रहे हों, उसमें एक बार जाँच लीजिए, क्या उसके पीछे कोई आशा बैठी है? अगर “हमें तो यही फल चाहिए” का भाव है, तो आशा अब भी जीवित है। उसे गिरा दीजिए, काम वही रहेगा, मगर उसका स्वाद बदल जाएगा।
श्लोक 2
भोगं कर्म समाधिं वा कुरु विज्ञ तथापि ते।
चित्तं निरस्तसर्वाशम् अत्यर्थं रोचयिष्यति॥
अब अष्टावक्र एक ऐसी बात कहते हैं जो हमारी रोज़ की समझ को उलट देती है। प्रयत्न से ही सब लोग दुःखी हैं, पर यह बात कोई जानता ही नहीं। इसी एक उपदेश से कोई धन्य पुरुष शान्ति को पा जाता है। हम तो सोचते हैं कि प्रयत्न से सुख मिलता है, मगर हर प्रयत्न के भीतर एक “कमी” का बोध छिपा रहता है, और यही कमी का बोध दुःख है। एक बार अपने सब पाए हुए लक्ष्यों को याद कीजिए। हर एक में एक वह क्षण था जब “हमें यह चाहिए” से “हो गया” की ओर छलाँग लगी। उस छलाँग के बाद का सुख थोड़ी ही देर ठहरा, और फिर “अगला” शुरू हो गया।
श्लोक 3
आयासात्सकलो दुःखी नैनं जानाति कश्चन।
अनेनैवोपदेशेन धन्यः प्राप्नोति निर्वृतिम्॥
यहाँ अष्टावक्र थोड़ा छेड़ने के अंदाज़ में कहते हैं। जो आँख की पलक झपकाने जैसे छोटे से काम में भी थकान अनुभव करे, उस आलस्य के सिरमौर को ही सुख है, और किसी को नहीं। “आलस्य का सिरमौर”, यह कहते हुए वे जान-बूझ कर बात को तीखा कर देते हैं। जिसे आँख का खुलना-बन्द होना भी “बहुत हुआ” लगे, उस गहरे विश्राम में ही सुख बसता है। इस श्लोक को अक्षरशः मत लीजिए, आँख तो खुलेगी ही, बन्द भी होगी। पर इसका मर्म यही है, कम से कम कर्म, और अधिक से अधिक ठहराव। आज जितना करना ज़रूरी न हो, उतना कम कीजिए।
श्लोक 4
व्यापारे खिद्यते यस्तु निमेषोन्मेषयोरपि।
तस्यालस्यधुरीणस्य सुखं नान्यस्य कस्यचित्॥
अब वे एक और गहरी बात खोलते हैं। “यह किया, यह नहीं किया”, इन दोनों द्वन्द्वों से जब मन छूट जाता है, तब वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष, चारों में निरपेक्ष हो जाता है। चारों पुरुषार्थों में यह निरपेक्षता हिन्दू-चिन्तन का बड़ा निडर मोड़ है, चारों लक्ष्यों को ही छोड़ देना, सब उद्देश्यों से ऊपर उठ जाना। आप किसी भी काम में हों, अपने आप से पूछिए, “यह किस लक्ष्य के लिए है?” अगर उत्तर “धर्म, अर्थ, काम या मोक्ष” है, तो आप अभी किसी न किसी दौड़ में हैं। ठहर कर फिर सोचिए, क्या यह दौड़ कभी थम भी सकती है।
श्लोक 5
इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तं यदा मनः।
धर्मार्थकाममोक्षेषु निरपेक्षं तदा भवेत्॥
अब अष्टावक्र तीन व्यक्तियों को आमने-सामने रखते हैं। विरक्त वह है जो विषयों से द्वेष करता है, और रागी वह जो विषयों से चिपका रहता है। मगर जो ग्रहण और त्याग, दोनों से ऊपर है, वह न विरक्त है न रागी। देखिए, रागी चाहता है, विरक्त नहीं चाहता, पर ज्ञानी न चाहता है न नहीं चाहता। पहली दो स्थितियाँ ऊपर से उलटी दिखती हैं, मगर भीतर का खेल एक ही है, “हम बनाम चीज़ें”। इसीलिए विरक्ति को ही मंज़िल मान लेना भूल है, क्योंकि विरक्त भी रागी का ही दर्पण-रूप है। ज्ञानी तीसरी जगह खड़ा है, तटस्थ, पसन्द-नापसन्द से परे।
श्लोक 6
विरक्तो विषयद्वेष्टा रागी विषयलोलुपः।
ग्रहमोक्षविहीनस्तु न विरक्तो न रागवान्॥
फिर वे संसार को एक वृक्ष का रूप देते हैं। यह छोड़ना और पकड़ना ही संसार-वृक्ष का अंकुर है। जब तक भीतर कोई चाह जीवित है, तब तक निर्विचार-दशा की नींव नहीं पड़ती। संसार तो बड़ा-सा पेड़ है, मगर उसका बीज कहाँ छिपा है? इसी “यह रखूँ, यह छोड़ूँ” के चुनाव में। हर ऐसा निर्णय एक नई पत्ती उगा देता है। निर्विचार-दशा अद्वैत में एक सहज अवस्था है, इसे किसी मंज़िल की तरह बाँधने की ज़रूरत नहीं। और अगर “हमें निर्विचार चाहिए”, यही चाह बन जाए, तो वही चाह सबसे बड़ी अड़चन बन बैठती है।
श्लोक 7
हेयोपादेयता तावत्संसारविटपाङ्कुरः।
स्पृहा जीवति यावद्वै निर्विचारदशास्पदम्॥
अब वे एक बच्चे की ओर इशारा करते हैं। प्रवृत्ति में राग जन्म लेता है और निवृत्ति में द्वेष; पर धीर पुरुष द्वन्द्वों से परे, बालक की तरह, बस वैसे ही स्थित रहता है। बालक प्रवृत्ति और निवृत्ति में चुनाव नहीं करता, वह बस “है”। न किसी चीज़ के पीछे दौड़ता है, न किसी से भागता है। यही ज्ञानी की अवस्था है। किसी छोटे बच्चे को देखिए, उसकी भोली सूरत को नहीं, उसकी सहज तटस्थता को। बच्चा क्रोध करता है, हँसता है, और अगले ही पल सब भूल जाता है। ज्ञानी भी ठीक यही अवस्था जीता है, पर पूरे होश के साथ।
श्लोक 8
प्रवृत्तौ जायते रागो निर्वृत्तौ द्वेष एव हि।
निर्द्वन्द्वो बालवद्धीमान् एवमेव व्यवस्थितः॥
यहाँ एक गहरी विडम्बना खुलती है। रागी संसार को छोड़ना चाहता है, इसलिए कि दुःख से बच जाए। मगर जो वीतराग है, वह तो निर्दुःख ही है, इसलिए संसार में रहते हुए भी उसे कोई खेद नहीं होता। साधक संसार इसलिए छोड़ना चाहता है ताकि दुःख से बच निकले, पर ज्ञानी, जो वीतराग है, उसके पास दुःख ही नहीं बचा। तो फिर संसार छोड़ने की आवश्यकता ही कहाँ रही। “संसार छोड़ो” का बुलावा अक्सर दुःख के डर से उठता है। मगर ज्ञान का बुलावा यह है, दुःख की जड़ को ही काट दीजिए, फिर संसार अपने आप ठीक हो जाता है।
श्लोक 9
हातुमिच्छति संसारं रागी दुःखजिहासया।
वीतरागो हि निर्दुःखस्तस्मिन्नपि न खिद्यति॥
अब अष्टावक्र एक सूक्ष्म जाल की ओर ध्यान दिलाते हैं। जिसको मोक्ष में भी अभिमान है, और देह में अब भी ममता है, वह न ज्ञानी है न योगी, वह तो बस दुःख का भागी है। “मोक्ष का अभिमान”, यही सबसे महीन फंदा है। “हमने मोक्ष पा लिया”, “हम मुक्त हो गए”, अगर यह अहंकार बच गया तो ज्ञान आधा ही रह गया। पूरा ज्ञान वही है जिसमें “हमने पाया” का भाव भी गिर जाए। आज जहाँ देखिए, बहुत से “मुक्त” लोग मिल जाएँगे, हर एक की अपनी छाप। इस श्लोक से एक बार जाँच लीजिए, “कहीं मोक्ष का अभिमान तो शेष नहीं?” अगर है, तो अभी काम बाकी है।
श्लोक 10
यस्याभिमानो मोक्षेऽपि देहेऽपि ममता तथा।
न च ज्ञानी न वा योगी केवलं दुःखभाग् असौ॥
और अन्त में अष्टावक्र वहीं लौट आते हैं जहाँ से प्रकरण शुरू हुआ था। चाहे शिव स्वयं आपके उपदेष्टा हों, चाहे विष्णु, चाहे कमल से जन्मे ब्रह्मा, फिर भी आपको स्वास्थ्य नहीं मिलेगा, जब तक सब कुछ भुला न दें। प्रकरण की शुरुआत भी “सब भूल” से हुई थी, और अन्त भी वहीं हुआ; बीच के नौ श्लोक तो उसी एक बात का विस्तार थे। यही दोनों छोरों की समरूपता इस प्रकरण को बल देती है। अन्तिम सन्देश यह है, कोई भी बाहरी गुरु, चाहे स्वयं शिव ही क्यों न आ कर कहें, तब भी आपके “सब भुलाए बिना” बात नहीं बनेगी। ज्ञान बाहर से आता है, मगर उसका अनुभव भीतर ही होता है।
श्लोक 11
हरो यद्युपदेष्टा ते हरिः कमलजोऽपि वा।
तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणाद् ऋते॥