‘जीवन्मुक्ति’ अठारहवाँ-और-सबसे-बड़ा प्रकरण है, सौ-श्लोक से अधिक। जीवित-रहते-हुए मोक्ष की अवधारणा भारतीय-दर्शन का एक अपना योगदान है। ईसाई और इस्लामी-परम्पराओं में मुक्ति मृत्यु-के-बाद आती है। हिन्दू-बौद्ध-जैन-तीनों में जीवन्मुक्ति की स्थापना है। आधुनिक-काल में आर. के. नारायण के उपन्यास ‘द गाइड’ (1958) में और सत्यजित राय की फ़िल्म ‘अपराजितो’ (1956) में जीवन्मुक्त-व्यक्तित्व-चित्रण देखा जा सकता है। ये दोनों कलाकार बौद्धिक-स्तर पर अष्टावक्र के दर्शन से परिचित थे।पाठ्य-संगति
जीवन्मुक्ति
Liberation in Life · 100 श्लोक
अष्टावक्र का सबसे लम्बा प्रकरण। सौ श्लोक, और हर श्लोक एक ही अद्वैत–ज्ञानी की दशा को किसी नए कोण से छूता है। यहाँ पूरी रचना का सार एक जगह बँध आया है। पढ़ते रहिए, बार-बार। बाद के एक जन्म में रमण महर्षि को यही प्रकरण सबसे प्रिय था।
अठारहवाँ प्रकरण “जीवन्मुक्ति” का वर्णन रखता है, यानी जीवित-रहते-मुक्ति। यह भाव अष्टावक्र-गीता और योग-वसिष्ठ में सबसे विस्तार से मिलता है। बाद की वेदान्त-परम्परा में जीवन्मुक्ति-विवेक (1450 के क़रीब विद्यारण्य-स्वामी द्वारा रचित) इसी सिद्धान्त पर सबसे विस्तृत ग्रंथ है।

अष्टावक्र पहले प्रणाम करते हैं, और प्रणाम भी उस ओर जहाँ बोध जागते ही सारा भ्रम स्वप्न-सा बिखर जाता है। वही सुख-रूप, वही शान्त, वही तेज, शान्ति और तेज एक ही दशा के दो रूप। फिर वे एक टका-सी बात कहते हैं। सब कुछ कमा लीजिए, अनगिनत भोग बटोर लीजिए, फिर भी भीतर के सर्व-त्याग के बिना, उस “मेरा” के छूटे बिना, सुख नहीं उतरता। कर्तव्य का बोझ एक सूरज की तरह भीतर जलाता रहता है, और उस आग को बुझाने वाली प्रशम की अमृत-धारा के बिना अन्तरात्मा कैसे शीतल हो। यह संसार तो बस भावना-मात्र है, परमार्थ में कुछ भी नहीं।
श्लोक 1 से 4
तस्मै सुखैकरूपाय नमः शान्ताय तेजसे॥
न हि सर्वपरित्यागमन्तरेण भवेत्सुखी॥
कुतः प्रशमपीयूषधारासारमृते सुखम्॥
नास्त्यभावः स्वभावानां भावाभावविभाविनाम्॥
अष्टावक्र अब उस मर्म पर आते हैं जो पूरे अद्वैत का बीज है। आत्मा का वह पद न कहीं दूर है, न किसी संकोच से दूर हुआ है, वह तो पहले से मिला ही हुआ है, निर्विकल्प, निर्आयास, निर्विकार, निरंजन। भ्रम भर हट जाए और स्वरूप स्वीकार हो जाए, तो मनुष्य शोक-रहित हो कर बिना किसी पर्दे की दृष्टि से दीप्त हो उठता है। और जब यह जान लिया कि सब कुछ कल्पना है और आत्मा तो सदा से मुक्त और सनातन है, तब धीर बालक की तरह कोई अभ्यास क्यों दोहराए। “आत्मा ब्रह्म है” यह निश्चय कर लेने पर, भाव और अभाव दोनों कल्पित ठहर जाते हैं, और निष्काम पुरुष के पास फिर न कुछ जानना बचता है, न बोलना, न करना।
श्लोक 5 से 8
निर्विकल्पं निरायासं निर्विकारं निरञ्जनम्॥
वीतशोका विराजन्ते निरावरणदृष्टयः॥
इति विज्ञाय धीरो हि किमभ्यस्यति बालवत्॥
निष्कामः किं विजानाति किं ब्रूते च करोति किम्॥
जो योगी “सब आत्मा है” यह निश्चय कर के मौन हो गया, उसकी “यह मैं हूँ, यह मैं नहीं” वाली सारी विकल्पना क्षीण हो जाती है। उपशान्त की दशा में न विक्षेप रहता है न एकाग्रता, न अति-बोध न मूढता, न सुख न दुःख, हर जोड़ी गिर जाती है, और यह कोई सधा-सा सन्तुलन नहीं, इन सबके पार की दशा है। राज-सिंहासन हो या भीख का कटोरा, लाभ हो या हानि, भीड़ हो या जंगल, निर्विकल्प स्वभाव वाले योगी को कहीं कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। और जो “यह किया, यह नहीं किया” के द्वन्द्वों से मुक्त है, उसके लिए धर्म कहाँ, अर्थ कहाँ, काम कहाँ, और विवेक तक कहाँ।
श्लोक 9 से 12
सर्वमात्मेति निश्चित्य तूष्णीम्भूतस्य योगिनः॥
न सुखं न च वा दुःखमुपशान्तस्य योगिनः॥
निर्विकल्पस्वभावस्य न विशेषोऽस्ति योगिनः॥
इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तस्य योगिनः॥
यहीं पहली बार वह शब्द आता है जो इस प्रकरण का प्राण है, जीवन्मुक्त, जीते-जी मुक्त। ऐसे योगी के लिए न कोई करने योग्य काम बचता है, न हृदय में किसी चीज़ का राग, बस जो जीवन चल रहा है वही उसका सहज ढंग है। सब संकल्पों की सीमा पर विश्रान्त उस महात्मा के लिए मोह कहाँ, विश्व कहाँ, ध्यान कहाँ, और मुक्ति तक कहाँ। जिसने विश्व को देखा है वही उसे “यह है ही नहीं” कह कर त्याग सकता है, पर जिसमें वासना ही नहीं बची, वह तो देखते हुए भी नहीं देखता। और जिसने परम ब्रह्म को देख लिया वही “मैं ब्रह्म हूँ” सोच सकता है, पर जो दूसरा कुछ देखता ही नहीं, वह निश्चिन्त किसका चिन्तन करे।
श्लोक 13 से 16
यथा जीवनमेवेह जीवन्मुक्तस्य योगिनः॥
सर्वसङ्कल्पसीमायां विश्रान्तस्य महात्मनः॥
निर्वासनः किं कुरुते पश्यन्नपि न पश्यति॥
किं चिन्तयति निश्चिन्तो द्वितीयं यो न पश्यति॥
जिसने भीतर अपने ही विक्षेप को देखा, वही उसे रोकने का यत्न करता है, पर उदार पुरुष विक्षिप्त ही नहीं होता, तो जब पाने को कुछ शेष ही नहीं तो वह रोके भी क्या। धीर भीतर से सारे लोक के विपरीत है, फिर भी बाहर लोक की ही तरह बरतता है, और अपने में न कोई समाधि देखता है, न विक्षेप, न कोई लेप। भाव-अभाव से रहित, तृप्त, वासना-शून्य वह ज्ञानी लोक की आँखों में करता हुआ भी कुछ नहीं करता। प्रवृत्ति में रहे या निवृत्ति में, धीर को कोई पकड़ नहीं बाँधती, जब जो सामने आ पड़े वही कर के वह सुख से ठहर जाता है।
श्लोक 17 से 20
उदारस्तु न विक्षिप्तः साध्याभावात्करोति किम्॥
न समाधिं न विक्षेपं न लेपं स्वस्य पश्यति॥
नैव किञ्चित्कृतं तेन लोकदृष्ट्या विकुर्वता॥
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वा तिष्ठते सुखम्॥
वासना से मुक्त, किसी सहारे से रहित, स्वच्छन्द और बन्धन-मुक्त यह पुरुष संस्कारों की हवा में सूखे पत्ते की तरह उड़ता है, हवा जिधर ले जाए उधर बह जाता है, कहीं कोई प्रतिरोध नहीं। संसार जिसके लिए रहा ही नहीं, उसे कहीं हर्ष नहीं, कहीं विषाद नहीं, वह नित्य शीतल-मन हो कर मानो देह के बिना ही दीप्त रहता है। न कहीं कुछ छोड़ने की चाह, न कहीं नाश का डर, आत्मा में ही रमता वह धीर भीतर से और भी शीतल, और भी निर्मल होता जाता है। स्वभाव से ही जिसका चित्त शून्य है और जो बच्चे की तरह अनायास काम किए जाता है, उसे न मान छूता है न अपमान।
श्लोक 21 से 24
क्षिप्तः संस्कारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत्॥
स शीतलमनानित्यमविदेह इव राजते॥
आत्मारामस्य धीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः॥
प्राकृतस्येव धीरस्य न मानो नावमानता॥
“यह कर्म तो देह से हुआ, मुझ शुद्ध-स्वरूप से नहीं”, इस भाव में बसा हुआ जो रहता है, वह करता हुआ भी नहीं करता। ऊपर से वह ऐसे बरतता है मानो कुछ मानता ही न हो, फिर भी मूर्ख नहीं, यही जीवन्मुक्त है, सुखी, श्रीमान्, संसार में रहते हुए भी शोभित। अनेक विचारों से थका हुआ धीर अब विश्राम में आ बैठा है, अब न वह कल्पना करता है, न जन्म लेता है, न सुनता है, न देखता है, पुनर्जन्म की कड़ी ही टूट गई। न समाधि के अभाव से, न विक्षेप के अभाव से, वह न मुमुक्षु रहा न और कुछ, कल्पित को कल्पित जान कर वह महाशय बस ब्रह्म ही हो कर रहता है।
श्लोक 25 से 28
इति चिन्तानुरोधी यः कुर्वन्नपि करोति न॥
जीवन्मुक्तः सुखी श्रीमान् संसरन्नपि शोभते॥
न कल्पते न जाति न शृणोति न पश्यति॥
निश्चित्य कल्पितं पश्यन्ब्रह्मैवास्ते महाशयः॥
जिसके भीतर अहंकार बैठा है, वह न करते हुए भी करने वाला बन जाता है, पर अहंकार-रहित धीर के लिए न कुछ किया हुआ है, न अनकिया। मुक्त का चित्त ऐसा होता है, न उद्विग्न, न सन्तुष्ट, अकर्ता, स्पन्द से रहित, आशा-रहित और सन्देह-रहित। उसका चित्त न तो ध्यान में लगने को उठता है, न किसी चेष्टा में, फिर भी बिना किसी निमित्त के वह “मैं ध्यान में हूँ” जैसा बना रहता है। उधर मन्द-बुद्धि का हाल उलटा है, तत्त्व को यथार्थ रूप में सुन कर वह और भी मूढ़ता में डूब जाता है या संकोच में सिमट जाता है, और कोई बिरला अमूढ़ ही ऊपर से मूढ़-सा दिखता है।
श्लोक 29 से 32
निरहंकारधीरेण न किञ्चिदकृतं कृतम्॥
निराशं गतसन्देहं चित्तं मुक्तस्य राजते॥
निर्निमित्तमिदं किन्तु निर्ध्यायेति विचेष्टते॥
अथवा याति सङ्कोचममूढः कोऽपि मूढवत्॥
मूढ़ लोग एकाग्रता और निरोध का बहुत-बहुत अभ्यास करते रहते हैं, पर धीर तो अपने ही पद में सोते-से स्थित रहते हैं, उन्हें कोई कर्तव्य दिखता ही नहीं। यत्न से हो या बिना यत्न के, मूढ़ शान्ति नहीं पाता, जबकि प्राज्ञ केवल तत्त्व के निश्चय-मात्र से शान्त हो जाता है। शुद्ध, बुद्ध, प्रिय, पूर्ण, प्रपंच से परे और निरामय उस आत्मा को, अभ्यास में ही उलझे रहने वाले लोग जान ही नहीं पाते। विमूढ़ कर्म से, अभ्यास के सहारे मोक्ष नहीं पाता, जबकि धन्य पुरुष केवल विज्ञान-मात्र से मुक्त हो कर अविकार स्थित रहता है।
श्लोक 33 से 36
धीराः कृत्यं न पश्यन्ति सुप्तवत्स्वपदे स्थिताः॥
तत्त्वनिश्चयमात्रेण प्राज्ञो भवति निर्वृतः॥
आत्मानं तं न जानन्ति तत्राभ्यासपरा जनाः॥
धन्यो विज्ञानमात्रेण मुक्तस्तिष्ठत्यविक्रियः॥
मूढ़ इसलिए ब्रह्म नहीं पाता क्योंकि उसे कुछ “बनने” की चाह है, जबकि धीर न चाहते हुए भी परब्रह्म-स्वरूप का भागी हो जाता है। आधार-हीन, पकड़ में उलझे हुए मूढ़ ही संसार को पालते-पोसते रहते हैं, और बुधजन इसी अनर्थ की जड़ को ही काट डालते हैं। मूढ़ इसलिए शान्ति नहीं पाता क्योंकि वह शान्त होने का यत्न करता है, जबकि धीर तत्त्व को निश्चित कर के सदा शान्त-मन रहता है। आत्मा का दर्शन उसका कहाँ जो किसी देखी हुई वस्तु का सहारा पकड़ता है, धीर तो उन भिन्न-भिन्न वस्तुओं को नहीं, उस अव्यय आत्मा को ही देखते हैं।
श्लोक 37 से 40
अनिच्छन्नपि धीरो हि परब्रह्मस्वरूपभाक्॥
एतस्यानर्थमूलस्य मूलच्छेदः कृतो बुधैः॥
धीरस्तत्त्वं विनिश्चित्य सर्वदा शान्तमानसः॥
धीरास्तं तं न पश्यन्ति पश्यन्त्यात्मानमव्ययम्॥
निरोध तो उसी विमूढ़ के लिए है जो भीतर कोई बँधन गढ़ता है, अपने में ही रमने वाले धीर का निरोध तो सहज है, बना-बनाया नहीं। कोई भाव का चिन्तन करता है, कोई “कुछ नहीं है” का, और कोई दोनों के अभाव का, पर इन सबसे परे जो रहा वही सच में निराकुल है। शुद्ध-अद्वय आत्मा की भावना तो कुबुद्धि भी करते हैं, पर मोह में फँसे रहने से जान नहीं पाते और जीवन भर अशान्त ही रहते हैं। मुमुक्षु की बुद्धि किसी न किसी सहारे के बिना टिकती ही नहीं, जबकि मुक्त की बुद्धि सदा निरालम्ब और निष्काम रहती है।
श्लोक 41 से 44
स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदासावकृत्रिमः॥
उभयाभावकः कश्चिदेवमेव निराकुलः॥
न तु जानन्ति सम्मोहाद्यावज्जीवमनिर्वृताः॥
निरालम्बैव निष्कामा बुद्धिर्मुक्तस्य सर्वदा॥
अष्टावक्र अब दो चित्र खींचते हैं। एक ओर विषय रूपी बाघों को देख कर डरे हुए लोग शरण की तलाश में झट से समाधि के कुम्भ में जा घुसते हैं, निरोध और एकाग्रता सिद्ध करने को। दूसरी ओर वासना-रहित को सिंह की तरह मौन देख कर विषय रूपी हाथी भाग भी नहीं पाते, उल्टे चाटुकारी कर के उसी की सेवा में लग जाते हैं। निःशंक और स्थिर-मन वाला तो मुक्ति का शास्त्र भी हाथ में नहीं थामता, वह देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, सब करता हुआ बस सुख से रहता है। तत्त्व को सुन लेने भर से जिसकी बुद्धि शुद्ध और निराकुल हो गई, वह न आचार देखता है, न अनाचार, न उदासीनता।
श्लोक 45 से 48
विशन्ति झटिति क्रोडं निरोधैकाग्रसिद्धये॥
पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः॥
पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्न् अश्नन्नस्ते यथासुखम्॥
नैवाचारमनाचारमौदास्यं वा प्रपश्यति॥
जब जो करने को सामने आ जाए, सरल चित्त वह वही कर लेता है, शुभ हो या अशुभ, उसकी चेष्टा बच्चे की चेष्टा जैसी सहज होती है। और फिर वह स्वातन्त्र्य की एक घोषणा करते हैं, स्वातन्त्र्य से सुख मिलता है, स्वातन्त्र्य से परम, स्वातन्त्र्य से शान्ति, स्वातन्त्र्य से ही परम पद। जब आत्मा अपने अकर्तृत्व और अभोक्तृत्व को मान लेती है, तभी चित्त की सारी वृत्तियाँ क्षीण हो जाती हैं। धीर की दशा भले उच्छृंखल और बिना सजावट की लगे, फिर भी वह दीप्त रहती है, जबकि चाह-भरे चित्त वाले मूढ़ की शान्ति बनावटी और झूठी होती है।
श्लोक 49 से 52
शुभं वाप्यशुभं वापि तस्य चेष्टा हि बालवत्॥
स्वातन्त्र्यान्निर्वृतिं गच्छेत्स्वातन्त्र्यात्परमं पदम्॥
तदा क्षीणा भवन्त्येव समस्ताश्चित्तवृत्तयः॥
न तु सस्पृहचित्तस्य शान्तिर्मूढस्य कृत्रिमा॥
कल्पना से रहित, अबद्ध और मुक्त-बुद्धि वाले धीर कभी महान् भोगों में विलास करते दिखते हैं, कभी पहाड़ की गुफाओं में बैठे, दोनों जगह वे समान हैं। वेदज्ञ हो, देवता हो, तीर्थ हो, स्त्री हो, राजा हो या कोई प्रिय, इन सबको देख कर और पूज कर भी धीर के हृदय में कोई वासना नहीं उठती। सेवक, पुत्र, पत्नी, दौहित्र, गोत्र के लोग, चाहे हँसी उड़ाएँ या तिरस्कार करें, योगी ज़रा भी विकृत नहीं होता। वह सन्तुष्ट दिख कर भी सन्तुष्ट नहीं, खिन्न दिख कर भी खिन्न नहीं, उसकी ये विचित्र दशाएँ बस वैसे ही पुरुष समझ पाते हैं।
श्लोक 53 से 56
निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः॥
दृष्ट्वा सम्पूज्य धीरस्य न कापि हृदि वासना॥
विहस्य धिक्कृतो योगी न याति विकृतिं मनाक्॥
तस्याश्चर्यदशां तां तां तादृशा एव जानते॥
कर्तव्य का यह भाव ही असल में संसार है, और ज्ञानीजन इसी कर्तव्यता को नहीं देखते, वे तो शून्य-आकार, निराकार, निर्विकार और निरामय हो जाते हैं। मूढ़-बुद्धि कुछ न करते हुए भी भीतर के क्षोभ से हर जगह व्यग्र रहता है, जबकि कुशल पुरुष काम करते हुए भी निराकुल बना रहता है। ऐसा शान्त-बुद्धि व्यवहार में भी सुख से बैठता है, सुख से सोता है, सुख से आता-जाता है, सुख से बोलता और खाता है। स्वभाव से ही जिसे पीड़ा नहीं छूती, लोक की तरह बरतते हुए भी, वह किसी बड़े झील की तरह अक्षुब्ध और क्लेश-रहित रह कर दीप्त होता है।
श्लोक 57 से 60
शून्याकाराः निराकाराः निर्विकाराः निरामयाः॥
कुर्वन्नपि तु कृत्यानि कुशलो हि निराकुलः॥
सुखं वक्ति सुखं भुंक्ते व्यवहारेऽपि शान्तधीः॥
महाह्रद इवाक्षोभ्यो गतक्लेशः स शोभते॥
मूढ़ की निवृत्ति भी भीतर एक नई प्रवृत्ति बन जाती है, जबकि धीर की प्रवृत्ति तक निवृत्ति का फल देती है। मूढ़ का वैराग्य प्रायः बाहरी परिग्रहों के प्रति दिखता है, पर जिसकी देह से ही आशा गल गई, उसके लिए राग कहाँ और विराग कहाँ। मूढ़ की दृष्टि सदा भावना और अभावना में आसक्त रहती है, जबकि स्वस्थ की दृष्टि भाव्य और भावना दोनों से रहित, मानो अदृष्टि-स्वरूप हो जाती है। सब आरम्भों में निष्काम, बालक की तरह विचरने वाले मुनि को कर्म होते हुए भी कोई लेप नहीं लगता।
श्लोक 61 से 64
प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्तिफलभागिनी॥
देहे विगलिताशस्य क्व रागः क्व विरागता॥
भाव्यभावनया सा तु स्वस्थस्यादृष्टिरूपिणी॥
न लेपस्तस्य शुद्धस्य क्रियमाणेऽपि कर्मणि॥
वही धन्य आत्म-ज्ञानी है जो सब भावों में सम रहता है, देखते, सुनते, छूते, सूँघते, खाते हुए भी जिसके भीतर कोई ज्वर नहीं उठता। उसके लिए संसार कहाँ, आभास कहाँ, साध्य कहाँ और साधन कहाँ, वह तो आकाश की तरह सदा निर्विकल्प रहता है। ऐसा अर्थ का सन्न्यासी, अपने पूर्ण रस-रूप में स्थित, बना-बनाया नहीं बल्कि अविच्छिन्न समाधि में डूबा हुआ पुरुष ही सच्ची जय पाता है। बहुत कहने से क्या, तत्त्व को जान चुका वह महाशय भोग और मोक्ष दोनों की चाह से परे हो कर, हर जगह सदा नीरस रहता है।
श्लोक 65 से 68
पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्न् अश्नन्निष्टे विरज्वरः॥
आकाशस्येव धीरस्य निर्विकल्पस्य सर्वदा॥
अकृत्रिमोऽनवच्छिन्ने समाधिर्यस्य वर्तते॥
भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी सदा सर्वत्र नीरसः॥
महत्तत्त्व से ले कर सारा यह द्वैत-जगत बस नाम-मात्र से फैला हुआ है, उसे छोड़ देने के बाद शुद्ध-बोध के लिए कोई कर्तव्य बाक़ी ही नहीं रहता। सारे भौतिक भ्रम को जान कर जो उससे विरत हो जाता है, वह वासना-रहित, आकार-रहित और निर्विकल्प हो कर स्थित रहता है। मानो कैवल्य ही पा लिया हो, ऐसा धन्य पुरुष, जिसका उठान किसी को दिखता नहीं, शुद्ध-बुद्धि हो कर किए-अनकिए कर्मों को देखता हुआ भी नहीं देखता। जो विरक्त है वह विषयों से द्वेष करता है, जो रागी है वह विषयों में लुभाता है, पर जो पकड़ और छोड़ दोनों से परे है, वह न विरक्त है न रागी।
श्लोक 69 से 72
विहाय शुद्धबोधस्य किं कृत्यमवशिष्यते॥
निर्वासनो निराकारो निर्विकल्पश्च तिष्ठति॥
शुद्धबुद्धिः कृताकृत्ये पश्यन्नपि न पश्यति॥
ग्रहमोक्षविहीनस्तु न विरक्तो न रागवान्॥
जब तक भीतर कुछ छोड़ने और कुछ ग्रहण करने का भाव है, यही संसार रूपी वृक्ष का अंकुर बना रहता है, और जब तक स्पृहा जीवित है, तब तक निर्विचार-दशा का कोई ठौर नहीं मिलता। प्रवृत्ति में राग जन्म लेता है और निवृत्ति में द्वेष, पर निर्द्वन्द्व धीमान् बालक की तरह इन दोनों से परे स्थित रहता है। रागी दुःख से बचने को संसार छोड़ना चाहता है, जबकि वीतराग पहले से ही निर्दुःख है, वह संसार में रहते हुए भी खिन्न नहीं होता। और जिसे मोक्ष का भी अभिमान है और साथ ही देह में ममता भी, वह न ज्ञानी है न योगी, बस दुःख का भागी है।
श्लोक 73 से 76
स्पृहा जीवति यावद्वै निर्विचारदशास्पदम्॥
निर्द्वन्द्वो बालवद्धीमान् एवमेव व्यवस्थितः॥
वीतरागो हि निर्दुःखस्तस्मिन्नपि न खिद्यति॥
न च ज्ञानी न वा योगी केवलं दुःखभाग् असौ॥
अब अष्टावक्र सीधे संबोधन में आ जाते हैं। शिव हों, विष्णु हों या ब्रह्मा, सब को भुलाए बिना तो इनमें से कोई भी उपदेष्टा हो कर भी आपको स्वस्थ नहीं कर सकता। राग और द्वेष तो मन के धर्म हैं, और मन आपका कभी रहा ही नहीं, आप तो निर्विकल्प, बोध-स्वरूप और निर्विकार हैं, सो सुख से विचरिए। फिर वे आश्चर्य की एक कड़ी कहते हैं। आश्चर्य ही है कि सब भूतों में आत्मा को और आत्मा में सब भूतों को जानने वाले मुनि में भी कहीं ममता बची रह जाए। और इससे बड़ा आश्चर्य कि परम-अद्वैत में स्थित, मोक्ष में लगा हुआ पुरुष भी काम के वश में आ कर खेल की आदत से विकल हो जाए।
श्लोक 77 से 80
तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणाद् ऋते॥
निर्विकल्पोऽसि बोधात्मा निर्विकारः सुखं चर॥
मुनेर्जानत आश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते॥
आश्चर्यं कामवशगो विकलः केलिशिक्षया॥
काम को ज्ञान का शत्रु जान लेने पर भी, अति-दुर्बल हो कर, और अन्त-काल के निकट पहुँच कर भी कोई उसी काम की चाह करे, यह भी आश्चर्य है। इस लोक और परलोक दोनों से विरक्त, नित्य-अनित्य का विवेकी, और मोक्ष का अभिलाषी पुरुष यदि मोक्ष से ही डर जाए, यह तो और भी आश्चर्य है। धीर तो भोगा जाए या सताया जाए, सदा केवल आत्मा को ही देखता रहता है, इसलिए न तुष्ट होता है, न क्रुद्ध। वह अपने ही चलते-फिरते शरीर को किसी पराए शरीर की तरह देखता है, फिर भला प्रशंसा हो या निन्दा, वह महाशय क्षुब्ध क्यों हो।
श्लोक 81 से 84
आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत् कालमन्तमनुश्रितः॥
आश्चर्यं मोक्षकामस्य मोक्षाद् एव विभीषिका॥
आत्मानं केवलं पश्यन्न तुष्यति न कुप्यति॥
संस्तवे चापि निन्दायां कथं क्षुभ्येत् महाशयः॥
इस विश्व को माया-मात्र देख कर, जिसका कौतूहल मिट गया, वह धीर-बुद्धि मृत्यु के निकट आने पर भी भला क्यों काँपे। निःस्पृह मन वाला वह महात्मा निराशा में भी डगमगाता नहीं, आत्म-ज्ञान से तृप्त उस पुरुष की तुलना भला किससे की जाए। स्वभाव से ही जो जान चुका कि यह दृश्य कुछ भी नहीं, वह धीर-बुद्धि “यह ग्रहण करने योग्य, यह त्यागने योग्य” कैसे देखे। भीतर के राग-कषाय छोड़ चुके, द्वन्द्व-रहित और आशा-रहित पुरुष के पास अपने आप जो भोग आ पड़ते हैं, वे न उसे दुःख देते हैं, न तुष्टि।
श्लोक 85 से 88
अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः॥
तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते॥
इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः॥
यदृच्छयागतो भोगो न दुःखाय न तुष्टये॥
किया और अनकिया, ये द्वन्द्व कब, किसके लिए शान्त हुए हैं, यही जान कर निर्वेद से त्याग में बस जाइए, बिना किसी व्रत के ही। फिर अष्टावक्र सीधे पुकार उठते हैं, हे चिन्मय, संकल्प और विकल्प से अपने चित्त को मत क्षुब्ध कीजिए, उपशान्त हो कर सुख से अपने उसी आनन्द-रूप आत्मा में ठहर जाइए। ध्यान को भी छोड़ दीजिए, हृदय में कुछ भी धारण मत कीजिए, आप तो आत्मा हैं और मुक्त ही हैं, फिर सोच-विचार से करेंगे क्या। यहाँ अष्टावक्र वही मंगल-श्लोक दोहराते हैं, सब कुछ कल्पना-मात्र है, आत्मा मुक्त और सनातन है, यह जान कर धीर बालक की तरह कौन-सा अभ्यास दोहराए।
श्लोक 89 से 92
एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद्भव त्यागपरोऽव्रती॥
उपशाम्य सुखं तिष्ठ स्वात्मन्यानन्दविग्रहे॥
आत्मा त्वं मुक्त एवासि किं विमृश्य करिष्यसि॥
इति विज्ञाय धीरो हि किमभ्यस्यति बालवत्॥
“आत्मा ब्रह्म है” यह निश्चय कर के, भाव-अभाव को कल्पित मान कर, निष्काम पुरुष फिर क्या जाने, क्या बोले, क्या करे। जो “सब आत्मा है” यह निश्चय कर के मौन हो गया, उस योगी की “यह मैं हूँ, यह मैं नहीं” वाली विकल्पना क्षीण हो जाती है। उपशान्त योगी की दशा में न विक्षेप है न एकाग्रता, न अति-बोध न मूढता, न सुख न दुःख। और निर्विकल्प स्वभाव वाले योगी के लिए राज्य हो या भिक्षा, लाभ हो या हानि, भीड़ हो या जंगल, कहीं कोई भेद नहीं रहता।
श्लोक 93 से 96
निष्कामः किं विजानाति किं ब्रूते च करोति किम्॥
सर्वमात्मेति निश्चित्य तूष्णीम्भूतस्य योगिनः॥
न सुखं न च वा दुःखमुपशान्तस्य योगिनः॥
निर्विकल्पस्वभावस्य न विशेषोऽस्ति योगिनः॥
और अन्त में वही चार पंक्तियाँ फिर लौट आती हैं, मानो प्रकरण अपने ही आरम्भ में विश्राम पा रहा हो। “यह किया, यह नहीं किया” इन द्वन्द्वों से मुक्त योगी के लिए धर्म कहाँ, काम कहाँ, अर्थ कहाँ और विवेक तक कहाँ। उस जीवन्मुक्त योगी के लिए न कोई कर्तव्य शेष रहता है, न हृदय में कोई राग, बस जो जीवन चल रहा है वही उसका सहज ढंग है। सब संकल्पों की सीमा पर विश्रान्त उस महात्मा के लिए मोह कहाँ, विश्व कहाँ, ध्यान कहाँ, मुक्ति कहाँ। जिसने यह विश्व देखा है वही इसे “है ही नहीं” कह कर त्याग सकता है, पर वासना-रहित तो देखते हुए भी नहीं देखता, और यहीं यह सबसे लम्बा प्रकरण विश्राम पा लेता है।
श्लोक 97 से 100
इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तस्य योगिनः॥
यथा जीवनमेवेह जीवन्मुक्तस्य योगिनः॥
सर्वसङ्कल्पसीमायां विश्रान्तस्य महात्मनः॥
निर्वासनः किं कुरुते पश्यन्नपि न पश्यति॥