अष्टावक्र गीता · प्रकरण 18: जीवन्मुक्ति

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 18

जीवन्मुक्ति

Liberation in Life · 100 श्लोक

अष्टावक्र का सबसे लम्बा प्रकरण। 100 श्लोक। पूरी text का सार यहाँ। हर श्लोक एक अद्वैत-ज्ञानी की state पर एक angle है। पढ़ते रहो, बार-बार। यह विशेष रूप से बाद के जन्म में Ramana Maharshi को पसन्द था।

श्लोक 1 · मङ्गलाचरण
अष्टावक्र उवाच
यस्य बोधोदये तावत्स्वप्नवद् भवति भ्रमः।
तस्मै सुखैकरूपाय नमः शान्ताय तेजसे॥
yasya bodhodaye tāvat svapnavad bhavati bhramaḥ
tasmai sukhaika-rūpāya namaḥ śāntāya tejase

अर्थ“जिसके बोध के उदय होते ही भ्रम स्वप्न जैसा हो जाता है, उस सुख-एक-रूप, शान्त, तेज को नमस्कार।”

सन्दर्भ“शान्ताय तेजसे”। अष्टावक्र की प्रणाम-line। शान्ति और तेज एक साथ। यह दो अलग नहीं, एक ही state के दो angles।
श्लोक 2
अर्जयित्वाखिलानर्थान्भोगानाप्नोति पुष्कलान्।
न हि सर्वपरित्यागमन्तरेण भवेत्सुखी॥
arjayitvākhilān arthān bhogān āpnoti puṣkalān
na hi sarva-parityāgam antareṇa bhavet sukhī

अर्थ“सब अर्थ कमा कर, अनेक भोग पा कर भी, सर्व-परित्याग के बिना सुखी नहीं होता।”

सन्दर्भ“सर्व-परित्याग” outer नहीं, inner। “मेरा” का drop।
श्लोक 3
कर्तव्यदुःखमार्तण्डज्वालादग्धान्तरात्मनः।
कुतः प्रशमपीयूषधारासारमृते सुखम्॥
kartavya-duḥkha-mārtaṇḍa-jvālā-dagdhāntarātmanaḥ
kutaḥ praśama-pīyūṣa-dhārā-sāram ṛte sukham

अर्थ“कर्तव्य-दुःख रूपी सूर्य की ज्वाला से जला अन्तरात्मा, प्रशम-अमृत-धारा के बिना सुखी कैसे होगा?”

सन्दर्भ“कर्तव्य-दुःख”। हर “करना ज़रूरी है” एक आग।
श्लोक 4
भवोऽयं भावनामात्रो न किञ्चित्परमार्थतः।
नास्त्यभावः स्वभावानां भावाभावविभाविनाम्॥
bhavo’yaṁ bhāvanā-mātro na kiñcit paramārthataḥ
nāsty abhāvaḥ svabhāvānāṁ bhāvābhāva-vibhāvinām

अर्थ“यह संसार सिर्फ़ भावना-मात्र है, परमार्थतः कुछ नहीं। भाव-अभाव को विभाजित करने वाले स्वभावों का अभाव नहीं।”

सन्दर्भ“भावना-मात्र”। संसार ख़याल।
श्लोक 5
न दूरं न च सङ्कोचाल्लब्धमेवात्मनः पदम्।
निर्विकल्पं निरायासं निर्विकारं निरञ्जनम्॥
na dūraṁ na ca saṅkocāl labdham evātmanaḥ padam
nirvikalpaṁ nirāyāsaṁ nirvikāraṁ nirañjanam

अर्थ“न दूर है, न संकोच से। आत्मा का पद पहले से प्राप्त ही है। निर्विकल्प, निर्आयास, निर्विकार, निरंजन।”

सन्दर्भ“लब्धम् एव”। “मिला हुआ ही”। यह statement पूरे अद्वैत का सार।
श्लोक 6
व्यामोहमात्रविरतौ स्वरूपादानमात्रतः।
वीतशोका विराजन्ते निरावरणदृष्टयः॥
vyāmoha-mātra-viratau svarūpādāna-mātrataḥ
vīta-śokā virājante nirāvaraṇa-dṛṣṭayaḥ

अर्थ“भ्रम-मात्र की विरति में, स्वरूप के स्वीकार से, शोक-रहित हो कर, निरावरण-दृष्टि वाले शोभित होते हैं।”

सन्दर्भ“निरावरण-दृष्टि”। बिना पर्दे की दृष्टि। पर्दा = concepts।
श्लोक 7
समस्तं कल्पनामात्रमात्मा मुक्तः सनातनः।
इति विज्ञाय धीरो हि किमभ्यस्यति बालवत्॥
samastaṁ kalpanā-mātram ātmā muktaḥ sanātanaḥ
iti vijñāya dhīro hi kim abhyasyati bālavat

अर्थ“सब कुछ कल्पना-मात्र है, आत्मा मुक्त और सनातन है। यह जान कर धीर बालक की तरह क्या अभ्यास करेगा?”

सन्दर्भ“बालवत् अभ्यास”। बच्चे की तरह पाठ। जब ज्ञान है, पाठ की क्या ज़रूरत?
श्लोक 8
आत्मा ब्रह्मेति निश्चित्य भावाभावौ च कल्पितौ।
निष्कामः किं विजानाति किं ब्रूते च करोति किम्॥
ātmā brahmeti niścitya bhāvābhāvau ca kalpitau
niṣkāmaḥ kiṁ vijānāti kiṁ brūte ca karoti kim

अर्थ“‘आत्मा ब्रह्म है’, निश्चय कर के, भाव-अभाव को कल्पित जान कर, निष्काम क्या जानेगा, क्या बोलेगा, क्या करेगा?”

सन्दर्भतीन activities: जानना, बोलना, करना। तीनों motivation की ज़रूरत है। motivation नहीं, activities का अन्त।
श्लोक 9
अयं सोऽहमयं नाहमिति क्षीणा विकल्पना।
सर्वमात्मेति निश्चित्य तूष्णीम्भूतस्य योगिनः॥
ayaṁ so’ham ayaṁ nāham iti kṣīṇā vikalpanā
sarvam ātmeti niścitya tūṣṇīm-bhūtasya yoginaḥ

अर्थ“‘यह मैं हूँ, यह मैं नहीं’, यह विकल्पना उस योगी की क्षीण होती है जो ‘सब आत्मा है’ निश्चय कर के मौन है।”

सन्दर्भ“तूष्णीम्-भूत”। silent हो गया।
श्लोक 10
न विक्षेपो न चैकाग्र्यं नातिबोधो न मूढता।
न सुखं न च वा दुःखमुपशान्तस्य योगिनः॥
na vikṣepo na caikāgryaṁ nātibodho na mūḍhatā
na sukhaṁ na ca vā duḥkham upaśāntasya yoginaḥ

अर्थ“न विक्षेप, न एकाग्रता, न अति-बोध, न मूढता। न सुख, न दुःख। यह उपशान्त योगी की state है।”

सन्दर्भहर polarity drop। यह balanced state नहीं, transcendent।
श्लोक 11
स्वाराज्ये भैक्ष्यवृत्तौ च लाभालाभे जने वने।
निर्विकल्पस्वभावस्य न विशेषोऽस्ति योगिनः॥
svārājye bhaikṣya-vṛttau ca lābhālābhe jane vane
nirvikalpa-svabhāvasya na viśeṣo’sti yoginaḥ

अर्थ“राज्य में, भीख माँगने में, लाभ-अलाभ में, भीड़ में, जंगल में, निर्विकल्प स्वभाव वाले योगी का कोई फ़र्क़ नहीं।”

सन्दर्भपाँच situations, same state।
श्लोक 12
क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेकिता।
इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तस्य योगिनः॥
kva dharmaḥ kva ca vā kāmaḥ kva cārthaḥ kva vivekitā
idaṁ kṛtam idaṁ neti dvandvair muktasya yoginaḥ

अर्थ“कहाँ धर्म, कहाँ काम, कहाँ अर्थ, कहाँ विवेक? ‘यह किया, यह नहीं’ इन द्वन्द्वों से मुक्त योगी के लिए।”

सन्दर्भचार पुरुषार्थों में से तीन (धर्म, अर्थ, काम), और विवेक भी drop।
श्लोक 13
कृत्यं किमपि नैवास्ति न कापि हृदि रञ्जना।
यथा जीवनमेवेह जीवन्मुक्तस्य योगिनः॥
kṛtyaṁ kim api naivāsti na kāpi hṛdi rañjanā
yathā jīvanam eveha jīvan-muktasya yoginaḥ

अर्थ“कुछ कृत्य नहीं, हृदय में कोई रंजना भी नहीं। यथा-जीवन ही इस जीवन्मुक्त योगी की state है।”

सन्दर्भ“जीवन्मुक्त” शब्द पहली बार आया। जीते-जी मुक्त। यह अद्वैत का central concept है।
श्लोक 14
क्व मोहः क्व च वा विश्वं क्व तद्ध्यानं क्व मुक्तता।
सर्वसङ्कल्पसीमायां विश्रान्तस्य महात्मनः॥
kva mohaḥ kva ca vā viśvaṁ kva tad-dhyānaṁ kva muktatā
sarva-saṅkalpa-sīmāyāṁ viśrāntasya mahātmanaḥ

अर्थ“कहाँ मोह, कहाँ विश्व, कहाँ वो ध्यान, कहाँ मुक्तता? सब सङ्कल्पों की सीमा में विश्रान्त महात्मा के लिए।”

सन्दर्भ“सङ्कल्प-सीमा”। resolves की boundary। उसके भी पार।
श्लोक 15
येन विश्वमिदं दृष्टं स नास्तीति करोतु वै।
निर्वासनः किं कुरुते पश्यन्नपि न पश्यति॥
yena viśvam idaṁ dṛṣṭaṁ sa nāstīti karotu vai
nirvāsanaḥ kiṁ kurute paśyann api na paśyati

अर्थ“जिसने यह विश्व देखा, वो ‘नहीं है’ कह कर त्याग कर सकता है। निर्वासन क्या करेगा? देखते हुए भी नहीं देखता।”

सन्दर्भदेखना और नहीं देखना, दोनों एक साथ।
श्लोक 16
येन दृष्टं परं ब्रह्म सोऽहं ब्रह्मेति चिन्तयेत्।
किं चिन्तयति निश्चिन्तो द्वितीयं यो न पश्यति॥
yena dṛṣṭaṁ paraṁ brahma so’haṁ brahmeti cintayet
kiṁ cintayati niścinto dvitīyaṁ yo na paśyati

अर्थ“जिसने परम ब्रह्म देखा, वो ‘मैं ब्रह्म हूँ’ सोच सकता है। मगर निश्चिन्त क्या सोचेगा, जो दूसरा देखता ही नहीं?”

सन्दर्भ“मैं ब्रह्म” भी एक thought है। उसके भी पार।
श्लोक 17
दृष्टो येनात्मविक्षेपो निरोधं कुरुते त्वसौ।
उदारस्तु न विक्षिप्तः साध्याभावात्करोति किम्॥
dṛṣṭo yenātma-vikṣepo nirodhaṁ kurute tv asau
udāras tu na vikṣiptaḥ sādhyābhāvāt karoti kim

अर्थ“जिसने आत्म-विक्षेप देखा, वो निरोध करता है। मगर उदार पुरुष विक्षिप्त नहीं, साध्य के अभाव में क्या करेगा?”

सन्दर्भनिरोध (कुछ रोकना) तभी ज़रूरी जब “रोकने को कुछ” हो।
श्लोक 18
धीरो लोकविपर्यस्तो वर्तमानोऽपि लोकवत्।
न समाधिं न विक्षेपं न लेपं स्वस्य पश्यति॥
dhīro loka-viparyasto vartamāno’pi lokavat
na samādhiṁ na vikṣepaṁ na lepaṁ svasya paśyati

अर्थ“धीर लोक के विपरीत है, फिर भी लोक की तरह व्यवहार करता है। न समाधि, न विक्षेप, न लेप अपनी देखता है।”

सन्दर्भबाहर lok-vat, अन्दर lok-विपरीत। यह balance।
श्लोक 19
भावाभावविहीनो यस्तृप्तो निर्वासनो बुधः।
नैव किञ्चित्कृतं तेन लोकदृष्ट्या विकुर्वता॥
bhāvābhāva-vihīno yas tṛpto nirvāsano budhaḥ
naiva kiñcit kṛtaṁ tena loka-dṛṣṭyā vikurvatā

अर्थ“भाव-अभाव से रहित, तृप्त, निर्वासन बुध, उसने कुछ भी नहीं किया, लोक की दृष्टि में करते हुए भी।”

सन्दर्भलोक की दृष्टि में करता, उसकी दृष्टि में नहीं।
श्लोक 20
प्रवृत्तौ वा निवृत्तौ वा नैव धीरस्य दुर्ग्रहः।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वा तिष्ठते सुखम्॥
pravṛttau vā nivṛttau vā naiva dhīrasya durgrahaḥ
yadā yat kartum āyāti tat kṛtvā tiṣṭhate sukham

अर्थ“प्रवृत्ति में हो या निवृत्ति में, धीर को कोई पकड़ नहीं। जब जो करने को आ जाए, वो कर के सुख से रहता है।”

सन्दर्भ“यथा-प्राप्त” का सुख।
श्लोक 21
निर्वासनो निरालम्बः स्वच्छन्दो मुक्तबन्धनः।
क्षिप्तः संस्कारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत्॥
nirvāsano nirālambaḥ svacchando mukta-bandhanaḥ
kṣiptaḥ saṁskāra-vātena ceṣṭate śuṣka-parṇavat

अर्थ“निर्वासन, निरालम्ब, स्वच्छन्द, मुक्त-बन्धन। संस्कार-वायु से उड़ाया जाते सूखे पत्ते की तरह चलता है।”

सन्दर्भ“सूखा पत्ता”। हवा जिधर ले जाए, चला जाता है। कोई resistance नहीं।
श्लोक 22
असंसारस्य तु क्वापि न हर्षो न विषादिता।
स शीतलमनानित्यमविदेह इव राजते॥
asaṁsārasya tu kvāpi na harṣo na viṣāditā
sa śītala-manā nityam avideha iva rājate

अर्थ“अ-संसारी को कहीं न हर्ष, न विषाद। वो नित्य शीतल-मन, बिना देह के जैसा शोभित होता है।”

सन्दर्भ“शीतल-मन”। ठंडा mind, deep peace से।
श्लोक 23
कुत्रापि न जिहासास्ति नाशो वापि न कुत्रचित्।
आत्मारामस्य धीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः॥
kutrāpi na jihāsāsti nāśo vāpi na kutracit
ātma-rāmasya dhīrasya śītalācchatarātmanaḥ

अर्थ“कहीं छोड़ने की इच्छा नहीं, कहीं नाश का डर नहीं। आत्म-राम धीर, शीतल-स्वच्छ-आत्मा वाले की state।”

सन्दर्भ“आत्म-राम”। आत्मा में रमण।
श्लोक 24
प्रकृत्या शून्यचित्तस्य कुर्वतोऽस्य यदृच्छया।
प्राकृतस्येव धीरस्य न मानो नावमानता॥
prakṛtyā śūnya-cittasya kurvato’sya yadṛcchayā
prākṛtasyeva dhīrasya na māno nāvamānatā

अर्थ“स्वभाव से शून्य-चित्त, अनायास काम करते इस धीर को, बच्चे की तरह, न मान, न अवमान।”

सन्दर्भ“प्राकृत”। natural। बच्चे की तरह।
श्लोक 25
कृतं देहेन कर्मेदं न मया शुद्धरूपिणा।
इति चिन्तानुरोधी यः कुर्वन्नपि करोति न॥
kṛtaṁ dehena karmedaṁ na mayā śuddha-rūpiṇā
iti cintānurodhī yaḥ kurvann api karoti na

अर्थ“‘यह कर्म देह से हुआ, मुझ शुद्ध-स्वरूप से नहीं’, इस विचार के अनुरूप जो रहता है, वो करता हुआ भी नहीं करता।”

सन्दर्भdoer-attribution का shift।
श्लोक 26
अतद्वादीव कुरुते न भवेदपि बालिशः।
जीवन्मुक्तः सुखी श्रीमान् संसरन्नपि शोभते॥
atad-vādīva kurute na bhaved api bāliśaḥ
jīvan-muktaḥ sukhī śrīmān saṁsarann api śobhate

अर्थ“‘अ-तत्’ बोलते जैसे, मगर बालिश नहीं। जीवन्मुक्त सुखी, श्रीमान्, संसरण में भी शोभित।”

श्लोक 27
नानाविचारसुश्रान्तो धीरो विश्रान्तिमागतः।
न कल्पते न जाति न शृणोति न पश्यति॥
nānā-vicāra-suśrānto dhīro viśrāntim āgataḥ
na kalpate na jāti na śṛṇoti na paśyati

अर्थ“अनेक विचारों से थका धीर, विश्राम में आ गया। न कल्पना करता, न पैदा होता, न सुनता, न देखता।”

सन्दर्भ“न जाति”। न जन्म लेता। punarjanma का chain टूटा।
श्लोक 28
असमाधेरविक्षेपान्न मुमुक्षुर्न चेतरः।
निश्चित्य कल्पितं पश्यन्ब्रह्मैवास्ते महाशयः॥
asamādher avikṣepān na mumukṣur na cetaraḥ
niścitya kalpitaṁ paśyan brahmaivāste mahāśayaḥ

अर्थ“न समाधि-रहितता से, न विक्षेप-रहितता से। न मुमुक्षु, न इतर। निश्चय कर के कल्पित को देखते हुए, महाशय ब्रह्म ही रहता है।”

श्लोक 29
यस्यान्तः स्यादहंकारो न करोति करोति सः।
निरहंकारधीरेण न किञ्चिदकृतं कृतम्॥
yasyāntaḥ syād ahaṅkāro na karoti karoti saḥ
nirahaṅkāra-dhīreṇa na kiñcid akṛtaṁ kṛtam

अर्थ“जिसके अन्दर अहंकार है, वो न करता हुआ भी करता है। निरहंकार धीर के लिए कुछ भी अकृत-कृत नहीं।”

श्लोक 30
नोद्विग्नं न च सन्तुष्टमकर्तृ स्पन्दवर्जितम्।
निराशं गतसन्देहं चित्तं मुक्तस्य राजते॥
nodvignaṁ na ca santuṣṭam akartṛ spanda-varjitam
nirāśaṁ gata-sandehaṁ cittaṁ muktasya rājate

अर्थ“न उद्विग्न, न सन्तुष्ट। अकर्ता, स्पन्द-रहित। निराश, सन्देह-रहित। मुक्त का चित्त ऐसा शोभित होता है।”

श्लोक 31
निर्ध्यातुं चेष्टितुं वापि यच्चित्तं न प्रवर्तते।
निर्निमित्तमिदं किन्तु निर्ध्यायेति विचेष्टते॥
nirdhyātuṁ ceṣṭituṁ vāpi yac cittaṁ na pravartate
nirnimittam idaṁ kintu nirdhyāyeti viceṣṭate

अर्थ“ध्यान या चेष्टा के लिए जिसका चित्त प्रवृत्त नहीं, मगर बिना निमित्त के ‘मैं ध्यान कर रहा हूँ’ की चेष्टा करता है।”

श्लोक 32
तत्त्वं यथार्थमाकर्ण्य मन्दः प्राप्नोति मूढताम्।
अथवा याति सङ्कोचममूढः कोऽपि मूढवत्॥
tattvaṁ yathārtham ākarṇya mandaḥ prāpnoti mūḍhatām
athavā yāti saṅkocam amūḍhaḥ ko’pi mūḍhavat

अर्थ“तत्त्व सुन कर मन्द बुद्धि मूढ़ता को प्राप्त होता है। या संकोच में जाता है। और कोई अ-मूढ़, मूढ़ की तरह दिखता है।”

श्लोक 33
एकाग्रता निरोधो वा मूढैरभ्यस्यते भृशम्।
धीराः कृत्यं न पश्यन्ति सुप्तवत्स्वपदे स्थिताः॥
ekāgratā nirodho vā mūḍhair abhyasyate bhṛśam
dhīrāḥ kṛtyaṁ na paśyanti supta-vat svapade sthitāḥ

अर्थ“एकाग्रता या निरोध मूढ़ बहुत अभ्यास करते हैं। धीर कुछ कृत्य नहीं देखते, सोते की तरह अपने पद में स्थित।”

श्लोक 34
अप्रयत्नात्प्रयत्नाद्वा मूढो नाप्नोति निर्वृतिम्।
तत्त्वनिश्चयमात्रेण प्राज्ञो भवति निर्वृतः॥
aprayatnāt prayatnād vā mūḍho nāpnoti nirvṛtim
tattva-niścaya-mātreṇa prājño bhavati nirvṛtaḥ

अर्थ“प्रयत्न से या अप्रयत्न से, मूढ़ शान्ति नहीं पाता। तत्त्व-निश्चय मात्र से प्राज्ञ शान्त हो जाता है।”

श्लोक 35
शुद्धं बुद्धं प्रियं पूर्णं निष्प्रपञ्चं निरामयम्।
आत्मानं तं न जानन्ति तत्राभ्यासपरा जनाः॥
śuddhaṁ buddhaṁ priyaṁ pūrṇaṁ niṣprapañcaṁ nirāmayam
ātmānaṁ taṁ na jānanti tatrābhyāsa-parā janāḥ

अर्थ“शुद्ध, बुद्ध, प्रिय, पूर्ण, निष्प्रपञ्च, निरामय आत्मा को, अभ्यास में लगे लोग जानते नहीं।”

श्लोक 36
नाप्नोति कर्मणा मोक्षं विमूढोऽभ्यासरूपिणा।
धन्यो विज्ञानमात्रेण मुक्तस्तिष्ठत्यविक्रियः॥
nāpnoti karmaṇā mokṣaṁ vimūḍho’bhyāsa-rūpiṇā
dhanyo vijñāna-mātreṇa muktas tiṣṭhaty avikriyaḥ

अर्थ“विमूढ़ कर्म से, अभ्यास से मोक्ष नहीं पाता। धन्य पुरुष विज्ञान-मात्र से मुक्त, अविकार स्थित।”

श्लोक 37
मूढो नाप्नोति तद्ब्रह्म यतो भवितुमिच्छति।
अनिच्छन्नपि धीरो हि परब्रह्मस्वरूपभाक्॥
mūḍho nāpnoti tad brahma yato bhavitum icchati
anicchann api dhīro hi para-brahma-svarūpa-bhāk

अर्थ“मूढ़ ब्रह्म नहीं पाता, क्योंकि उसे ‘बनने’ की इच्छा है। न चाहते भी धीर परब्रह्म-स्वरूप का भागी।”

श्लोक 38
निराधारा ग्रहव्यग्रा मूढाः संसारपोषकाः।
एतस्यानर्थमूलस्य मूलच्छेदः कृतो बुधैः॥
nirādhārā graha-vyagrā mūḍhāḥ saṁsāra-poṣakāḥ
etasyānartha-mūlasya mūla-cchedaḥ kṛto budhaiḥ

अर्थ“निराधार, ग्रह में व्यग्र मूढ़, संसार के पोषक। बुधों ने इस अनर्थ-मूल की जड़ काट दी।”

श्लोक 39
न शान्तिं लभते मूढो यतः शमितुमिच्छति।
धीरस्तत्त्वं विनिश्चित्य सर्वदा शान्तमानसः॥
na śāntiṁ labhate mūḍho yataḥ śamitum icchati
dhīras tattvaṁ viniścitya sarvadā śānta-mānasaḥ

अर्थ“मूढ़ शान्ति नहीं पाता क्योंकि शान्त होने की इच्छा है। धीर तत्त्व निश्चित कर के, सदा शान्त-मानस।”

श्लोक 40
क्वात्मनो दर्शनं तस्य यद्दृष्टमवलम्बते।
धीरास्तं तं न पश्यन्ति पश्यन्त्यात्मानमव्ययम्॥
kvātmano darśanaṁ tasya yad dṛṣṭam avalambate
dhīrās taṁ taṁ na paśyanti paśyanty ātmānam avyayam

अर्थ“उसका आत्म-दर्शन कहाँ जो “दृष्ट” का सहारा लेता है? धीर वो-वो (objects) नहीं देखते, अव्यय आत्मा को देखते हैं।”

श्लोक 41
क्व निरोधो विमूढस्य यो निर्बन्धं करोति वै।
स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदासावकृत्रिमः॥
kva nirodho vimūḍhasya yo nirbandhaṁ karoti vai
svārāmasyaiva dhīrasya sarvadāsāv akṛtrimaḥ

अर्थ“विमूढ़ का निरोध कहाँ जो बँधन करता है? स्व-आराम धीर का निरोध सदा अकृत्रिम।”

श्लोक 42
भावस्य भावकः कश्चिन्न किञ्चिद्भावकोऽपरः।
उभयाभावकः कश्चिदेवमेव निराकुलः॥
bhāvasya bhāvakaḥ kaścin na kiñcid bhāvako’paraḥ
ubhayābhāvakaḥ kaścid evam eva nirākulaḥ

अर्थ“कोई भाव का चिन्तक, दूसरा ‘कुछ नहीं’ का चिन्तक। तीसरा दोनों के अभाव का चिन्तक, ऐसे ही निराकुल।”

श्लोक 43
शुद्धमद्वयमात्मानं भावयन्ति कुबुद्धयः।
न तु जानन्ति सम्मोहाद्यावज्जीवमनिर्वृताः॥
śuddham advayam ātmānaṁ bhāvayanti kubuddhayaḥ
na tu jānanti sammohād yāvaj-jīvam anirvṛtāḥ

अर्थ“कुबुद्धि शुद्ध-अद्वय आत्मा की भावना करते हैं, मगर जानते नहीं। सम्मोह से जीवन भर अशान्त रहते हैं।”

श्लोक 44
मुमुक्षोर्बुद्धिरालम्बमन्तरेण न विद्यते।
निरालम्बैव निष्कामा बुद्धिर्मुक्तस्य सर्वदा॥
mumukṣor buddhir ālambam antareṇa na vidyate
nirālambaiva niṣkāmā buddhir muktasya sarvadā

अर्थ“मुमुक्षु की बुद्धि बिना आलम्बन के नहीं रहती। मुक्त की बुद्धि निरालम्ब, निष्काम, सदा।”

श्लोक 45
विषयद्वीपिनो वीक्ष्य चकिताः शरणार्थिनः।
विशन्ति झटिति क्रोडं निरोधैकाग्रसिद्धये॥
viṣaya-dvīpino vīkṣya cakitāḥ śaraṇārthinaḥ
viśanti jhaṭiti kroḍaṁ nirodhaikāgra-siddhaye

अर्थ“विषय रूपी बाघों को देख कर डरे हुए शरण-चाहने वाले, जल्दी से (समाधि के) कुम्भ में घुसते हैं, निरोध और एकाग्रता की सिद्धि के लिए।”

श्लोक 46
निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा तूष्णीं विषयदन्तिनः।
पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः॥
nirvāsanaṁ hariṁ dṛṣṭvā tūṣṇīṁ viṣaya-dantinaḥ
palāyante na śaktās te sevante kṛta-cāṭavaḥ

अर्थ“निर्वासन सिंह को मौन देख कर, विषय-हाथी न भाग सकते, उसकी ही चाटुकारी कर के सेवा करते।”

श्लोक 47
न मुक्तिकारिकां धत्ते निःशङ्को युक्तमानसः।
पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्न् अश्नन्नस्ते यथासुखम्॥
na mukti-kārikāṁ dhatte niḥśaṅko yukta-mānasaḥ
paśyan śṛṇvan spṛśan jighrann aśnann āste yathā-sukham

अर्थ“निःशङ्क, युक्त-मानस वाला मुक्ति-शास्त्र भी धारण नहीं करता। देखते, सुनते, छूते, सूँघते, खाते, सुख से रहता है।”

श्लोक 48
वस्तुश्रवणमात्रेण शुद्धबुद्धिर्निराकुलः।
नैवाचारमनाचारमौदास्यं वा प्रपश्यति॥
vastu-śravaṇa-mātreṇa śuddha-buddhir nirākulaḥ
naivācāram anācāram audāsyaṁ vā prapaśyati

अर्थ“वस्तु (तत्त्व) के श्रवण मात्र से शुद्ध-बुद्धि निराकुल। आचार, अनाचार, औदास्य कुछ नहीं देखता।”

श्लोक 49
यदा यत्कर्तुमायाति तदा तत्कुरुते ऋजुः।
शुभं वाप्यशुभं वापि तस्य चेष्टा हि बालवत्॥
yadā yat kartum āyāti tadā tat kurute ṛjuḥ
śubhaṁ vāpy aśubhaṁ vāpi tasya ceṣṭā hi bālavat

अर्थ“जब जो करने को आ जाए, सरल चित्त करता है। शुभ-अशुभ कुछ भी, उसकी चेष्टा बच्चे की तरह।”

श्लोक 50
स्वातन्त्र्यात्सुखमाप्नोति स्वातन्त्र्याल्लभते परम्।
स्वातन्त्र्यान्निर्वृतिं गच्छेत्स्वातन्त्र्यात्परमं पदम्॥
svātantryāt sukham āpnoti svātantryāl labhate param
svātantryān nirvṛtiṁ gacchet svātantryāt paramaṁ padam

अर्थ“स्वातन्त्र्य से सुख। स्वातन्त्र्य से परम। स्वातन्त्र्य से शान्ति। स्वातन्त्र्य से परम पद।”

सन्दर्भ“स्वातन्त्र्य”। चार बार। freedom की declaration।
श्लोक 51
अकर्तृत्वमभोक्तृत्वं स्वात्मनो मन्यते यदा।
तदा क्षीणा भवन्त्येव समस्ताश्चित्तवृत्तयः॥
akartṛtvam abhoktṛtvaṁ svātmano manyate yadā
tadā kṣīṇā bhavanty eva samastāś citta-vṛttayaḥ

अर्थ“जब आत्मा के अकर्तृत्व-अभोक्तृत्व को मानता है, तब चित्त की सब वृत्तियाँ क्षीण हो जाती हैं।”

श्लोक 52
उच्छृङ्खलाप्यकृतिका स्थितिर्धीरस्य राजते।
न तु सस्पृहचित्तस्य शान्तिर्मूढस्य कृत्रिमा॥
ucchṛṅkhalāpy akṛtikā sthitir dhīrasya rājate
na tu sa-spṛha-cittasya śāntir mūḍhasya kṛtrimā

अर्थ“उच्छृङ्खल भी, अकृत्रिम धीर की स्थिति शोभित होती है। मगर सस्पृह-चित्त मूढ़ की शान्ति कृत्रिम (झूठी)।”

श्लोक 53
विलसन्ति महाभोगैर्विशन्ति गिरिगह्वरान्।
निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः॥
vilasanti mahā-bhogair viśanti giri-gahvarān
nirasta-kalpanā dhīrā abaddhā mukta-buddhayaḥ

अर्थ“महान् भोगों से विलास करते, या पहाड़ की गुफाओं में घुसते। निरस्त-कल्पना धीर, अबद्ध, मुक्त-बुद्धि।”

श्लोक 54
श्रोत्रियं देवतां तीर्थमङ्गनां भूपतिं प्रियम्।
दृष्ट्वा सम्पूज्य धीरस्य न कापि हृदि वासना॥
śrotriyaṁ devatāṁ tīrtham aṅganāṁ bhū-patiṁ priyam
dṛṣṭvā sampūjya dhīrasya na kāpi hṛdi vāsanā

अर्थ“वेदज्ञ, देवता, तीर्थ, स्त्री, राजा, या प्रिय को देख कर, धीर को हृदय में कोई वासना नहीं।”

श्लोक 55
भृत्यैः पुत्रैः कलत्रैश्च दौहित्रैश्चापि गोत्रजैः।
विहस्य धिक्कृतो योगी न याति विकृतिं मनाक्॥
bhṛtyaiḥ putraiḥ kalatraiś ca dauhitraiś cāpi gotrajaiḥ
vihasya dhik-kṛto yogī na yāti vikṛtiṁ manāk

अर्थ“भृत्य, पुत्र, पत्नी, दौहित्र, गोत्रज, सब से हँसी या तिरस्कार पाने पर, योगी ज़रा भी विकृत नहीं होता।”

श्लोक 56
सन्तुष्टोऽपि न सन्तुष्टः खिन्नोऽपि न च खिद्यते।
तस्याश्चर्यदशां तां तां तादृशा एव जानते॥
santuṣṭo’pi na santuṣṭaḥ khinno’pi na ca khidyate
tasyāścarya-daśāṁ tāṁ tāṁ tādṛśā eva jānate

अर्थ“सन्तुष्ट भी सन्तुष्ट नहीं, खिन्न भी खिन्न नहीं। उसकी आश्चर्य-दशाएँ, वैसे ही जानते हैं।”

श्लोक 57
कर्तव्यतैव संसारो न तां पश्यन्ति सूरयः।
शून्याकाराः निराकाराः निर्विकाराः निरामयाः॥
kartavyataiva saṁsāro na tāṁ paśyanti sūrayaḥ
śūnyākārāḥ nirākārāḥ nirvikārāḥ nirāmayāḥ

अर्थ“कर्तव्यता ही संसार है, जिसे सूरी (ज्ञानी) नहीं देखते। शून्य-आकार, निराकार, निर्विकार, निरामय।”

श्लोक 58
अकुर्वन्नपि सङ्क्षोभाद्व्यग्रः सर्वत्र मूढधीः।
कुर्वन्नपि तु कृत्यानि कुशलो हि निराकुलः॥
akurvann api saṅkṣobhād vyagraḥ sarvatra mūḍha-dhīḥ
kurvann api tu kṛtyāni kuśalo hi nirākulaḥ

अर्थ“मूढ़-बुद्धि न करते हुए भी क्षोभ से व्यग्र। कुशल कर्म करते हुए भी निराकुल।”

श्लोक 59
सुखमास्ते सुखं शेते सुखमायाति याति च।
सुखं वक्ति सुखं भुंक्ते व्यवहारेऽपि शान्तधीः॥
sukham āste sukhaṁ śete sukham āyāti yāti ca
sukhaṁ vakti sukhaṁ bhuṅkte vyavahāre’pi śānta-dhīḥ

अर्थ“सुख से बैठता, सुख से सोता, सुख से आता-जाता, सुख से बोलता, सुख से खाता, व्यवहार में भी शान्त-धी।”

श्लोक 60
स्वभावाद्यस्य नैवार्तिर्लोकवद्व्यवहारिणः।
महाह्रद इवाक्षोभ्यो गतक्लेशः स शोभते॥
svabhāvād yasya naivārtir lokavad vyavahāriṇaḥ
mahā-hrada ivākṣobhyo gata-kleśaḥ sa śobhate

अर्थ“स्वभाव से जिसको पीड़ा नहीं, लोक की तरह व्यवहार करते भी। बड़े झील की तरह अक्षोभ्य, क्लेश-रहित, वो शोभित।”

श्लोक 61
निवृत्तिरपि मूढस्य प्रवृत्तिरुपजायते।
प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्तिफलभागिनी॥
nivṛttir api mūḍhasya pravṛttir upajāyate
pravṛttir api dhīrasya nivṛtti-phala-bhāginī

अर्थ“मूढ़ की निवृत्ति प्रवृत्ति बन जाती है। धीर की प्रवृत्ति निवृत्ति-फल देती है।”

श्लोक 62
परिग्रहेषु वैराग्यं प्रायो मूढस्य दृश्यते।
देहे विगलिताशस्य क्व रागः क्व विरागता॥
parigraheṣu vairāgyaṁ prāyo mūḍhasya dṛśyate
dehe vigalitāśasya kva rāgaḥ kva virāgatā

अर्थ“मूढ़ की वैराग्य परिग्रहों से दिखती है। देह से जिसकी आशा गल गयी, उसको कहाँ राग, कहाँ विराग?”

श्लोक 63
भावनाभावनासक्ता दृष्टिर्मूढस्य सर्वदा।
भाव्यभावनया सा तु स्वस्थस्यादृष्टिरूपिणी॥
bhāvanābhāvanā-saktā dṛṣṭir mūḍhasya sarvadā
bhāvya-bhāvanayā sā tu svasthasyādṛṣṭi-rūpiṇī

अर्थ“मूढ़ की दृष्टि भावना-अभावना में आसक्त। स्वस्थ की दृष्टि भाव्य-भावना से रहित, अदृष्टि-स्वरूप।”

श्लोक 64
सर्वारम्भेषु निष्कामो यश्चरेद्बालवन्मुनिः।
न लेपस्तस्य शुद्धस्य क्रियमाणेऽपि कर्मणि॥
sarvārambheṣu niṣkāmo yaś cared bālavan muniḥ
na lepas tasya śuddhasya kriyamāṇe’pi karmaṇi

अर्थ“सब आरम्भों में निष्काम, बालक की तरह चलने वाला मुनि। उस शुद्ध को कर्म होते हुए भी कोई लेप नहीं।”

श्लोक 65
स एव धन्य आत्मज्ञः सर्वभावेषु यः समः।
पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्न् अश्नन्निष्टे विरज्वरः॥
sa eva dhanya ātma-jñaḥ sarva-bhāveṣu yaḥ samaḥ
paśyan śṛṇvan spṛśan jighrann aśnann iṣṭe vira-jvaraḥ

अर्थ“वही धन्य आत्म-ज्ञ, जो सब भावों में सम। देखते, सुनते, छूते, सूँघते, खाते, पसन्द में भी ज्वर-रहित।”

श्लोक 66
क्व संसारः क्व चाभासः क्व साध्यं क्व च साधनम्।
आकाशस्येव धीरस्य निर्विकल्पस्य सर्वदा॥
kva saṁsāraḥ kva cābhāsaḥ kva sādhyaṁ kva ca sādhanam
ākāśasyeva dhīrasya nirvikalpasya sarvadā

अर्थ“कहाँ संसार, कहाँ आभास, कहाँ साध्य, कहाँ साधन? आकाश जैसे, सर्वदा निर्विकल्प, धीर के लिए।”

श्लोक 67
स जयत्यर्थसन्न्यासी पूर्णस्वरसविग्रहः।
अकृत्रिमोऽनवच्छिन्ने समाधिर्यस्य वर्तते॥
sa jayaty artha-sannyāsī pūrṇa-svarasa-vigrahaḥ
akṛtrimo’navacchinne samādhir yasya vartate

अर्थ“वो जय पाता है जो अर्थ-सन्न्यासी, पूर्ण-स्वरस-विग्रह। जिसकी अकृत्रिम, अविच्छिन्न समाधि चलती है।”

श्लोक 68
बहुनात्र किमुक्तेन ज्ञाततत्त्वो महाशयः।
भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी सदा सर्वत्र नीरसः॥
bahunātra kim uktena jñāta-tattvo mahāśayaḥ
bhoga-mokṣa-nirākāṅkṣī sadā sarvatra nīrasaḥ

अर्थ“बहुत क्या कहूँ? ज्ञात-तत्त्व महाशय, भोग-मोक्ष से निराकांक्षी, सर्वदा सर्वत्र नीरस।”

श्लोक 69
महदादि जगद्द्वैतं नाममात्रविजृम्भितम्।
विहाय शुद्धबोधस्य किं कृत्यमवशिष्यते॥
mahad-ādi jagad-dvaitaṁ nāma-mātra-vijṛmbhitam
vihāya śuddha-bodhasya kiṁ kṛtyam avaśiṣyate

अर्थ“महद् आदि जगत्-द्वैत नाम-मात्र से फैला। उसे छोड़ शुद्ध-बोध के लिए क्या कृत्य बाक़ी?”

श्लोक 70
भ्रमं भौतिकमिखिलं विज्ञाय विरमेद् यतः।
निर्वासनो निराकारो निर्विकल्पश्च तिष्ठति॥
bhramaṁ bhautikam akhilaṁ vijñāya virameda yataḥ
nirvāsano nirākāro nirvikalpaś ca tiṣṭhati

अर्थ“सब भौतिक भ्रम जान कर जो विरमित हो, वो निर्वासन, निराकार, निर्विकल्प स्थित।”

श्लोक 71
कैवल्यमिव सम्प्राप्तो धन्योऽज्ञातसमुच्छ्रयः।
शुद्धबुद्धिः कृताकृत्ये पश्यन्नपि न पश्यति॥
kaivalyam iva samprāpto dhanyo’jñāta-samucchrayaḥ
śuddha-buddhiḥ kṛtākṛtye paśyann api na paśyati

अर्थ“मानो कैवल्य प्राप्त, धन्य पुरुष, अज्ञात-समुच्छ्रय। शुद्ध-बुद्धि कृत-अकृत्य में देख कर भी नहीं देखता।”

श्लोक 72
यो विरक्तो विषयद्वेष्टा रागी विषयलोलुपः।
ग्रहमोक्षविहीनस्तु न विरक्तो न रागवान्॥
yo virakto viṣaya-dveṣṭā rāgī viṣaya-lolupaḥ
graha-mokṣa-vihīnas tu na virakto na rāgavān

अर्थ“जो विरक्त वो विषय-द्वेष्टा। रागी वो विषय-लोलुप। ग्रह-मोक्ष से रहित, न विरक्त, न रागवान।”

श्लोक 73
हेयोपादेयता तावत्संसारविटपाङ्कुरः।
स्पृहा जीवति यावद्वै निर्विचारदशास्पदम्॥
heyopādeyatā tāvat saṁsāra-viṭapāṅkuraḥ
spṛhā jīvati yāvad vai nirvicāra-daśāspadam

अर्थ“हेय-उपादेय ही संसार-वृक्ष का अंकुर है। जब तक स्पृहा जीवित है, निर्विचार-दशा का स्थान नहीं।”

श्लोक 74
प्रवृत्तौ जायते रागो निवृत्तौ द्वेष एव हि।
निर्द्वन्द्वो बालवद्धीमान् एवमेव व्यवस्थितः॥
pravṛttau jāyate rāgo nivṛttau dveṣa eva hi
nirdvandvo bālavad dhīmān evam eva vyavasthitaḥ

अर्थ“प्रवृत्ति में राग, निवृत्ति में द्वेष। निर्द्वन्द्व, बालक की तरह धीमान् ऐसे स्थित।”

श्लोक 75
हातुमिच्छति संसारं रागी दुःखजिहासया।
वीतरागो हि निर्दुःखस्तस्मिन्नपि न खिद्यति॥
hātum icchati saṁsāraṁ rāgī duḥkha-jihāsayā
vīta-rāgo hi niḥkhukhas tasminn api na khidyati

अर्थ“रागी दुःख से बचने को संसार छोड़ना चाहता है। वीत-राग निर्दुःख, संसार में भी खेद नहीं।”

श्लोक 76
यस्याभिमानो मोक्षेऽपि देहेऽपि ममता तथा।
न च ज्ञानी न वा योगी केवलं दुःखभाग् असौ॥
yasyābhimāno mokṣe’pi dehe’pi mamatā tathā
na ca jñānī na vā yogī kevalaṁ duḥkha-bhāg asau

अर्थ“मोक्ष में अभिमान, देह में ममता, ऐसा न ज्ञानी, न योगी, केवल दुःख-भागी।”

श्लोक 77
हरो यद्युपदेष्टा ते हरिः कमलजोऽपि वा।
तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणाद् ऋते॥
haro yady upadeṣṭā te hariḥ kamalajo’pi vā
tathāpi na tava svāsthyaṁ sarva-vismaraṇād ṛte

अर्थ“शिव, विष्णु, ब्रह्मा भी उपदेष्टा हों, फिर भी तुझे स्वास्थ्य नहीं, बिना सब को भुलाए।”

श्लोक 78
रागद्वेषौ मनोधर्मौ न मनस्ते कदाचन।
निर्विकल्पोऽसि बोधात्मा निर्विकारः सुखं चर॥
rāga-dveṣau mano-dharmau na manas te kadācana
nirvikalpo’si bodhātmā nirvikāraḥ sukhaṁ cara

अर्थ“राग-द्वेष मन के धर्म, मन तेरा कभी नहीं। निर्विकल्प, बोध-आत्मा, निर्विकार, सुख से चल।”

श्लोक 79
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
मुनेर्जानत आश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते॥
sarva-bhūteṣu cātmānaṁ sarva-bhūtāni cātmani
muner jānata āścaryaṁ mamatvam anuvartate

अर्थ“सब भूतों में आत्मा, सब भूत आत्मा में, यह जानने वाले मुनि की ममता बची रहे, आश्चर्य।”

श्लोक 80
आस्थितः परमाद्वैतं मोक्षार्थेऽपि व्यवस्थितः।
आश्चर्यं कामवशगो विकलः केलिशिक्षया॥
āsthitaḥ paramādvaitaṁ mokṣārthe’pi vyavasthitaḥ
āścaryaṁ kāma-vaśa-go vikalaḥ keli-śikṣayā

अर्थ“परम-अद्वैत में स्थित, मोक्ष में लगे हुए को भी, काम के वश में हो कर खेल-शिक्षा से विकल होना, आश्चर्य।”

श्लोक 81
उद्भूतं ज्ञानदुर्मित्रमवधार्यातिदुर्बलः।
आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत् कालमन्तमनुश्रितः॥
udbhūtaṁ jñāna-durmitram avadhāryāti-durbalaḥ
āścaryaṁ kāmam ākāṅkṣet kālam antam anuśritaḥ

अर्थ“काम को ज्ञान-शत्रु जान कर, अति-दुर्बल हो कर, अन्तकाल के निकट हो कर भी काम चाहना, आश्चर्य।”

श्लोक 82
इहामुत्र विरक्तस्य नित्यानित्यविवेकिनः।
आश्चर्यं मोक्षकामस्य मोक्षाद् एव विभीषिका॥
ihāmutra viraktasya nityānitya-vivekinaḥ
āścaryaṁ mokṣa-kāmasya mokṣād eva vibhīṣikā

अर्थ“इह-अमुत्र से विरक्त, नित्य-अनित्य के विवेकी, मोक्ष-कामी को मोक्ष से ही डर, आश्चर्य।”

श्लोक 83
धीरस्तु भोज्यमानोऽपि पीड्यमानोऽपि सर्वदा।
आत्मानं केवलं पश्यन्न तुष्यति न कुप्यति॥
dhīras tu bhojyamāno’pi pīḍyamāno’pi sarvadā
ātmānaṁ kevalaṁ paśyan na tuṣyati na kupyati

अर्थ“धीर भोगा जाता या पीड़ित होता, सदा सिर्फ़ आत्मा को देखता, न तुष्ट, न क्रुद्ध।”

श्लोक 84
चेष्टमानं शरीरं स्वं पश्यत्यन्यशरीरवत्।
संस्तवे चापि निन्दायां कथं क्षुभ्येत् महाशयः॥
ceṣṭamānaṁ śarīraṁ svaṁ paśyaty anya-śarīravat
saṁstave cāpi nindāyāṁ kathaṁ kṣubhyet mahāśayaḥ

अर्थ“अपने काम करते शरीर को दूसरे की तरह देखता है। प्रशंसा-निन्दा में महाशय कैसे क्षुब्ध हो?”

श्लोक 85
मायामात्रमिदं विश्वं पश्यन्विगतकौतुकः।
अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः॥
māyā-mātram idaṁ viśvaṁ paśyan vigata-kautukaḥ
api sannihite mṛtyau kathaṁ trasyati dhīra-dhīḥ

अर्थ“विश्व माया-मात्र देख कर, कौतुक-रहित, मृत्यु निकट आने पर भी धीर-धी कैसे डरे?”

श्लोक 86
निःस्पृहं मानसं यस्य नैराश्येऽपि महात्मनः।
तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते॥
niḥspṛhaṁ mānasaṁ yasya nairāśye’pi mahātmanaḥ
tasyātma-jñāna-tṛptasya tulanā kena jāyate

अर्थ“निःस्पृह मन, निराशा में भी, उस महात्मा की, आत्म-ज्ञान-तृप्त की, तुलना किस से हो?”

श्लोक 87
स्वभावादेव जानानो दृश्यमेतन्न किञ्चन।
इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः॥
svabhāvād eva jānāno dṛśyam etan na kiñcana
idaṁ grāhyam idaṁ tyājyaṁ sa kiṁ paśyati dhīradhīḥ

अर्थ“स्वभाव से ही जानते कि यह दृश्य कुछ नहीं, वो धीर ‘यह लेने योग्य, यह छोड़ने योग्य’ कैसे देखे?”

श्लोक 88
अन्तस्त्यक्तकषायस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः।
यदृच्छयागतो भोगो न दुःखाय न तुष्टये॥
antas tyakta-kaṣāyasya nirdvandvasya nirāśiṣaḥ
yadṛcchayāgato bhogo na duḥkhāya na tuṣṭaye

अर्थ“अन्दर के कषाय छोड़े, निर्द्वन्द्व, निराशीष, यदृच्छया आए भोग, न दुःख देते, न तुष्टि।”

श्लोक 89
कृताकृते च द्वन्द्वानि कदा शान्तानि कस्य वा।
एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद्भव त्यागपरोऽव्रती॥
kṛtākṛte ca dvandvāni kadā śāntāni kasya vā
evaṁ jñātvā iha nirvedād bhava tyāga-paro’vratī

अर्थ“किया-अकिया द्वन्द्व कब किसके शान्त हुए? यह जान कर निर्वेद से त्याग-पर हो जा, अव्रती।”

श्लोक 90
मा सङ्कल्पविकल्पाभ्यां चित्तं क्षोभय चिन्मय।
उपशाम्य सुखं तिष्ठ स्वात्मन्यानन्दविग्रहे॥
mā saṅkalpa-vikalpābhyāṁ cittaṁ kṣobhaya cinmaya
upaśāmya sukhaṁ tiṣṭha svātmany ānanda-vigrahe

अर्थ“हे चिन्मय, सङ्कल्प-विकल्प से चित्त को क्षुब्ध मत कर। उपशान्त हो कर, सुख से, अपने आनन्द-विग्रह आत्मा में स्थित हो।”

श्लोक 91
त्यजैव ध्यानं सर्वत्र मा किञ्चिद् हृदि धारय।
आत्मा त्वं मुक्त एवासि किं विमृश्य करिष्यसि॥
tyajaiva dhyānaṁ sarvatra mā kiñcid hṛdi dhāraya
ātmā tvaṁ mukta evāsi kiṁ vimṛśya kariṣyasi

अर्थ“ध्यान भी छोड़, हर जगह। हृदय में कुछ धारण मत कर। तू मुक्त आत्मा ही है। विचार से क्या करेगा?”

श्लोक 92
समस्तं कल्पनामात्रमात्मा मुक्तः सनातनः।
इति विज्ञाय धीरो हि किमभ्यस्यति बालवत्॥
samastaṁ kalpanā-mātram ātmā muktaḥ sanātanaḥ
iti vijñāya dhīro hi kim abhyasyati bālavat

अर्थ“सब कल्पना-मात्र है, आत्मा मुक्त, सनातन। यह जान कर धीर बच्चे की तरह क्या अभ्यास करेगा?”

श्लोक 93
आत्मा ब्रह्मेति निश्चित्य भावाभावौ च कल्पितौ।
निष्कामः किं विजानाति किं ब्रूते च करोति किम्॥
ātmā brahmeti niścitya bhāvābhāvau ca kalpitau
niṣkāmaḥ kiṁ vijānāti kiṁ brūte ca karoti kim

अर्थ“आत्मा ब्रह्म, निश्चय। भाव-अभाव कल्पित। निष्काम क्या जाने, क्या बोले, क्या करे?”

श्लोक 94
अयं सोऽहमयं नाहमिति क्षीणा विकल्पना।
सर्वमात्मेति निश्चित्य तूष्णीम्भूतस्य योगिनः॥
ayaṁ so’ham ayaṁ nāham iti kṣīṇā vikalpanā
sarvam ātmeti niścitya tūṣṇīm-bhūtasya yoginaḥ

अर्थ“‘यह मैं, यह मैं नहीं’ विकल्पना क्षीण। ‘सब आत्मा’ निश्चय कर के मौन हुए योगी की।”

श्लोक 95
न विक्षेपो न चैकाग्र्यं नातिबोधो न मूढता।
न सुखं न च वा दुःखमुपशान्तस्य योगिनः॥
na vikṣepo na caikāgryaṁ nātibodho na mūḍhatā
na sukhaṁ na ca vā duḥkham upaśāntasya yoginaḥ

अर्थ“न विक्षेप, न एकाग्रता, न अति-बोध, न मूढता। न सुख, न दुःख। उपशान्त योगी की।”

श्लोक 96
स्वाराज्ये भैक्ष्यवृत्तौ च लाभालाभे जने वने।
निर्विकल्पस्वभावस्य न विशेषोऽस्ति योगिनः॥
svārājye bhaikṣya-vṛttau ca lābhālābhe jane vane
nirvikalpa-svabhāvasya na viśeṣo’sti yoginaḥ

अर्थ“राज्य में, भीख माँगने में, लाभ-अलाभ, जन-वन, निर्विकल्प-स्वभाव योगी को कोई फ़र्क़ नहीं।”

श्लोक 97
क्व धर्मः क्व च वा कामः क्व चार्थः क्व विवेकिता।
इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तस्य योगिनः॥
kva dharmaḥ kva ca vā kāmaḥ kva cārthaḥ kva vivekitā
idaṁ kṛtam idaṁ neti dvandvair muktasya yoginaḥ

अर्थ“कहाँ धर्म, काम, अर्थ, विवेकिता? ‘किया-नहीं’ द्वन्द्वों से मुक्त योगी के लिए।”

श्लोक 98
कृत्यं किमपि नैवास्ति न कापि हृदि रञ्जना।
यथा जीवनमेवेह जीवन्मुक्तस्य योगिनः॥
kṛtyaṁ kim api naivāsti na kāpi hṛdi rañjanā
yathā jīvanam eveha jīvan-muktasya yoginaḥ

अर्थ“कुछ कृत्य नहीं, हृदय में कोई रंजना नहीं। यथा-जीवन ही जीवन्मुक्त योगी की।”

श्लोक 99
क्व मोहः क्व च वा विश्वं क्व तद्ध्यानं क्व मुक्तता।
सर्वसङ्कल्पसीमायां विश्रान्तस्य महात्मनः॥
kva mohaḥ kva ca vā viśvaṁ kva tad-dhyānaṁ kva muktatā
sarva-saṅkalpa-sīmāyāṁ viśrāntasya mahātmanaḥ

अर्थ“कहाँ मोह, विश्व, ध्यान, मुक्तता? सब सङ्कल्प-सीमा में विश्रान्त महात्मा के लिए।”

श्लोक 100
येन विश्वमिदं दृष्टं स नास्तीति करोतु वै।
निर्वासनः किं कुरुते पश्यन्नपि न पश्यति॥
yena viśvam idaṁ dṛṣṭaṁ sa nāstīti karotu vai
nirvāsanaḥ kiṁ kurute paśyann api na paśyati

अर्थ“जिसने विश्व देखा, वो ‘नहीं है’ कर सकता। निर्वासन क्या करे? देखते हुए भी नहीं देखता।”

सन्दर्भप्रकरण 18, सबसे लम्बा, यहाँ ख़त्म। 100 श्लोकों में पूरी text का सार दोहराया। हर बार थोड़ा deepen। यह प्रकरण repeat-readable है, धीरे-धीरे absorb।
॥ जीवन्मुक्ति ॥