जीवन्मुक्ति
Liberation in Life · 100 श्लोक
अष्टावक्र का सबसे लम्बा प्रकरण। 100 श्लोक। पूरी text का सार यहाँ। हर श्लोक एक अद्वैत-ज्ञानी की state पर एक angle है। पढ़ते रहो, बार-बार। यह विशेष रूप से बाद के जन्म में Ramana Maharshi को पसन्द था।
तस्मै सुखैकरूपाय नमः शान्ताय तेजसे॥
tasmai sukhaika-rūpāya namaḥ śāntāya tejase
अर्थ“जिसके बोध के उदय होते ही भ्रम स्वप्न जैसा हो जाता है, उस सुख-एक-रूप, शान्त, तेज को नमस्कार।”
न हि सर्वपरित्यागमन्तरेण भवेत्सुखी॥
na hi sarva-parityāgam antareṇa bhavet sukhī
अर्थ“सब अर्थ कमा कर, अनेक भोग पा कर भी, सर्व-परित्याग के बिना सुखी नहीं होता।”
कुतः प्रशमपीयूषधारासारमृते सुखम्॥
kutaḥ praśama-pīyūṣa-dhārā-sāram ṛte sukham
अर्थ“कर्तव्य-दुःख रूपी सूर्य की ज्वाला से जला अन्तरात्मा, प्रशम-अमृत-धारा के बिना सुखी कैसे होगा?”
नास्त्यभावः स्वभावानां भावाभावविभाविनाम्॥
nāsty abhāvaḥ svabhāvānāṁ bhāvābhāva-vibhāvinām
अर्थ“यह संसार सिर्फ़ भावना-मात्र है, परमार्थतः कुछ नहीं। भाव-अभाव को विभाजित करने वाले स्वभावों का अभाव नहीं।”
निर्विकल्पं निरायासं निर्विकारं निरञ्जनम्॥
nirvikalpaṁ nirāyāsaṁ nirvikāraṁ nirañjanam
अर्थ“न दूर है, न संकोच से। आत्मा का पद पहले से प्राप्त ही है। निर्विकल्प, निर्आयास, निर्विकार, निरंजन।”
वीतशोका विराजन्ते निरावरणदृष्टयः॥
vīta-śokā virājante nirāvaraṇa-dṛṣṭayaḥ
अर्थ“भ्रम-मात्र की विरति में, स्वरूप के स्वीकार से, शोक-रहित हो कर, निरावरण-दृष्टि वाले शोभित होते हैं।”
इति विज्ञाय धीरो हि किमभ्यस्यति बालवत्॥
iti vijñāya dhīro hi kim abhyasyati bālavat
अर्थ“सब कुछ कल्पना-मात्र है, आत्मा मुक्त और सनातन है। यह जान कर धीर बालक की तरह क्या अभ्यास करेगा?”
निष्कामः किं विजानाति किं ब्रूते च करोति किम्॥
niṣkāmaḥ kiṁ vijānāti kiṁ brūte ca karoti kim
अर्थ“‘आत्मा ब्रह्म है’, निश्चय कर के, भाव-अभाव को कल्पित जान कर, निष्काम क्या जानेगा, क्या बोलेगा, क्या करेगा?”
सर्वमात्मेति निश्चित्य तूष्णीम्भूतस्य योगिनः॥
sarvam ātmeti niścitya tūṣṇīm-bhūtasya yoginaḥ
अर्थ“‘यह मैं हूँ, यह मैं नहीं’, यह विकल्पना उस योगी की क्षीण होती है जो ‘सब आत्मा है’ निश्चय कर के मौन है।”
न सुखं न च वा दुःखमुपशान्तस्य योगिनः॥
na sukhaṁ na ca vā duḥkham upaśāntasya yoginaḥ
अर्थ“न विक्षेप, न एकाग्रता, न अति-बोध, न मूढता। न सुख, न दुःख। यह उपशान्त योगी की state है।”
निर्विकल्पस्वभावस्य न विशेषोऽस्ति योगिनः॥
nirvikalpa-svabhāvasya na viśeṣo’sti yoginaḥ
अर्थ“राज्य में, भीख माँगने में, लाभ-अलाभ में, भीड़ में, जंगल में, निर्विकल्प स्वभाव वाले योगी का कोई फ़र्क़ नहीं।”
इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तस्य योगिनः॥
idaṁ kṛtam idaṁ neti dvandvair muktasya yoginaḥ
अर्थ“कहाँ धर्म, कहाँ काम, कहाँ अर्थ, कहाँ विवेक? ‘यह किया, यह नहीं’ इन द्वन्द्वों से मुक्त योगी के लिए।”
यथा जीवनमेवेह जीवन्मुक्तस्य योगिनः॥
yathā jīvanam eveha jīvan-muktasya yoginaḥ
अर्थ“कुछ कृत्य नहीं, हृदय में कोई रंजना भी नहीं। यथा-जीवन ही इस जीवन्मुक्त योगी की state है।”
सर्वसङ्कल्पसीमायां विश्रान्तस्य महात्मनः॥
sarva-saṅkalpa-sīmāyāṁ viśrāntasya mahātmanaḥ
अर्थ“कहाँ मोह, कहाँ विश्व, कहाँ वो ध्यान, कहाँ मुक्तता? सब सङ्कल्पों की सीमा में विश्रान्त महात्मा के लिए।”
निर्वासनः किं कुरुते पश्यन्नपि न पश्यति॥
nirvāsanaḥ kiṁ kurute paśyann api na paśyati
अर्थ“जिसने यह विश्व देखा, वो ‘नहीं है’ कह कर त्याग कर सकता है। निर्वासन क्या करेगा? देखते हुए भी नहीं देखता।”
किं चिन्तयति निश्चिन्तो द्वितीयं यो न पश्यति॥
kiṁ cintayati niścinto dvitīyaṁ yo na paśyati
अर्थ“जिसने परम ब्रह्म देखा, वो ‘मैं ब्रह्म हूँ’ सोच सकता है। मगर निश्चिन्त क्या सोचेगा, जो दूसरा देखता ही नहीं?”
उदारस्तु न विक्षिप्तः साध्याभावात्करोति किम्॥
udāras tu na vikṣiptaḥ sādhyābhāvāt karoti kim
अर्थ“जिसने आत्म-विक्षेप देखा, वो निरोध करता है। मगर उदार पुरुष विक्षिप्त नहीं, साध्य के अभाव में क्या करेगा?”
न समाधिं न विक्षेपं न लेपं स्वस्य पश्यति॥
na samādhiṁ na vikṣepaṁ na lepaṁ svasya paśyati
अर्थ“धीर लोक के विपरीत है, फिर भी लोक की तरह व्यवहार करता है। न समाधि, न विक्षेप, न लेप अपनी देखता है।”
नैव किञ्चित्कृतं तेन लोकदृष्ट्या विकुर्वता॥
naiva kiñcit kṛtaṁ tena loka-dṛṣṭyā vikurvatā
अर्थ“भाव-अभाव से रहित, तृप्त, निर्वासन बुध, उसने कुछ भी नहीं किया, लोक की दृष्टि में करते हुए भी।”
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वा तिष्ठते सुखम्॥
yadā yat kartum āyāti tat kṛtvā tiṣṭhate sukham
अर्थ“प्रवृत्ति में हो या निवृत्ति में, धीर को कोई पकड़ नहीं। जब जो करने को आ जाए, वो कर के सुख से रहता है।”
क्षिप्तः संस्कारवातेन चेष्टते शुष्कपर्णवत्॥
kṣiptaḥ saṁskāra-vātena ceṣṭate śuṣka-parṇavat
अर्थ“निर्वासन, निरालम्ब, स्वच्छन्द, मुक्त-बन्धन। संस्कार-वायु से उड़ाया जाते सूखे पत्ते की तरह चलता है।”
स शीतलमनानित्यमविदेह इव राजते॥
sa śītala-manā nityam avideha iva rājate
अर्थ“अ-संसारी को कहीं न हर्ष, न विषाद। वो नित्य शीतल-मन, बिना देह के जैसा शोभित होता है।”
आत्मारामस्य धीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः॥
ātma-rāmasya dhīrasya śītalācchatarātmanaḥ
अर्थ“कहीं छोड़ने की इच्छा नहीं, कहीं नाश का डर नहीं। आत्म-राम धीर, शीतल-स्वच्छ-आत्मा वाले की state।”
प्राकृतस्येव धीरस्य न मानो नावमानता॥
prākṛtasyeva dhīrasya na māno nāvamānatā
अर्थ“स्वभाव से शून्य-चित्त, अनायास काम करते इस धीर को, बच्चे की तरह, न मान, न अवमान।”
इति चिन्तानुरोधी यः कुर्वन्नपि करोति न॥
iti cintānurodhī yaḥ kurvann api karoti na
अर्थ“‘यह कर्म देह से हुआ, मुझ शुद्ध-स्वरूप से नहीं’, इस विचार के अनुरूप जो रहता है, वो करता हुआ भी नहीं करता।”
जीवन्मुक्तः सुखी श्रीमान् संसरन्नपि शोभते॥
jīvan-muktaḥ sukhī śrīmān saṁsarann api śobhate
अर्थ“‘अ-तत्’ बोलते जैसे, मगर बालिश नहीं। जीवन्मुक्त सुखी, श्रीमान्, संसरण में भी शोभित।”
न कल्पते न जाति न शृणोति न पश्यति॥
na kalpate na jāti na śṛṇoti na paśyati
अर्थ“अनेक विचारों से थका धीर, विश्राम में आ गया। न कल्पना करता, न पैदा होता, न सुनता, न देखता।”
निश्चित्य कल्पितं पश्यन्ब्रह्मैवास्ते महाशयः॥
niścitya kalpitaṁ paśyan brahmaivāste mahāśayaḥ
अर्थ“न समाधि-रहितता से, न विक्षेप-रहितता से। न मुमुक्षु, न इतर। निश्चय कर के कल्पित को देखते हुए, महाशय ब्रह्म ही रहता है।”
निरहंकारधीरेण न किञ्चिदकृतं कृतम्॥
nirahaṅkāra-dhīreṇa na kiñcid akṛtaṁ kṛtam
अर्थ“जिसके अन्दर अहंकार है, वो न करता हुआ भी करता है। निरहंकार धीर के लिए कुछ भी अकृत-कृत नहीं।”
निराशं गतसन्देहं चित्तं मुक्तस्य राजते॥
nirāśaṁ gata-sandehaṁ cittaṁ muktasya rājate
अर्थ“न उद्विग्न, न सन्तुष्ट। अकर्ता, स्पन्द-रहित। निराश, सन्देह-रहित। मुक्त का चित्त ऐसा शोभित होता है।”
निर्निमित्तमिदं किन्तु निर्ध्यायेति विचेष्टते॥
nirnimittam idaṁ kintu nirdhyāyeti viceṣṭate
अर्थ“ध्यान या चेष्टा के लिए जिसका चित्त प्रवृत्त नहीं, मगर बिना निमित्त के ‘मैं ध्यान कर रहा हूँ’ की चेष्टा करता है।”
अथवा याति सङ्कोचममूढः कोऽपि मूढवत्॥
athavā yāti saṅkocam amūḍhaḥ ko’pi mūḍhavat
अर्थ“तत्त्व सुन कर मन्द बुद्धि मूढ़ता को प्राप्त होता है। या संकोच में जाता है। और कोई अ-मूढ़, मूढ़ की तरह दिखता है।”
धीराः कृत्यं न पश्यन्ति सुप्तवत्स्वपदे स्थिताः॥
dhīrāḥ kṛtyaṁ na paśyanti supta-vat svapade sthitāḥ
अर्थ“एकाग्रता या निरोध मूढ़ बहुत अभ्यास करते हैं। धीर कुछ कृत्य नहीं देखते, सोते की तरह अपने पद में स्थित।”
तत्त्वनिश्चयमात्रेण प्राज्ञो भवति निर्वृतः॥
tattva-niścaya-mātreṇa prājño bhavati nirvṛtaḥ
अर्थ“प्रयत्न से या अप्रयत्न से, मूढ़ शान्ति नहीं पाता। तत्त्व-निश्चय मात्र से प्राज्ञ शान्त हो जाता है।”
आत्मानं तं न जानन्ति तत्राभ्यासपरा जनाः॥
ātmānaṁ taṁ na jānanti tatrābhyāsa-parā janāḥ
अर्थ“शुद्ध, बुद्ध, प्रिय, पूर्ण, निष्प्रपञ्च, निरामय आत्मा को, अभ्यास में लगे लोग जानते नहीं।”
धन्यो विज्ञानमात्रेण मुक्तस्तिष्ठत्यविक्रियः॥
dhanyo vijñāna-mātreṇa muktas tiṣṭhaty avikriyaḥ
अर्थ“विमूढ़ कर्म से, अभ्यास से मोक्ष नहीं पाता। धन्य पुरुष विज्ञान-मात्र से मुक्त, अविकार स्थित।”
अनिच्छन्नपि धीरो हि परब्रह्मस्वरूपभाक्॥
anicchann api dhīro hi para-brahma-svarūpa-bhāk
अर्थ“मूढ़ ब्रह्म नहीं पाता, क्योंकि उसे ‘बनने’ की इच्छा है। न चाहते भी धीर परब्रह्म-स्वरूप का भागी।”
एतस्यानर्थमूलस्य मूलच्छेदः कृतो बुधैः॥
etasyānartha-mūlasya mūla-cchedaḥ kṛto budhaiḥ
अर्थ“निराधार, ग्रह में व्यग्र मूढ़, संसार के पोषक। बुधों ने इस अनर्थ-मूल की जड़ काट दी।”
धीरस्तत्त्वं विनिश्चित्य सर्वदा शान्तमानसः॥
dhīras tattvaṁ viniścitya sarvadā śānta-mānasaḥ
अर्थ“मूढ़ शान्ति नहीं पाता क्योंकि शान्त होने की इच्छा है। धीर तत्त्व निश्चित कर के, सदा शान्त-मानस।”
धीरास्तं तं न पश्यन्ति पश्यन्त्यात्मानमव्ययम्॥
dhīrās taṁ taṁ na paśyanti paśyanty ātmānam avyayam
अर्थ“उसका आत्म-दर्शन कहाँ जो “दृष्ट” का सहारा लेता है? धीर वो-वो (objects) नहीं देखते, अव्यय आत्मा को देखते हैं।”
स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदासावकृत्रिमः॥
svārāmasyaiva dhīrasya sarvadāsāv akṛtrimaḥ
अर्थ“विमूढ़ का निरोध कहाँ जो बँधन करता है? स्व-आराम धीर का निरोध सदा अकृत्रिम।”
उभयाभावकः कश्चिदेवमेव निराकुलः॥
ubhayābhāvakaḥ kaścid evam eva nirākulaḥ
अर्थ“कोई भाव का चिन्तक, दूसरा ‘कुछ नहीं’ का चिन्तक। तीसरा दोनों के अभाव का चिन्तक, ऐसे ही निराकुल।”
न तु जानन्ति सम्मोहाद्यावज्जीवमनिर्वृताः॥
na tu jānanti sammohād yāvaj-jīvam anirvṛtāḥ
अर्थ“कुबुद्धि शुद्ध-अद्वय आत्मा की भावना करते हैं, मगर जानते नहीं। सम्मोह से जीवन भर अशान्त रहते हैं।”
निरालम्बैव निष्कामा बुद्धिर्मुक्तस्य सर्वदा॥
nirālambaiva niṣkāmā buddhir muktasya sarvadā
अर्थ“मुमुक्षु की बुद्धि बिना आलम्बन के नहीं रहती। मुक्त की बुद्धि निरालम्ब, निष्काम, सदा।”
विशन्ति झटिति क्रोडं निरोधैकाग्रसिद्धये॥
viśanti jhaṭiti kroḍaṁ nirodhaikāgra-siddhaye
अर्थ“विषय रूपी बाघों को देख कर डरे हुए शरण-चाहने वाले, जल्दी से (समाधि के) कुम्भ में घुसते हैं, निरोध और एकाग्रता की सिद्धि के लिए।”
पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः॥
palāyante na śaktās te sevante kṛta-cāṭavaḥ
अर्थ“निर्वासन सिंह को मौन देख कर, विषय-हाथी न भाग सकते, उसकी ही चाटुकारी कर के सेवा करते।”
पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्न् अश्नन्नस्ते यथासुखम्॥
paśyan śṛṇvan spṛśan jighrann aśnann āste yathā-sukham
अर्थ“निःशङ्क, युक्त-मानस वाला मुक्ति-शास्त्र भी धारण नहीं करता। देखते, सुनते, छूते, सूँघते, खाते, सुख से रहता है।”
नैवाचारमनाचारमौदास्यं वा प्रपश्यति॥
naivācāram anācāram audāsyaṁ vā prapaśyati
अर्थ“वस्तु (तत्त्व) के श्रवण मात्र से शुद्ध-बुद्धि निराकुल। आचार, अनाचार, औदास्य कुछ नहीं देखता।”
शुभं वाप्यशुभं वापि तस्य चेष्टा हि बालवत्॥
śubhaṁ vāpy aśubhaṁ vāpi tasya ceṣṭā hi bālavat
अर्थ“जब जो करने को आ जाए, सरल चित्त करता है। शुभ-अशुभ कुछ भी, उसकी चेष्टा बच्चे की तरह।”
स्वातन्त्र्यान्निर्वृतिं गच्छेत्स्वातन्त्र्यात्परमं पदम्॥
svātantryān nirvṛtiṁ gacchet svātantryāt paramaṁ padam
अर्थ“स्वातन्त्र्य से सुख। स्वातन्त्र्य से परम। स्वातन्त्र्य से शान्ति। स्वातन्त्र्य से परम पद।”
तदा क्षीणा भवन्त्येव समस्ताश्चित्तवृत्तयः॥
tadā kṣīṇā bhavanty eva samastāś citta-vṛttayaḥ
अर्थ“जब आत्मा के अकर्तृत्व-अभोक्तृत्व को मानता है, तब चित्त की सब वृत्तियाँ क्षीण हो जाती हैं।”
न तु सस्पृहचित्तस्य शान्तिर्मूढस्य कृत्रिमा॥
na tu sa-spṛha-cittasya śāntir mūḍhasya kṛtrimā
अर्थ“उच्छृङ्खल भी, अकृत्रिम धीर की स्थिति शोभित होती है। मगर सस्पृह-चित्त मूढ़ की शान्ति कृत्रिम (झूठी)।”
निरस्तकल्पना धीरा अबद्धा मुक्तबुद्धयः॥
nirasta-kalpanā dhīrā abaddhā mukta-buddhayaḥ
अर्थ“महान् भोगों से विलास करते, या पहाड़ की गुफाओं में घुसते। निरस्त-कल्पना धीर, अबद्ध, मुक्त-बुद्धि।”
दृष्ट्वा सम्पूज्य धीरस्य न कापि हृदि वासना॥
dṛṣṭvā sampūjya dhīrasya na kāpi hṛdi vāsanā
अर्थ“वेदज्ञ, देवता, तीर्थ, स्त्री, राजा, या प्रिय को देख कर, धीर को हृदय में कोई वासना नहीं।”
विहस्य धिक्कृतो योगी न याति विकृतिं मनाक्॥
vihasya dhik-kṛto yogī na yāti vikṛtiṁ manāk
अर्थ“भृत्य, पुत्र, पत्नी, दौहित्र, गोत्रज, सब से हँसी या तिरस्कार पाने पर, योगी ज़रा भी विकृत नहीं होता।”
तस्याश्चर्यदशां तां तां तादृशा एव जानते॥
tasyāścarya-daśāṁ tāṁ tāṁ tādṛśā eva jānate
अर्थ“सन्तुष्ट भी सन्तुष्ट नहीं, खिन्न भी खिन्न नहीं। उसकी आश्चर्य-दशाएँ, वैसे ही जानते हैं।”
शून्याकाराः निराकाराः निर्विकाराः निरामयाः॥
śūnyākārāḥ nirākārāḥ nirvikārāḥ nirāmayāḥ
अर्थ“कर्तव्यता ही संसार है, जिसे सूरी (ज्ञानी) नहीं देखते। शून्य-आकार, निराकार, निर्विकार, निरामय।”
कुर्वन्नपि तु कृत्यानि कुशलो हि निराकुलः॥
kurvann api tu kṛtyāni kuśalo hi nirākulaḥ
अर्थ“मूढ़-बुद्धि न करते हुए भी क्षोभ से व्यग्र। कुशल कर्म करते हुए भी निराकुल।”
सुखं वक्ति सुखं भुंक्ते व्यवहारेऽपि शान्तधीः॥
sukhaṁ vakti sukhaṁ bhuṅkte vyavahāre’pi śānta-dhīḥ
अर्थ“सुख से बैठता, सुख से सोता, सुख से आता-जाता, सुख से बोलता, सुख से खाता, व्यवहार में भी शान्त-धी।”
महाह्रद इवाक्षोभ्यो गतक्लेशः स शोभते॥
mahā-hrada ivākṣobhyo gata-kleśaḥ sa śobhate
अर्थ“स्वभाव से जिसको पीड़ा नहीं, लोक की तरह व्यवहार करते भी। बड़े झील की तरह अक्षोभ्य, क्लेश-रहित, वो शोभित।”
प्रवृत्तिरपि धीरस्य निवृत्तिफलभागिनी॥
pravṛttir api dhīrasya nivṛtti-phala-bhāginī
अर्थ“मूढ़ की निवृत्ति प्रवृत्ति बन जाती है। धीर की प्रवृत्ति निवृत्ति-फल देती है।”
देहे विगलिताशस्य क्व रागः क्व विरागता॥
dehe vigalitāśasya kva rāgaḥ kva virāgatā
अर्थ“मूढ़ की वैराग्य परिग्रहों से दिखती है। देह से जिसकी आशा गल गयी, उसको कहाँ राग, कहाँ विराग?”
भाव्यभावनया सा तु स्वस्थस्यादृष्टिरूपिणी॥
bhāvya-bhāvanayā sā tu svasthasyādṛṣṭi-rūpiṇī
अर्थ“मूढ़ की दृष्टि भावना-अभावना में आसक्त। स्वस्थ की दृष्टि भाव्य-भावना से रहित, अदृष्टि-स्वरूप।”
न लेपस्तस्य शुद्धस्य क्रियमाणेऽपि कर्मणि॥
na lepas tasya śuddhasya kriyamāṇe’pi karmaṇi
अर्थ“सब आरम्भों में निष्काम, बालक की तरह चलने वाला मुनि। उस शुद्ध को कर्म होते हुए भी कोई लेप नहीं।”
पश्यन् शृण्वन् स्पृशन् जिघ्रन्न् अश्नन्निष्टे विरज्वरः॥
paśyan śṛṇvan spṛśan jighrann aśnann iṣṭe vira-jvaraḥ
अर्थ“वही धन्य आत्म-ज्ञ, जो सब भावों में सम। देखते, सुनते, छूते, सूँघते, खाते, पसन्द में भी ज्वर-रहित।”
आकाशस्येव धीरस्य निर्विकल्पस्य सर्वदा॥
ākāśasyeva dhīrasya nirvikalpasya sarvadā
अर्थ“कहाँ संसार, कहाँ आभास, कहाँ साध्य, कहाँ साधन? आकाश जैसे, सर्वदा निर्विकल्प, धीर के लिए।”
अकृत्रिमोऽनवच्छिन्ने समाधिर्यस्य वर्तते॥
akṛtrimo’navacchinne samādhir yasya vartate
अर्थ“वो जय पाता है जो अर्थ-सन्न्यासी, पूर्ण-स्वरस-विग्रह। जिसकी अकृत्रिम, अविच्छिन्न समाधि चलती है।”
भोगमोक्षनिराकाङ्क्षी सदा सर्वत्र नीरसः॥
bhoga-mokṣa-nirākāṅkṣī sadā sarvatra nīrasaḥ
अर्थ“बहुत क्या कहूँ? ज्ञात-तत्त्व महाशय, भोग-मोक्ष से निराकांक्षी, सर्वदा सर्वत्र नीरस।”
विहाय शुद्धबोधस्य किं कृत्यमवशिष्यते॥
vihāya śuddha-bodhasya kiṁ kṛtyam avaśiṣyate
अर्थ“महद् आदि जगत्-द्वैत नाम-मात्र से फैला। उसे छोड़ शुद्ध-बोध के लिए क्या कृत्य बाक़ी?”
निर्वासनो निराकारो निर्विकल्पश्च तिष्ठति॥
nirvāsano nirākāro nirvikalpaś ca tiṣṭhati
अर्थ“सब भौतिक भ्रम जान कर जो विरमित हो, वो निर्वासन, निराकार, निर्विकल्प स्थित।”
शुद्धबुद्धिः कृताकृत्ये पश्यन्नपि न पश्यति॥
śuddha-buddhiḥ kṛtākṛtye paśyann api na paśyati
अर्थ“मानो कैवल्य प्राप्त, धन्य पुरुष, अज्ञात-समुच्छ्रय। शुद्ध-बुद्धि कृत-अकृत्य में देख कर भी नहीं देखता।”
ग्रहमोक्षविहीनस्तु न विरक्तो न रागवान्॥
graha-mokṣa-vihīnas tu na virakto na rāgavān
अर्थ“जो विरक्त वो विषय-द्वेष्टा। रागी वो विषय-लोलुप। ग्रह-मोक्ष से रहित, न विरक्त, न रागवान।”
स्पृहा जीवति यावद्वै निर्विचारदशास्पदम्॥
spṛhā jīvati yāvad vai nirvicāra-daśāspadam
अर्थ“हेय-उपादेय ही संसार-वृक्ष का अंकुर है। जब तक स्पृहा जीवित है, निर्विचार-दशा का स्थान नहीं।”
निर्द्वन्द्वो बालवद्धीमान् एवमेव व्यवस्थितः॥
nirdvandvo bālavad dhīmān evam eva vyavasthitaḥ
अर्थ“प्रवृत्ति में राग, निवृत्ति में द्वेष। निर्द्वन्द्व, बालक की तरह धीमान् ऐसे स्थित।”
वीतरागो हि निर्दुःखस्तस्मिन्नपि न खिद्यति॥
vīta-rāgo hi niḥkhukhas tasminn api na khidyati
अर्थ“रागी दुःख से बचने को संसार छोड़ना चाहता है। वीत-राग निर्दुःख, संसार में भी खेद नहीं।”
न च ज्ञानी न वा योगी केवलं दुःखभाग् असौ॥
na ca jñānī na vā yogī kevalaṁ duḥkha-bhāg asau
अर्थ“मोक्ष में अभिमान, देह में ममता, ऐसा न ज्ञानी, न योगी, केवल दुःख-भागी।”
तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणाद् ऋते॥
tathāpi na tava svāsthyaṁ sarva-vismaraṇād ṛte
अर्थ“शिव, विष्णु, ब्रह्मा भी उपदेष्टा हों, फिर भी तुझे स्वास्थ्य नहीं, बिना सब को भुलाए।”
निर्विकल्पोऽसि बोधात्मा निर्विकारः सुखं चर॥
nirvikalpo’si bodhātmā nirvikāraḥ sukhaṁ cara
अर्थ“राग-द्वेष मन के धर्म, मन तेरा कभी नहीं। निर्विकल्प, बोध-आत्मा, निर्विकार, सुख से चल।”
मुनेर्जानत आश्चर्यं ममत्वमनुवर्तते॥
muner jānata āścaryaṁ mamatvam anuvartate
अर्थ“सब भूतों में आत्मा, सब भूत आत्मा में, यह जानने वाले मुनि की ममता बची रहे, आश्चर्य।”
आश्चर्यं कामवशगो विकलः केलिशिक्षया॥
āścaryaṁ kāma-vaśa-go vikalaḥ keli-śikṣayā
अर्थ“परम-अद्वैत में स्थित, मोक्ष में लगे हुए को भी, काम के वश में हो कर खेल-शिक्षा से विकल होना, आश्चर्य।”
आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत् कालमन्तमनुश्रितः॥
āścaryaṁ kāmam ākāṅkṣet kālam antam anuśritaḥ
अर्थ“काम को ज्ञान-शत्रु जान कर, अति-दुर्बल हो कर, अन्तकाल के निकट हो कर भी काम चाहना, आश्चर्य।”
आश्चर्यं मोक्षकामस्य मोक्षाद् एव विभीषिका॥
āścaryaṁ mokṣa-kāmasya mokṣād eva vibhīṣikā
अर्थ“इह-अमुत्र से विरक्त, नित्य-अनित्य के विवेकी, मोक्ष-कामी को मोक्ष से ही डर, आश्चर्य।”
आत्मानं केवलं पश्यन्न तुष्यति न कुप्यति॥
ātmānaṁ kevalaṁ paśyan na tuṣyati na kupyati
अर्थ“धीर भोगा जाता या पीड़ित होता, सदा सिर्फ़ आत्मा को देखता, न तुष्ट, न क्रुद्ध।”
संस्तवे चापि निन्दायां कथं क्षुभ्येत् महाशयः॥
saṁstave cāpi nindāyāṁ kathaṁ kṣubhyet mahāśayaḥ
अर्थ“अपने काम करते शरीर को दूसरे की तरह देखता है। प्रशंसा-निन्दा में महाशय कैसे क्षुब्ध हो?”
अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः॥
api sannihite mṛtyau kathaṁ trasyati dhīra-dhīḥ
अर्थ“विश्व माया-मात्र देख कर, कौतुक-रहित, मृत्यु निकट आने पर भी धीर-धी कैसे डरे?”
तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते॥
tasyātma-jñāna-tṛptasya tulanā kena jāyate
अर्थ“निःस्पृह मन, निराशा में भी, उस महात्मा की, आत्म-ज्ञान-तृप्त की, तुलना किस से हो?”
इदं ग्राह्यमिदं त्याज्यं स किं पश्यति धीरधीः॥
idaṁ grāhyam idaṁ tyājyaṁ sa kiṁ paśyati dhīradhīḥ
अर्थ“स्वभाव से ही जानते कि यह दृश्य कुछ नहीं, वो धीर ‘यह लेने योग्य, यह छोड़ने योग्य’ कैसे देखे?”
यदृच्छयागतो भोगो न दुःखाय न तुष्टये॥
yadṛcchayāgato bhogo na duḥkhāya na tuṣṭaye
अर्थ“अन्दर के कषाय छोड़े, निर्द्वन्द्व, निराशीष, यदृच्छया आए भोग, न दुःख देते, न तुष्टि।”
एवं ज्ञात्वेह निर्वेदाद्भव त्यागपरोऽव्रती॥
evaṁ jñātvā iha nirvedād bhava tyāga-paro’vratī
अर्थ“किया-अकिया द्वन्द्व कब किसके शान्त हुए? यह जान कर निर्वेद से त्याग-पर हो जा, अव्रती।”
उपशाम्य सुखं तिष्ठ स्वात्मन्यानन्दविग्रहे॥
upaśāmya sukhaṁ tiṣṭha svātmany ānanda-vigrahe
अर्थ“हे चिन्मय, सङ्कल्प-विकल्प से चित्त को क्षुब्ध मत कर। उपशान्त हो कर, सुख से, अपने आनन्द-विग्रह आत्मा में स्थित हो।”
आत्मा त्वं मुक्त एवासि किं विमृश्य करिष्यसि॥
ātmā tvaṁ mukta evāsi kiṁ vimṛśya kariṣyasi
अर्थ“ध्यान भी छोड़, हर जगह। हृदय में कुछ धारण मत कर। तू मुक्त आत्मा ही है। विचार से क्या करेगा?”
इति विज्ञाय धीरो हि किमभ्यस्यति बालवत्॥
iti vijñāya dhīro hi kim abhyasyati bālavat
अर्थ“सब कल्पना-मात्र है, आत्मा मुक्त, सनातन। यह जान कर धीर बच्चे की तरह क्या अभ्यास करेगा?”
निष्कामः किं विजानाति किं ब्रूते च करोति किम्॥
niṣkāmaḥ kiṁ vijānāti kiṁ brūte ca karoti kim
अर्थ“आत्मा ब्रह्म, निश्चय। भाव-अभाव कल्पित। निष्काम क्या जाने, क्या बोले, क्या करे?”
सर्वमात्मेति निश्चित्य तूष्णीम्भूतस्य योगिनः॥
sarvam ātmeti niścitya tūṣṇīm-bhūtasya yoginaḥ
अर्थ“‘यह मैं, यह मैं नहीं’ विकल्पना क्षीण। ‘सब आत्मा’ निश्चय कर के मौन हुए योगी की।”
न सुखं न च वा दुःखमुपशान्तस्य योगिनः॥
na sukhaṁ na ca vā duḥkham upaśāntasya yoginaḥ
अर्थ“न विक्षेप, न एकाग्रता, न अति-बोध, न मूढता। न सुख, न दुःख। उपशान्त योगी की।”
निर्विकल्पस्वभावस्य न विशेषोऽस्ति योगिनः॥
nirvikalpa-svabhāvasya na viśeṣo’sti yoginaḥ
अर्थ“राज्य में, भीख माँगने में, लाभ-अलाभ, जन-वन, निर्विकल्प-स्वभाव योगी को कोई फ़र्क़ नहीं।”
इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तस्य योगिनः॥
idaṁ kṛtam idaṁ neti dvandvair muktasya yoginaḥ
अर्थ“कहाँ धर्म, काम, अर्थ, विवेकिता? ‘किया-नहीं’ द्वन्द्वों से मुक्त योगी के लिए।”
यथा जीवनमेवेह जीवन्मुक्तस्य योगिनः॥
yathā jīvanam eveha jīvan-muktasya yoginaḥ
अर्थ“कुछ कृत्य नहीं, हृदय में कोई रंजना नहीं। यथा-जीवन ही जीवन्मुक्त योगी की।”
सर्वसङ्कल्पसीमायां विश्रान्तस्य महात्मनः॥
sarva-saṅkalpa-sīmāyāṁ viśrāntasya mahātmanaḥ
अर्थ“कहाँ मोह, विश्व, ध्यान, मुक्तता? सब सङ्कल्प-सीमा में विश्रान्त महात्मा के लिए।”
निर्वासनः किं कुरुते पश्यन्नपि न पश्यति॥
nirvāsanaḥ kiṁ kurute paśyann api na paśyati
अर्थ“जिसने विश्व देखा, वो ‘नहीं है’ कर सकता। निर्वासन क्या करे? देखते हुए भी नहीं देखता।”