स्वास्थ्य
Self-Repose · 11 श्लोक
अष्टावक्र की एक repeated theme: “सब भूल”। यह radical position है। शास्त्र भी, अभ्यास भी, सब भुलाओ। तब आत्मा का स्वास्थ्य।
तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणाद् ऋते॥
tathāpi na tava svāsthyaṁ sarva-vismaraṇād ṛte
अर्थ“बेटा, अनेक शास्त्रों को बार-बार बोल या सुन। फिर भी तुझे स्वास्थ्य (आत्म-स्थिति) नहीं मिलेगा, बिना सब को भुलाए।”
पाठक के लिए“भूलना” यहाँ amnesia नहीं। यह उन सब concepts का drop है जो “मैं” से चिपके हैं। शास्त्र पढ़ो, फिर रख दो। उस “रख देना” में स्वास्थ्य है।
चित्तं निरस्तसर्वाशम् अत्यर्थं रोचयिष्यति॥
cittaṁ nirasta-sarvāśam atyarthaṁ rocayiṣyati
अर्थ“हे विज्ञ, भोग कर, कर्म कर, या समाधि कर। तेरा चित्त सब आशाओं से रहित हो कर ही अति-आनन्द से रुचेगा।”
पाठक के लिएआप जो भी कर रहे हैं, उसमें “आशा” check करो। अगर “मुझे यह result चाहिए” है, तो आशा है। उसको drop करो, activity वही रहेगी, मगर experience बदल जाएगा।
अनेनैवोपदेशेन धन्यः प्राप्नोति निर्वृतिम्॥
anenaivopadeśena dhanyaḥ prāpnoti nirvṛtim
अर्थ“प्रयत्न से सब लोग दुःखी हैं, यह बात कोई जानता नहीं। इसी उपदेश से धन्य पुरुष शान्ति को प्राप्त करता है।”
पाठक के लिएएक test: अपने सब “achievements” सोचो। हर एक में एक “वो moment” था जब “मुझे यह चाहिए” से “हो गया” का transition हुआ। उस transition के बाद का सुख कुछ ही देर रहा। फिर “अगला” शुरू।
तस्यालस्यधुरीणस्य सुखं नान्यस्य कस्यचित्॥
tasyālasya-dhurīṇasya sukhaṁ nānyasya kasyacit
अर्थ“जो आँख की पलक झपकाने जैसे काम में भी खेद करता है, उस आलस्य-धुरीण को ही सुख है, और किसी को नहीं।”
पाठक के लिएयह श्लोक literally नहीं लेना। आँख तो खुलेगी-बन्द होगी। पर इस श्लोक की spirit है, minimum action, maximum being। आज जितना action ज़रूरी न हो, उतना कम।
धर्मार्थकाममोक्षेषु निरपेक्षं तदा भवेत्॥
dharmārtha-kāma-mokṣeṣu nirapekṣaṁ tadā bhavet
अर्थ“‘यह किया, यह नहीं किया’, इन द्वन्द्वों से जब मन मुक्त, तब धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष में निरपेक्ष हो जाता है।”
पाठक के लिएआप किसी भी activity में हो, अपने आप से पूछो, “यह किस goal के लिए?” अगर answer “धर्म, अर्थ, काम, या मोक्ष” है, तो आप अभी pursuit में हो। पुनर्विचार करो, क्या यह pursuit ख़त्म हो सकती है?
ग्रहमोक्षविहीनस्तु न विरक्तो न रागवान्॥
graha-mokṣa-vihīnas tu na virakto na rāgavān
अर्थ“विरक्त वो जो विषयों से द्वेष करता है। रागी वो जो विषयों से चिपका है। मगर ‘ग्रहण-त्याग’ से रहित, न विरक्त, न रागवान।”
पाठक के लिए“विरक्ति” को goal समझना mistake है। विरक्त भी रागी का mirror है। ज्ञानी third position, neutral, beyond preference।
स्पृहा जीवति यावद्वै निर्विचारदशास्पदम्॥
spṛhā jīvati yāvad vai nirvicāra-daśāspadam
अर्थ“हेय-उपादेय (छोड़ना-पकड़ना) ही संसार-वृक्ष का अंकुर है। जब तक स्पृहा जीवित है, तब तक निर्विचार-दशा का आधार नहीं।”
पाठक के लिए“निर्विचार-दशा” का goal नहीं है। यह अद्वैत में natural state है। मगर अगर “मुझे निर्विचार चाहिए” यह स्पृहा है, तो वो ख़ुद obstacle।
निर्द्वन्द्वो बालवद्धीमान् एवमेव व्यवस्थितः॥
nirdvandvo bālavad dhīmān evam eva vyavasthitaḥ
अर्थ“प्रवृत्ति में राग पैदा होता है, निवृत्ति में द्वेष। निर्द्वन्द्व, बालक की तरह, धीमान्, ऐसे ही स्थित रहता है।”
पाठक के लिएएक छोटे बच्चे को देखो, उसकी innocence नहीं, उसकी natural neutrality। बच्चा गुस्सा करता है, हँसता है, मगर अगले moment भूल जाता है। यही state, ज्ञानपूर्वक।
वीतरागो हि निर्दुःखस्तस्मिन्नपि न खिद्यति॥
vīta-rāgo hi nirduḥkhas tasminn api na khidyati
अर्थ“रागी संसार को छोड़ना चाहता है, दुःख से बचने की इच्छा से। मगर वीत-राग तो निर्दुःख है। उसे संसार में भी खेद नहीं।”
पाठक के लिए“संसार छोड़ो” का call आम तौर पर “दुःख से डर” से आता है। मगर ज्ञान का call है, “दुःख का base ख़त्म कर, संसार automatic okay”।
न च ज्ञानी न वा योगी केवलं दुःखभाग् असौ॥
na ca jñānī na vā yogī kevalaṁ duḥkha-bhāg asau
अर्थ“जिसको मोक्ष में भी अभिमान है, और देह में ममता, वो न ज्ञानी है, न योगी। बस केवल दुःख का भागी है।”
पाठक के लिएआज spiritual world में बहुत “enlightened” लोग हैं। हर एक का अपना brand। इस श्लोक से check करें, “क्या मोक्ष का अभिमान है?” अगर है, तो काम बाक़ी है।
तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणाद् ऋते॥
tathāpi na tava svāsthyaṁ sarva-vismaraṇād ṛte
अर्थ“शिव, विष्णु, ब्रह्मा भी तेरे उपदेष्टा हों, फिर भी तुझे स्वास्थ्य नहीं मिलेगा, बिना सब को भुलाए।”
पाठक के लिएप्रकरण 16 ख़त्म। final message: कोई बाहर का guru, चाहे शिव हो, ख़ुद आ कर बोले, फिर भी तुम्हारे “सब भुलाए बिना” काम नहीं होगा। ज्ञान बाहर से आता है, मगर realize अन्दर ही होता है।