अष्टावक्र गीता · प्रकरण 16: स्वास्थ्य

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 16

स्वास्थ्य

Self-Repose · 11 श्लोक

अष्टावक्र की एक repeated theme: “सब भूल”। यह radical position है। शास्त्र भी, अभ्यास भी, सब भुलाओ। तब आत्मा का स्वास्थ्य।

श्लोक 1
अष्टावक्र उवाच
आचक्ष्व शृणु वा तात नानाशास्त्राण्यनेकशः।
तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणाद् ऋते॥
ācakṣva śṛṇu vā tāta nānā-śāstrāṇy anekaśaḥ
tathāpi na tava svāsthyaṁ sarva-vismaraṇād ṛte

अर्थ“बेटा, अनेक शास्त्रों को बार-बार बोल या सुन। फिर भी तुझे स्वास्थ्य (आत्म-स्थिति) नहीं मिलेगा, बिना सब को भुलाए।”

सन्दर्भ“सर्व-विस्मरण”। सब का विस्मरण। यह radical है। ज्ञान भी “भूलना” है? हाँ। ज्ञान concept में रुक गया, तो भी ज्ञान नहीं। पूरी विस्मृति में जब “मैं” remember नहीं रहा, तब असली स्वास्थ्य।

पाठक के लिए“भूलना” यहाँ amnesia नहीं। यह उन सब concepts का drop है जो “मैं” से चिपके हैं। शास्त्र पढ़ो, फिर रख दो। उस “रख देना” में स्वास्थ्य है।

श्लोक 2
अष्टावक्र उवाच
भोगं कर्म समाधिं वा कुरु विज्ञ तथापि ते।
चित्तं निरस्तसर्वाशम् अत्यर्थं रोचयिष्यति॥
bhogaṁ karma samādhiṁ vā kuru vijña tathāpi te
cittaṁ nirasta-sarvāśam atyarthaṁ rocayiṣyati

अर्थ“हे विज्ञ, भोग कर, कर्म कर, या समाधि कर। तेरा चित्त सब आशाओं से रहित हो कर ही अति-आनन्द से रुचेगा।”

सन्दर्भतीन options: भोग, कर्म, समाधि। तीनों कर लो। फिर भी “आनन्द” तभी जब “आशा” गयी। यानी activity का problem नहीं, attachment का problem है।

पाठक के लिएआप जो भी कर रहे हैं, उसमें “आशा” check करो। अगर “मुझे यह result चाहिए” है, तो आशा है। उसको drop करो, activity वही रहेगी, मगर experience बदल जाएगा।

श्लोक 3
अष्टावक्र उवाच
आयासात्सकलो दुःखी नैनं जानाति कश्चन।
अनेनैवोपदेशेन धन्यः प्राप्नोति निर्वृतिम्॥
āyāsāt sakalo duḥkhī nainaṁ jānāti kaścana
anenaivopadeśena dhanyaḥ prāpnoti nirvṛtim

अर्थ“प्रयत्न से सब लोग दुःखी हैं, यह बात कोई जानता नहीं। इसी उपदेश से धन्य पुरुष शान्ति को प्राप्त करता है।”

सन्दर्भ“प्रयत्न से दुःख”। यह counter-intuitive है। हम सोचते हैं प्रयत्न से सुख। मगर हर प्रयत्न में “कमी” का sense छुपा है। इसी “कमी” का sense दुःख है।

पाठक के लिएएक test: अपने सब “achievements” सोचो। हर एक में एक “वो moment” था जब “मुझे यह चाहिए” से “हो गया” का transition हुआ। उस transition के बाद का सुख कुछ ही देर रहा। फिर “अगला” शुरू।

श्लोक 4
अष्टावक्र उवाच
व्यापारे खिद्यते यस्तु निमेषोन्मेषयोरपि।
तस्यालस्यधुरीणस्य सुखं नान्यस्य कस्यचित्॥
vyāpāre khidyate yas tu nimeṣonmeṣayor api
tasyālasya-dhurīṇasya sukhaṁ nānyasya kasyacit

अर्थ“जो आँख की पलक झपकाने जैसे काम में भी खेद करता है, उस आलस्य-धुरीण को ही सुख है, और किसी को नहीं।”

सन्दर्भ“आलस्य-धुरीण”। यानी “आलस्य का leader”। अष्टावक्र provocatively बोल रहे हैं। आँख का खुलना-बन्द होना भी “ज़्यादा activity” लगे, उस deep rest में सुख।

पाठक के लिएयह श्लोक literally नहीं लेना। आँख तो खुलेगी-बन्द होगी। पर इस श्लोक की spirit है, minimum action, maximum being। आज जितना action ज़रूरी न हो, उतना कम।

श्लोक 5
अष्टावक्र उवाच
इदं कृतमिदं नेति द्वन्द्वैर्मुक्तं यदा मनः।
धर्मार्थकाममोक्षेषु निरपेक्षं तदा भवेत्॥
idaṁ kṛtam idaṁ neti dvandvair muktaṁ yadā manaḥ
dharmārtha-kāma-mokṣeṣu nirapekṣaṁ tadā bhavet

अर्थ“‘यह किया, यह नहीं किया’, इन द्वन्द्वों से जब मन मुक्त, तब धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष में निरपेक्ष हो जाता है।”

सन्दर्भचारों पुरुषार्थों में निरपेक्षता। यह हिन्दू-philosophy का radical departure है। चारों goals को छोड़ना, सब उद्देश्यों से ऊपर उठ जाना।

पाठक के लिएआप किसी भी activity में हो, अपने आप से पूछो, “यह किस goal के लिए?” अगर answer “धर्म, अर्थ, काम, या मोक्ष” है, तो आप अभी pursuit में हो। पुनर्विचार करो, क्या यह pursuit ख़त्म हो सकती है?

श्लोक 6
अष्टावक्र उवाच
विरक्तो विषयद्वेष्टा रागी विषयलोलुपः।
ग्रहमोक्षविहीनस्तु न विरक्तो न रागवान्॥
virakto viṣaya-dveṣṭā rāgī viṣaya-lolupaḥ
graha-mokṣa-vihīnas tu na virakto na rāgavān

अर्थ“विरक्त वो जो विषयों से द्वेष करता है। रागी वो जो विषयों से चिपका है। मगर ‘ग्रहण-त्याग’ से रहित, न विरक्त, न रागवान।”

सन्दर्भतीन positions: रागी (चाहता), विरक्त (नहीं चाहता), और ज्ञानी (न चाहता, न नहीं चाहता)। पहली दो positions opposite हैं, मगर dynamic same है, “मैं vs चीज़ें”।

पाठक के लिए“विरक्ति” को goal समझना mistake है। विरक्त भी रागी का mirror है। ज्ञानी third position, neutral, beyond preference।

श्लोक 7
अष्टावक्र उवाच
हेयोपादेयता तावत्संसारविटपाङ्कुरः।
स्पृहा जीवति यावद्वै निर्विचारदशास्पदम्॥
heyopādeyatā tāvat saṁsāra-viṭapāṅkuraḥ
spṛhā jīvati yāvad vai nirvicāra-daśāspadam

अर्थ“हेय-उपादेय (छोड़ना-पकड़ना) ही संसार-वृक्ष का अंकुर है। जब तक स्पृहा जीवित है, तब तक निर्विचार-दशा का आधार नहीं।”

सन्दर्भ“संसार-वृक्ष का अंकुर”। यह interesting metaphor है। संसार बड़ा पेड़, मगर उसका seed कहाँ? हेय-उपादेय के choice में। हर “यह रखूँ-यह छोड़ूँ” decision एक नया leaf उगाता है।

पाठक के लिए“निर्विचार-दशा” का goal नहीं है। यह अद्वैत में natural state है। मगर अगर “मुझे निर्विचार चाहिए” यह स्पृहा है, तो वो ख़ुद obstacle।

श्लोक 8
अष्टावक्र उवाच
प्रवृत्तौ जायते रागो निर्वृत्तौ द्वेष एव हि।
निर्द्वन्द्वो बालवद्धीमान् एवमेव व्यवस्थितः॥
pravṛttau jāyate rāgo nirvṛttau dveṣa eva hi
nirdvandvo bālavad dhīmān evam eva vyavasthitaḥ

अर्थ“प्रवृत्ति में राग पैदा होता है, निवृत्ति में द्वेष। निर्द्वन्द्व, बालक की तरह, धीमान्, ऐसे ही स्थित रहता है।”

सन्दर्भ“बालवद्”। बच्चे की तरह। बच्चा प्रवृत्ति-निवृत्ति में choose नहीं करता। बस “is”। न दौड़ता है किसी चीज़ के पीछे, न भागता है। यही ज्ञानी की state है।

पाठक के लिएएक छोटे बच्चे को देखो, उसकी innocence नहीं, उसकी natural neutrality। बच्चा गुस्सा करता है, हँसता है, मगर अगले moment भूल जाता है। यही state, ज्ञानपूर्वक।

श्लोक 9
अष्टावक्र उवाच
हातुमिच्छति संसारं रागी दुःखजिहासया।
वीतरागो हि निर्दुःखस्तस्मिन्नपि न खिद्यति॥
hātum icchati saṁsāraṁ rāgī duḥkha-jihāsayā
vīta-rāgo hi nirduḥkhas tasminn api na khidyati

अर्थ“रागी संसार को छोड़ना चाहता है, दुःख से बचने की इच्छा से। मगर वीत-राग तो निर्दुःख है। उसे संसार में भी खेद नहीं।”

सन्दर्भएक deep इरोनी। साधक संसार छोड़ना चाहता है, ताकि दुःख से बचे। मगर ज्ञानी, जो वीत-राग है, उसे दुःख ही नहीं। तो संसार छोड़ने की क्या ज़रूरत?

पाठक के लिए“संसार छोड़ो” का call आम तौर पर “दुःख से डर” से आता है। मगर ज्ञान का call है, “दुःख का base ख़त्म कर, संसार automatic okay”।

श्लोक 10
अष्टावक्र उवाच
यस्याभिमानो मोक्षेऽपि देहेऽपि ममता तथा।
न च ज्ञानी न वा योगी केवलं दुःखभाग् असौ॥
yasyābhimāno mokṣe’pi dehe’pi mamatā tathā
na ca jñānī na vā yogī kevalaṁ duḥkha-bhāg asau

अर्थ“जिसको मोक्ष में भी अभिमान है, और देह में ममता, वो न ज्ञानी है, न योगी। बस केवल दुःख का भागी है।”

सन्दर्भ“मोक्ष का अभिमान”। यह subtle trap है। “मैंने मोक्ष पा लिया”, “मैं enlightened हूँ”। यह अहंकार बच गया तो ज्ञान आधा। पूरा ज्ञान वो जिसमें “मैंने पाया” भी drop।

पाठक के लिएआज spiritual world में बहुत “enlightened” लोग हैं। हर एक का अपना brand। इस श्लोक से check करें, “क्या मोक्ष का अभिमान है?” अगर है, तो काम बाक़ी है।

श्लोक 11
अष्टावक्र उवाच
हरो यद्युपदेष्टा ते हरिः कमलजोऽपि वा।
तथापि न तव स्वास्थ्यं सर्वविस्मरणाद् ऋते॥
haro yady upadeṣṭā te hariḥ kamalajo’pi vā
tathāpi na tava svāsthyaṁ sarva-vismaraṇād ṛte

अर्थ“शिव, विष्णु, ब्रह्मा भी तेरे उपदेष्टा हों, फिर भी तुझे स्वास्थ्य नहीं मिलेगा, बिना सब को भुलाए।”

सन्दर्भप्रकरण की shuruआत भी “सब भूल” से, अन्त भी। बीच में 9 श्लोक elaboration। यह bookend symmetry powerful है।

पाठक के लिएप्रकरण 16 ख़त्म। final message: कोई बाहर का guru, चाहे शिव हो, ख़ुद आ कर बोले, फिर भी तुम्हारे “सब भुलाए बिना” काम नहीं होगा। ज्ञान बाहर से आता है, मगर realize अन्दर ही होता है।

॥ स्वास्थ्य ॥