पाठ्य-संगति
‘शान्त’ चौदहवाँ-प्रकरण है। शान्ति और शान्त अलग शब्द हैं। शान्ति एक स्थिति है, शान्त एक स्वरूप-गुण है। यह विभेद संस्कृत-व्याकरण की एक-विशेषता है।
नागार्जुन (दूसरी-सदी) के मूल-माध्यमक-कारिका में ‘शान्तम्’ एक मुख्य शब्द है, और बौद्ध-शून्यता-सिद्धान्त का दार्शनिक-केन्द्र। अष्टावक्र-शान्त और नागार्जुन-शान्तम् दोनों एक तत्त्व-तक पहुँचते हैं, मगर अलग-पथ-से।
शान्त
4 श्लोक
जनक के चार छोटे श्लोक, “क्या बच जाता है” पर। एक आकारहीन शान्ति जो हर कर्म के नीचे है।
चौदहवें प्रकरण में “शान्त” शब्द फिर लौटता है, अब और गहरा-अर्थ ले कर। शान्ति की कई-परतें हैं, अष्टावक्र इसे क्रमिक-अनावरण की तरह दिखाते हैं। पतंजलि-योग-सूत्रों (दूसरी-सदी ईसा-पूर्व) के पहले-पाद में जो “वृत्ति-निरोध” का वर्णन है, उसकी एक-पूर्व-झलक यहाँ मिलती है।

निद्रितो बोधित इव क्षीणसंस्मरणो हि सः॥
nidrito bodhita iva kṣīṇa-saṁsmaraṇo hi saḥ
अर्थ“जिसका चित्त स्वभाव से ही शून्य है, और प्रमाद से कभी भावों की भावना भी कर ले, वह नींद से जागे की तरह, जिसका स्मरण क्षीण हो गया हैं, वैसा है।”
पाठक के लिए“क्षीण-संस्मरण”। स्मृति की कमज़ोरी, साधारण अर्थ में नहीं। ज्ञानी में बातों को बार-बार मन में घुमाने वाली स्मृति कम होती है। एक घटना हुई, ख़त्म। फिर उसे बार-बार सोचना? नहीं।
क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा॥
kva śāstraṁ kva ca vijñānaṁ yadā me galitā spṛhā
अर्थ“कहाँ धन, कहाँ मित्र, कहाँ मेरे विषय-डाकू, कहाँ शास्त्र, कहाँ विज्ञान, जब मेरी स्पृहा (इच्छा) गल गयी?”
पाठक के लिए“शास्त्र भी कहाँ?”। यह बहुत बड़ी बात है। साधक की पकड़ शास्त्रों पर भी होती है। मगर ज्ञानी के लिए, शास्त्र भी “उद्देश्य का साधन” थे, अब उद्देश्य पूरा हो गया, साधन की क्या ज़रूरत?
नैराश्ये बन्धमोक्षे च न चिन्ता मुक्तये मम॥
nairāśye bandha-mokṣe ca na cintā muktaye mama
अर्थ“साक्षी-पुरुष, परमात्मा, ईश्वर को जान कर, बन्ध-मोक्ष में निराशा (निःस्पृहता) पा कर, मुझे मुक्ति की कोई चिन्ता नहीं।”
पाठक के लिए“मुक्ति चाहिए”, यह वहीं तक काम का है जब तक पहचान नहीं हुई। एक बार पहचान हो गई, तो “मुक्ति चाहिए” भी एक लहर है। आप तो पहले से किनारे पर हैं।
भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्तादृशा एव जानते॥
bhrāntasyeva daśās tās tās tādṛśā eva jānate
अर्थ“अन्दर विकल्प-शून्य, बाहर स्वच्छन्द-चारी, मानो भ्रमित जैसा, उसकी अनेक दशाएँ, वैसे ही (ज्ञानी) ही जान सकते हैं।”
पाठक के लिएप्रकरण 14 ख़त्म। “तादृशा एव जानते”। “वैसे ही जानते हैं”। यानी ज्ञानी को सिर्फ़ ज्ञानी पहचानता है। बाक़ी लोग देख कर राय बनाएँगे। उनको रोकने की कोई कोशिश नहीं।