शान्त
Peaceful · 4 श्लोक
जनक के चार छोटे श्लोक। अब बात “क्या जानना है” नहीं, “क्या बच जाता है” पर है। एक shape-less calm जो हर action के नीचे है।
निद्रितो बोधित इव क्षीणसंस्मरणो हि सः॥
nidrito bodhita iva kṣīṇa-saṁsmaraṇo hi saḥ
अर्थ“जिसका चित्त स्वभाव से ही शून्य है, और प्रमाद से कभी भावों की भावना भी कर ले, वह नींद से जागे की तरह, जिसका स्मरण क्षीण हो गया हो, वैसा है।”
पाठक के लिए“क्षीण-संस्मरण”। memory की weakness, normal sense में नहीं। ज्ञानी की “rumination” memory कम होती है। एक event हुआ, ख़त्म। फिर उसे बार-बार सोचना? नहीं।
क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा॥
kva śāstraṁ kva ca vijñānaṁ yadā me galitā spṛhā
अर्थ“कहाँ धन, कहाँ मित्र, कहाँ मेरे विषय-डाकू, कहाँ शास्त्र, कहाँ विज्ञान, जब मेरी स्पृहा (इच्छा) गल गयी?”
पाठक के लिए“शास्त्र भी कहाँ?”। यह बहुत strong बात है। साधक की पकड़ शास्त्रों पर भी होती है। मगर ज्ञानी के लिए, शास्त्र भी “उद्देश्य का साधन” थे, अब उद्देश्य पूरा हो गया, साधन की क्या ज़रूरत?
नैराश्ये बन्धमोक्षे च न चिन्ता मुक्तये मम॥
nairāśye bandha-mokṣe ca na cintā muktaye mama
अर्थ“साक्षी-पुरुष, परमात्मा, ईश्वर को जान कर, बन्ध-मोक्ष में निराशा (निःस्पृहता) पा कर, मुझे मुक्ति की कोई चिन्ता नहीं।”
पाठक के लिए“मुक्ति चाहिए” यह वहीं तक useful है जब तक recognition नहीं। एक बार recognition, “मुक्ति चाहिए” भी एक wave है। आप already shore पर हैं।
भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्तादृशा एव जानते॥
bhrāntasyeva daśās tās tās tādṛśā eva jānate
अर्थ“अन्दर विकल्प-शून्य, बाहर स्वच्छन्द-चारी, मानो भ्रमित जैसा, उसकी अनेक दशाएँ, वैसे ही (ज्ञानी) ही जान सकते हैं।”
पाठक के लिएप्रकरण 14 ख़त्म। “तादृशा एव जानते”। “वैसे ही जानते हैं”। यानी ज्ञानी को सिर्फ़ ज्ञानी पहचानता है। बाक़ी लोग देख कर judge करेंगे। उनको रोकने की कोई कोशिश नहीं।