अष्टावक्र गीता · प्रकरण 14: शान्त

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 14

शान्त

Peaceful · 4 श्लोक

जनक के चार छोटे श्लोक। अब बात “क्या जानना है” नहीं, “क्या बच जाता है” पर है। एक shape-less calm जो हर action के नीचे है।

श्लोक 1
जनक उवाच
प्रकृत्या शून्यचित्तो यः प्रमादात्भावभावनः।
निद्रितो बोधित इव क्षीणसंस्मरणो हि सः॥
prakṛtyā śūnya-citto yaḥ pramādād bhāva-bhāvanaḥ
nidrito bodhita iva kṣīṇa-saṁsmaraṇo hi saḥ

अर्थ“जिसका चित्त स्वभाव से ही शून्य है, और प्रमाद से कभी भावों की भावना भी कर ले, वह नींद से जागे की तरह, जिसका स्मरण क्षीण हो गया हो, वैसा है।”

सन्दर्भएक interesting condition। ज्ञानी का चित्त “शून्य” है, मगर कभी-कभी “प्रमाद” से कुछ “सोच” लेता है। तब वो उस सोच को बहुत quickly forget करता है, जैसे नींद से जाग कर सपने भूल जाते हैं।

पाठक के लिए“क्षीण-संस्मरण”। memory की weakness, normal sense में नहीं। ज्ञानी की “rumination” memory कम होती है। एक event हुआ, ख़त्म। फिर उसे बार-बार सोचना? नहीं।

श्लोक 2
जनक उवाच
क्व धनानि क्व मित्राणि क्व मे विषयदस्यवः।
क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा॥
kva dhanāni kva mitrāṇi kva me viṣaya-dasyavaḥ
kva śāstraṁ kva ca vijñānaṁ yadā me galitā spṛhā

अर्थ“कहाँ धन, कहाँ मित्र, कहाँ मेरे विषय-डाकू, कहाँ शास्त्र, कहाँ विज्ञान, जब मेरी स्पृहा (इच्छा) गल गयी?”

सन्दर्भ“विषय-दस्यु”, “विषयों के डाकू”। पाँच इन्द्रियाँ ज्ञान को चुराने वाले डाकू मानी जाती हैं। मगर जब “स्पृहा” (इच्छा) ही नहीं, तो वो डाकू कुछ चुरा ही नहीं सकते।

पाठक के लिए“शास्त्र भी कहाँ?”। यह बहुत strong बात है। साधक की पकड़ शास्त्रों पर भी होती है। मगर ज्ञानी के लिए, शास्त्र भी “उद्देश्य का साधन” थे, अब उद्देश्य पूरा हो गया, साधन की क्या ज़रूरत?

श्लोक 3
जनक उवाच
विज्ञाते साक्षिपुरुषे परमात्मनि चेश्वरे।
नैराश्ये बन्धमोक्षे च न चिन्ता मुक्तये मम॥
vijñāte sākṣi-puruṣe paramātmani ceśvare
nairāśye bandha-mokṣe ca na cintā muktaye mama

अर्थ“साक्षी-पुरुष, परमात्मा, ईश्वर को जान कर, बन्ध-मोक्ष में निराशा (निःस्पृहता) पा कर, मुझे मुक्ति की कोई चिन्ता नहीं।”

सन्दर्भ“मुक्ति की चिन्ता” साधक का primary concern है। ज्ञानी के लिए वो भी drop हो गया। क्योंकि “मैं already मुक्त हूँ” recognition में मुक्ति का pursuit obsolete हो जाता है।

पाठक के लिए“मुक्ति चाहिए” यह वहीं तक useful है जब तक recognition नहीं। एक बार recognition, “मुक्ति चाहिए” भी एक wave है। आप already shore पर हैं।

श्लोक 4
जनक उवाच
अन्तर्विकल्पशून्यस्य बहिःस्वच्छन्दचारिणः।
भ्रान्तस्येव दशास्तास्तास्तादृशा एव जानते॥
antar-vikalpa-śūnyasya bahiḥ svacchanda-cāriṇaḥ
bhrāntasyeva daśās tās tās tādṛśā eva jānate

अर्थ“अन्दर विकल्प-शून्य, बाहर स्वच्छन्द-चारी, मानो भ्रमित जैसा, उसकी अनेक दशाएँ, वैसे ही (ज्ञानी) ही जान सकते हैं।”

सन्दर्भज्ञानी की appearance “भ्रमित” जैसी हो सकती है। क्योंकि न कोई planning, न कोई rigid behavior। बाहर से देखो तो “क्या कर रहा है?” समझ नहीं आता। पर अन्दर पूरा calm।

पाठक के लिएप्रकरण 14 ख़त्म। “तादृशा एव जानते”। “वैसे ही जानते हैं”। यानी ज्ञानी को सिर्फ़ ज्ञानी पहचानता है। बाक़ी लोग देख कर judge करेंगे। उनको रोकने की कोई कोशिश नहीं।

॥ शान्त ॥