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अष्टावक्र गीता · प्रकरण 13: यथासुख

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पाठ्य-संगति

‘यथासुख’ तेरहवाँ प्रकरण है। ‘जैसा सुख हो वैसा’, यह एक सहज शैली है, जो किसी प्रयत्न से नहीं आती, अपने आप बहती है। यह बौद्ध परम्परा के ‘सुगत’ से अलग है, क्योंकि सुगत एक नैतिक उपलब्धि है, और यथासुख एक सहज अवस्था।

आधुनिक काल में चीनी ज़ेन-गुरु शुनरयू सुज़ुकी (1904-1971) ने अपनी पुस्तक ‘ज़ेन माइण्ड, बिगिनर्स माइण्ड’ (1970) में जिस आरम्भिक-चित्त की बात की, वह अष्टावक्र के यथासुख से अद्भुत ढंग से मेल खाती है।

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 13

यथासुख

सहज सुख में · 7 श्लोक

जनक का सबसे प्यारा प्रकरण। हर श्लोक एक ही पंक्ति पर आ कर ठहरता है, “अहमासे यथासुखम्”, “हम ऐसे ही सुख से हैं”। यह जीवन का पूरी तरह थमा हुआ चित्र है। न कुछ चाहिए, न कुछ खोना।

तेरहवाँ प्रकरण उस स्थिति का वर्णन रखता है जिसे यथासुख कहते हैं, यानी जैसा सुख हो वैसा। मुक्त-व्यक्ति की एक विशेषता यह है कि वह किसी स्थिति को “हमारे लिए कैसे ठीक हो” इस कसौटी पर नहीं तौलता। सब स्थितियाँ उसी सहज अवस्था में बैठ जाती हैं। रमण-महर्षि (1879-1950) ने अपनी “उपदेश-सार” में ऐसी ही स्थिति को “सहज-समाधि” कहा।

अब तक

स्वभाव के बाद, यथासुख। जो भी आए, उसमें सुख।

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जनक बोलते हैं, और उनका पहला वचन ही एक उलटी बात कह जाता है। संसार समझता है कि कुछ पास होने में सुख है, मगर जनक एक ऐसे स्वास्थ्य की बात करते हैं जो कुछ भी पास न होने पर ही मिलता है। यह वह चैन है जो एक लंगोटी पहन कर बैठे संन्यासी को भी दुर्लभ रहता है, क्योंकि लंगोटी भी तो “हमने त्याग कर दिया” की एक पकड़ है। जनक न इस पकड़ में हैं, न उसके उलट भोग की पकड़ में। त्याग और आदान, छोड़ना और बटोरना, दोनों को पीछे रख कर वे बस होने में टिक जाते हैं, और कहते हैं, हम ऐसे ही सुख से हैं।

श्लोक 1

अकिञ्चनभवं स्वास्थ्यं कौपीनत्वेऽपि दुर्लभम्।
त्यागादाने विहायास्मादहमासे यथासुखम्॥

फिर वे शरीर और मन की ओर देखते हैं, उस सब की ओर जिसे हम अपना कह बैठते हैं। कहीं देह थक कर खिन्न होती है, कहीं जीभ किसी स्वाद पर रूठ या रीझ जाती है, कहीं मन ही उकता उठता है। जनक इन सबको इकाइयों की तरह देखते हैं, अपने से अलग। जो इन सबको देख रहा है, वह इनसे छूटा हुआ है। उसी देखने वाले में स्थित हो कर, इन सारी हलचलों को पीछे रख कर, वे कहते हैं, हम सुख से हैं।

श्लोक 2

कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खिद्यते।
मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम्॥

अब जनक कर्म की गाँठ खोलते हैं। तत्त्व को जानने वाला भीतर से यह देख चुका है कि सचमुच कुछ “किया गया” है ही नहीं। काम तो चलते रहते हैं, पर “हमने किया” का भाव वहाँ नहीं उठता। ऐसा व्यक्ति किसी काम के पीछे नहीं दौड़ता; जो भी सामने आ कर करने को होता है, उसे सहज ही कर लेता है और वैसे ही बना रहता है, जैसे वह पहले से था। करते हुए भी अनकिए जैसा, और इसी हलकेपन में, हम सुख से हैं।

श्लोक 3

कृतं किमपि नैव स्यादिति सञ्चिन्त्य तत्त्ववित्।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वासे यथासुखम्॥

जो योगी अभी देह में अपने को बँधा मानते हैं, उनके मन में एक दुविधा घर कर लेती है, कर्म करें या न करें, यह करना ठीक या वह न करना। जनक इस दुविधा के बाहर खड़े हैं। और इसी के साथ वे एक और जोड़ी को छोड़ देते हैं, मिलना और बिछड़ना। हमारी अधिकतर खुशियाँ और दुख इसी मिलने-बिछड़ने के खेल हैं। मगर जनक की दृष्टि से ये सब सतह की लहरें हैं; गहराई में जो हैं, वे किसी से कभी मिले ही नहीं, फिर बिछड़ें कैसे। इसी अछूतेपन में, हम सुख से हैं।

श्लोक 4

कर्मनैष्कर्म्यनिर्बन्धभावा देहस्थयोगिनाम्।
संयोगायोगविरहादहमासे यथासुखम्॥

फिर जनक रोज़मर्रा की सबसे सीधी-सादी बात ले आते हैं। खड़ा होना, चलना, सो जाना, इन तीन में से किसी से उनका कोई लाभ बँधा है, न कोई हानि। न इन क्रियाओं से कुछ सँवरता है, न बिगड़ता है। इसीलिए चाहे खड़े हों, चाहे चलते हों, चाहे लेटे हों, वही एक-सा चैन उनके भीतर बना रहता है। हम जिस ध्यान को आसन पर बैठने से बाँधते हैं, जनक उसे हर मुद्रा में, हर पल बहता हुआ पाते हैं, और कहते हैं, हम सुख से हैं।

श्लोक 5

अर्थानर्थौ न मे स्थित्या गत्या न शयनेन वा।
तिष्ठन् गच्छन् स्वपन् तस्मादहमासे यथासुखम्॥

अब जनक उन दो छोरों को छूते हैं जो हमें सबसे ज़्यादा हिलाते हैं। एक है हानि, खो जाने का धक्का; दूसरा है उल्लास, पा लेने की उमंग। संसार में सोते हुए भी हमें कुछ खोने का डर रहता है, और जतन कर के कुछ पा लेने का लोभ। जनक के लिए न सोने में कोई हानि है, न प्रयत्न से कोई सिद्धि। नाश और उल्लास, ये दोनों उभार, वे पीछे रख देते हैं। आप आकाश हैं और ये भाव बस लहरें, इसी समझ के साथ, हम सुख से हैं।

श्लोक 6

स्वपतो नास्ति मे हानिः सिद्धिर्यत्नवतो न वा।
नाशोल्लासौ विहायास्मादहमासे यथासुखम्॥

और अंत में जनक उस नियम को उघाड़ देते हैं जो इस पूरे प्रकरण की जड़ है। उन्होंने बार-बार, असंख्य बार यह देखा है कि सुख और दुख एक ही डोर के दो सिरे हैं। हर सुख के पीछे दुख चला आता है, हर दुख के पीछे सुख; एक को बुलाओ तो दूसरा अपने आप साथ आ जाता है। फिर किसके पीछे दौड़ें, और किससे भागें। यही देख कर जनक शुभ और अशुभ, दोनों को छोड़ देते हैं, और उस सहज चैन में आ बैठते हैं जहाँ न कोई चाह पीछे खींचती है, न कोई डर सताता है। हम ऐसे ही सुख से हैं।

श्लोक 7

सुखादिरूपा नियमं भावेष्वालोक्य भूरिशः।
शुभाशुभे विहायास्मादहमासे यथासुखम्॥

॥ यथासुख ॥