‘स्वभाव’ बारहवाँ प्रकरण है। यहाँ अष्टावक्र एक बलवती बात उठाते हैं, स्वभाव से सहज होने वाली क्रियाएँ बन्धन नहीं देतीं। यह स्थापना भगवद्गीता के ‘स्वभाव-नियतं कर्म’ (18.47) से सीधी संगति रखती है। आधुनिक काल में अरविन्द (1872-1950) ने अपने ग्रन्थ ‘द लाइफ़ डिवाइन’ (1939-40) में ‘स्वभाव’ की अवधारणा को विशेष केन्द्र दिया था। उनके अनुसार स्वभाव एक प्रकार का वैश्विक व्यक्तित्व है, जो हर व्यक्ति का अपना अनूठा होता है।पाठ्य-संगति
स्वभाव
Innate Nature · 8 श्लोक
जनक आठ श्लोक बोलते हैं। हर एक का अन्त एक ही वाक्यांश से होता है, “एवमेवाहमास्थितः”, अर्थात् हम ऐसे ही स्थित हैं। यह होने की घोषणा है, करने की नहीं। हर श्लोक एक परत छीलता चला जाता है।
बारहवें प्रकरण में “स्वभाव” तत्त्व पर ज़ोर है। स्वभाव यानी आत्मा का अपना स्थायी गुण। यह शंकराचार्य के “स्वरूप-लक्षण” से मिलता-जुलता है, मगर अष्टावक्र अधिक सीधे स्वर में बोलते हैं। स्वभाव से ही आप मुक्त हैं, इस वचन के बाद पाठक को कुछ करने की ज़रूरत नहीं रह जाती।

जनक अब अपनी ही दशा खोल कर रख देते हैं। पहले शरीर का काम भारी लगता था, फिर बोलना भी बोझ हो गया, और एक दिन तो सोचना ही असह्य हो उठा। इन तीनों के पार जब वे आ गए, तब बस होना ही शेष रहा, और वे कहते हैं, हम ऐसे ही स्थित हैं। फिर वे एक और परत खोलते हैं। न शब्दों में अब कोई प्रीति बची, न आत्मा कहीं दीखने वाली वस्तु रही; इसलिए विक्षेप और एकाग्रता, इन दोनों से उनका हृदय मुक्त हो चुका, क्योंकि एकाग्रता भी तो एक आती-जाती अवस्था ही है।
श्लोक 1 · 2
कायकृत्यासहः पूर्वं ततो वाग्विस्तरासहः।
अथ चिन्तासहस्तस्मादेवमेवाहमास्थितः॥
प्रीत्यभावेन शब्दादेरदृश्यत्वेन चात्मनः।
विक्षेपैकाग्रहृदय एवमेवाहमास्थितः॥
अब जनक एक सूक्ष्म नियम सामने रखते हैं। समाधि की कमी ही तो हमसे समाधि-पाने का व्यवहार कराती है; जहाँ पाने की चाह है, वहीं प्रमाण है कि अभी मिला नहीं। यह नियम देख कर वे ऐसे ही स्थित हो जाते हैं। फिर वे अष्टावक्र को आदर से ब्रह्मन् कह कर पुकारते हैं, क्योंकि अब गुरु उन्हें अलग पुरुष नहीं, साक्षात् ब्रह्म ही दीखते हैं। जब छोड़ने और पकड़ने योग्य का भेद ही मिट गया, तब हर्ष और विषाद की जड़ भी सूख गई, और आज, हे ब्रह्मन्, वे बस होने में टिके हैं।
श्लोक 3 · 4
समाध्यासादिविक्षिप्तौ व्यवहारः समाधये।
एवं विलोक्य नियममेवमेवाहमास्थितः॥
हेयोपादेयविरहादेवं हर्षविषादयोः।
अभावादद्य हे ब्रह्मन्नेवमेवाहमास्थितः॥
अब जनक आश्रम और कर्म, दोनों के परे चले जाते हैं। गृहस्थ हो या संन्यासी, ध्यान हो, चित्त की स्वीकृति हो या त्याग, यह सब उनके लिए अब केवल विकल्प मात्र हैं, अनिवार्य नियम नहीं; यह देख कर वे ऐसे ही स्थित हो रहते हैं। और तो और, वे एक और गहरी बात कहते हैं। कर्म करना अज्ञान से उपजता है, और कर्म से विराम भी उसी अज्ञान से, क्योंकि दोनों में ही कर्ता होने का भाव छिपा है। इस तत्त्व को भली-भाँति समझ कर वे न करने में हैं, न छोड़ने में, बस होने में हैं।
श्लोक 5 · 6
आश्रमानाश्रमं ध्यानं चित्तस्वीकृतवर्जनम्।
विकल्पं मम वीक्ष्यैतैरेवमेवाहमास्थितः॥
कर्मानुष्ठानमज्ञानाद्यथैवोपरमस्तथा।
बुध्वा सम्यगिदं तत्त्वमेवमेवाहमास्थितः॥
अन्त में जनक चिन्तन की ही जड़ काट देते हैं। जो ब्रह्म चिन्तन से परे है, उसे जो सोचने बैठता है वही चिन्ता का रूप धारण कर लेता है, क्योंकि सोचना अपने ही नये विचार खड़े कर देता है। इसी भावना को छोड़ कर जनक ऐसे ही स्थित हैं। और तब वे दोनों राहों को एक साथ आशीष दे देते हैं। जिसने इसी प्रकार साधन कर के यह दशा पाई वह भी कृतार्थ है, और जिसका स्वभाव ही सहज इसी रूप में बहता है वह भी कृतार्थ है। आठ श्लोकों में जनक की दशा एक-एक परत खुलती गई, और अब केवल होना शेष है।
श्लोक 7 · 8
अचिन्त्यं चिन्त्यमानोऽपि चिन्तारूपं भजत्यसौ।
त्यक्त्वा तद्भावनं तस्मादेवमेवाहमास्थितः॥
एवमेव कृतं येन स कृतार्थो भवेदसौ।
एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ॥