स्वभाव
Innate Nature · 8 श्लोक
जनक आठ श्लोक बोलते हैं। हर एक का अन्त एक phrase से, “एवमेवाहमास्थितः”, “मैं ऐसे ही स्थित हूँ”। यह declaration of being है, doing नहीं। हर श्लोक एक layer छीलता है।
अथ चिन्तासहस्तस्मादेवमेवाहमास्थितः॥
atha cintā-sahas tasmād evam evāham āsthitaḥ
अर्थ“पहले शरीर का काम सहन नहीं होता था, फिर वाणी का विस्तार सहन नहीं हुआ, फिर चिन्ता असह्य हुई, और अब मैं ऐसे ही स्थित हूँ।”
पाठक के लिएएक test: अगर अभी 1 घंटे के लिए physically idle रहना पड़े, बेचैनी होगी क्या? अगर हाँ, तो “कायकृत्य-असह” अभी आया नहीं। मगर साधना में, यह सब अपने आप comfortable होने लगता है।
विक्षेपैकाग्रहृदय एवमेवाहमास्थितः॥
vikṣepaikāgra-hṛdaya evam evāham āsthitaḥ
अर्थ“शब्द आदि में प्रीति न होने से, और आत्मा के अदृश्य होने से, विक्षेप-एकाग्र (दोनों) से मुक्त हृदय वाला, मैं ऐसे ही स्थित हूँ।”
पाठक के लिएध्यान में हम focus लाते हैं, distractions भगाते हैं। यह acceptable है initial stage के लिए। मगर देर तक रहेगा, तो ख़ुद obstacle। आख़िर में, focus और distraction दोनों drop।
एवं विलोक्य नियममेवमेवाहमास्थितः॥
evaṁ vilokya niyamam evam evāham āsthitaḥ
अर्थ“समाधि न होने पर ही व्यवहार समाधि के लिए होता है, यह नियम देख कर, मैं ऐसे ही स्थित हूँ।”
पाठक के लिए“प्राप्ति का प्रयास, अप्राप्ति का proof”। अगर “मुझे शान्ति चाहिए” तो शान्ति अभी नहीं। अगर “मुझे शान्ति चाहिए” यह सोच ही छूट जाए, तो शान्ति वहीं है।
अभावादद्य हे ब्रह्मन्नेवमेवाहमास्थितः॥
abhāvād adya he brahmann evam evāham āsthitaḥ
अर्थ“हेय-उपादेय (छोड़ने योग्य, पकड़ने योग्य) के विरह से, और हर्ष-विषाद के अभाव से, हे ब्रह्मन्, आज मैं ऐसे ही स्थित हूँ।”
पाठक के लिए“हे ब्रह्मन्”। जनक अष्टावक्र को “ब्रह्मन्” कह कर सम्बोधित कर रहे हैं। यानी जनक को अब अष्टावक्र अलग व्यक्ति नहीं लगते, ब्रह्म ही लगते हैं। यह respect है।
विकल्पं मम वीक्ष्यैतैरेवमेवाहमास्थितः॥
vikalpaṁ mama vīkṣyaitair evam evāham āsthitaḥ
अर्थ“आश्रम-अनाश्रम, ध्यान, चित्त की स्वीकृति-त्याग, यह सब विकल्प मेरे लिए हैं, यह देख कर, मैं ऐसे ही स्थित हूँ।”
पाठक के लिएआश्रम-व्यवस्था ज़रूरी है social structure के लिए, individual freedom के लिए नहीं। ज्ञानी कोई भी आश्रम में हो, उसकी inner state same।
बुध्वा सम्यगिदं तत्त्वमेवमेवाहमास्थितः॥
budhvā samyag idaṁ tattvam evam evāham āsthitaḥ
अर्थ“कर्म करना अज्ञान से, और कर्म से विराम भी वैसे ही (अज्ञान से), यह तत्त्व समझ कर, मैं ऐसे ही स्थित हूँ।”
पाठक के लिएसंन्यासी सोचता है “मैंने कर्म छोड़ दिया”। पर “छोड़ना” भी एक कर्म है। अष्टावक्र-जनक इस loop को expose करते हैं।
त्यक्त्वा तद्भावनं तस्मादेवमेवाहमास्थितः॥
tyaktvā tad-bhāvanaṁ tasmād evam evāham āsthitaḥ
अर्थ“अचिन्त्य (जो सोचने योग्य नहीं) को सोचने वाला, चिन्ता का ही रूप ले लेता है। उसकी भावना छोड़ कर, मैं ऐसे ही स्थित हूँ।”
पाठक के लिए“मैं कौन हूँ?” यह सोचो, और एक answer मिलेगा. वो answer ख़ुद obstacle है, क्योंकि असली “मैं” answer नहीं, answer-वाले के पीछे है। सोचना छूटे, तब recognition।
एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ॥
evam eva svabhāvo yaḥ sa kṛtārtho bhaved asau
अर्थ“जिसने इसी तरह किया, वो कृतार्थ है। और जिसका स्वभाव ही ऐसा है, वो भी कृतार्थ है।”
पाठक के लिएप्रकरण 12 ख़त्म। आठ श्लोकों में जनक की state का unfolding। हर श्लोक एक नयी layer छीलता है: कर्म, distraction, samadhi-pursuit, हेय-उपादेय, आश्रम-व्यवस्था, doing-non-doing, thinking। सब drop।