अष्टावक्र गीता · प्रकरण 12: स्वभाव

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 12

स्वभाव

Innate Nature · 8 श्लोक

जनक आठ श्लोक बोलते हैं। हर एक का अन्त एक phrase से, “एवमेवाहमास्थितः”, “मैं ऐसे ही स्थित हूँ”। यह declaration of being है, doing नहीं। हर श्लोक एक layer छीलता है।

श्लोक 1
जनक उवाच
कायकृत्यासहः पूर्वं ततो वाग्विस्तरासहः।
अथ चिन्तासहस्तस्मादेवमेवाहमास्थितः॥
kāya-kṛtyāsahaḥ pūrvaṁ tato vāg-vistarāsahaḥ
atha cintā-sahas tasmād evam evāham āsthitaḥ

अर्थ“पहले शरीर का काम सहन नहीं होता था, फिर वाणी का विस्तार सहन नहीं हुआ, फिर चिन्ता असह्य हुई, और अब मैं ऐसे ही स्थित हूँ।”

सन्दर्भतीन-step deepening। पहले physical activity का बोझ लगा। फिर शब्दों का। फिर thinking ख़ुद का। और इन तीनों के पार जाने पर सिर्फ़ “being” बचा। यह progression natural है, जब साधक deepening करता है।

पाठक के लिएएक test: अगर अभी 1 घंटे के लिए physically idle रहना पड़े, बेचैनी होगी क्या? अगर हाँ, तो “कायकृत्य-असह” अभी आया नहीं। मगर साधना में, यह सब अपने आप comfortable होने लगता है।

श्लोक 2
जनक उवाच
प्रीत्यभावेन शब्दादेरदृश्यत्वेन चात्मनः।
विक्षेपैकाग्रहृदय एवमेवाहमास्थितः॥
prīty-abhāvena śabdāder adṛśyatvena cātmanaḥ
vikṣepaikāgra-hṛdaya evam evāham āsthitaḥ

अर्थ“शब्द आदि में प्रीति न होने से, और आत्मा के अदृश्य होने से, विक्षेप-एकाग्र (दोनों) से मुक्त हृदय वाला, मैं ऐसे ही स्थित हूँ।”

सन्दर्भ“विक्षेप-एकाग्र दोनों से मुक्त”। साधक “विक्षेप” (distraction) से escape करता है, “एकाग्रता” चाहता है। पर ज्ञानी दोनों से free है। क्योंकि एकाग्रता भी एक state है, और states आते-जाते हैं।

पाठक के लिएध्यान में हम focus लाते हैं, distractions भगाते हैं। यह acceptable है initial stage के लिए। मगर देर तक रहेगा, तो ख़ुद obstacle। आख़िर में, focus और distraction दोनों drop।

श्लोक 3
जनक उवाच
समाध्यासादिविक्षिप्तौ व्यवहारः समाधये।
एवं विलोक्य नियममेवमेवाहमास्थितः॥
samādhy-āsādi-vikṣiptau vyavahāraḥ samādhaye
evaṁ vilokya niyamam evam evāham āsthitaḥ

अर्थ“समाधि न होने पर ही व्यवहार समाधि के लिए होता है, यह नियम देख कर, मैं ऐसे ही स्थित हूँ।”

सन्दर्भयह subtle है। हम समाधि “पाने” के लिए practices करते हैं। मगर “पाने” का concept ही प्रमाण है कि समाधि अभी नहीं है। अगर समाधि स्वभाव है, तो पाने का सवाल कहाँ?

पाठक के लिए“प्राप्ति का प्रयास, अप्राप्ति का proof”। अगर “मुझे शान्ति चाहिए” तो शान्ति अभी नहीं। अगर “मुझे शान्ति चाहिए” यह सोच ही छूट जाए, तो शान्ति वहीं है।

श्लोक 4
जनक उवाच
हेयोपादेयविरहादेवं हर्षविषादयोः।
अभावादद्य हे ब्रह्मन्नेवमेवाहमास्थितः॥
heyopādeya-virahād evaṁ harṣa-viṣādayoḥ
abhāvād adya he brahmann evam evāham āsthitaḥ

अर्थ“हेय-उपादेय (छोड़ने योग्य, पकड़ने योग्य) के विरह से, और हर्ष-विषाद के अभाव से, हे ब्रह्मन्, आज मैं ऐसे ही स्थित हूँ।”

सन्दर्भहर्ष-विषाद का root हेय-उपादेय है। “यह पाया” तो हर्ष, “यह खोया” तो विषाद। पाने-छोड़ने का division ही गया, तो भावनात्मक उतार-चढ़ाव भी गया।

पाठक के लिए“हे ब्रह्मन्”। जनक अष्टावक्र को “ब्रह्मन्” कह कर सम्बोधित कर रहे हैं। यानी जनक को अब अष्टावक्र अलग व्यक्ति नहीं लगते, ब्रह्म ही लगते हैं। यह respect है।

श्लोक 5
जनक उवाच
आश्रमानाश्रमं ध्यानं चित्तस्वीकृतवर्जनम्।
विकल्पं मम वीक्ष्यैतैरेवमेवाहमास्थितः॥
āśramānāśramaṁ dhyānaṁ citta-svīkṛta-varjanam
vikalpaṁ mama vīkṣyaitair evam evāham āsthitaḥ

अर्थ“आश्रम-अनाश्रम, ध्यान, चित्त की स्वीकृति-त्याग, यह सब विकल्प मेरे लिए हैं, यह देख कर, मैं ऐसे ही स्थित हूँ।”

सन्दर्भ“आश्रम” यानी गृहस्थ, संन्यासी आदि चार stages। अष्टावक्र-जनक की position से, यह सब “विकल्प” हैं, optional rituals। नियम नहीं।

पाठक के लिएआश्रम-व्यवस्था ज़रूरी है social structure के लिए, individual freedom के लिए नहीं। ज्ञानी कोई भी आश्रम में हो, उसकी inner state same।

श्लोक 6
जनक उवाच
कर्मानुष्ठानमज्ञानाद्यथैवोपरमस्तथा।
बुध्वा सम्यगिदं तत्त्वमेवमेवाहमास्थितः॥
karmānuṣṭhānam ajñānād yathaivoparamas tathā
budhvā samyag idaṁ tattvam evam evāham āsthitaḥ

अर्थ“कर्म करना अज्ञान से, और कर्म से विराम भी वैसे ही (अज्ञान से), यह तत्त्व समझ कर, मैं ऐसे ही स्थित हूँ।”

सन्दर्भदोनों, “कर्म करना” और “कर्म से विराम”, दोनों अज्ञान से उत्पन्न। क्योंकि दोनों में “मैं doer हूँ” का sense है। ज्ञानी न करता है, न नहीं करता। बस “हो रहा है” का witness।

पाठक के लिएसंन्यासी सोचता है “मैंने कर्म छोड़ दिया”। पर “छोड़ना” भी एक कर्म है। अष्टावक्र-जनक इस loop को expose करते हैं।

श्लोक 7
जनक उवाच
अचिन्त्यं चिन्त्यमानोऽपि चिन्तारूपं भजत्यसौ।
त्यक्त्वा तद्भावनं तस्मादेवमेवाहमास्थितः॥
acintyaṁ cintyamāno’pi cintā-rūpaṁ bhajaty asau
tyaktvā tad-bhāvanaṁ tasmād evam evāham āsthitaḥ

अर्थ“अचिन्त्य (जो सोचने योग्य नहीं) को सोचने वाला, चिन्ता का ही रूप ले लेता है। उसकी भावना छोड़ कर, मैं ऐसे ही स्थित हूँ।”

सन्दर्भब्रह्म “अचिन्त्य” है, सोचने से परे। उसे सोचने की कोशिश ख़ुद ही नये thoughts पैदा करती है, जो उसी की पहचान को block करती हैं। इसलिए सोचना छोड़ो।

पाठक के लिए“मैं कौन हूँ?” यह सोचो, और एक answer मिलेगा. वो answer ख़ुद obstacle है, क्योंकि असली “मैं” answer नहीं, answer-वाले के पीछे है। सोचना छूटे, तब recognition।

श्लोक 8
जनक उवाच
एवमेव कृतं येन स कृतार्थो भवेदसौ।
एवमेव स्वभावो यः स कृतार्थो भवेदसौ॥
evam eva kṛtaṁ yena sa kṛtārtho bhaved asau
evam eva svabhāvo yaḥ sa kṛtārtho bhaved asau

अर्थ“जिसने इसी तरह किया, वो कृतार्थ है। और जिसका स्वभाव ही ऐसा है, वो भी कृतार्थ है।”

सन्दर्भदो paths। “करना” और “होना”। जो consciously practice करता है, वो भी, और जिसका natural disposition यही है, वो भी, दोनों कृतार्थ। अष्टावक्र-जनक दोनों को acceptable मानते हैं।

पाठक के लिएप्रकरण 12 ख़त्म। आठ श्लोकों में जनक की state का unfolding। हर श्लोक एक नयी layer छीलता है: कर्म, distraction, samadhi-pursuit, हेय-उपादेय, आश्रम-व्यवस्था, doing-non-doing, thinking। सब drop।

॥ स्वभाव ॥