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अष्टावक्र गीता · प्रकरण 11: चिद्रूप

पढ़ने में लगभग 5 मिनट · 708 शब्द

पाठ्य-संगति

‘चिद्रूप’ ग्यारहवाँ-प्रकरण है, और यह ‘चित्’ और ‘रूप’ का संयुक्त-शब्द है। चित् का स्वरूप क्या है, इस प्रश्न का उत्तर। उत्तर यह है कि चित् का कोई-रूप नहीं है, और इसी ‘अरूप-रूप’ को चिद्रूप कहा गया। यह विरोधाभास उपनिषद्-शैली का है, जैसे ‘सत्यस्य सत्यम्’ (बृहदारण्यक 2.1.20)।

आधुनिक-दर्शन में लुडविग विट्गेन्स्टीन ने अपने अन्तिम-वाक्य में लिखा था कि जिस-बारे में बोला नहीं जा सकता, उस-पर मौन रहना चाहिए। अष्टावक्र का चिद्रूप उसी ‘अकथ्य-तत्त्व’ का दूसरा-नाम है।

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 11

चिद्रूप

Form of Consciousness · 8 श्लोक

अब तक वैराग्य की बात थी। यहाँ अष्टावक्र पहली बार सीधे बताते हैं कि ज्ञानी भीतर से कैसा होता है। आठ श्लोक, और हर एक एक ‘निश्चय’ है, एक ऐसी पक्की समझ जो मन में बैठते ही एक तनाव अपने आप ढीला हो जाता है। यह कोई भाषण नहीं, यह एक चित्र है।

ग्यारहवें प्रकरण में ‘चिद्रूप’ शब्द आता है, यानी चेतना-रूप। यह काश्मीर-शैव-दर्शन की ‘प्रकाश-विमर्श’ व्यवस्था से बहुत क़रीब है, जिसे अभिनवगुप्त ने ग्यारहवीं-सदी में विकसित किया। अष्टावक्र-गीता की रचना उससे पहले की है, और यह कौतूहल-जनक है कि कितनी पुरानी विचार-धाराएँ इसी एक-शब्द में संकेतित हैं।

अब तक

वैराग्य के बाद चिद्रूप। आत्मा का स्वरूप-दर्शन।

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अष्टावक्र पहला निश्चय रखते हैं। होना, न-होना, और बदलना, यह सब प्रकृति का अपना स्वभाव है, इसमें ‘हमारा’ कुछ भी नहीं। जो यह बात भीतर तक जान लेता है, वह निर्विकार और क्लेश-रहित हो कर सहज ही शान्त हो जाता है। फिर दूसरा निश्चय। रचने वाला एक ही है, वही चेतना सबके पीछे है, यहाँ कोई दूसरा रचयिता नहीं। यह जान कर भीतर की सब आशाएँ अपने आप गल जाती हैं, और ऐसा व्यक्ति शान्त रह कर कहीं भी आसक्त नहीं होता।

श्लोक 1 · 2

अष्टावक्र उवाच ।
भावाभावविकारश्च स्वभावादिति निश्चयी।
निर्विकारो गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति॥

ईश्वरः सर्वनिर्माता नेहान्य इति निश्चयी।
अन्तर्गलितसर्वाशः शान्तः क्वापि न सज्जते॥

तीसरा निश्चय आपदा और सम्पदा से जुड़ा है। विपत्ति हो या सम्पत्ति, दोनों अपने समय पर दैव से ही आती हैं, यानी कर्म और काल के मेल से। जो यह जान लेता है वह सदा तृप्त रहता है, उसकी इन्द्रियाँ अपने आप में स्थित रहती हैं, वह न किसी चीज़ की चाह करता है, न शोक करता है। चौथे निश्चय में यही बात और गहरी हो जाती है। सुख-दुःख और जन्म-मृत्यु, सब दैव से ही हैं; ऐसा जानने वाला कोई साध्य आगे नहीं देखता, बिना किसी आयास के सहज रहता है, और काम करते हुए भी उसमें लिप्त नहीं होता।

श्लोक 3 · 4

आपदः सम्पदः काले दैवादेवेति निश्चयी।
तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वान्छति न शोचति॥

सुखदुःखे जन्ममृत्यू दैवादेवेति निश्चयी।
साध्यादर्शी निरायासः कुर्वन्नपि न लिप्यते॥

पाँचवाँ निश्चय दुःख की जड़ खोल देता है। दुःख चिन्ता से ही पैदा होता है, और किसी कारण से नहीं। घटना अपने आप में निरपेक्ष है, उस पर लगी ‘अब क्या होगा’ वाली चिन्ता ही असली दुःख है। जो इस चिन्ता से रहित हो जाता है, वह सुखी और शान्त रहता है, और हर ओर से उसकी स्पृहा गल जाती है। छठा निश्चय और भी भीतर ले जाता है। हम देह नहीं हैं, देह हमारी भी नहीं, हम तो बोध हैं; जो यह जान लेता है वह मानो कैवल्य पा लेता है, और फिर ‘क्या किया, क्या नहीं किया’, यह हिसाब उसके मन में टिकता ही नहीं।

श्लोक 5 · 6

चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी।
तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः॥

नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी।
कैवल्यमिव सम्प्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम्॥

सातवाँ निश्चय सबसे विस्तृत दृष्टि देता है। ब्रह्मा से ले कर तिनके तक, जो कुछ है सब हम ही हैं; जो यह जान लेता है वह निर्विकल्प, शुचि और शान्त हो जाता है, और ‘यह पाया, यह नहीं पाया’ का भेद उसके लिए गिर जाता है, क्योंकि जो ‘अपना’ था और जो ‘अपना नहीं’ था, दोनों उसी एक में समाए हैं। और आठवाँ, अन्तिम निश्चय। अनेक आश्चर्यों से भरा यह सारा विश्व असल में कुछ भी नहीं है; ऐसा जान कर मनुष्य वासना-रहित हो जाता है, केवल एक स्फूर्ति-मात्र, एक जीवंत स्पन्दन रह जाता है, और फिर भी ऐसे शान्त, मानो कुछ है ही नहीं। आठों निश्चय राय नहीं हैं, पहचान हैं, और बार-बार के साथ भीतर बैठती जाती हैं।

श्लोक 7 · 8

आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तमहमेवेति निश्चयी।
निर्विकल्पः शुचिः शान्तः प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः॥

नानाश्चर्यमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी।
निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिव शाम्यति॥

॥ चिद्रूप ॥