अष्टावक्र गीता · प्रकरण 11: चिद्रूप

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 11

चिद्रूप

Form of Consciousness · 8 श्लोक

अष्टावक्र अब positive description पर आते हैं। आठ श्लोक, हर एक “ज्ञानी ऐसा होता है” वाले tone में। यह behavioral portrait है, doctrinal नहीं।

श्लोक 1
अष्टावक्र उवाच
भावाभावविकारश्च स्वभावादिति निश्चयी।
निर्विकारो गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति॥
bhāvābhāva-vikāraś ca svabhāvād iti niścayī
nirvikāro gata-kleśaḥ sukhenaivopaśāmyati

अर्थ“‘होना, न-होना, बदलना, सब प्रकृति-स्वभाव से ही है’, यह निश्चय करने वाला, निर्विकार और क्लेश-रहित हो कर, सहज ही शान्त हो जाता है।”

सन्दर्भ“स्वभाव” key word है। चीज़ें होती हैं, चीज़ें नहीं होतीं, बदलती हैं। यह सब प्रकृति का स्वभाव। इसमें “मेरा” कुछ नहीं। यह recognition होते ही, anxiety drop हो जाती है।

पाठक के लिएआज मौसम बदला। कोई control नहीं। आज तबीयत बदली। कोई control नहीं। यह सब “स्वभाव”। आप doer नहीं, observer हैं।

श्लोक 2
अष्टावक्र उवाच
ईश्वरः सर्वनिर्माता नेहान्य इति निश्चयी।
अन्तर्गलितसर्वाशः शान्तः क्वापि न सज्जते॥
īśvaraḥ sarva-nirmātā nehānya iti niścayī
antar-galita-sarvāśaḥ śāntaḥ kvāpi na sajjate

अर्थ“‘ईश्वर ही सबका रचयिता है, यहाँ कोई और नहीं’, यह निश्चय वाला, अन्दर से सब आशाओं को छोड़ कर, शान्त, कहीं भी आसक्त नहीं होता।”

सन्दर्भ“ईश्वर” यहाँ personal God नहीं, “वह जो सबको रचता है”। चेतना। हर event behind एक same source। तो particular events में आसक्ति का scope नहीं।

पाठक के लिए“अन्तर्गलित सर्व-आश”। अन्दर से सब आशाएँ गल गयीं। यह passive surrender नहीं, active recognition है। “जो हो रहा है, ठीक हो रहा है, source same है”।

श्लोक 3
अष्टावक्र उवाच
आपदः सम्पदः काले दैवादेवेति निश्चयी।
तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वान्छति न शोचति॥
āpadaḥ sampadaḥ kāle daivād eveti niścayī
tṛptaḥ svasthendriyo nityaṁ na vāñchati na śocati

अर्थ“‘आपदा और सम्पदा समय पर दैव से ही आती है’, यह निश्चय वाला, तृप्त, स्वस्थ-इन्द्रिय वाला, नित्य न चाहता है, न शोक करता है।”

सन्दर्भ“दैव” यानी कर्म + काल का mix। हम कारण नहीं, instrument हैं। यह जान कर tense होने का कोई कारण नहीं।

पाठक के लिए“स्वस्थ-इन्द्रिय”। इन्द्रियाँ अपने आप में स्थित। यानी इन्द्रियाँ कुछ “चाहती” नहीं। सिर्फ़ काम करती हैं। आँख देखती है, कान सुनते हैं, बस।

श्लोक 4
अष्टावक्र उवाच
सुखदुःखे जन्ममृत्यू दैवादेवेति निश्चयी।
साध्यादर्शी निरायासः कुर्वन्नपि न लिप्यते॥
sukha-duḥkhe janma-mṛtyū daivād eveti niścayī
sādhyādarśī nirāyāsaḥ kurvann api na lipyate

अर्थ“‘सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु, सब दैव से ही’, यह निश्चय वाला, कुछ साध्य न देखने वाला, अनायास, करते हुए भी नहीं लिप्त होता।”

सन्दर्भ“साध्य-अदर्शी”। कोई goal नहीं देखता। यह key है। हर पकड़ का base “साध्य” है, “मुझे यह पाना है”। साध्य गया, पकड़ गयी।

पाठक के लिए“कुर्वन् अपि न लिप्यते”। करते हुए भी लिप्त नहीं। यह कर्म-योग का अष्टावक्र version है। काम करो, मगर “I am doing” का तार छूट जाए।

श्लोक 5
अष्टावक्र उवाच
चिन्तया जायते दुःखं नान्यथेहेति निश्चयी।
तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः॥
cintayā jāyate duḥkhaṁ nānyatheheti niścayī
tayā hīnaḥ sukhī śāntaḥ sarvatra galita-spṛhaḥ

अर्थ“‘चिन्ता से ही दुःख पैदा होता है, और कोई कारण नहीं’, यह निश्चय वाला, उससे रहित, सुखी, शान्त, सर्वत्र गलित-स्पृह।”

सन्दर्भदुःख का mechanism unfold हो रहा है। दुःख घटनाओं से नहीं, “चिन्ता” से आता है। घटना neutral है, “इसका क्या होगा?” वो दुःख। यह deep psychological insight है।

पाठक के लिएएक experiment। आज का सबसे दुःखद moment सोचो। उसे dissect करो। घटना ख़ुद कितनी देर का थी? 1 minute? और चिन्ता कितनी देर चली? 2 घंटे? दुःख घटना का 1% है, चिन्ता का 99%।

श्लोक 6
अष्टावक्र उवाच
नाहं देहो न मे देहो बोधोऽहमिति निश्चयी।
कैवल्यमिव सम्प्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम्॥
nāhaṁ deho na me deho bodho’ham iti niścayī
kaivalyam iva samprāpto na smaraty akṛtaṁ kṛtam

अर्थ“‘मैं देह नहीं, देह मेरी नहीं, मैं बोध हूँ’, यह निश्चय वाला, मानो कैवल्य पा कर, किया-अकिया याद नहीं रखता।”

सन्दर्भ“कृत-अकृत” का memory ख़त्म। यह interesting point है। हम constantly “क्या किया, क्या नहीं किया” track करते हैं। यह memory ego को feed करती है। ज्ञानी की यह memory ही चली जाती है।

पाठक के लिएआज दिन भर के “किया-नहीं किया” list बनाओ। अब इसे delete करो। बिना उस list के अगर रात बीते, कैसा लगेगा? शायद एक नयी कि़स्म की शान्ति।

श्लोक 7
अष्टावक्र उवाच
आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तमहमेवेति निश्चयी।
निर्विकल्पः शुचिः शान्तः प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः॥
ā-brahma-stamba-paryantam aham eveti niścayī
nirvikalpaḥ śuciḥ śāntaḥ prāptāprāpta-vinirvṛtaḥ

अर्थ“‘ब्रह्मा से लेकर तृण तक, सब मैं ही हूँ’, यह निश्चय वाला, निर्विकल्प, शुचि, शान्त, प्राप्त-अप्राप्त से मुक्त।”

सन्दर्भ“प्राप्त-अप्राप्त”। पाया-नहीं पाया। यह distinction collapse हो गया। क्योंकि जो “मेरा” था, वो “मैं” का part था। जो “मेरा नहीं”, वो भी “मैं” का part था। तो पाना-नहीं पाना का scope ख़त्म।

पाठक के लिएहमारी ज़िंदगी “क्या पाया, क्या नहीं पाया” पर ही टिकी है। यह श्लोक उस foundation को हिलाता है। एक नया foundation: सब already “मैं”।

श्लोक 8
अष्टावक्र उवाच
नानाश्चर्यमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चयी।
निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिव शाम्यति॥
nānāścaryam idaṁ viśvaṁ na kiñcid iti niścayī
nirvāsanaḥ sphūrti-mātro na kiñcid iva śāmyati

अर्थ“‘यह अनेक आश्चर्य वाला विश्व कुछ नहीं है’, यह निश्चय वाला, वासना-रहित, सिर्फ़ स्फूर्ति-मात्र, मानो कुछ नहीं की तरह शान्त।”

सन्दर्भ“स्फूर्ति-मात्र”। बस energy, vibration। कोई fixed self नहीं। ज्ञानी एक frozen entity नहीं, एक dynamic flow है। और फिर भी शान्त, क्योंकि उसमें “stick होने वाला कोई” नहीं।

पाठक के लिएप्रकरण 11 ख़त्म। आठ “निश्चय” बताए। हर एक एक mental position। यह opinions नहीं, recognitions हैं। बार-बार से settle होती हैं।

॥ चिद्रूप ॥