चिद्रूप
Form of Consciousness · 8 श्लोक
अष्टावक्र अब positive description पर आते हैं। आठ श्लोक, हर एक “ज्ञानी ऐसा होता है” वाले tone में। यह behavioral portrait है, doctrinal नहीं।
निर्विकारो गतक्लेशः सुखेनैवोपशाम्यति॥
nirvikāro gata-kleśaḥ sukhenaivopaśāmyati
अर्थ“‘होना, न-होना, बदलना, सब प्रकृति-स्वभाव से ही है’, यह निश्चय करने वाला, निर्विकार और क्लेश-रहित हो कर, सहज ही शान्त हो जाता है।”
पाठक के लिएआज मौसम बदला। कोई control नहीं। आज तबीयत बदली। कोई control नहीं। यह सब “स्वभाव”। आप doer नहीं, observer हैं।
अन्तर्गलितसर्वाशः शान्तः क्वापि न सज्जते॥
antar-galita-sarvāśaḥ śāntaḥ kvāpi na sajjate
अर्थ“‘ईश्वर ही सबका रचयिता है, यहाँ कोई और नहीं’, यह निश्चय वाला, अन्दर से सब आशाओं को छोड़ कर, शान्त, कहीं भी आसक्त नहीं होता।”
पाठक के लिए“अन्तर्गलित सर्व-आश”। अन्दर से सब आशाएँ गल गयीं। यह passive surrender नहीं, active recognition है। “जो हो रहा है, ठीक हो रहा है, source same है”।
तृप्तः स्वस्थेन्द्रियो नित्यं न वान्छति न शोचति॥
tṛptaḥ svasthendriyo nityaṁ na vāñchati na śocati
अर्थ“‘आपदा और सम्पदा समय पर दैव से ही आती है’, यह निश्चय वाला, तृप्त, स्वस्थ-इन्द्रिय वाला, नित्य न चाहता है, न शोक करता है।”
पाठक के लिए“स्वस्थ-इन्द्रिय”। इन्द्रियाँ अपने आप में स्थित। यानी इन्द्रियाँ कुछ “चाहती” नहीं। सिर्फ़ काम करती हैं। आँख देखती है, कान सुनते हैं, बस।
साध्यादर्शी निरायासः कुर्वन्नपि न लिप्यते॥
sādhyādarśī nirāyāsaḥ kurvann api na lipyate
अर्थ“‘सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु, सब दैव से ही’, यह निश्चय वाला, कुछ साध्य न देखने वाला, अनायास, करते हुए भी नहीं लिप्त होता।”
पाठक के लिए“कुर्वन् अपि न लिप्यते”। करते हुए भी लिप्त नहीं। यह कर्म-योग का अष्टावक्र version है। काम करो, मगर “I am doing” का तार छूट जाए।
तया हीनः सुखी शान्तः सर्वत्र गलितस्पृहः॥
tayā hīnaḥ sukhī śāntaḥ sarvatra galita-spṛhaḥ
अर्थ“‘चिन्ता से ही दुःख पैदा होता है, और कोई कारण नहीं’, यह निश्चय वाला, उससे रहित, सुखी, शान्त, सर्वत्र गलित-स्पृह।”
पाठक के लिएएक experiment। आज का सबसे दुःखद moment सोचो। उसे dissect करो। घटना ख़ुद कितनी देर का थी? 1 minute? और चिन्ता कितनी देर चली? 2 घंटे? दुःख घटना का 1% है, चिन्ता का 99%।
कैवल्यमिव सम्प्राप्तो न स्मरत्यकृतं कृतम्॥
kaivalyam iva samprāpto na smaraty akṛtaṁ kṛtam
अर्थ“‘मैं देह नहीं, देह मेरी नहीं, मैं बोध हूँ’, यह निश्चय वाला, मानो कैवल्य पा कर, किया-अकिया याद नहीं रखता।”
पाठक के लिएआज दिन भर के “किया-नहीं किया” list बनाओ। अब इसे delete करो। बिना उस list के अगर रात बीते, कैसा लगेगा? शायद एक नयी कि़स्म की शान्ति।
निर्विकल्पः शुचिः शान्तः प्राप्ताप्राप्तविनिर्वृतः॥
nirvikalpaḥ śuciḥ śāntaḥ prāptāprāpta-vinirvṛtaḥ
अर्थ“‘ब्रह्मा से लेकर तृण तक, सब मैं ही हूँ’, यह निश्चय वाला, निर्विकल्प, शुचि, शान्त, प्राप्त-अप्राप्त से मुक्त।”
पाठक के लिएहमारी ज़िंदगी “क्या पाया, क्या नहीं पाया” पर ही टिकी है। यह श्लोक उस foundation को हिलाता है। एक नया foundation: सब already “मैं”।
निर्वासनः स्फूर्तिमात्रो न किञ्चिदिव शाम्यति॥
nirvāsanaḥ sphūrti-mātro na kiñcid iva śāmyati
अर्थ“‘यह अनेक आश्चर्य वाला विश्व कुछ नहीं है’, यह निश्चय वाला, वासना-रहित, सिर्फ़ स्फूर्ति-मात्र, मानो कुछ नहीं की तरह शान्त।”
पाठक के लिएप्रकरण 11 ख़त्म। आठ “निश्चय” बताए। हर एक एक mental position। यह opinions नहीं, recognitions हैं। बार-बार से settle होती हैं।