यथासुख
At Ease · 7 श्लोक
जनक का सबसे प्यारा प्रकरण। हर श्लोक एक ही phrase से ख़त्म, “अहमासे यथासुखम्”, “मैं ऐसे ही सुख से हूँ”। यह जीवन का wholesomely settled portrait है। कुछ चाहिए नहीं, कुछ खोना नहीं।
त्यागादाने विहायास्मादहमासे यथासुखम्॥
tyāgādāne vihāyāsmād aham āse yathā-sukham
अर्थ“अकिञ्चन (बेसहारा) होने का स्वास्थ्य, कौपीन (एक लंगोटी) पहनने में भी दुर्लभ है। त्याग-आदान दोनों छोड़ कर, मैं सुख से हूँ।”
पाठक के लिए“त्यागादाने विहाय”। दोनों, त्याग और आदान, छोड़े। ज्ञानी “त्यागी” भी नहीं, “भोगी” भी नहीं। बस “है”।
मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम्॥
manaḥ kutrāpi tat tyaktvā puruṣārthe sthitaḥ sukham
अर्थ“कहीं शरीर का खेद है, कहीं जिह्वा खिन्न होती है, कहीं मन। यह सब छोड़ कर, पुरुषार्थ में स्थित, मैं सुख से हूँ।”
पाठक के लिएआज शरीर थका है, क्या आप भी थके हैं? या शरीर थका है, और आप “थके” शरीर के witness हैं? यह distinction पूरी ज़िंदगी बदल सकती है।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वासे यथासुखम्॥
yadā yat kartum āyāti tat kṛtvāse yathā-sukham
अर्थ“‘कुछ भी ‘किया गया’ नहीं है’, यह तत्त्व-ज्ञानी सोच कर, जब जो करने को आए, वही करते हुए, सुख से रहता है।”
पाठक के लिएएक practice: एक काम करते हुए सोचो, “क्या मैं यह कर रहा हूँ, या यह हो रहा है?” अगर ध्यान से देखो, action automatic है। planning का भी action automatic है। “मैं” बस labels लगा रहा है।
संयोगायोगविरहादहमासे यथासुखम्॥
saṁyogāyoga-virahād aham āse yathā-sukham
अर्थ“कर्म और निष्कर्म दोनों के निर्बन्धन-भाव शरीरस्थ योगियों को होते हैं। संयोग-वियोग दोनों के विरह से, मैं सुख से हूँ।”
पाठक के लिए“मिलना-बिछड़ना” हमारी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा है। ख़ुशियाँ-दुःख, ज़्यादातर मिलना-बिछड़ना ही हैं। जनक की position से, यह सब movements सतह पर हैं, “मैं” गहराई में untouched।
तिष्ठन् गच्छन् स्वपन् तस्मादहमासे यथासुखम्॥
tiṣṭhan gacchan svapan tasmād aham āse yathā-sukham
अर्थ“न मेरा अर्थ-अनर्थ खड़े होने से, चलने से, सोने से। इसलिए खड़ा होते हुए, चलते हुए, सोते हुए, मैं सुख से हूँ।”
पाठक के लिएहम सोचते हैं “ध्यान बैठ कर होता है”। पर जनक की राय में, ध्यान चलते-फिरते भी, सोते भी। यानी अष्टांग योग का “आसन” आधा optional है।
नाशोल्लासौ विहायास्मादहमासे यथासुखम्॥
nāśollāsau vihāyāsmād aham āse yathā-sukham
अर्थ“सोते हुए मेरी हानि नहीं, यत्न करते सिद्धि भी नहीं। नाश और उल्लास, दोनों छोड़ कर, मैं सुख से हूँ।”
पाठक के लिएआज एक छोटी सी जीत हुई। उल्लास आया। उसे observe करो। अब एक छोटा सा नुक़सान हुआ। उदासी आयी। उसे भी observe करो। दोनों emotions waves हैं। आप sky हैं।
शुभाशुभे विहायास्मादहमासे यथासुखम्॥
śubhāśubhe vihāyāsmād aham āse yathā-sukham
अर्थ“सुख-दुःख आदि भावों में एक niyam (नियम) है, यह बार-बार देख कर, शुभ-अशुभ छोड़ कर, मैं सुख से हूँ।”
पाठक के लिएप्रकरण 13 ख़त्म। “यथासुखम्” का refrain जनक का life-attitude दिखाता है। कुछ चाहिए नहीं, कुछ डर नहीं। बस ease। यह spiritual maturity का sign है।