अष्टावक्र गीता · प्रकरण 13: यथासुख

अष्टावक्र गीता · प्रकरण 13

यथासुख

At Ease · 7 श्लोक

जनक का सबसे प्यारा प्रकरण। हर श्लोक एक ही phrase से ख़त्म, “अहमासे यथासुखम्”, “मैं ऐसे ही सुख से हूँ”। यह जीवन का wholesomely settled portrait है। कुछ चाहिए नहीं, कुछ खोना नहीं।

श्लोक 1
जनक उवाच
अकिञ्चनभवं स्वास्थ्यं कौपीनत्वेऽपि दुर्लभम्।
त्यागादाने विहायास्मादहमासे यथासुखम्॥
akiñcana-bhavaṁ svāsthyaṁ kaupīnatve’pi durlabham
tyāgādāne vihāyāsmād aham āse yathā-sukham

अर्थ“अकिञ्चन (बेसहारा) होने का स्वास्थ्य, कौपीन (एक लंगोटी) पहनने में भी दुर्लभ है। त्याग-आदान दोनों छोड़ कर, मैं सुख से हूँ।”

सन्दर्भसंन्यासी कौपीन पहनता है, “त्याग” का चिन्ह। मगर वो भी “त्याग” की पकड़ है। जनक राजगद्दी पर बैठे “मैंने त्याग कर दिया” का दावा नहीं करते। बस “मैं हूँ” कहते हैं।

पाठक के लिए“त्यागादाने विहाय”। दोनों, त्याग और आदान, छोड़े। ज्ञानी “त्यागी” भी नहीं, “भोगी” भी नहीं। बस “है”।

श्लोक 2
जनक उवाच
कुत्रापि खेदः कायस्य जिह्वा कुत्रापि खिद्यते।
मनः कुत्रापि तत्त्यक्त्वा पुरुषार्थे स्थितः सुखम्॥
kutrāpi khedaḥ kāyasya jihvā kutrāpi khidyate
manaḥ kutrāpi tat tyaktvā puruṣārthe sthitaḥ sukham

अर्थ“कहीं शरीर का खेद है, कहीं जिह्वा खिन्न होती है, कहीं मन। यह सब छोड़ कर, पुरुषार्थ में स्थित, मैं सुख से हूँ।”

सन्दर्भशरीर थकता है, जीभ कुछ-कुछ खाने पर तुष्ट होती है या रूठती है, मन कभी थक जाता है। यह सब “मेरी” इकाइयाँ हैं। मगर “मैं” इन से अलग।

पाठक के लिएआज शरीर थका है, क्या आप भी थके हैं? या शरीर थका है, और आप “थके” शरीर के witness हैं? यह distinction पूरी ज़िंदगी बदल सकती है।

श्लोक 3
जनक उवाच
कृतं किमपि नैव स्यादिति सञ्चिन्त्य तत्त्ववित्।
यदा यत्कर्तुमायाति तत्कृत्वासे यथासुखम्॥
kṛtaṁ kim api naiva syād iti sañcintya tattva-vit
yadā yat kartum āyāti tat kṛtvāse yathā-sukham

अर्थ“‘कुछ भी ‘किया गया’ नहीं है’, यह तत्त्व-ज्ञानी सोच कर, जब जो करने को आए, वही करते हुए, सुख से रहता है।”

सन्दर्भ“कुछ भी किया नहीं”। यानी कर्ता-भाव absent। काम तो होता है, मगर “मैंने किया” का sense नहीं। और जो situation में करने को आ जाए, बिना दौड़े, वही करता है।

पाठक के लिएएक practice: एक काम करते हुए सोचो, “क्या मैं यह कर रहा हूँ, या यह हो रहा है?” अगर ध्यान से देखो, action automatic है। planning का भी action automatic है। “मैं” बस labels लगा रहा है।

श्लोक 4
जनक उवाच
कर्मनैष्कर्म्यनिर्बन्धभावा देहस्थयोगिनाम्।
संयोगायोगविरहादहमासे यथासुखम्॥
karma-naiṣkarmya-nirbandha-bhāvā deha-stha-yoginām
saṁyogāyoga-virahād aham āse yathā-sukham

अर्थ“कर्म और निष्कर्म दोनों के निर्बन्धन-भाव शरीरस्थ योगियों को होते हैं। संयोग-वियोग दोनों के विरह से, मैं सुख से हूँ।”

सन्दर्भयोगी “कर्म करूँ या नहीं” इस duality में फँसते हैं। ज्ञानी इस duality के बाहर। और “संयोग-वियोग” यानी मिलना-बिछड़ना। यह दोनों relevant नहीं, क्योंकि “मैं” किसी से कभी मिला नहीं, बिछड़ा भी नहीं।

पाठक के लिए“मिलना-बिछड़ना” हमारी ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा है। ख़ुशियाँ-दुःख, ज़्यादातर मिलना-बिछड़ना ही हैं। जनक की position से, यह सब movements सतह पर हैं, “मैं” गहराई में untouched।

श्लोक 5
जनक उवाच
अर्थानर्थौ न मे स्थित्या गत्या न शयनेन वा।
तिष्ठन् गच्छन् स्वपन् तस्मादहमासे यथासुखम्॥
arthānarthau na me sthityā gatyā na śayanena vā
tiṣṭhan gacchan svapan tasmād aham āse yathā-sukham

अर्थ“न मेरा अर्थ-अनर्थ खड़े होने से, चलने से, सोने से। इसलिए खड़ा होते हुए, चलते हुए, सोते हुए, मैं सुख से हूँ।”

सन्दर्भतीन simple postures: खड़ा, चलना, सोना। हर एक में same equanimity। ज्ञानी की posture-independent state है।

पाठक के लिएहम सोचते हैं “ध्यान बैठ कर होता है”। पर जनक की राय में, ध्यान चलते-फिरते भी, सोते भी। यानी अष्टांग योग का “आसन” आधा optional है।

श्लोक 6
जनक उवाच
स्वपतो नास्ति मे हानिः सिद्धिर्यत्नवतो न वा।
नाशोल्लासौ विहायास्मादहमासे यथासुखम्॥
svapato nāsti me hāniḥ siddhir yatnavato na vā
nāśollāsau vihāyāsmād aham āse yathā-sukham

अर्थ“सोते हुए मेरी हानि नहीं, यत्न करते सिद्धि भी नहीं। नाश और उल्लास, दोनों छोड़ कर, मैं सुख से हूँ।”

सन्दर्भ“नाश-उल्लास”। दोनों emotions extreme हैं। एक loss पर, दूसरा gain पर। दोनों “मैं” को shake करते हैं। ज्ञानी दोनों से untouched।

पाठक के लिएआज एक छोटी सी जीत हुई। उल्लास आया। उसे observe करो। अब एक छोटा सा नुक़सान हुआ। उदासी आयी। उसे भी observe करो। दोनों emotions waves हैं। आप sky हैं।

श्लोक 7
जनक उवाच
सुखादिरूपा नियमं भावेष्वालोक्य भूरिशः।
शुभाशुभे विहायास्मादहमासे यथासुखम्॥
sukhādi-rūpā niyamaṁ bhāveṣv ālokya bhūriśaḥ
śubhāśubhe vihāyāsmād aham āse yathā-sukham

अर्थ“सुख-दुःख आदि भावों में एक niyam (नियम) है, यह बार-बार देख कर, शुभ-अशुभ छोड़ कर, मैं सुख से हूँ।”

सन्दर्भ“नियम”। सुख-दुःख का pattern। हर सुख के बाद दुःख आता है, हर दुःख के बाद सुख। यह law है। एक के साथ दूसरा automatic। तो pursue किसको करो?

पाठक के लिएप्रकरण 13 ख़त्म। “यथासुखम्” का refrain जनक का life-attitude दिखाता है। कुछ चाहिए नहीं, कुछ डर नहीं। बस ease। यह spiritual maturity का sign है।

॥ यथासुख ॥