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अंग 93

अंग
93
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: भगत बेणी जी
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
स्रीराग बाणी भगत बेणी जीउ की ॥
पहरिआ कै घरि गावणा ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रे नर गरभ कुंडल जब आछत उरध धिआन लिव लागा ॥
मिरतक पिंडि पद मद ना अहिनिसि एकु अगिआन सु नागा ॥
ते दिन संमलु कसट महा दुख अब चितु अधिक पसारिआ ॥
गरभ छोडि म्रित मंडल आइआ तउ नरहरि मनहु बिसारिआ ॥1॥
फिरि पछुतावहिगा मूड़िआ तूं कवन कुमति भ्रमि लागा ॥
चेति रामु नाही जम पुरि जाहिगा जनु बिचरै अनराधा ॥1॥ रहाउ ॥
बाल बिनोद चिंद रस लागा खिनु खिनु मोहि बिआपै ॥
रसु मिसु मेधु अंम्रितु बिखु चाखी तउ पंच प्रगट संतापै ॥
जपु तपु संजमु छोडि सुक्रित मति राम नामु न अराधिआ ॥
उछलिआ कामु काल मति लागी तउ आनि सकति गलि बांधिआ ॥2॥
तरुण तेजु पर त्रिअ मुखु जोहहि सरु अपसरु न पछाणिआ ॥
उनमत कामि महा बिखु भूलै पापु पुंनु न पछानिआ ॥
सुत संपति देखि इहु मनु गरबिआ रामु रिदै ते खोइआ ॥
अवर मरत माइआ मनु तोले तउ भग मुखि जनमु विगोइआ ॥3॥
पुंडर केस कुसम ते धउले सपत पाताल की बाणी ॥
लोचन स्रमहि बुधि बल नाठी ता कामु पवसि माधाणी ॥
ता ते बिखै भई मति पावसि काइआ कमलु कुमलाणा ॥
अवगति बाणि छोडि म्रित मंडलि तउ पाछै पछुताणा ॥4॥
निकुटी देह देखि धुनि उपजै मान करत नही बूझै ॥
लालचु करै जीवन पद कारन लोचन कछू न सूझै ॥
थाका तेजु उडिआ मनु पंखी घरि आंगनि न सुखाई ॥
बेणी कहै सुनहु रे भगतहु मरन मुकति किनि पाई ॥5॥
भगत बेणी जी की वाणी में योग-साधना का गहरा अनुभव झलकता है, नाड़ी और चक्र की भाषा के साथ। उनके बारे में जीवनी-विवरण कम हैं।

हिन्दी अर्थ: श्री राग बाणी भगत बेणी जीउ की ॥ (प्रस्तुत पद को पहरे वाणी के स्वर में गाने का आदेश दिया गया है।) ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे मनुष्य जब आप मां के पेट में था, तब आपकी सुरति ऊचे (प्रभू के) ध्यान में जुड़ी रहती थी। (आपको तब) शरीर के अस्तित्व का अहंकार नहीं था। दिन रात एक प्रभू को (सिमरता था)। (आपके अंदर) अज्ञान नहीं था। (हे मनुष्य !) वो दिन अब याद कर (तब आपको) बहुत कलेश व तकलीफें थीं। पर अब तूने अपने मन को (दुनिया के जंजालों में) बहुत फंसा रखा है। मां का पेट छोड़ के जब का आप जगत में आया है, तब से तूने अपने निरंकार को भुला दिया है।1। हे मूर्ख ! आप किस मति, किस भुलेखे में लगा हुआ है? (समय को हाथों से गवा के) फिर हाथ मलेगा। प्रभू को सिमर वरना यमपुरी में धकेल दिया जाएगा। (आप तो ऐसे घूम रहा है) जैसे कोई ना मुड़ने वाला सख्श (जिसने कभी वापिस ही नहीं जाना हो)।1। रहाउ। (पहले) आप बालपन की खेलों व स्वाद में लगा रहा और सदा (इनके ही) मोह में फंसा रहा। (अब जबसे) तूने माया रूपी विष को रसीला व पवित्र अमृत समझ के चख लिया है, तब से आपको पाँचों विकार (कामादिक) खुले तौर पर सता रहे हैं। जप तप संजम और पुंन कर्म करने वाली बुद्धि आप त्याग बैठा है। प्रभू के नाम को नहीं सिमरता। (आपके अंदर) काम प्रबल है। आपकी बुद्धि गलत रास्ते पर लगी हुई है। (कामातुर हैं के) तूने स्त्री को गले से लगाया है।2। (आपके अंदर) जवानी का जोश है। आप पराई औरतों का मुंह देखता है। वक्त बेवक्त भी आप नहीं समझता। हे काम में मस्त हुए हुये ! हे प्रबल माया में भूले हुए ! तूझे ये समझ नहीं कि पाप क्या है और पुंन्न क्या। पुत्रों को, धन पदार्थों को देख आपका मन अहंकारी हैं रहा है। प्रभू को आप हृदय से विसार बैठा है। औरों (संबंधियों) के मरने पर आपका मन गिनती मिनती में लग जाता है कि कितनी माया मिलेगी। इस तरह तूने अपने उत्तम व श्रेष्ठ (मनुष्य) जीवन को व्यर्थ गवा लिया है।3। आपके केस सफेद कमल के फूल से भी ज्यादा सफेद हैं चुके हैं। आपकी आवाज (बहुत मद्यम हैं गयी है, मानो) सातवें पाताल से आ रही है। आपकी आँखें सिम रहीं हैं, आपकी चतुरायी भरी बुद्धि क्षीण हैं चुकी है, तो भी काम (की) मथानी (आपके अंदर) चल रही है (अर्थात, अभी भी काम की वासना जोरों में है)। इन ही वासनाओं के कारण आपकी बुद्धि में विषौ विकारों की झड़ी लगी हुई है, आपका शरीर रूपी कमल फूल कुम्हला गया है। जगत में आ के आप परमात्मा का भजन छोड़ बैठा है। (समय बीत जाने पर) पीछे हाथ मलेगा।4। छोटे छोटे बच्चे (पुत्र पौत्र) देख के (मनुष्य के मन में उनके लिए) मोह पैदा होता है, अहंकार करता है। पर इसको ये समझ नहीं आती (कि सब कुछ छोड़ जाना है)। आँखों से दिखना बंद हो जाता है (फिर भी मनुष्य) और जीने का लालच करता है। (आखिर) शरीर का बल खत्म हो जाता है, (और जब) जीव पंछी (शरीर में से) उड़ जाता है (तब मुर्दा देह) धर में, आंगन में, पड़ी हुई अच्छी नहीं लगती। बेणी कहता है, हे संत जनों ! (अगर मनुष्य का सारी जिंदगी यही हाल रहा, भाव, जीते जी कभी भी विकारों और मोह से मुक्त ना हुआ, यदि जीवन मुक्त ना हुआ तो ये सच जानो कि) मरने के बाद मुक्ति किसी को नहीं मिलती।5।
सिरीरागु ॥
तोही मोही मोही तोही अंतरु कैसा ॥
कनक कटिक जल तरंग जैसा ॥1॥
जउ पै हम न पाप करंता अहे अनंता ॥
पतित पावन नामु कैसे हुंता ॥1॥ रहाउ ॥
तुम॑ जु नाइक आछहु अंतरजामी ॥
प्रभ ते जनु जानीजै जन ते सुआमी ॥2॥
सरीरु आराधै मो कउ बीचारु देहू ॥
रविदास सम दल समझावै कोऊ ॥3॥
भगत बेणी जी की वाणी में योग-साधना का गहरा अनुभव झलकता है, नाड़ी और चक्र की भाषा के साथ। उनके बारे में जीवनी-विवरण कम हैं।

हिन्दी अर्थ: सिरीरागु॥ (हे परमात्मा !) आपकी मुझसे, मेरी तूझसे (असल) दूरी कैसी है? (वैसी ही है) जैसी सोने और सोने के कड़े की, या पानी ओर पानी की लहरों की है।1। हे बेअंत (प्रभू) जी ! अगर हम जीव पाप ना करते तो आपका नाम (पापियों को पवित्र करने वाला) ‘पतित पावन’ कैसे हो जाता? ।1।रहाउ। हे हमारे दिलों के ज्ञाता प्रभू ! आप जो हमारा मालिक है (तो फिर मालिकों वाला बिरद पाल, अपने ‘पतित पावन’ नाम की लाज रख)। मालिक को देख के ये पहचान लेते हैं कि इसका सेवक कैसा है और सेवक से मालिक की परख हो जाती है।2। (सो, हे प्रभू !) मुझे ये सूझ बख्श कि जब तक मेरा ये शरीर है तब तक मैं आपका सिमरन करूँ। (ये भी मेहर कर कि) रविदास को कोई संत जन ये समझ भी दे कि आप सर्व-व्यापक है।3।

श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्री राग बाणी भगत बेणी जीउ की ॥ (प्रस्तुत पद को पहरे वाणी के स्वर में गाने का आदेश दिया गया है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।