पहरिआ कै घरि गावणा ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रे नर गरभ कुंडल जब आछत उरध धिआन लिव लागा ॥
मिरतक पिंडि पद मद ना अहिनिसि एकु अगिआन सु नागा ॥
ते दिन संमलु कसट महा दुख अब चितु अधिक पसारिआ ॥
गरभ छोडि म्रित मंडल आइआ तउ नरहरि मनहु बिसारिआ ॥1॥
फिरि पछुतावहिगा मूड़िआ तूं कवन कुमति भ्रमि लागा ॥
चेति रामु नाही जम पुरि जाहिगा जनु बिचरै अनराधा ॥1॥ रहाउ ॥
बाल बिनोद चिंद रस लागा खिनु खिनु मोहि बिआपै ॥
रसु मिसु मेधु अंम्रितु बिखु चाखी तउ पंच प्रगट संतापै ॥
जपु तपु संजमु छोडि सुक्रित मति राम नामु न अराधिआ ॥
उछलिआ कामु काल मति लागी तउ आनि सकति गलि बांधिआ ॥2॥
तरुण तेजु पर त्रिअ मुखु जोहहि सरु अपसरु न पछाणिआ ॥
उनमत कामि महा बिखु भूलै पापु पुंनु न पछानिआ ॥
सुत संपति देखि इहु मनु गरबिआ रामु रिदै ते खोइआ ॥
अवर मरत माइआ मनु तोले तउ भग मुखि जनमु विगोइआ ॥3॥
पुंडर केस कुसम ते धउले सपत पाताल की बाणी ॥
लोचन स्रमहि बुधि बल नाठी ता कामु पवसि माधाणी ॥
ता ते बिखै भई मति पावसि काइआ कमलु कुमलाणा ॥
अवगति बाणि छोडि म्रित मंडलि तउ पाछै पछुताणा ॥4॥
निकुटी देह देखि धुनि उपजै मान करत नही बूझै ॥
लालचु करै जीवन पद कारन लोचन कछू न सूझै ॥
थाका तेजु उडिआ मनु पंखी घरि आंगनि न सुखाई ॥
बेणी कहै सुनहु रे भगतहु मरन मुकति किनि पाई ॥5॥
तोही मोही मोही तोही अंतरु कैसा ॥
कनक कटिक जल तरंग जैसा ॥1॥
जउ पै हम न पाप करंता अहे अनंता ॥
पतित पावन नामु कैसे हुंता ॥1॥ रहाउ ॥
तुम॑ जु नाइक आछहु अंतरजामी ॥
प्रभ ते जनु जानीजै जन ते सुआमी ॥2॥
सरीरु आराधै मो कउ बीचारु देहू ॥
रविदास सम दल समझावै कोऊ ॥3॥
श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।
इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्री राग बाणी भगत बेणी जीउ की ॥ (प्रस्तुत पद को पहरे वाणी के स्वर में गाने का आदेश दिया गया है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।