लुल्ला परिवारLulla Family
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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

राग प्रभाती

राग · M1-M5

राग प्रभाती

भोर का राग, पहली प्रार्थना का।

प्रभाती सुबह के मुहूर्त का राग है, पहली प्रार्थना के लिए बना। नाम का अर्थ ही "प्रभात" (सुबह) है, और स्वर इसी समय की हलकी रोशनी और निःशब्दता का है।

ग्रंथ में प्रभाती की रचनाएँ अंग तेरह-सौ-सत्ताईस के क़रीब से शुरू होती हैं। सुबह की कीर्तन-संगति में इसकी रचनाएँ प्रिय रही हैं।

"प्रभ की सेवा जन की सोभा ॥" प्रभाती M5
इस राग के सब अंग

इस राग के शबद

हर शबद अपनी पहली पंक्ति से, वाणी के अनुसार। पंक्ति पर जाने से वह शबद अपने अंग पर खुलता है।

महला 1 (23)
  1. तेरा नामु रतनु करमु चानणु सुरति तिथै लोइ ॥अंग 1327
  2. जै कारणि बेद ब्रहमै उचरे संकरि छोडी माइआ ॥अंग 1328
  3. जा कै रूपु नाही जाति नाही नाही मुखु मासा ॥अंग 1328
  4. ता का कहिआ दरि परवाणु ॥अंग 1328
  5. अंम्रितु नीरु गिआनि मन मजनु अठसठि तीरथ संगि गहे ॥अंग 1328
  6. गुर परसादी विदिआ वीचारै पड़ि पड़ि पावै मानु ॥अंग 1329
  7. आवतु किनै न राखिआ जावतु किउ राखिआ जाइ ॥अंग 1329
  8. दिसटि बिकारी बंधनि बांधै हउ तिस कै बलि जाई ॥अंग 1329
  9. मनु माइआ मनु धाइआ मनु पंखी आकासि ॥अंग 1330
  10. जागतु बिगसै मूठो अंधा ॥अंग 1330
  11. मसटि करउ मूरखु जगि कहीआ ॥अंग 1330
  12. खाइआ मैलु वधाइआ पैधै घर की हाणि ॥अंग 1331
  13. गीत नाद हरख चतुराई ॥अंग 1331
  14. अंतरि देखि सबदि मनु मानिआ अवरु न रांगनहारा ॥अंग 1331
  15. बारह महि रावल खपि जावहि चहु छिअ महि संनिआसी ॥अंग 1332
  16. संता की रेणु साध जन संगति हरि कीरति तरु तारी ॥अंग 1332
  17. दुबिधा बउरी मनु बउराइआ ॥अंग 1342
  18. माइआ मोहि सगल जगु छाइआ ॥अंग 1342
  19. निवली करम भुअंगम भाठी रेचक पूरक कुंभ करै ॥अंग 1343
  20. गोतमु तपा अहिलिआ इसत्री तिसु देखि इंद्रु लुभाइआ ॥अंग 1344
  21. आखणा सुनणा नामु अधारु ॥अंग 1344
  22. राम नामु जपि अंतरि पूजा ॥अंग 1345
  23. इकि धुरि बखसि लए गुरि पूरै सची बणत बणाई ॥अंग 1345
महला 3 (9)
  1. गुरमुखि विरला कोई बूझै सबदे रहिआ समाई ॥अंग 1332
  2. निरगुणीआरे कउ बखसि लै सुआमी आपे लैहु मिलाई ॥अंग 1333
  3. गुरमुखि हरि सालाहिआ जिंना तिन सलाहि हरि जाता ॥अंग 1333
  4. तुधु जेवडु मै अवरु न सूझै ना को होआ न होगु ॥1॥अंग 1333
  5. गुर सबदी मनु निरमलु होआ चूका मनि अभिमानु ॥अंग 1334
  6. आपे भांति बणाए बहु रंगी सिसटि उपाइ प्रभि खेलु कीआ ॥अंग 1334
  7. मेरे मन गुरु अपणा सालाहि ॥अंग 1334
  8. गुर परसादी वेखु तू हरि मंदरु तेरै नालि ॥अंग 1346
  9. भै भाइ जागे से जन जाग्रण करहि हउमै मैलु उतारि ॥अंग 1346
महला 4 (7)
  1. रसकि रसकि गुन गावह गुरमति लिव उनमनि नामि लगान ॥अंग 1335
  2. उगवै सूरु गुरमुखि हरि बोलहि सभ रैनि सम॑ालहि हरि गाल ॥अंग 1335
  3. इकु खिनु हरि प्रभि किरपा धारी गुन गाए रसक रसीक ॥अंग 1335
  4. अगम दइआल क्रिपा प्रभि धारी मुखि हरि हरि नामु हम कहे ॥अंग 1336
  5. मनि लागी प्रीति राम नाम हरि हरि जपिओ हरि प्रभु वडफा ॥अंग 1336
  6. गुर सतिगुरि नामु द्रिड़ाइओ हरि हरि हम मुए जीवे हरि जपिभा ॥अंग 1337
  7. जपि मन हरि हरि नामु निधान ॥अंग 1337
महला 5 (17)
  1. मनु हरि कीआ तनु सभु साजिआ ॥अंग 1337
  2. प्रभ की सेवा जन की सोभा ॥अंग 1338
  3. गुन गावत मनि होइ अनंद ॥अंग 1338
  4. सगले दूख मिटे सुख दीए अपना नामु जपाइआ ॥अंग 1338
  5. सिमरत नामु किलबिख सभि नासे ॥अंग 1339
  6. करि किरपा अपुने प्रभि कीए ॥अंग 1339
  7. से धनवंत सेई सचु साहा ॥अंग 1339
  8. गुरु पूरा पूरी ता की कला ॥अंग 1339
  9. सतिगुरि पूरै नामु दीआ ॥अंग 1340
  10. पारब्रहमु प्रभु सुघड़ सुजाणु ॥अंग 1340
  11. कुरबाणु जाई गुर पूरे अपने ॥अंग 1340
  12. गुरु गुरु करत सदा सुखु पाइआ ॥अंग 1341
  13. अवरु न दूजा ठाउ ॥अंग 1341
  14. रम राम राम राम जाप ॥अंग 1341
  15. चरन कमल सरनि टेक ॥अंग 1341
  16. मात पिता भाई सुतु बनिता ॥अंग 1347
  17. सिमरत नामु किलबिख सभि काटे ॥अंग 1348
भगत कबीर जी (5)
  1. मरन जीवन की संका नासी ॥अंग 1349
  2. अलहु एकु मसीति बसतु है अवरु मुलखु किसु केरा ॥अंग 1349
  3. अवलि अलह नूरु उपाइआ कुदरति के सभ बंदे ॥अंग 1349
  4. बेद कतेब कहहु मत झूठे झूठा जो न बिचारै ॥अंग 1350
  5. सुंन संधिआ तेरी देव देवाकर अधपति आदि समाई ॥अंग 1350
भगत नामदेव जी (3)
  1. मन की बिरथा मनु ही जानै कै बूझल आगै कहीऐ ॥अंग 1350
  2. आदि जुगादि जुगादि जुगो जुगु ता का अंतु न जानिआ ॥अंग 1351
  3. अकुल पुरख इकु चलितु उपाइआ ॥अंग 1351
अन्य भगत (2)
  1. छका 1 ॥अंग 1337
  2. प्रभाती भगत बेणी जी कीअंग 1351

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