राग प्रभाती
भोर का राग, पहली प्रार्थना का।
प्रभाती सुबह के मुहूर्त का राग है, पहली प्रार्थना के लिए बना। नाम का अर्थ ही “प्रभात” (सुबह) है, और स्वर इसी समय की हलकी रोशनी और निःशब्दता का है।
ग्रंथ में प्रभाती की रचनाएँ अंग तेरह-सौ-सत्ताईस के क़रीब से शुरू होती हैं। सुबह की कीर्तन-संगति में इसकी रचनाएँ प्रिय रही हैं।
“निरगुणु आपि सरगुणु भी ओही ।” प्रभाती M5