नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: वह अनंतशक्ति परम-परमेश्वर केवल एक है, नाम उसका सत्य है, वह सम्पूर्ण विश्व को बनाने वाला है, सर्वशक्तिमान है, वह भय से रहित है,वस्तुतः सब पर समान दृष्टि होने के कारण वह प्रेमस्वरूप है, वह कालातीत ब्रह्म मूर्ति सदा अमर है, वह जन्म-मरण के चक्र से परे है, अजन्मा है, वह स्वतः प्रकाशमान हुआ और गुरु की कृपा से प्राप्त होता है। रागु परभाती बिभास महला 1 चउपदे घरु 1 ॥ हे प्रभू ! आपके नाम में जुड़ के ही (संसार-समुंद्र के विकारों से) पार लांघा जाता है। आपके नाम के द्वारा ही इज्जत-आदर मिलता है। आपका नाम (इन्सानी जीवन को श्रृंगारने के लिए) गहना है। मानवीय-बुद्धि का मकसद यही है (कि मनुष्य आपका नाम सिमरे)। हे प्रभू ! आपके नाम में टिक के ही हर कोई (नाम सिमरन वाले की) इज्जत करता है। 1। परमेश्वर के नाम बिना कभी इज्जत प्राप्त नहीं होती॥ 1॥ (प्रभू का सिमरन छोड़ के दुनिया में आदर हासिल करने के लिए) और-और चतुराईयों (के काम निरे) लोक-दिखावा हैं (वह पाज उघड़ जाता है और हासिल की हुई इज्जत भी खत्म हो जाती है)। जिस जीव पर प्रभू बख्शिश करता है (उसको अपने नाम की दाति देता है। और उस जीव का) जिंदगी का असल उद्देश्य सफल होता है। 1। रहाउ। (मनुष्य दुनियावी ताकत। हकूमत। फौजों की सरदारी और बादशाहियत के लिए दौड़ता-फिरता है। फिर ये सब कुछ नाशवंत है) हे प्रभू ! आपका नाम ही (असल) ताकत है। आपका नाम ही (असल) हकूमत है। आपका नाम ही फौजों (की सरदारी) है। जिसके पल्ले आपका नाम है वही बादशाह है। हे प्रभू ! आपके नाम में जुड़ने से ही असल आदर मिलता है इज्जत मिलती है। जो मनुष्य आपके नाम में मस्त है वही जगत में जाना-माना हुआ है। पर। आपकी मेहर की नज़र से ही आपकी बख्शिश से ही (जीव-यात्री को इस जीवन-यात्रा में) यह परवाना (राहदारी) मिलता है। 2। हे प्रभू ! आपके नाम में जुड़ने से ही मन की शांति मिलती है। आपके नाम में जुड़ने से आपकी सिफत-सालाह करने की आदत बनती है। आपका नाम ही आत्मिक जीवन देने वाला ऐसा पवित्र जल है (जिसकी बरकति से मनुष्य मन में से विषौ-विकारों का सारा) जहर धुल जाता है। आपके नाम में जुड़ने से सारे सुख मन में आ बसते हैं। नाम से टूट के दुनिया (विकारों की जंजीरों में) बँधी हुई जम की नगरी में जाती है। 3। हे नानक ! स्त्री (का प्यार) घरों को जमीन-जायदादों की मल्कियत – ये सब कुछ (जीव-यात्री के पैरों में) बेड़ियाँ (पड़ी हुई) हैं (जो इसको सही जीवन-यात्रा में चलने नहीं देतीं)। मन की प्रसन्नता के लिए अनेकों पहरावे पहनते है। (ये खुशियाँ व चाव भी बेड़ियाँ ही हैं)। जब (परमात्मा जीव को) मौत का बुलावा भेजता है (उसके बुलावे पर) रक्ती भर भी ढील नहीं हो सकती। (तब समझ आती है कि) झूठे पदार्थों का साथ झूठा ही निकलता है। 4। 1।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 1 ॥ (हे प्रभू !) जिस (मानस) सुरति में आपका नाम-रत्न (जड़ा हुआ) है। आपकी बख्शिश रौशनी कर रही है उस सुरति के अंदर (आपके ज्ञान का) प्रकाश हैं रहा है। (माया के मोह में) अंधी हैं रही सृष्टि पर अज्ञानता का अंधेरा प्रभाव डाल रहा है। (इस अंधेरे में) सारी आत्मिक राशि-पूँजी गवा ली जाती है। 1। (हे प्रभू ! आपके नाम से टूट के) ये सारा जगत विकार ही विकार (सहेड़ रहा) है। (इस विकार रोग की) दवाई (सिर्फ) आपका नाम ही है। (आपके नाम के बिना) कोई और दवा-दारू नहीं। (जगत को और जगत के रोगों की दवाई को) बनाने वाला आप बेअंत प्रभू स्वयं ही है। 1। रहाउ। अगर सृष्टि की सारी पाताल और पुरियाँ (आपस में बँध के) एक गठड़ी बन जाएं। और अगर इस तरह की और लाखों-करोड़ों गठड़ियां भी हैं जाएं (तो ये सारे मिल के भी परमात्मा के नाम की बराबरी नहीं कर सकते)। हे प्रभू ! आपके कीमती नाम का मूल्य तब ही पड़ सकता है जब नाम को तोलने के लिए तकड़ी के दूसरे छाबे में (सारी दुनिया के धन-पदार्थों को छोड़ के) कोई और पदार्थ हों (भाव। आपकी सिफतों के खजाने हों ! आपके नाम जैसा कीमती नाम ही है। आपकी सिफतें-सालाहें ही हैं)। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह अनंतशक्ति परम-परमेश्वर केवल एक है, नाम उसका सत्य है, वह सम्पूर्ण विश्व को बनाने वाला है, सर्वशक्तिमान है, वह भय से रहित है,वस्तुतः सब पर समान दृष्टि होने के कारण वह प्रेमस्वरूप ।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।