Lulla Family

अंग 1350

अंग
1350
राग प्रभाती
राग: प्रभाती · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
लोगा भरमि न भूलहु भाई ॥
खालिकु खलक खलक महि खालिकु पूरि रहिओ स्रब ठांई ॥1॥ रहाउ ॥
माटी एक अनेक भांति करि साजी साजनहारै ॥
ना कछु पोच माटी के भांडे ना कछु पोच कुंभारै ॥2॥
सभ महि सचा एको सोई तिस का कीआ सभु कछु होई ॥
हुकमु पछानै सु एको जानै बंदा कहीऐ सोई ॥3॥
अलहु अलखु न जाई लखिआ गुरि गुड़ु दीना मीठा ॥
कहि कबीर मेरी संका नासी सरब निरंजनु डीठा ॥4॥3॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: हे लोगो ! हे भाई ! (रॅब की हस्ती के बारे) किसी भूलेखे में पड़ कर दुखी मत होवो। वह रॅब सारी ख़लकत को पैदा करने वाला है और सारी ख़लकत़ में मौजूद है वह सब जगह भरपूर है। 1। रहाउ। सृजनहार ने एक ही मिट्टी से (भाव। एक जैसे तत्वों से) अनेकों किस्मों के जीव-जन्तु पैदा कर दिए हैं। (जहाँ तक जीवों की अस्लियत का खरे होने का सम्बंध है) ना इन मिट्टी के बर्तनों (भाव। जीवों) में कोई कमी है। और ना (इन बर्तनों के बनाने वाले) कुम्हार में। 2। वह सदा कायम रहने वाला प्रभू सब जीवों में बसता है। जो कुछ जगत में हो रहा है। उसी का किया हुआ हो रहा है। वही मनुष्य रॅब का (प्यारा) बँदा कहा जा सकता है। जो उसकी रज़ा को पहचानता है और उस एक के साथ सांझ डालता है। 3। वह रॅब ऐसा है जिसका मुकम्मल स्वरूप बयान से परे है। उसके गुण कहे नहीं जा सकते। कबीर कहता है- मेरे गुरू ने (प्रभू के गुणों की सूझ रूपी) मीठा गुड़ मुझे दिया है (जिसका स्वाद तो मैं नहीं बता सकता। पर) मैंने उस माया-रहित प्रभू को हर जगह देख लिया है। मुझे इस में कोई शक नहीं रहा (मेरा अंदर किसी जाति अथवा मज़हब के लोगों की उच्चता व नीचता का कर्म नहीं रहा)। 4। 3।
प्रभाती ॥
बेद कतेब कहहु मत झूठे झूठा जो न बिचारै ॥
जउ सभ महि एकु खुदाइ कहत हउ तउ किउ मुरगी मारै ॥1॥
मुलां कहहु निआउ खुदाई ॥
तेरे मन का भरमु न जाई ॥1॥ रहाउ ॥
पकरि जीउ आनिआ देह बिनासी माटी कउ बिसमिलि कीआ ॥
जोति सरूप अनाहत लागी कहु हलालु किआ कीआ ॥2॥
किआ उजू पाकु कीआ मुहु धोइआ किआ मसीति सिरु लाइआ ॥
जउ दिल महि कपटु निवाज गुजारहु किआ हज काबै जाइआ ॥3॥
तूं नापाकु पाकु नही सूझिआ तिस का मरमु न जानिआ ॥
कहि कबीर भिसति ते चूका दोजक सिउ मनु मानिआ ॥4॥4॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती ॥ (हे हिन्दू और मुसलमान भाईयो !) वेदों और कुरान आदि को (एक-दूसरे की) धर्म-पुस्तकों को झूठा ना कहो। झूठा तो वह व्यक्ति है जो इन धर्म-पुस्तकों की विचार नहीं करता। (भला। हे मुल्लां !) अगर आप यह कहता है कि खुदा सब जीवों में मौजूद है तो (उस खुदा के आगे कुर्बानी देने के लिए) मुर्गी क्यों मारता है। (क्या उस मुर्गी में वह ख़ुदा नहीं। मुर्गी में बैठे खुदा के अंश को मार के खुदा के आगे भेट करने का क्या भाव है।)। 1। हे मुल्ला ! आप (और लोगों को तो) खुदा का न्याय सुनाता है। पर आपके अपने मन का भुलेखा अभी दूर ही नहीं हुआ। 1। रहाउ। हे मुल्ला ! (मुर्गी आदि) जीव को पकड़ कर आप ले आया। तूने उसका शरीर नाश कर दिया। उस (के जिस्म) की मिट्टी को तूने खुदा के नाम पर कुर्बान किया (भाव। खुदा की नज़र भेट किया)। पर। हे मुल्ला ! जो खुदा निरा नूर ही नूर है। और जो अविनाशी है उसकी जोति तो हर जगह मौजूद है। (उस मुर्गी में भी है जो आप खुदा के नाम से कुर्बान करता है) तो फिर। बता। तूने रॅब के नाम पर कुर्बानी देने के लायक कौन सी चीज़ बनाई। 2। पैर हाथ आदि साफ़ करने की रस्म का क्या लाभ। मुँह धोने के क्या गुण। मस्जिद में जाकर सजदा करने की क्या जरूरत। और। काबे के हज का क्या फायदा। हे मुल्ला ! अगर आप अपने दिल में कपट रख के नमाज़ पढ़ता है। तो इस नमाज़ का क्या फायदा। 3। हे मुल्ला ! आप अंदर से तो अपवित्र ही रहा। आपको उस पवित्र प्रभू की समझ ही नहीं पड़ी। तूने उसका भेद नहीं पाया। कबीर कहता है- (इस भुलेखे में फसे रह के) आप बहिश्त से चूक गया है। और दोजक आपका नसीब बन गई है। 4। 4।
प्रभाती ॥
सुंन संधिआ तेरी देव देवाकर अधपति आदि समाई ॥
सिध समाधि अंतु नही पाइआ लागि रहे सरनाई ॥1॥
लेहु आरती हैं पुरख निरंजन सतिगुर पूजहु भाई ॥
ठाढा ब्रहमा निगम बीचारै अलखु न लखिआ जाई ॥1॥ रहाउ ॥
ततु तेलु नामु कीआ बाती दीपकु देह उज्यारा ॥
जोति लाइ जगदीस जगाइआ बूझै बूझनहारा ॥2॥
पंचे सबद अनाहद बाजे संगे सारिंगपानी ॥
कबीर दास तेरी आरती कीनी निरंकार निरबानी ॥3॥5॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती ॥ हे देव ! हे उजाले की खान ! हे जगत के मालिक ! हे सबके मूल ! हे सर्व-व्यापक प्रभू ! जोगाभ्यास में निपुन्न जोगियों ने समाधियाँ लगा के भी आपका अंत नहीं पाया वे भी आखिर में आपकी शरण लेते हैं। (आप माया से रहित है। सो) माया के फुरनों से मन को साफ रखना (और आपके चरणों में ही जुड़े रहना) यह आपकी आरती करनी है। 1। हे भाई ! गुरू के बताए हुए राह पर चलो। और उस प्रभू की आरती उतारो जो माया से रहित है और जो सबमें व्यापक है। जिसका कोई खास चक्र-चिन्ह नहीं। जिसके गुण बयान नहीं किए जा सकते और जिसके दर पर खड़ा ब्रहमा वेद विचार रहा है। 1। रहाउ। कोई विरला ज्ञानवान (प्रभू की आरती का भेद) समझता है। (जिसने समझा है उसने) ज्ञान को तेल बनाया है। नाम को बाती और शरीर में (नाम की) रौशनी को ही दीपक बनाया है। यह दीया उसने जगत के मालिक प्रभू की जोति (में जुड़ के) जगाया है। 2। हे सारिंगपाणि ! आप मुझे अंग-संग दिखाई दे रहा है (और मेरे अंदर एक ऐसा आनंद बन रहा है। मानो) पाँच ही किस्मों के साज़ (मेरे अंदर) एक-रस बज रहे हैं। हे वासना-रहित निरंकार ! मैं आपके दास कबीर ने भी आपकी (ऐसी ही) आरती की है 3। 5।
प्रभाती बाणी भगत नामदेव जी की
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मन की बिरथा मनु ही जानै कै बूझल आगै कहीऐ ॥
अंतरजामी रामु रवांई मै डरु कैसे चहीऐ ॥1॥
बेधीअले गोपाल गोुसाई ॥
मेरा प्रभु रविआ सरबे ठाई ॥1॥ रहाउ ॥
मानै हाटु मानै पाटु मानै है पासारी ॥
मानै बासै नाना भेदी भरमतु है संसारी ॥2॥
गुर कै सबदि एहु मनु राता दुबिधा सहजि समाणी ॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती बाणी भगत नामदेव जी की सतिगुर प्रसादि ॥ मन का दुख-कलेश अथवा (दुखिए का) अपना मन जानता है अथवा (अंतरजामी प्रभू जानता है। सो अगर कहना होतो) उस अंतरजामी के आगे ही कहना चाहिए। मुझे तो अब कोई (दुखों का) डर रहा ही नहीं। क्योंकि मैं उस अंतरजामी परमात्मा को सिमर रहा हूँ। 1। मेरे गोपाल गोसाई ने मुझे (अपने) चरणों में भेद लिया है। अब मुझे वह प्यारा प्रभू हर जगह बसता दिखता है। 1। रहाउ। (उस अंतरजामी का मनुष्य के) मन में ही हाट है। मन में ही शहर है। और मन में ही वह हाट चला रहा है। वह अनेक रूपों-रंगों वाला प्रभू (मनुष्य के) मन में ही बसता है। पर संसार से मोह रखने वाला मनुष्य बाहर भटकता फिरता है। 2। जिस मनुष्य का ये मन सतिगुरू के शबद में रंगा गया है। उसकी मेर-तेर अडोल आत्मिक अवस्था में लीन हो गई है। वह सम-दरसी हो जाता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे लोगो ! हे भाई ! (रॅब की हस्ती के बारे) किसी भूलेखे में पड़ कर दुखी मत होवो।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।