सभो हुकमु हुकमु है आपे निरभउ समतु बीचारी ॥3॥ जो जन जानि भजहि पुरखोतमु ता ची अबिगतु बाणी ॥ नामा कहै जगजीवनु पाइआ हिरदै अलख बिडाणी ॥4॥1॥
भगत बेणी जी की वाणी में योग-साधना का गहरा अनुभव झलकता है, नाड़ी और चक्र की भाषा के साथ। उनके बारे में जीवनी-विवरण कम हैं।
हिन्दी अर्थ: वह निडर हो जाता है क्योंकि उसको (हर जगह) प्रभू का ही हुकम बरतता दिखता है। प्रभू स्वयं ही हुकम चला रहा प्रतीत होता है। 3। जो मनुष्य उक्तम पुरख प्रभू को (इस तरह सर्व-व्यापक) जान के सिमरते हैं। उनकी बाणी ही प्रभू का नाम बन जाता है (भाव। वे हर वक्त सिफत्सालाह ही करते हैं)। नामदेव कहता है उन लोगों ने आश्चर्य-जनक अलख और जगत-के-जीवन प्रभू को अपने हृदय में ही पा लिया है। 4। 1।
प्रभाती ॥ आदि जुगादि जुगादि जुगो जुगु ता का अंतु न जानिआ ॥ सरब निरंतरि रामु रहिआ रवि ऐसा रूपु बखानिआ ॥1॥ गोबिदु गाजै सबदु बाजै ॥ आनद रूपी मेरो रामईआ ॥1॥ रहाउ ॥ बावन बीखू बानै बीखे बासु ते सुख लागिला ॥ सरबे आदि परमलादि कासट चंदनु भैइला ॥2॥ तुम॑ चे पारसु हम चे लोहा संगे कंचनु भैइला ॥ तू दइआलु रतनु लालु नामा साचि समाइला ॥3॥2॥
भगत बेणी जी की वाणी में योग-साधना का गहरा अनुभव झलकता है, नाड़ी और चक्र की भाषा के साथ। उनके बारे में जीवनी-विवरण कम हैं।
हिन्दी अर्थ: प्रभाती ॥ (वह सुंदर राम) सारे संसार का मूल है। जुगों के आदि से है। हरेक युग में मौजूद है। उस राम के गुणों का किसी ने अंत नहीं पाया। वह राम सब जीवों में एक-रस व्यापक है- (सब धर्म-पुस्तकों ने) उस राम का कुछ इस तरह का स्वरूप बयान किया है। 1। (इस मनुष्य के हृदय में गुरू का) शबद बाजा बजता है। वहाँ मेरा सुंदर राम। सुख स्वरूप राम। गोबिंद प्रकट हो जाता है। 1। रहाउ। (जैसे) जंगल में चँदन का पौधा होता है। (उसकी) सुगंधि से (सबको) सुख मिलता है। (उसकी संगति से साधारण) वृक्ष चंदन बन जाता है; वैसे ही। वह राम। सब जीवों का मूल राम। (सब गुणों का रूप) सुगन्धियों का मूल है (उसकी संगति में साधारण जीव गुणवान हो जाते हैं)। 2। (हे मेरे सुंदर राम) आप पारस है। मैं लोहा हूँ। आपकी संगति में मैं सोना बन गया हूँ। आप दया का घर है। आप रतन है। आप लाल है। मैं नामा आप सदा स्थिर रहने वाले में लीन हैं गया हूँ। 3। 2।
प्रभाती ॥ अकुल पुरख इकु चलितु उपाइआ ॥ घटि घटि अंतरि ब्रहमु लुकाइआ ॥1॥ जीअ की जोति न जानै कोई ॥ तै मै कीआ सु मालूमु होई ॥1॥ रहाउ ॥ जिउ प्रगासिआ माटी कुंभेउ ॥ आप ही करता बीठुलु देउ ॥2॥ जीअ का बंधनु करमु बिआपै ॥ जो किछु कीआ सु आपै आपै ॥3॥ प्रणवति नामदेउ इहु जीउ चितवै सु लहै ॥ अमरु होइ सद आकुल रहै ॥4॥3॥
भगत बेणी जी की वाणी में योग-साधना का गहरा अनुभव झलकता है, नाड़ी और चक्र की भाषा के साथ। उनके बारे में जीवनी-विवरण कम हैं।
हिन्दी अर्थ: प्रभाती ॥ जिस परमात्मा की कोई खास कुल नहीं है उस सर्व-व्यापक ने ये जगत-रूप एक खेल बना दी है। हरेक शरीर में। हरेक के अंदर उसने अपनी आत्मा गुप्त रख दी है। 1। सारे जीवों में बसती जोति को तो कोई प्राणी जानता नहीं। पर हम सारे जीव जो कुछ करते हैं (हमारे अंदर) उस अंदर-बस-रही-जोति को मालूम हो जाता है। 1। रहाउ। जैसे मिट्टी से घड़ा बन जाता है। (वैसे ही उस परम जोति से सारे जीव बनते हैं। पर) वह बीठलु प्रभू खुद ही सबको पैदा करने वाला है। 2। जीव का किया हुआ काम उसके लिए जंजाल बन जाता है। पर यह जंजाल आदि भी जो कुछ बनाया है प्रभू ने स्वयं ही बनाया है। 3। नामदेव विनती करता है। यह जीव जिस शै के ऊपर अपना मन टिकाता है उसको हासिल कर लेता है (माया-जाल की चितवनी करता है और माया-जाल में फंस जाता है। पर) अगर यह जीव सर्व-व्यापक परमात्मा को अपने मन में टिकाए तो (उस अमर प्रभू में टिक के स्वयं भी) अमर हो जाता है। 4।
प्रभाती भगत बेणी जी की ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ तनि चंदनु मसतकि पाती ॥ रिद अंतरि कर तल काती ॥ ठग दिसटि बगा लिव लागा ॥ देखि बैसनो प्रान मुख भागा ॥1॥ कलि भगवत बंद चिरांमं ॥ क्रूर दिसटि रता निसि बादं ॥1॥ रहाउ ॥ नितप्रति इसनानु सरीरं ॥ दुइ धोती करम मुखि खीरं ॥ रिदै छुरी संधिआनी ॥ पर दरबु हिरन की बानी ॥2॥ सिल पूजसि चक्र गणेसं ॥ निसि जागसि भगति प्रवेसं ॥ पग नाचसि चितु अकरमं ॥ ए लंपट नाच अधरमं ॥3॥ म्रिग आसणु तुलसी माला ॥ कर ऊजल तिलकु कपाला ॥ रिदै कूड़ु कंठि रुद्राखं ॥ रे लंपट क्रिसनु अभाखं ॥4॥ जिनि आतम ततु न चीनि॑आ ॥ सभ फोकट धरम अबीनिआ ॥ कहु बेणी गुरमुखि धिआवै ॥ बिनु सतिगुर बाट न पावै ॥5॥1॥
भगत बेणी जी की वाणी में योग-साधना का गहरा अनुभव झलकता है, नाड़ी और चक्र की भाषा के साथ। उनके बारे में जीवनी-विवरण कम हैं।
हिन्दी अर्थ: प्रभाती भगत बेणी जी की सतिगुर प्रसादि ॥ (हे लंपट !) आप शरीर पर चँदन (का लेप करता है) माथे पर तुलसी का पत्र (लगाता है; पर) आपके दिल में (ऐसा कुछ हैं रहा है जैसे) आपके हाथों में कैंची पकड़ी हुई है; आपकी निगाहें ठॅगों वाली बगुले की तरह तूने समाधि लगाई हुई है। देखने को आप वैष्णव लगता है जैसे आपके मुँह में से साँस निकल गए हैं (भाव। देखने में आप बड़ा ही दयावान लगता है)। 1। (हे विषई मनुष्य ! आप वैसे तो) कलियुगी स्वभाव में प्रवृति है। पर मूर्ति को काफी देर तक नमस्कार करता है। आपकी नजर टेढ़ी है (आपकी निगाह में खोट है)। दिन-रात आप माया के धंधों में रति हुआ रहता है (ऐसे इरादे से। आपका इन मूर्तियों की बँदना किस अर्थ की।)। 1। रहाउ। (हे विषई मनुष्य !) आप हर रोज अपने शरीर को स्नान करवाता है। दो धोतियाँ रखता है। (अन्य) कर्म-काण्ड (भी करता है)। दूधाधारी (बना हुआ) है; पर अपने हृदय में तूने छुरी कस के रखी हुई है। आपको पराया धन ठगने की आदत पड़ी हुई है। 2। (हे लंपट !) आप शिला पूजता है। शरीर पर तूने गणेश देवते के निशान बनाए हुए हैं। रातों में रास (डालने के नाम पर भगती करने के लिए) जागता भी है। वहाँ पैरों से आप नाचता है। पर आपका चित्त बुरे कर्मों में ही मगन रहता है। हे लंपट ! यह नाच कोई धर्म (का काम) नहीं। 3। हे विषयी मनुष्य ! (पूजा पाठ के वक्त) आप हिरन की खाल का आसन (प्रयोग करता है)। तुलसी की माला आपके पास है। साफ हाथों से आप माथे पर तिलक लगाता है। गले में तूने रुद्राक्ष की माला पहनी हुई है। पर आपके हृदय में ठॅगी है। (हे लंपट ! इस तरह) आप हरी को नहीं सिमर रहा है। 4। हे बेणी ! ये बात सच है कि जिस मनुष्य ने आत्मा की अस्लियत को नहीं पहचाना। उस अंधे के सारे धर्म-कर्म फोके हैं। वही मनुष्य सिमरन करता है जो गुरू के सन्मुख होता है। गुरू के बिना जिंदगी का सही राह नहीं मिलता। 5। 1।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह निडर हो जाता है क्योंकि उसको (हर जगह) प्रभू का ही हुकम बरतता दिखता है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।