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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 555 · बिहागड़ा

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अंग
555
बिहागड़ा
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  1. जि तुध नो सालाहे सु सभु किछु पावै जिस नो किरपा निरंजन केरी ॥
  2. कबीरा मरता मरता जगु मुआ मरि भि न जानै कोइ ॥
  3. किआ जाणा किव मरहगे कैसा मरणा होइ ॥
  4. जा आपि क्रिपालु होवै हरि सुआमी ता आपणां नाउ हरि आपि जपावै ॥
  5. रामु रामु करता सभु जगु फिरै रामु न पाइआ जाइ ॥
  6. ए मन इहु धनु नामु है जितु सदा सदा सुखु होइ ॥
  7. आपे सभ घट अंदरे आपे ही बाहरि ॥
  8. हउमै विचि जगतु मुआ मरदो मरदा जाइ ॥

गुरु राम दास जी · बिहागड़ा की वार, पउड़ी · राग बिहागड़ा

जि तुध नो सालाहे सु सभु किछु पावै जिस नो किरपा निरंजन केरी ॥

अंग 554 से चला आ रहा अंश

जि तुध नो सालाहे सु सभु किछु पावै जिस नो किरपा निरंजन केरी ॥
सोई साहु सचा वणजारा जिनि वखरु लदिआ हरि नामु धनु तेरी ॥
सभि तिसै नो सालाहिहु संतहु जिनि दूजे भाव की मारि विडारी ढेरी ॥16॥

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! जो मनुष्य आपकी सिफत सालाह करता है। उसको सब कुछ प्राप्त होता है। क्योंकि उस पर माया-रहित प्रभू की कृपा होती है। हे हरी ! जिसने आपके नाम (रूपी) धन असबाब लादा है वही शाहूकार है और सही मायने में वणजारा व्यापारी है। हे संत जनो ! जिस प्रभू ने माया के मोह का टिॅबा (मन में से) गिरा के निकाल दिया है। आप सभी उसी की सिफत सालाह करें। 16।

भगत कबीर जी · बिहागड़ा की वार, सलोक · राग बिहागड़ा

कबीरा मरता मरता जगु मुआ मरि भि न जानै कोइ ॥

सलोक ॥
कबीरा मरता मरता जगु मुआ मरि भि न जानै कोइ ॥
ऐसी मरनी जो मरै बहुरि न मरना होइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ हे कबीर ! मरता मरता (वैसे तो) सारा संसार ही मर रहा है। पर किसी ने भी (सच्चे) मरने की जाच नहीं सीखी। जो मनुष्य इस तरह की सच्ची मौत मरता है। उसे फिर मरना नहीं पड़ता। 1।

गुरु अमर दास जी · बिहागड़ा की वार, सलोक · राग बिहागड़ा

किआ जाणा किव मरहगे कैसा मरणा होइ ॥

मः 3 ॥
किआ जाणा किव मरहगे कैसा मरणा होइ ॥
जे करि साहिबु मनहु न वीसरै ता सहिला मरणा होइ ॥
मरणै ते जगतु डरै जीविआ लोड़ै सभु कोइ ॥
गुर परसादी जीवतु मरै हुकमै बूझै सोइ ॥
नानक ऐसी मरनी जो मरै ता सद जीवणु होइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3। मुझे तो ये पता नहीं कि (सच्चा) मरना क्या होता है और हमें कैसे मरना चाहिए। अगर मालिक मन से ना विसरे। तो मरना आसान हो जाता है (भाव। मनुष्य आराम से ही माया के प्रभाव से बच जाता है)। मरने से सारा संसार डरता है। हर कोई जीना चाहता है। गुरू की कृपा से जो मनुष्य जीवित ही मरता है। वह हरी की रजा को समझता है। हे नानक ! इस तरह की मौत जो मरता है। (भाव। जो मनुष्य प्रभू की रजा में चलता है) उसे अटल जीवन मिल जाता है। 2।

गुरु राम दास जी · बिहागड़ा की वार, पउड़ी · राग बिहागड़ा

जा आपि क्रिपालु होवै हरि सुआमी ता आपणां नाउ हरि आपि जपावै ॥

पउड़ी ॥
जा आपि क्रिपालु होवै हरि सुआमी ता आपणां नाउ हरि आपि जपावै ॥
आपे सतिगुरु मेलि सुखु देवै आपणां सेवकु आपि हरि भावै ॥
आपणिआ सेवका की आपि पैज रखै आपणिआ भगता की पैरी पावै ॥
धरम राइ है हरि का कीआ हरि जन सेवक नेड़ि न आवै ॥
जो हरि का पिआरा सो सभना का पिआरा होर केती झखि झखि आवै जावै ॥17॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जब हरी स्वामी खुद मेहरबान होता है तो अपना नाम (जीवों से) आप जपाता है। अपना सेवक हरी को प्यारा लगता है। उसको खुद ही सतिगुरू मिल के सुख देता है। प्रभू अपने सेवकों की आप लाज रखता है। (संसार को) अपने भक्तों के चरणों में ला डालता है। (और तो और) धर्म राज जो प्रभू का ही बनाया हुआ है। प्रभू के सेवक के नजदीक नहीं आता। (बात यहाँ पे खत्म होती है कि) जो मनुष्य प्रभू का प्यारा है (भाव। उसे सब लोग प्यार करते हैं); (और बाकी) और बहुत सारी सृष्टि खप-खप के पैदा होती है मरती है। 17।

गुरु अमर दास जी · बिहागड़ा की वार, सलोक · राग बिहागड़ा

रामु रामु करता सभु जगु फिरै रामु न पाइआ जाइ ॥

सलोक मः 3 ॥
रामु रामु करता सभु जगु फिरै रामु न पाइआ जाइ ॥
अगमु अगोचरु अति वडा अतुलु न तुलिआ जाइ ॥
कीमति किनै न पाईआ कितै न लइआ जाइ ॥
गुर कै सबदि भेदिआ इन बिधि वसिआ मनि आइ ॥
नानक आपि अमेउ है गुर किरपा ते रहिआ समाइ ॥
आपे मिलिआ मिलि रहिआ आपे मिलिआ आइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3। सारा संसार (मुँह से) ‘राम राम’ कहता फिरता है पर इस तरह ‘राम’ पाया नहीं जाता; क्योंकि वह अपहुँच है इन्द्रियों की पहुँच से परे है। बहुत बड़ा है अतुल है और तोला नहीं जा सकता। कोई भी उसकी कीमत नहीं लगा सका (भाव। उसकी प्राप्ति का मूल्य किसी को नहीं पता) और किसी जगह से (मूल्य दे के) खरीदा भी नहीं जाता। (पर हाँ। एक तरीका है) अगर गुरू के शबद से (मन) भेदित हो जाए तो इस तरह प्रभू मन में आ बसता है। हे नानक ! प्रभू खुद तो गिनती से परे है। पर सतिगुरू की कृपा से (ये पता मिल जाता है कि वह सारी सृष्टि में) व्यापक है; प्रभू खुद ही हर जगह मिला हुआ है और (जीव के हृदय में) खुद ही आ के प्रगट होता है। 1।

गुरु अमर दास जी · बिहागड़ा की वार, सलोक · राग बिहागड़ा

ए मन इहु धनु नामु है जितु सदा सदा सुखु होइ ॥

मः 3 ॥
ए मन इहु धनु नामु है जितु सदा सदा सुखु होइ ॥
तोटा मूलि न आवई लाहा सद ही होइ ॥
खाधै खरचिऐ तोटि न आवई सदा सदा ओहु देइ ॥
सहसा मूलि न होवई हाणत कदे न होइ ॥
नानक गुरमुखि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥ हे मन ! जिस धन से सदा ही सुख होता है वह धन ‘नाम’ है। इस धन को बिल्कुल घाटा नहीं। सदा लाभ ही लाभ है। खाने से और खर्चने से भी घाटा नहीं पड़ता। (क्योंकि) वह प्रभू सदा ही (ये धन) दिए जाता है। (यहाँ) कभी (इस धन संबंधी) कोई चिंता नहीं होती और (आगे दरगाह में) शर्मिंदगी नहीं उठानी पड़ती। हे नानक! जिस मनुष्य पर प्रभु कृपा-दृष्टि करते हैं, उसे गुरु के सन्मुख होकर यह नाम-धन मिलता है। 2।

गुरु राम दास जी · बिहागड़ा की वार, पउड़ी · राग बिहागड़ा

आपे सभ घट अंदरे आपे ही बाहरि ॥

पउड़ी ॥
आपे सभ घट अंदरे आपे ही बाहरि ॥
आपे गुपतु वरतदा आपे ही जाहरि ॥
जुग छतीह गुबारु करि वरतिआ सुंनाहरि ॥
ओथै वेद पुरान न सासता आपे हरि नरहरि ॥
बैठा ताड़ी लाइ आपि सभ दू ही बाहरि ॥
आपणी मिति आपि जाणदा आपे ही गउहरु ॥18॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ प्रभू खुद ही सारे शरीरों में है और खुद ही सबसे अलग है। खुद ही (सब में) छुपा हुआ है और प्रत्यक्ष (दिखाई दे रहा है)। प्रभू खुद ही कई युग अंधेरा करके शून्य (अफुर) अवस्था में बरतता है; उस शून्य अवस्था के समय जीवों का मालिक प्रभू खुद ही खुद होता है; वेद पुरान शास्त्र आदि कोई भी धर्म पुस्तक तब नहीं होती। (जीवों को रच के) सब से अलग भी समाधि लगा के बैठा हुआ है (भाव। माया की रचना रच के भी इस माया के प्रभाव से स्वयं अलग व निर्लिप है)। प्रभू स्वयं ही (जैसे) गहरा समुंद्र है। वह कितना बड़ा है, ये बात वह स्वयं ही जानता है। 18।

गुरु अमर दास जी · बिहागड़ा की वार, सलोक · राग बिहागड़ा

हउमै विचि जगतु मुआ मरदो मरदा जाइ ॥

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सलोक मः 3 ॥
हउमै विचि जगतु मुआ मरदो मरदा जाइ ॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ संसार अहंकार में मरा पड़ा है। नित्य (नीचे ही नीचे) गरकता ही है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 4: गुरु राम दास जी; भगत कबीर जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 555 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।