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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 547 · बिहागड़ा

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अंग
547
बिहागड़ा
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  1. बिनवंत नानक कर देइ राखहु गोबिंद दीन दइआरा ॥4॥
  2. सुनहु बेनंतीआ सुआमी मेरे राम ॥
  3. बोलि सुधरमीड़िआ मोनि कत धारी राम ॥

बिनवंत नानक कर देइ राखहु गोबिंद दीन दइआरा ॥4॥

अंग 546 से चला आ रहा अंश

बिनवंत नानक कर देइ राखहु गोबिंद दीन दइआरा ॥4॥
सो दिनु सफलु गणिआ हरि प्रभू मिलाइआ राम ॥
सभि सुख परगटिआ दुख दूरि पराइआ राम ॥
सुख सहज अनद बिनोद सद ही गुन गुपाल नित गाईऐ ॥
भजु साधसंगे मिले रंगे बहुड़ि जोनि न धाईऐ ॥
गहि कंठि लाए सहजि सुभाए आदि अंकुरु आइआ ॥
बिनवंत नानक आपि मिलिआ बहुड़ि कतहू न जाइआ ॥5॥4॥7॥

हिन्दी अर्थ: नानक विनती करता है, हे गोविंद ! हे दीनों पर दया करने वाले !अपना हाथ दे के मुझे (माया में डूबने से) बचा ले। 4। हे भाई ! वह दिन भाग्यशाली समझना चाहिए जब हरी-प्रभू (गुरू के) मिलाने से (मिल जाता है)। (हृदय में) सारे सुख प्रगट हो जाते हैं। और। सारे दुख दूर जा पड़ते हैं। हे भाई ! आएँ। जगत-पाल प्रभू के गुण नित्य गाते रहें (सिफत सालाह की बरकति से हृदय में) सदा ही आत्मिक अडोलता के सुख-आनंद बने रहते हैं। खुशियां बनी रहती हैं। हे भाई ! गुरू की संगति में प्रेम से मिल के परमात्मा का भजन किया कर (भजन की बरकति से) दोबारा जोनियों में पड़ना पड़ता। परमात्मा (बाँह से) पकड़ के अपने गले से लगा लेता है। आत्मिक अडोलता में प्रेम में (लीन कर देता है। हृदय में भक्ति का) आदि अंकुर फूट पड़ता है। नानक विनती करता है, (हे भाई ! साध-संगति में मिलने से) प्रभू स्वयं आ मिलता है। फिर (उसका दर छोड़ के) कहीं और भटकने की जरूरत नहीं रह जाती। 5। 4। 7।

सुनहु बेनंतीआ सुआमी मेरे राम ॥

बिहागड़ा महला 5 छंत ॥
सुनहु बेनंतीआ सुआमी मेरे राम ॥
कोटि अप्राध भरे भी तेरे चेरे राम ॥
दुख हरन किरपा करन मोहन कलि कलेसह भंजना ॥
सरनि तेरी रखि लेहु मेरी सरब मै निरंजना ॥
सुनत पेखत संगि सभ कै प्रभ नेरहू ते नेरे ॥
अरदासि नानक सुनि सुआमी रखि लेहु घर के चेरे ॥1॥
तू समरथु सदा हम दीन भेखारी राम ॥
माइआ मोहि मगनु कढि लेहु मुरारी राम ॥
लोभि मोहि बिकारि बाधिओ अनिक दोख कमावने ॥
अलिपत बंधन रहत करता कीआ अपना पावने ॥
करि अनुग्रहु पतित पावन बहु जोनि भ्रमते हारी ॥
बिनवंति नानक दासु हरि का प्रभ जीअ प्रान अधारी ॥2॥
तू समरथु वडा मेरी मति थोरी राम ॥
पालहि अकिरतघना पूरन द्रिसटि तेरी राम ॥
अगाधि बोधि अपार करते मोहि नीचु कछू न जाना ॥
रतनु तिआगि संग्रहन कउडी पसू नीचु इआना ॥
तिआगि चलती महा चंचलि दोख करि करि जोरी ॥
नानक सरनि समरथ सुआमी पैज राखहु मोरी ॥3॥
जा ते वीछुड़िआ तिनि आपि मिलाइआ राम ॥
साधू संगमे हरि गुण गाइआ राम ॥
गुण गाइ गोविद सदा नीके कलिआण मै परगट भए ॥
सेजा सुहावी संगि प्रभ कै आपणे प्रभ करि लए ॥
छोडि चिंत अचिंत होए बहुड़ि दूखु न पाइआ ॥
नानक दरसनु पेखि जीवे गोविंद गुण निधि गाइआ ॥4॥5॥8॥

हिन्दी अर्थ: बिहागड़ा महला 5 छंत ॥ हे मेरे मालिक ! मेरी विनती सुन। (हम जीव) करोड़ों पापों से लिबड़े हुए हैं। पर फिर भी आपके (दर के) दास हैं। हे दुखों का नाश करने वाले ! हे कृपा करने वाले ! हे मोहन ! हे हमारे दुख-कलेश दूर करने वाले ! मैं आपकी शरण आया हूँ। मेरी लाज रख ले। हे सर्व-व्यापक ! हे निर्लिप प्रभू ! हे प्रभू ! आप हमारे अति नजदीक बसते हैं। आप सब जीवों के अंग-संग रहते हैं। आप सब जीवों की अरदासें सुनते हैं। आप सब जीवों के किए काम देखते हैं। हे मेरे स्वामी ! नानक की विनती सुन। मैं आपके घर का गुलाम हूँ। मेरी इज्जत रख ले। 1। हे प्रभू ! आप सब ताकतों के मालिक हैं। हम (आपके दर पर) निमाणे से मंगते हैं। हे मुरारी ! मैं माया के मोह में डूबा रहता हूँ। मुझे (मोह में से) निकाल ले। मैं लोभ में। मोह में। विकार में बँधा रहता हूँ। हे प्रभू ! हम जीव अनेकों पाप कमाते रहते हैं। (हे भाई !) एक करतार ही निर्लिप रहता है। और बँधनों से आजाद है। हम जीव तो अपने किए कर्मों का फल भुगतते रहते हैं। हे विकारियों को पवित्र करने वाले प्रभू ! मेहर कर। अनेकों जूनियों में भटक-भटक के (मेरी आत्मा) थक गई है। (हे भाई !) नानक विनती करता है, नानक उस हरी का उस प्रभू का दास है जो (सब जीवों की) जिंद का प्राणों का आसरा है। 2। हे राम ! आप बड़ी ताकत वाले हैं। मेरी मति तो छोटी सी है (आपके बड़प्पन को समझ नहीं सकती)। हे प्रभू ! आपकी निगाह सदा एक सार है आप अकृतघनों ना-शुक्रों को भी पालते रहते हैं। हे करतार ! हे बेअंत प्रभू ! आप जीवों की समझ से परे व अथाह हैं। मैं नीच जीवन वाला (आपके बारे में) कुछ भी नहीं जान सकता। हे प्रभू ! आपका कीमती नाम छोड़ के मैं कौड़ियां इकट्ठी करता रहता हूँ। मैं पशु-स्वभाव वाला हूँ। नीच हूँ। अंजान हूँ। मैं पाप कर-कर के (उस माया को ही) जोड़ता रहा जो कभी टिक के नहीं बैठती। जो जीवों का साथ छोड़ जाती है। हे नानक ! (कह) हे सब ताकतों के मालिक मेरे स्वामी ! मैं आपकी शरण आया हूँ। मेरी लाज रख ले। 3। गुणों की संगति में आ के (जिस मनुष्य ने) परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाने आरम्भ कर दिए (उस मनुष्य को) उस परमात्मा ने खुद अपने चरणों में जोड़ लिया जिससे (वह चिरों से) विछुड़ा चला आ रहा था। संतों की सभा में सम्मिलित होकर श्रीहरि का गुणगान किया है | परमात्मा की सिफत सालाह के गीत सदा गाने की बरकति से आनंदमयी परमात्मा (हृदय में) प्रकट हो जाता है। (जिस मनुष्य के हृदय में प्रभू प्रकट होता है) प्रभू की संगति से उसकी हृदय-सेज आनंद-भरपूर हो जाती है। प्रभू उसको अपना (सेवक) बना लेता है। वह दुनियावी चिंता-फिक्र त्याग के शांत-चित्त हो जाते हैं। उनको दोबारा कोई दुख छू नहीं सकता। हे नानक ! (कह) जो मनुष्य गुणों के खजाने परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाते हैं वह (अपने अंदर) परमात्मा का दर्शन करके आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं।4। 5। 8।

बोलि सुधरमीड़िआ मोनि कत धारी राम ॥

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बिहागड़ा महला 5 छंत ॥
बोलि सुधरमीड़िआ मोनि कत धारी राम ॥
तू नेत्री देखि चलिआ माइआ बिउहारी राम ॥
संगि तेरै कछु न चालै बिना गोबिंद नामा ॥
देस वेस सुवरन रूपा सगल ऊणे कामा ॥
पुत्र कलत्र न संगि सोभा हसत घोरि विकारी ॥
बिनवंत नानक बिनु साधसंगम सभ मिथिआ संसारी ॥1॥

हिन्दी अर्थ: बिहागड़ा महला 5 छंत ॥ हे (सारी) जूनियों में से (उक्तम फर्ज वाले। धर्म वाले !) परमात्मा के सिफत सालाह के बोल बोला कर। (सिफत सालाह से) आपने क्यूँ चुप धारण की हुई है। अपनी आँखों से (ध्यान से) देख; (निरी) माया का व्यवहार करने वाला (यहाँ से खाली हाथ) चला जाता है। हे भाई ! परमात्मा के नाम के बिना और कोई चीज आपके साथ नहीं जा सकती। देशों (की हकूमतें)।कपड़े सोना। चाँदी (-इनकी खातिर किए हुए) सारे उद्यम व्यर्थ हो जाते हैं। हे भाई ! पुत्र, स्त्री। दुनियावी मान-सम्मान- कुछ भी मनुष्य के साथ नहीं जाता। हाथी घोड़े आदि की लालसाएं भी विकारों की ओर ले जाती हैं। नानक विनती करता है, साध-संगत के बिना दुनिया के सारे उद्यम नाशवान हैं।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 547 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।