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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 546 · बिहागड़ा

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अंग
546
बिहागड़ा
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  1. अमिअ सरोवरो पीउ हरि हरि नामा राम ॥
  2. अन काए रातड़िआ वाट दुहेली राम ॥

अमिअ सरोवरो पीउ हरि हरि नामा राम ॥

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अमिअ सरोवरो पीउ हरि हरि नामा राम ॥
संतह संगि मिलै जपि पूरन कामा राम ॥
सभ काम पूरन दुख बिदीरन हरि निमख मनहु न बीसरै ॥
आनंद अनदिनु सदा साचा सरब गुण जगदीसरै ॥
अगणत ऊच अपार ठाकुर अगम जा को धामा ॥
बिनवंति नानक मेरी इछ पूरन मिले स्रीरंग रामा ॥3॥
कई कोटिक जग फला सुणि गावनहारे राम ॥
हरि हरि नामु जपत कुल सगले तारे राम ॥
हरि नामु जपत सोहंत प्राणी ता की महिमा कित गना ॥
हरि बिसरु नाही प्रान पिआरे चितवंति दरसनु सद मना ॥
सुभ दिवस आए गहि कंठि लाए प्रभ ऊच अगम अपारे ॥
बिनवंति नानक सफलु सभु किछु प्रभ मिले अति पिआरे ॥4॥3॥6॥

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! परमात्मा का नाम आत्मिक जीवन देने वाले जल का पवित्र तालाब है। (इस में से) पीते रहा करो। (पर ये नाम जल) संत-जनों की संगति में रहने से मिलता है। ये हरी-नाम जप के सारे कार्य सफल हो जाते हैं। हे भाई ! जगत के मालिक परमात्मा में सारे ही गुण मौजूद हैं। वह सब जीवों के सारे कारज पूरे करने वाला है। सबके दुख नाश करने वाला है। वह सदा ही कायम रहने वाला है। जिस मनुष्य के मन से वह परमात्मा आँख झपकने जितने समय के लिए भी नहीं बिसरता। वह मनुष्य सदा हर वक्त आत्मिक आनंत भोगता है। हे भाई ! परमात्मा अनगिनत गुणों वाला है। सबसे ऊँचा और। बेअंत है। सबका मालिक है। उसका ठिकाना (सिर्फ अक्ल-समझदारी के सहारे) अपहुँच है। नानक विनती करता है, (हे भाई !) मुझे लक्ष्मी-पति परमात्मा मिल गया है। मेरी (चिरों की) तमन्ना पूरी हो गई है। 3। परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाने वाले मनुष्य परमात्मा का नाम सुन-सुन के कई करोड़ यज्ञों का फल प्राप्त कर लेते हैं। (भाव। करोड़ों किए हुए यज्ञ भी हरी-नाम के मुकाबले में तुच्छ हैं)। परमात्मा का नाम जपते हुए (जपने वाले मनुष्य) अपनी सारी कुलें भी पार लंघा लेते हैं। परमात्मा का नाम जपते-जपते मनुष्य सोहणे जीवन वाले बन जाते हैं। उन (के आत्मिक जीवन) की महिमा कितनी मैं बताऊँ। वे सदा अपने मनों में परमात्मा के दर्शन की तमन्ना रखते हैं (और। अरदासें करते रहते हैं) हे प्राण प्यारे ! (हमारे मन से कभी) ना बिसर ! सबसे ऊँचा अपहुँच और बेअंत प्रभू (जिन भाग्यशालियों को) पकड़ के अपने गले से लगा लेता है उन (की जिंदगी के) भाग्यशाली दिन आ जाते हैं। नानक विनती करता है, (हे भाई !) जिन मनुष्यों को बहुत प्यारा परमात्मा मिल जाता है उन (के जीवन) का हरेक कारज सफल हो जाता है। 4। 3। 6।

अन काए रातड़िआ वाट दुहेली राम ॥

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बिहागड़ा महला 5 छंत ॥
अन काए रातड़िआ वाट दुहेली राम ॥
पाप कमावदिआ तेरा कोइ न बेली राम ॥
कोए न बेली होइ तेरा सदा पछोतावहे ॥
गुन गुपाल न जपहि रसना फिरि कदहु से दिह आवहे ॥
तरवर विछुंने नह पात जुड़ते जम मगि गउनु इकेली ॥
बिनवंत नानक बिनु नाम हरि के सदा फिरत दुहेली ॥1॥
तूं वलवंच लूकि करहि सभ जाणै जाणी राम ॥
लेखा धरम भइआ तिल पीड़े घाणी राम ॥
किरत कमाणे दुख सहु पराणी अनिक जोनि भ्रमाइआ ॥
महा मोहनी संगि राता रतन जनमु गवाइआ ॥
इकसु हरि के नाम बाझहु आन काज सिआणी ॥
बिनवंत नानक लेखु लिखिआ भरमि मोहि लुभाणी ॥2॥
बीचु न कोइ करे अक्रितघणु विछुड़ि पइआ ॥
आए खरे कठिन जमकंकरि पकड़ि लइआ ॥
पकड़े चलाइआ अपणा कमाइआ महा मोहनी रातिआ ॥
गुन गोविंद गुरमुखि न जपिआ तपत थंम॑ गलि लातिआ ॥
काम क्रोधि अहंकारि मूठा खोइ गिआनु पछुतापिआ ॥
बिनवंत नानक संजोगि भूला हरि जापु रसन न जापिआ ॥3॥
तुझ बिनु को नाही प्रभ राखनहारा राम ॥
पतित उधारण हरि बिरदु तुमारा राम ॥
पतित उधारन सरनि सुआमी क्रिपा निधि दइआला ॥
अंध कूप ते उधरु करते सगल घट प्रतिपाला ॥
सरनि तेरी कटि महा बेड़ी इकु नामु देहि अधारा ॥

हिन्दी अर्थ: बिहागड़ा महला 5 छंत ॥ हे तुच्छ पदार्थों (के मोह) में रते हुए मनुष्य ! (इस मोह के कारण) आपका जीवन-पथ दुखों से भरता जा रहा है। हे पाप कमाने वाले ! आपका कोई भी (सदा के लिए) साथी नहीं। (किए पापों की सजा में भागीदारी के लिए) आपका कोई भी साथी नहीं बनेगा। आप सदा हाथ मलते रह जाएँगे। आप अपनी जीभ से सृष्टि के मालिक प्रभू के गुण नहीं जपते। जिंदगी के ये दिन फिर कभी वापिस नहीं आएंगे (जैसे) वृक्षों से बिछुड़े हुए पत्ते (दुबारा पेड़ों से) नहीं जुड़ सकते। (किए पापों के कारण मनुष्य के प्राण) आत्मिक मौत के रास्ते पर अकेले ही चलते जाते हैं। नानक विनती करता है, परमात्मा का नाम सिमरे बिना मनुष्य के प्राण हमेशा दुखों से घिरे हुए भटकते रहते हैं। 1। (हे प्राणी !) आप (लोगों से) छुप-छुप के छल-कपट करते रहते हैं। पर अंतरजामी परमात्मा आपकी हरेक करतूत को जानता है। जब धर्मराज का हिसाब होता है तो (बुरे कर्म करने वाले इस तरह) पीढ़े जाते हैं जैसे तिल (घाणी में) पीढ़ा जाता है। हे प्राणी ! अपने किए कमाए कर्मों के अनुसार आप भी दुख बर्दाश्त करें। (मंद-कर्मी जीव) को अनेकों जूनियों में घुमाया जाता है। जो मनुष्य सदा इस बड़ी मोह लेने वाली माया के साथ ही मस्त रहता है वह श्रेष्ठ मानस जनम गवा लेता है। (हे जीवात्मा !) एक परमात्मा के नाम के बगैर आप अन्य सारे कामों में समझदार (बनी फिरती हैं)। नानक विनती करता है,आपके माथे पर (माया के मोह का ही) लेख लिखा जा रहा है (तभी तो आप) माया की भटकना में माया के मोह में फसी रहती हैं। 2। परमात्मा के किए हुए उपकारों को ना जानने वाला मनुष्य परमात्मा के चरणों से विछुड़ा रहता है (प्रभू से दुबारा मिलने के लिए) कोई (उसका) विचोला नहीं बनता। (उसकी सारी उम्र इसी तमन्ना में निकल जाती है। आखिर) बड़ा निर्दयी जम-दूत उसे आकर पकड़ लेता है। (जम-दूत उसे) पकड़ के आगे लगा लेता है। सारी उम्र खासी तगड़ी (ताकतवर) माया में मस्त रहने के कारण वह अपना किया पाता है। गुरू की शरण पड़ के वह परमात्मा के गुण कभी याद नहीं करता (उसकी सारी उम्र विकारों की तपश में यूँ बीतती है। जैसे) जलते-तपते स्तम्भों के गले से उसे लगाया गया है। काम में। क्रोध में। अहंकार में (फंसे रह के वह) अपना आत्मिक जीवन लुटा बैठता है। आत्मिक जीवन की सूझ गवा के (आखिर) हाथ मलता है। नानक विनती करता है,कामादिक विकारों के संजोग के कारण (सारी उम्र मनुष्य) गलत रास्ते पर पड़ा रहता है। कभी अपनी जीभ से परमात्मा का नाम नहीं जपता। 3। हे प्रभू ! आपके बिना (विकारों की तपश से) बचा सकने वाला और कोई नहीं। विकारों में गिरे हुओं को (विकारों में डूबने से) बचाना आपका बिरद है। हे विकारों में गिरे हुओं को (डूबने से) बचाने वाले ! हे स्वामी ! हे कृपा के खजाने ! हे दया के घर ! हे करतार ! मैं आपकी शरण आया हूँ। हे सारे शरीरों की पालना करने वाले !मुझे (माया के मोह के) अंधे कूएं (में डूबने) से बचा लें। मैं आपकी शरण आया हूँ; मेरी (माया के मोह की) करड़ी बेड़ी काट दें। मुझे अपना नाम-आसरा बख्शें।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 546 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।