राग: Bihaagraa · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
अमिअ सरोवरो पीउ हरि हरि नामा राम ॥ संतह संगि मिलै जपि पूरन कामा राम ॥ सभ काम पूरन दुख बिदीरन हरि निमख मनहु न बीसरै ॥ आनंद अनदिनु सदा साचा सरब गुण जगदीसरै ॥ अगणत ऊच अपार ठाकुर अगम जा को धामा ॥ बिनवंति नानक मेरी इछ पूरन मिले स्रीरंग रामा ॥3॥ कई कोटिक जग फला सुणि गावनहारे राम ॥ हरि हरि नामु जपत कुल सगले तारे राम ॥ हरि नामु जपत सोहंत प्राणी ता की महिमा कित गना ॥ हरि बिसरु नाही प्रान पिआरे चितवंति दरसनु सद मना ॥ सुभ दिवस आए गहि कंठि लाए प्रभ ऊच अगम अपारे ॥ बिनवंति नानक सफलु सभु किछु प्रभ मिले अति पिआरे ॥4॥3॥6॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! परमात्मा का नाम आत्मिक जीवन देने वाले जल का पवित्र तालाब है।(इस में से) पीते रहा करो। (पर ये नाम जल) संत-जनों की संगति में रहने से मिलता है।ये हरी-नाम जप के सारे कार्य सफल हो जाते हैं। हे भाई ! जगत के मालिक परमात्मा में सारे ही गुण मौजूद हैं।वह सब जीवों के सारे कारज पूरे करने वाला है।सबके दुख नाश करने वाला है।वह सदा ही कायम रहने वाला है।जिस मनुष्य के मन से वह परमात्मा आँख झपकने जितने समय के लिए भी नहीं बिसरता। वह मनुष्य सदा हर वक्त आत्मिक आनंत भोगता है।हे भाई ! परमात्मा अनगिनत गुणों वाला है।सबसे ऊँचा और।बेअंत है।सबका मालिक है। उसका ठिकाना (सिर्फ अक्ल-समझदारी के सहारे) अपहुँच है। नानक विनती करता है, (हे भाई !) मुझे लक्ष्मी-पति परमात्मा मिल गया है।मेरी (चिरों की) तमन्ना पूरी हो गई है। 3। परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाने वाले मनुष्य परमात्मा का नाम सुन-सुन के कई करोड़ यज्ञों का फल प्राप्त कर लेते हैं।(भाव।करोड़ों किए हुए यज्ञ भी हरी-नाम के मुकाबले में तुच्छ हैं)। परमात्मा का नाम जपते हुए (जपने वाले मनुष्य) अपनी सारी कुलें भी पार लंघा लेते हैं। परमात्मा का नाम जपते-जपते मनुष्य सोहणे जीवन वाले बन जाते हैं।उन (के आत्मिक जीवन) की महिमा कितनी मैं बताऊँ। वे सदा अपने मनों में परमात्मा के दर्शन की तमन्ना रखते हैं (और।अरदासें करते रहते हैं) हे प्राण प्यारे ! (हमारे मन से कभी) ना बिसर ! सबसे ऊँचा अपहुँच और बेअंत प्रभू (जिन भाग्यशालियों को) पकड़ के अपने गले से लगा लेता है उन (की जिंदगी के) भाग्यशाली दिन आ जाते हैं। नानक विनती करता है, (हे भाई !) जिन मनुष्यों को बहुत प्यारा परमात्मा मिल जाता है उन (के जीवन) का हरेक कारज सफल हो जाता है। 4। 3। 6।
बिहागड़ा महला 5 छंत ॥ अन काए रातड़िआ वाट दुहेली राम ॥ पाप कमावदिआ तेरा कोइ न बेली राम ॥ कोए न बेली होइ तेरा सदा पछोतावहे ॥ गुन गुपाल न जपहि रसना फिरि कदहु से दिह आवहे ॥ तरवर विछुंने नह पात जुड़ते जम मगि गउनु इकेली ॥ बिनवंत नानक बिनु नाम हरि के सदा फिरत दुहेली ॥1॥ तूं वलवंच लूकि करहि सभ जाणै जाणी राम ॥ लेखा धरम भइआ तिल पीड़े घाणी राम ॥ किरत कमाणे दुख सहु पराणी अनिक जोनि भ्रमाइआ ॥ महा मोहनी संगि राता रतन जनमु गवाइआ ॥ इकसु हरि के नाम बाझहु आन काज सिआणी ॥ बिनवंत नानक लेखु लिखिआ भरमि मोहि लुभाणी ॥2॥ बीचु न कोइ करे अक्रितघणु विछुड़ि पइआ ॥ आए खरे कठिन जमकंकरि पकड़ि लइआ ॥ पकड़े चलाइआ अपणा कमाइआ महा मोहनी रातिआ ॥ गुन गोविंद गुरमुखि न जपिआ तपत थंम॑ गलि लातिआ ॥ काम क्रोधि अहंकारि मूठा खोइ गिआनु पछुतापिआ ॥ बिनवंत नानक संजोगि भूला हरि जापु रसन न जापिआ ॥3॥ तुझ बिनु को नाही प्रभ राखनहारा राम ॥ पतित उधारण हरि बिरदु तुमारा राम ॥ पतित उधारन सरनि सुआमी क्रिपा निधि दइआला ॥ अंध कूप ते उधरु करते सगल घट प्रतिपाला ॥ सरनि तेरी कटि महा बेड़ी इकु नामु देहि अधारा ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: बिहागड़ा महला 5 छंत ॥ हे तुच्छ पदार्थों (के मोह) में रते हुए मनुष्य ! (इस मोह के कारण) आपका जीवन-पथ दुखों से भरता जा रहा है। हे पाप कमाने वाले ! आपका कोई भी (सदा के लिए) साथी नहीं। (किए पापों की सजा में भागीदारी के लिए) आपका कोई भी साथी नहीं बनेगा। आप सदा हाथ मलता रह जाएगा। आप अपनी जीभ से सुष्टि के मालिक प्रभू के गुण नहीं जपता।जिंदगी के ये दिन फिर कभी वापिस नहीं आएंगे (जैसे) वृक्षों से बिछुड़े हुए पत्ते (दुबारा पेड़ों से) नहीं जुड़ सकते।(किए पापों के कारण मनुष्य के प्राण) आत्मिक मौत के रास्ते पर अकेले ही चलते जाते हैं। नानक विनती करता है, परमात्मा का नाम सिमरे बिना मनुष्य के प्राण हमेशा दुखों से घिरे हुए भटकते रहते हैं। 1। (हे प्राणी !) आप (लोगों से) छुप-छुप के छल-कपट करता रहता है।पर अंतजामी परमात्मा आपकी हरेक करतूत को जानता है। जब धर्मराज का हिसाब होता है तो (बुरे कर्म करने वाले इस तरह) पीढ़े जाते हैं जैसे तिल (घाणी में) पीढ़ा जाता है। हे प्राणी ! अपने किए कमाए कर्मों के अनुसार आप भी दुख बर्दाश्त कर।(मंद-कर्मी जीव) को अनेकों जूनियों में घुमाया जाता है। जो मनुष्य सदा इस बड़ी मोह लेने वाली माया के साथ ही मस्त रहता है वह श्रेष्ठ मानस जनम गवा लेता है। (हे जीवात्मा !) एक परमात्मा के नाम के बगैर आप अन्य सारे कामों में समझदार (बनी फिरती है।) नानक विनती करता है,आपके माथे पर माया के मोह का ही) लेख लिखा जा रहा है (तभी तो आप) माया की भटकना में माया के मोह में फसी रहती है। 2। परमात्मा के किए हुए उपकारों को ना जानने वाला मनुष्य परमात्मा के चरणों से विछुड़ा रहता है (प्रभू से दुबारा मिलने के लिए) कोई (उसका) विचोला नहीं बनता। (उसकी सारी उम्र इसी तमन्ना में निकल जाती है।आखिर) बड़ा निर्दयी जम-दूत उसे आकर पकड़ लेता है। (जम-दूत उसे) पकड़ के आगे लगा लेता है।सारी उम्र खासी तगड़ी (ताकतवर) माया में मस्त रहने के कारण वह अपना किया पाता है। गुरू की शरण पड़ के वह परमात्मा के गुण कभी याद नहीं करता (उसकी सारी उम्र विकारों की तपश में यूँ बीतती है।जैसे) जलते-तपते स्तम्भों के गले से उसे लगाया गया है। काम में।क्रोध में।अहंकार में (फंसे रह के वह) अपना आत्मि्क जीवन लुटा बैठता है।आत्मिक जीवन की सूझ गवा के (आखिर) हाथ मलता है नानक विनती करता है,कामादिक विकारों के संजोग के कारण (सारी उम्र मनुष्य) गलत रास्ते पर पड़ा रहता है।कभी अपनी जीभ से परमात्मा का नाम नहीं जपता। 3। हे प्रभू ! आपके बिना (विकारों की तपश से) बचा सकने वाला और कोई नहीं। विकारों में गिरे हुओं को (विकारों में डूबने से) बचाना आपका बिरद है। हे विकारों में गिरे हुओं को (डूबने से) बचाने वाले ! हे स्वामी ! हे कृपा के खजाने ! हे दया के घर ! हे करतार ! मैं आपकी शरण आया हूँ। हे सारे शरीरों की पालना करने वाले !मुझे (माया के मोह के) अंधे कूएं (में डूबने) से बचा ले। मैं आपकी शरण आया हूँ; मेरी (माया के मोह की) करड़ी बेड़ी काट दे।मुझे अपना नाम-आसरा बख्श।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! परमात्मा का नाम आत्मिक जीवन देने वाले जल का पवित्र तालाब है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।