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अंग 548

अंग
548
राग Bihaagraa
राग: Bihaagraa · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
राजन किउ सोइआ तू नीद भरे जागत कत नाही राम ॥
माइआ झूठु रुदनु केते बिललाही राम ॥
बिललाहि केते महा मोहन बिनु नाम हरि के सुखु नही ॥
सहस सिआणप उपाव थाके जह भावत तह जाही ॥
आदि अंते मधि पूरन सरबत्र घटि घटि आही ॥
बिनवंत नानक जिन साधसंगमु से पति सेती घरि जाही ॥2॥
नरपति जाणि ग्रहिओ सेवक सिआणे राम ॥
सरपर वीछुड़णा मोहे पछुताणे राम ॥
हरिचंदउरी देखि भूला कहा असथिति पाईऐ ॥
बिनु नाम हरि के आन रचना अहिला जनमु गवाईऐ ॥
हउ हउ करत न त्रिसन बूझै नह कांम पूरन गिआने ॥
बिनवंति नानक बिनु नाम हरि के केतिआ पछुताने ॥3॥
धारि अनुग्रहो अपना करि लीना राम ॥
भुजा गहि काढि लीओ साधू संगु दीना राम ॥
साधसंगमि हरि अराधे सगल कलमल दुख जले ॥
महा धरम सुदान किरिआ संगि तेरै से चले ॥
रसना अराधै एकु सुआमी हरि नामि मनु तनु भीना ॥
नानक जिस नो हरि मिलाए सो सरब गुण परबीना ॥4॥6॥9॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे धरती के सरदार।मनुष्य ! आप क्यूँ माया के मोह की गाढ़ी नींद में सो रहा है।आप क्यों सचेत नहीं होता। इस माया की खातिर अनेकों ही मनुष्य झूठा रोना-धोना करते आ रहे हैं।विलकते आ रहे हैं। बेअंत प्राणी इस खासी मन-मोहनी माया की खातिर तरले लेते आ रहे हैं (कि माया मिले और माया से सुख मिले।पर) परमात्मा के नाम के बिना सुख (किसी को) नहीं मिला। जीव हजारों चतुराईयाँ हजारों वसीले करते थक जाते हैं (माया के मोह में से खलासी भी नहीं होती।हो भी कैसे।) जिधर परमात्मा की मर्जी होती है उधर ही जीव जा सकते हैं। वह परमात्मा सदा के लिए ही सर्व-व्यापक है।हर जगह मौजूद है।हरेक शरीर में है। नानक विनती करता है, जिन मनुष्यों को गुरू का मिलाप प्राप्त होता है वह (यहाँ से) इज्जत से परमात्मा की हजूरी में जाते हैं। 2। (अगर कोई मनुष्य) राजा (बन जाता है।तो वह) अपने सेवकों को (अपने) जान के (राज के मोह में) फस जाता है। (पर दुनिया के सारे पदार्थों से) जरूर विछुड़ जाना है।(जो मनुष्य दुनियावी मोह में) फंसते हैं।वह आखिर हाथ मलते रह जाते हैं। मनुष्य आकाश के काल्पनिक शहर हरीचंदौरी जैसे जगत को देख के गलत राह पर पड़ जाता है।पर यहाँ कहीं भी सदा का ठिकाना नहीं मिल सकता। परमात्मा के नाम से टूट के।जगत-रचना के और ही पदार्थों में फंस के श्रेष्ठ मानस जन्म को गवा लेता है। “मैं (बड़ा बन जाऊँ)।मैं (बड़ा बन जाऊँ)” – ये करते करते माया की तृष्णा खत्म नहीं होती।मानस जन्म का उद्देश्य हासिल नहीं हो सकता।आत्मिक जीवन की समझ नहीं पड़ती। नानक विनती करता है, परमात्मा के नाम से टूट के अनेकों जीव हाथ मलते जाते हैं। 3। (हे भाई ! जिस मनुष्य को) परमात्मा दया करके अपना बना लेता है उसको गुरू का मिलाप बख्शता है। उसे बाँह से पकड़ के (मोह के कूँए में से) निकाल लेता है। जो मनुष्य गुरू की संगत में टिक के परमात्मा का नाम सिमरता रहता है उसके सारे पाप सारे दुख जल जाते हैं। हे भाई ! सबसे बड़ा धर्म नाम जपने का धर्म।और सबसे बड़ा दान- नाम दान – यही काम (जगत से) आपके साथ जा सकते हैं। हे नानक ! (कह) जो मनुष्य अपनी जीभ से एक मालिक प्रभू की आराधना करता रहता है उसका मन उसका हृदय परमात्मा के नाम-जल में तरो-तर हुआ रहता है। जिस मनुष्य को परमात्मा अपने चरणों में जोड़ लेता है वह सारे गुणों में प्रवीण हो जाता है। 4। 6। 9।
बिहागड़े की वार महला 4
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक मः 3 ॥
गुर सेवा ते सुखु पाईऐ होर थै सुखु न भालि ॥
गुर कै सबदि मनु भेदीऐ सदा वसै हरि नालि ॥
नानक नामु तिना कउ मिलै जिन हरि वेखै नदरि निहालि ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: बिहागड़े की वार महला 4 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्लोक महला 3 ॥ (हे जीव !) सुख सतिगुरू की सेवा से (ही) मिलता है किसी और जगह सुख ना ढूँढ। (क्योंकि) सतिगुरू के शबद में (जब) मन को परो दें (तब ये समझ आ जाता है कि सुख-दाता) हरी सदा अंग-संग बसता है। हे नानक ! (हरी का सुखदाई) नाम उन्हें मिलता है।जिनको मेहर की नजर से देखता है। 1।
मः 3 ॥
सिफति खजाना बखस है जिसु बखसै सो खरचै खाइ ॥
सतिगुर बिनु हथि न आवई सभ थके करम कमाइ ॥
नानक मनमुखु जगतु धनहीणु है अगै भुखा कि खाइ ॥2॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥ हरी की सिफत-सलाह (रूपी) खजाना (हरी की) कृपा है (भाव।बख्शिश से ही मिलता है)।जिसको बख्शता है वह स्वयं खाता है (भाव।सिफत सालाह का आनंद लेता है) और खर्चता है (अर्थात।औरों को भी सिफत करनी सिखाता है)।(पर। ये कृपा) सतिगुरू के बिना मिलती नहीं।(सतिगुरू की ओट छोड़ के और) कर्म बहुत सारे लोक करके थक गए हैं (पर ये दाति नहीं मिली)। हे नानक ! मन के अधीन (और सतिगुरू को भूला) हुआ संसार (यहाँ इस सिफत-रूप) धन से वंचित है।भूखा आगे क्या खाएगा।(भाव।जो मनुष्य अब मानस जन्म में नाम नहीं जपते।वे इस जन्म को गवा के क्या जपेंगे।)। 2।
पउड़ी ॥
सभ तेरी तू सभस दा सभ तुधु उपाइआ ॥
सभना विचि तू वरतदा तू सभनी धिआइआ ॥
तिस दी तू भगति थाइ पाइहि जो तुधु मनि भाइआ ॥
जो हरि प्रभ भावै सो थीऐ सभि करनि तेरा कराइआ ॥
सलाहिहु हरि सभना ते वडा जो संत जनां की पैज रखदा आइआ ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे प्रभू ! सारी सृष्टि आपकी है।आप सबका मालिक है।सबको तूने ही पैदा किया है। सारे (जीवों) में आप ही व्यापक है।और सब आपका सिमरन करते हैं। जो मनुष्य आपको प्यारा लगता है।आप उसकी भक्ति कबूल करता है। हे हरी प्रभू ! जो आपको ठीक लगता है सो (संसार में) होता है।सारे जीव आपका किया करते हैं। (हे भाई !) जो हरी (आदि से) भक्तों की लाज रखता आया है और सबसे बड़ा है।उसकी सिफत सालाह करो। 1।
सलोक मः 3 ॥
नानक गिआनी जगु जीता जगि जीता सभु कोइ ॥
नामे कारज सिधि है सहजे होइ सु होइ ॥
गुरमति मति अचलु है चलाइ न सकै कोइ ॥
भगता का हरि अंगीकारु करे कारजु सुहावा होइ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ हे नानक ! ज्ञानवान मनुष्य ने संसार को (भाव।माया के मोह को) जीत लिया है।(और ज्ञानी के बिना) हरेक मनुष्य को संसार ने जीता है। (ज्ञानी के) करने वाले काम (भाव।मानस जन्म को सवाँरने) में कामयाबी नाम जपने से होती है उसे ऐसा प्रतीत होता है कि जो कुछ हो रहा है।प्रभू की रजा में हो रहा है। सतिगुरू की मति पर चलने से (ज्ञानी मनुष्य की) मति पक्की हो जाती है।कोई (मायावी व्यावहार) उसको थिड़का नहीं सकता (उसका निष्चय बन जाता है कि) – प्रभू भक्तों का साथ निभाता है (और उनके हरेक) काम रास आ जाते हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।