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548
बिहागड़ा
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राजन किउ सोइआ तू नीद भरे जागत कत नाही राम ॥
राजन किउ सोइआ तू नीद भरे जागत कत नाही राम ॥
माइआ झूठु रुदनु केते बिललाही राम ॥
बिललाहि केते महा मोहन बिनु नाम हरि के सुखु नही ॥
सहस सिआणप उपाव थाके जह भावत तह जाही ॥
आदि अंते मधि पूरन सरबत्र घटि घटि आही ॥
बिनवंत नानक जिन साधसंगमु से पति सेती घरि जाही ॥2॥
नरपति जाणि ग्रहिओ सेवक सिआणे राम ॥
सरपर वीछुड़णा मोहे पछुताणे राम ॥
हरिचंदउरी देखि भूला कहा असथिति पाईऐ ॥
बिनु नाम हरि के आन रचना अहिला जनमु गवाईऐ ॥
हउ हउ करत न त्रिसन बूझै नह कांम पूरन गिआने ॥
बिनवंति नानक बिनु नाम हरि के केतिआ पछुताने ॥3॥
धारि अनुग्रहो अपना करि लीना राम ॥
भुजा गहि काढि लीओ साधू संगु दीना राम ॥
साधसंगमि हरि अराधे सगल कलमल दुख जले ॥
महा धरम सुदान किरिआ संगि तेरै से चले ॥
रसना अराधै एकु सुआमी हरि नामि मनु तनु भीना ॥
नानक जिस नो हरि मिलाए सो सरब गुण परबीना ॥4॥6॥9॥
माइआ झूठु रुदनु केते बिललाही राम ॥
बिललाहि केते महा मोहन बिनु नाम हरि के सुखु नही ॥
सहस सिआणप उपाव थाके जह भावत तह जाही ॥
आदि अंते मधि पूरन सरबत्र घटि घटि आही ॥
बिनवंत नानक जिन साधसंगमु से पति सेती घरि जाही ॥2॥
नरपति जाणि ग्रहिओ सेवक सिआणे राम ॥
सरपर वीछुड़णा मोहे पछुताणे राम ॥
हरिचंदउरी देखि भूला कहा असथिति पाईऐ ॥
बिनु नाम हरि के आन रचना अहिला जनमु गवाईऐ ॥
हउ हउ करत न त्रिसन बूझै नह कांम पूरन गिआने ॥
बिनवंति नानक बिनु नाम हरि के केतिआ पछुताने ॥3॥
धारि अनुग्रहो अपना करि लीना राम ॥
भुजा गहि काढि लीओ साधू संगु दीना राम ॥
साधसंगमि हरि अराधे सगल कलमल दुख जले ॥
महा धरम सुदान किरिआ संगि तेरै से चले ॥
रसना अराधै एकु सुआमी हरि नामि मनु तनु भीना ॥
नानक जिस नो हरि मिलाए सो सरब गुण परबीना ॥4॥6॥9॥
हिन्दी अर्थ: हे धरती के सरदार। मनुष्य ! आप क्यूँ माया के मोह की गाढ़ी नींद में सो रहे हैं। आप क्यों सचेत नहीं होते। इस माया की खातिर अनेकों ही मनुष्य झूठा रोना-धोना करते आ रहे हैं। विलकते आ रहे हैं। बेअंत प्राणी इस खासी मन-मोहनी माया की खातिर तरले लेते आ रहे हैं (कि माया मिले और माया से सुख मिले। पर) परमात्मा के नाम के बिना सुख (किसी को) नहीं मिला। जीव हजारों चतुराईयाँ हजारों वसीले करते थक जाते हैं (माया के मोह में से खलासी भी नहीं होती। हो भी कैसे।) जिधर परमात्मा की मर्जी होती है उधर ही जीव जा सकते हैं। वह परमात्मा सदा के लिए ही सर्व-व्यापक है। हर जगह मौजूद है। हरेक शरीर में है। नानक विनती करता है, जिन मनुष्यों को गुरू का मिलाप प्राप्त होता है वह (यहाँ से) इज्जत से परमात्मा की हजूरी में जाते हैं। 2। (अगर कोई मनुष्य) राजा (बन जाता है। तो वह) अपने सेवकों को (अपने) जान के (राज के मोह में) फस जाता है। (पर दुनिया के सारे पदार्थों से) जरूर विछुड़ जाना है। (जो मनुष्य दुनियावी मोह में) फंसते हैं। वह आखिर हाथ मलते रह जाते हैं। मनुष्य आकाश के काल्पनिक शहर हरीचंदौरी जैसे जगत को देख के गलत राह पर पड़ जाता है। पर यहाँ कहीं भी सदा का ठिकाना नहीं मिल सकता। परमात्मा के नाम से टूट के। जगत-रचना के और ही पदार्थों में फंस के श्रेष्ठ मानस जन्म को गवा लेता है। “मैं (बड़ा बन जाऊँ)।मैं (बड़ा बन जाऊँ)” - ये करते करते माया की तृष्णा खत्म नहीं होती। मानस जन्म का उद्देश्य हासिल नहीं हो सकता। आत्मिक जीवन की समझ नहीं पड़ती। नानक विनती करता है, परमात्मा के नाम से टूट के अनेकों जीव हाथ मलते जाते हैं। 3। (हे भाई ! जिस मनुष्य को) परमात्मा दया करके अपना बना लेता है उसको गुरू का मिलाप बख्शता है। उसे बाँह से पकड़ के (मोह के कूँए में से) निकाल लेता है। जो मनुष्य गुरू की संगत में टिक के परमात्मा का नाम सिमरता रहता है उसके सारे पाप सारे दुख जल जाते हैं। हे भाई ! सबसे बड़ा धर्म नाम जपने का धर्म। और सबसे बड़ा दान- नाम दान - यही काम (जगत से) आपके साथ जा सकते हैं। हे नानक ! (कह) जो मनुष्य अपनी जीभ से एक मालिक प्रभू की आराधना करता रहता है उसका मन उसका हृदय परमात्मा के नाम-जल में तरो-तर हुआ रहता है। जिस मनुष्य को परमात्मा अपने चरणों में जोड़ लेता है वह सारे गुणों में प्रवीण हो जाता है। 4। 6। 9।
गुर सेवा ते सुखु पाईऐ होर थै सुखु न भालि ॥
बिहागड़े की वार महला 4
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक मः 3 ॥
गुर सेवा ते सुखु पाईऐ होर थै सुखु न भालि ॥
गुर कै सबदि मनु भेदीऐ सदा वसै हरि नालि ॥
नानक नामु तिना कउ मिलै जिन हरि वेखै नदरि निहालि ॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक मः 3 ॥
गुर सेवा ते सुखु पाईऐ होर थै सुखु न भालि ॥
गुर कै सबदि मनु भेदीऐ सदा वसै हरि नालि ॥
नानक नामु तिना कउ मिलै जिन हरि वेखै नदरि निहालि ॥1॥
हिन्दी अर्थ: बिहागड़े की वार महला 4 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्लोक महला 3 ॥ (हे जीव !) सुख सतिगुरू की सेवा से (ही) मिलता है किसी और जगह सुख ना ढूँढ। (क्योंकि) सतिगुरू के शबद में (जब) मन को परो दें (तब ये समझ आ जाता है कि सुख-दाता) हरी सदा अंग-संग बसता है। हे नानक ! (हरी का सुखदाई) नाम उन्हें मिलता है। जिनको मेहर की नजर से देखता है। 1।
सिफति खजाना बखस है जिसु बखसै सो खरचै खाइ ॥
मः 3 ॥
सिफति खजाना बखस है जिसु बखसै सो खरचै खाइ ॥
सतिगुर बिनु हथि न आवई सभ थके करम कमाइ ॥
नानक मनमुखु जगतु धनहीणु है अगै भुखा कि खाइ ॥2॥
सिफति खजाना बखस है जिसु बखसै सो खरचै खाइ ॥
सतिगुर बिनु हथि न आवई सभ थके करम कमाइ ॥
नानक मनमुखु जगतु धनहीणु है अगै भुखा कि खाइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 3 ॥ हरी की सिफत-सलाह (रूपी) खजाना (हरी की) कृपा है (भाव। बख्शिश से ही मिलता है)।जिसको बख्शता है वह स्वयं खाता है (भाव। सिफत सालाह का आनंद लेता है) और खर्चता है (अर्थात। औरों को भी सिफत करनी सिखाता है)। (पर। ये कृपा) सतिगुरू के बिना मिलती नहीं। (सतिगुरू की ओट छोड़ के और) कर्म बहुत सारे लोक करके थक गए हैं (पर ये दाति नहीं मिली)। हे नानक ! मन के अधीन (और सतिगुरू को भूला) हुआ संसार (यहाँ इस सिफत-रूप) धन से वंचित है। भूखा आगे क्या खाएगा। (भाव। जो मनुष्य अब मानस जन्म में नाम नहीं जपते। वे इस जन्म को गवा के क्या जपेंगे।)। 2।
सभ तेरी तू सभस दा सभ तुधु उपाइआ ॥
पउड़ी ॥
सभ तेरी तू सभस दा सभ तुधु उपाइआ ॥
सभना विचि तू वरतदा तू सभनी धिआइआ ॥
तिस दी तू भगति थाइ पाइहि जो तुधु मनि भाइआ ॥
जो हरि प्रभ भावै सो थीऐ सभि करनि तेरा कराइआ ॥
सलाहिहु हरि सभना ते वडा जो संत जनां की पैज रखदा आइआ ॥1॥
सभ तेरी तू सभस दा सभ तुधु उपाइआ ॥
सभना विचि तू वरतदा तू सभनी धिआइआ ॥
तिस दी तू भगति थाइ पाइहि जो तुधु मनि भाइआ ॥
जो हरि प्रभ भावै सो थीऐ सभि करनि तेरा कराइआ ॥
सलाहिहु हरि सभना ते वडा जो संत जनां की पैज रखदा आइआ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ हे प्रभू ! सारी सृष्टि आपकी है। आप सबके मालिक हैं। सबको आपने ही पैदा किया है। सारे (जीवों) में आप ही व्यापक हैं। और सब आपका सिमरन करते हैं। जो मनुष्य आपको प्यारा लगता है। आप उसकी भक्ति कबूल करते हैं। हे हरी प्रभू ! जो आपको ठीक लगता है सो (संसार में) होता है। सारे जीव आपका किया करते हैं। (हे भाई !) जो हरी (आदि से) भक्तों की लाज रखता आया है और सबसे बड़ा है। उसकी सिफत सालाह करो। 1।
नानक गिआनी जगु जीता जगि जीता सभु कोइ ॥
सलोक मः 3 ॥
नानक गिआनी जगु जीता जगि जीता सभु कोइ ॥
नामे कारज सिधि है सहजे होइ सु होइ ॥
गुरमति मति अचलु है चलाइ न सकै कोइ ॥
भगता का हरि अंगीकारु करे कारजु सुहावा होइ ॥
नानक गिआनी जगु जीता जगि जीता सभु कोइ ॥
नामे कारज सिधि है सहजे होइ सु होइ ॥
गुरमति मति अचलु है चलाइ न सकै कोइ ॥
भगता का हरि अंगीकारु करे कारजु सुहावा होइ ॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3 ॥ हे नानक ! ज्ञानवान मनुष्य ने संसार को (भाव। माया के मोह को) जीत लिया है। (और ज्ञानी के बिना) हरेक मनुष्य को संसार ने जीता है। (ज्ञानी के) करने वाले काम (भाव। मानस जन्म को सवाँरने) में कामयाबी नाम जपने से होती है उसे ऐसा प्रतीत होता है कि जो कुछ हो रहा है। प्रभू की रजा में हो रहा है। सतिगुरू की मति पर चलने से (ज्ञानी मनुष्य की) मति पक्की हो जाती है। कोई (मायावी व्यावहार) उसको थिड़का नहीं सकता (उसका निष्चय बन जाता है कि) - प्रभू भक्तों का साथ निभाता है (और उनके हरेक) काम रास आ जाते हैं।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 4: गुरु राम दास जी; महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 548 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।