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- जिमी वसंदी पाणीऐ ईधणु रखै भाहि ॥
- तेरे कीते कंम तुधै ही गोचरे ॥
- कड़छीआ फिरंनि॑ सुआउ न जाणनि॑ सुञीआ ॥
- खोजी लधमु खोजु छडीआ उजाड़ि ॥
- आराधिहु सचा सोइ सभु किछु जिसु पासि ॥
- लधमु लभणहारु करमु करंदो मा पिरी ॥
- पापड़िआ पछाड़ि बाणु सचावा संनि॑ कै ॥
- वाहु वाहु सिरजणहार पाईअनु ठाढि आपि ॥
- जा कउ भए क्रिपाल प्रभ हरि हरि सेई जपात ॥
- रामु रमहु बडभागीहो जलि थलि महीअलि सोइ ॥
- भगता का बोलिआ परवाणु है दरगह पवै थाइ ॥
जिमी वसंदी पाणीऐ ईधणु रखै भाहि ॥
मः 5 ॥
जिमी वसंदी पाणीऐ ईधणु रखै भाहि ॥
नानक सो सहु आहि जा कै आढलि हभु को ॥2॥
जिमी वसंदी पाणीऐ ईधणु रखै भाहि ॥
नानक सो सहु आहि जा कै आढलि हभु को ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! (जैसे) धरती पानी में (अडोल) बसती है और पानी को आसरा भी देती है। (जैसे) लकड़ी (अपने अंदर) आग (छुपा के) रखती है। (वैसे) वह पति (प्रभू) जिस के आसरे हरेक जीव है। (इस सारे जगत में अडोल छुपा हुआ) है। 2।
तेरे कीते कंम तुधै ही गोचरे ॥
पउड़ी ॥
तेरे कीते कंम तुधै ही गोचरे ॥
सोई वरतै जगि जि कीआ तुधु धुरे ॥
बिसमु भए बिसमाद देखि कुदरति तेरीआ ॥
सरणि परे तेरी दास करि गति होइ मेरीआ ॥
तेरै हथि निधानु भावै तिसु देहि ॥
जिस नो होइ दइआलु हरि नामु सेइ लेहि ॥
अगम अगोचर बेअंत अंतु न पाईऐ ॥
जिस नो होहि क्रिपालु सु नामु धिआईऐ ॥11॥
तेरे कीते कंम तुधै ही गोचरे ॥
सोई वरतै जगि जि कीआ तुधु धुरे ॥
बिसमु भए बिसमाद देखि कुदरति तेरीआ ॥
सरणि परे तेरी दास करि गति होइ मेरीआ ॥
तेरै हथि निधानु भावै तिसु देहि ॥
जिस नो होइ दइआलु हरि नामु सेइ लेहि ॥
अगम अगोचर बेअंत अंतु न पाईऐ ॥
जिस नो होहि क्रिपालु सु नामु धिआईऐ ॥11॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे प्रभू !) जो जो काम आपने किए हैं यह आप ही कर सकते हैं। जगत में वही कुछ हो रहा है जो करने के वास्ते आपने धुर से हुकम कर दिया है। आपकी कुदरति देख-देख के हम हैरान हो रहे हैं। (आपके) दास आसरा लेते हैं (मैं भी आपकी शरण आया हूँ। हे प्रभू ! मेहर) कर। मेरी भी आत्मिक अवस्था ऊँची हो जाए। (आपके नाम का) खजाना आपके (अपने) हाथ में है। अगर आपको अच्छा लगे उसे आप (ये खजाना) देते हैं। जिस जिस को दयाल हो के हरी-नाम (देता है) वही जीव आपका नाम-खजाना प्राप्त करते हैं। हे अपहुँच ! हे अगोचर ! हे बेअंत प्रभू ! आपका अंत नहीं पाया जा सकता। आप जिस मनुष्य पर प्रसन्न होते हैं वह आपका नाम सिमरता है। 11।
कड़छीआ फिरंनि॑ सुआउ न जाणनि॑ सुञीआ ॥
सलोक मः 5 ॥
कड़छीआ फिरंनि॑ सुआउ न जाणनि॑ सुञीआ ॥
सेई मुख दिसंनि॑ नानक रते प्रेम रसि ॥1॥
कड़छीआ फिरंनि॑ सुआउ न जाणनि॑ सुञीआ ॥
सेई मुख दिसंनि॑ नानक रते प्रेम रसि ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे नानक ! कड़छीआं (दाल-भाजी के बर्तनों में) फिरती हैं (पर वह उस दाल-भाजी) का स्वाद नहीं जानतीं (क्योंकि वे) खाली (ही रहती) हें। (इस तरह) वह मुंह (सुंदर) दिखते हैं जो प्रेम के स्वाद में रंगे गए हैं (सिर्फ बातें करने वाले मुँह कड़छियों की तरह ही हैं)। 1।
खोजी लधमु खोजु छडीआ उजाड़ि ॥
मः 5 ॥
खोजी लधमु खोजु छडीआ उजाड़ि ॥
तै सहि दिती वाड़ि नानक खेतु न छिजई ॥2॥
खोजी लधमु खोजु छडीआ उजाड़ि ॥
तै सहि दिती वाड़ि नानक खेतु न छिजई ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (जिन कामादिकों ने मेरी खेती) उजाड़ दी थी उनका खोज मैंने खोज निकालने वाले (गुरू) के द्वारा ढूँढ लिया है। हे पति-प्रभु ! आपने मेरी खेती को (गुरू की सहायता की) वाड़ दे दी है। अब नानक की खेती नहीं उजड़ती। 2।
आराधिहु सचा सोइ सभु किछु जिसु पासि ॥
पउड़ी ॥
आराधिहु सचा सोइ सभु किछु जिसु पासि ॥
दुहा सिरिआ खसमु आपि खिन महि करे रासि ॥
तिआगहु सगल उपाव तिस की ओट गहु ॥
पउ सरणाई भजि सुखी हूं सुख लहु ॥
करम धरम ततु गिआनु संता संगु होइ ॥
जपीऐ अंम्रित नामु बिघनु न लगै कोइ ॥
जिस नो आपि दइआलु तिसु मनि वुठिआ ॥
पाईअनि॑ सभि निधान साहिबि तुठिआ ॥12॥
आराधिहु सचा सोइ सभु किछु जिसु पासि ॥
दुहा सिरिआ खसमु आपि खिन महि करे रासि ॥
तिआगहु सगल उपाव तिस की ओट गहु ॥
पउ सरणाई भजि सुखी हूं सुख लहु ॥
करम धरम ततु गिआनु संता संगु होइ ॥
जपीऐ अंम्रित नामु बिघनु न लगै कोइ ॥
जिस नो आपि दइआलु तिसु मनि वुठिआ ॥
पाईअनि॑ सभि निधान साहिबि तुठिआ ॥12॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे भाई !) उस सदा स्थिर रहने वाले प्रभू को सिमरो। जिसके वश में हरेक पदार्थ है जो (माया की कशिश और नाम-रस) दोनों पक्ष का मालिक है (भाव। जो माया के मोह में फंसाने वाला भी है और नाम-रस की दाति देने वाला भी है)।जो (जीवों के काम) एक पलक में पूरे कर देता है। (हे भाई !) अन्य सारे तरीकों को छोड़ो और उस परमात्मा का आसरा लो। दौड़ के उस प्रभू की शरण पड़ो और सबसे अच्छा सुख हासिल करो। अगर संतों की संगति मिले तो वह ऊँची समझ (प्राप्त) होती है जो (मानो) सब कर्मों-धर्मों का निचोड़ है। अगर प्रभू का अमृत नाम सिमरें तो (जीवन की राह में) कोई रुकावट नहीं पड़ती। जिस मनुष्य पर प्रभू स्वयं मेहरवान हो उसके मन में स्वयं आ बसता है। प्रभू मालिक के प्रसन्न होने पर (मानो) सारे खजाने पा लेते हैं। 12।
लधमु लभणहारु करमु करंदो मा पिरी ॥
सलोक मः 5 ॥
लधमु लभणहारु करमु करंदो मा पिरी ॥
इको सिरजणहारु नानक बिआ न पसीऐ ॥1॥
लधमु लभणहारु करमु करंदो मा पिरी ॥
इको सिरजणहारु नानक बिआ न पसीऐ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ जब मेरे प्यारे पति ने (मेरे पर) बख्शिश की तो मैंने ढूँढने योग्य प्रभू को ढूँढ लिया। (अब) हे नानक ! एक करतार ही (हर जगह) दिखाई दे रहा है। कोई और नहीं दिखता। 1।
पापड़िआ पछाड़ि बाणु सचावा संनि॑ कै ॥
मः 5 ॥
पापड़िआ पछाड़ि बाणु सचावा संनि॑ कै ॥
गुर मंत्रड़ा चितारि नानक दुखु न थीवई ॥2॥
पापड़िआ पछाड़ि बाणु सचावा संनि॑ कै ॥
गुर मंत्रड़ा चितारि नानक दुखु न थीवई ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! सॅच (भाव। सिमरन) का तीर तान के चंदरे पापों को भगा के। सतिगुरू का सोहाना मंत्र चेते कर। (इस तरह) दुख नहीं व्याप्ता। 2।
वाहु वाहु सिरजणहार पाईअनु ठाढि आपि ॥
पउड़ी ॥
वाहु वाहु सिरजणहार पाईअनु ठाढि आपि ॥
जीअ जंत मिहरवानु तिस नो सदा जापि ॥
दइआ धारी समरथि चुके बिल बिलाप ॥
नठे ताप दुख रोग पूरे गुर प्रतापि ॥
कीतीअनु आपणी रख गरीब निवाजि थापि ॥
आपे लइअनु छडाइ बंधन सगल कापि ॥
तिसन बुझी आस पुंनी मन संतोखि ध्रापि ॥
वडी हूं वडा अपार खसमु जिसु लेपु न पुंनि पापि ॥13॥
वाहु वाहु सिरजणहार पाईअनु ठाढि आपि ॥
जीअ जंत मिहरवानु तिस नो सदा जापि ॥
दइआ धारी समरथि चुके बिल बिलाप ॥
नठे ताप दुख रोग पूरे गुर प्रतापि ॥
कीतीअनु आपणी रख गरीब निवाजि थापि ॥
आपे लइअनु छडाइ बंधन सगल कापि ॥
तिसन बुझी आस पुंनी मन संतोखि ध्रापि ॥
वडी हूं वडा अपार खसमु जिसु लेपु न पुंनि पापि ॥13॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (हे भाई !) उस करतार को ‘धन्य धन्य’ कह जिस ने (आपके अंदर) स्वयं ठंड डाली है। उस प्रभू को याद कर जो सब जीवों पर मेहरवान है। समर्थ प्रभू ने (जिस मनुष्य पर) मेहर की है उसके सारे प्रलाप समाप्त हो गए हैं। पूरे गुरू के प्रताप से उसके (सारे) कलेश, दुख और रोग दूर हो गए। (जिन) गरीबों (भाव। जो दर पे आ गिरे हैं) को निवाज के पीठ ठोक के (उनकी) रक्षा उस (प्रभू) ने खुद की है। उनके सारे बंधन कट के उनको (विकारों से) उसने खुद छुड़ा लिया है। संतोष से तृप्त हो जाने के कारण उनके मन की आस पूरी हो गई है उनकी तृष्णा मिट गई है। (पर) बेअंत (प्रभू) पति सबसे बड़ा है उसको (जीवों के किए) पुन्य अथवा पाप से (जाती तौर पर) कोई लाग-लबेड़ नहीं होता। 13।
जा कउ भए क्रिपाल प्रभ हरि हरि सेई जपात ॥
सलोक मः 5 ॥
जा कउ भए क्रिपाल प्रभ हरि हरि सेई जपात ॥
नानक प्रीति लगी तिन राम सिउ भेटत साध संगात ॥1॥
जा कउ भए क्रिपाल प्रभ हरि हरि सेई जपात ॥
नानक प्रीति लगी तिन राम सिउ भेटत साध संगात ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे नानक ! जिन मनुष्यों पर प्रभू जी कृपा करते हैं वही हरी-नाम जपते हैं। साध-संगति में मिलने के कारण परमात्मा के साथ उनकी प्रीति बन जाती है। 1।
रामु रमहु बडभागीहो जलि थलि महीअलि सोइ ॥
मः 5 ॥
रामु रमहु बडभागीहो जलि थलि महीअलि सोइ ॥
नानक नामि अराधिऐ बिघनु न लागै कोइ ॥2॥
रामु रमहु बडभागीहो जलि थलि महीअलि सोइ ॥
नानक नामि अराधिऐ बिघनु न लागै कोइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे बड़े भाग्य वालो ! उस परमात्मा को सिमरो जो पानी में धरती के अंदर धरती के ऊपर (हर जगह) मौजूद है। हे नानक ! यदि प्रभू का नाम सिमरें तो (जीवन राह में) कोई रुकावट नहीं होती। 2।
भगता का बोलिआ परवाणु है दरगह पवै थाइ ॥
पउड़ी ॥
भगता का बोलिआ परवाणु है दरगह पवै थाइ ॥
भगता तेरी टेक रते सचि नाइ ॥
जिस नो होइ क्रिपालु तिस का दूखु जाइ ॥
भगता का बोलिआ परवाणु है दरगह पवै थाइ ॥
भगता तेरी टेक रते सचि नाइ ॥
जिस नो होइ क्रिपालु तिस का दूखु जाइ ॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ बंदगी करने वाले मनुष्यों का वचन मानने के लायक होता है। प्रभू की दरगाह में (भी) कबूल होता है। हे प्रभू ! भक्तों को आपका आसरा होता है। वे सच्चे नाम में रंगे रहते हैं। प्रभू जिस मनुष्य पर मेहरवान होता है उसका दुख दूर हो जाता है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 521 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।