Lulla Family

अंग 522

अंग
522
राग Gujri
राग: Gujri · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
भगत तेरे दइआल ओन॑ा मिहर पाइ ॥
दूखु दरदु वड रोगु न पोहे तिसु माइ ॥
भगता एहु अधारु गुण गोविंद गाइ ॥
सदा सदा दिनु रैणि इको इकु धिआइ ॥
पीवति अंम्रित नामु जन नामे रहे अघाइ ॥14॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: हे दयालु प्रभू ! बंदगी करने वाले बंदे आपके हैं के रहते हैं। आप उनपे कृपा करता है; (जिस मनुष्य पर आप मेहर करता है) उसको माया तंग नहीं कर सकती।कोई दुख-दर्द कोई बड़े से बड़ा रोग उसे सता नहीं सकता। गोविंद के गुण गा गा के यह (सिफत सालाह) भक्तों (की जिंदगी) का आसरा बन जाती है ; दिन रात सदा ही एक प्रभू को सिमर सिमर के। नाम-रूपी अमृत पी पी के सेवक नाम में ही तृप्त रहते हैं। 14।
सलोक मः 5 ॥
कोटि बिघन तिसु लागते जिस नो विसरै नाउ ॥
नानक अनदिनु बिलपते जिउ सुंञै घरि काउ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5 ॥ जिस मनुष्य को परमात्मा का नाम विसर जाता है उसको करोड़ो विघन आ घेरते हैं; हे नानक ! (ऐसे लोग) हर रोज यूँ बिलकते हैं जैसे सूने घरों में कौए शोर डालते हैं (पर वहाँ उन्हें मिलता कुछ नहीं)।
मः 5 ॥
पिरी मिलावा जा थीऐ साई सुहावी रुति ॥
घड़ी मुहतु नह वीसरै नानक रवीऐ नित ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ वही ऋतु सुंदर है जब प्यारे प्रभू-पति का मेल होता है।सो। हे नानक ! उसे हर वक्त याद करें।कभी घड़ी दो घड़ी भी उस प्रभू को ना भूलें। 2।
पउड़ी ॥
सूरबीर वरीआम किनै न होड़ीऐ ॥ फउज सताणी हाठ पंचा जोड़ीऐ ॥
दस नारी अउधूत देनि चमोड़ीऐ ॥
जिणि जिणि लैनि॑ रलाइ एहो एना लोड़ीऐ ॥
त्रै गुण इन कै वसि किनै न मोड़ीऐ ॥
भरमु कोटु माइआ खाई कहु कितु बिधि तोड़ीऐ ॥
गुरु पूरा आराधि बिखम दलु फोड़ीऐ ॥
हउ तिसु अगै दिनु राति रहा कर जोड़ीऐ ॥15॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (कामादिक विकार) बड़े शूरवीर और बहादर (सिपाही) हैं।किसी ने इन्हें रोका नहीं। इन पाँचों ने बड़ी बलशाली और हठीली फौज एकत्र की हुई है। (दुनियादार तो कहाँ रहे) त्यागियों को (भी) ये दस इन्द्रियां चिपका देते हैं। सबको जीत जीत के अपने मुताबिक ढाले जाते हैं। बस ! यही बात ये चाहते हैं।सारे ही त्रैगुणी जीव इनके दबाव तले हैं।कोई इन्हें मोड़ नहीं सका। (माया की खातिर जीवों की) भटकना (ये।मानो।इन पाँचों का) किला है और माया (का मोह।उस किले के इर्द-गिर्द गहरी) खाई (खुदी हुई) है।(ये किला) कैसे तोड़ा जाए। पूरे सतिगुरू को याद करने से ये ताकतवर फौज सर की जा सकती है। (यदि प्रभू की मेहर हो तो) मैं दिन-रात हाथ जोड़ के उस गुरू के सामने खड़ा रहूँ। 15।
सलोक मः 5 ॥
किलविख सभे उतरनि नीत नीत गुण गाउ ॥
कोटि कलेसा ऊपजहि नानक बिसरै नाउ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे नानक ! सदा ही प्रभू की सिफत सालाह करो।(सिफत सालाह की बरकति से) सारे पाप उतर जाते हैं। अगर प्रभू का नाम भूल जाए तो करोड़ों दुख लग जाते हैं। 1।
मः 5 ॥
नानक सतिगुरि भेटिऐ पूरी होवै जुगति ॥
हसंदिआ खेलंदिआ पैनंदिआ खावंदिआ विचे होवै मुकति ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हे नानक ! अगर सतिगुरू मिल जाए तो जीने का सही सलीका आ जाता। और हँसते खेलते खाते पहनते (भाव।दुनिया के सारे काम करते हुए) माया में बरतते हुए भी कामादिक विकारों से बचे रह सकते हैं। 2।
पउड़ी ॥
सो सतिगुरु धनु धंनु जिनि भरम गड़ु तोड़िआ ॥
सो सतिगुरु वाहु वाहु जिनि हरि सिउ जोड़िआ ॥
नामु निधानु अखुटु गुरु देइ दारूओ ॥
महा रोगु बिकराल तिनै बिदारूओ ॥
पाइआ नामु निधानु बहुतु खजानिआ ॥
जिता जनमु अपारु आपु पछानिआ ॥
महिमा कही न जाइ गुर समरथ देव ॥
गुर पारब्रहम परमेसुर अपरंपर अलख अभेव ॥16॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ धन्य है वह सतिगुरू जिसने (हमारा) भ्रम का किला तोड़ दिया है। अत्भुद महिमा वाला है वह गुरू जिसने (हमें) ईश्वर से जोड़ दिया है; गुरू अमु नाम-खजाना रूपी दवाई देता है। (इस दवाई से) उस गुरू ने ही (हमारा ये) बड़ा भयानक रोग नाश कर दिया है। (जिस मनुष्य ने गुरू से) प्रभू-नाम रूपी बड़ा खजाना हासिल किया है उसने अपने आप को पहचान लिया है और मानस-जन्म (की) अपार (बाजी) जीत ली है। समर्थ गुरदेव की महिमा बयान नहीं की जा सकती। सतिगुरू उस परमेश्वर पारब्रहम का रूप है और बेअंत है अलख है और अभेव है। 16।
सलोकु मः 5 ॥
उदमु करेदिआ जीउ तूं कमावदिआ सुख भुंचु ॥
धिआइदिआ तूं प्रभू मिलु नानक उतरी चिंत ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5 ॥ हे नानक ! (प्रभू की भगती का) उद्यम करते हुए आत्मिक जीवन मिलता है।(इस नाम की) कमाई करने से सुख की प्राप्ति होती है; नाम सिमरने से परमात्मा को मिल लेते है और चिंता मिट जाती है। 1।
मः 5 ॥
सुभ चिंतन गोबिंद रमण निरमल साधू संग ॥
नानक नामु न विसरउ इक घड़ी करि किरपा भगवंत ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: महला 5॥ पवित्र संत-संग करूँ।गोबिंद का सिमरन करूँ और भली सोचें सोचूँ। 2। हे भगवान ! मुझ नानक पर कृपा कर कि मैं एक घड़ी भी आपका नाम ना भुलाऊँ।
पउड़ी ॥
तेरा कीता होइ त काहे डरपीऐ ॥
जिसु मिलि जपीऐ नाउ तिसु जीउ अरपीऐ ॥
आइऐ चिति निहालु साहिब बेसुमार ॥
तिस नो पोहे कवणु जिसु वलि निरंकार ॥
सभु किछु तिस कै वसि न कोई बाहरा ॥
सो भगता मनि वुठा सचि समाहरा ॥
तेरे दास धिआइनि तुधु तूं रखण वालिआ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ अगर (हे प्रभू !) जो कुछ घटित होता है आपका ही किया हुआ होता है तो (हम) क्यूँ (किसी से) डरें। जिस को मिल के प्रभू का नाम जपा जाए।उसके आगे अपना आप भेट कर देना चाहिए। क्योंकि अगर बेअंत साहिब चित्त में आ बसे तो निहाल हैं जाते हैं। जिसके पक्ष में निरंकार हो जाए। उस पर कोई दबाव नहीं डाल सकता। क्योंकि हरेक चीज उस परमात्मा के वश में है।उसके हुकम से परे नहीं जा सकता। (भक्तों के) सिमरन के कारण वह प्रभू भक्तों के मन में आ बसता है (उनके अंदर) समा जाता है। हे प्रभू ! आपके दास आपको याद करते हैं।आप उनकी रक्षा करता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे दयालु प्रभू ! बंदगी करने वाले बंदे आपके हैं के रहते हैं।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।