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- प्रेम पटोला तै सहि दिता ढकण कू पति मेरी ॥
- तैडै सिमरणि हभु किछु लधमु बिखमु न डिठमु कोई ॥
- होवै सुखु घणा दयि धिआइऐ ॥
- नदी तरंदड़ी मैडा खोजु न खुंभै मंझि मुहबति तेरी ॥
- जिन॑ा दिसंदड़िआ दुरमति वंञै मित्र असाडड़े सेई ॥
- आवै साहिबु चिति तेरिआ भगता डिठिआ ॥
- बारि विडानड़ै हुंमस धुंमस कूका पईआ राही ॥
- सची बैसक तिन॑ा संगि जिन संगि जपीऐ नाउ ॥
- सा वेला परवाणु जितु सतिगुरु भेटिआ ॥
- विछोहे जंबूर खवे न वंञनि गाखड़े ॥
प्रेम पटोला तै सहि दिता ढकण कू पति मेरी ॥
सलोक मः 5 ॥
प्रेम पटोला तै सहि दिता ढकण कू पति मेरी ॥
दाना बीना साई मैडा नानक सार न जाणा तेरी ॥1॥
प्रेम पटोला तै सहि दिता ढकण कू पति मेरी ॥
दाना बीना साई मैडा नानक सार न जाणा तेरी ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ मेरी नानक की इज्जत ढक के रखने के लिए (हे प्रभू !) आपने ने मुझे अपना ‘प्यार’-रूप रेशमी कपड़ा दिया है। आप मेरा पति (मेरे दिल की) जानने वाले हैं। मैंने आपकी कद्र नहीं समझी। 1।
तैडै सिमरणि हभु किछु लधमु बिखमु न डिठमु कोई ॥
मः 5 ॥
तैडै सिमरणि हभु किछु लधमु बिखमु न डिठमु कोई ॥
जिसु पति रखै सचा साहिबु नानक मेटि न सकै कोई ॥2॥
तैडै सिमरणि हभु किछु लधमु बिखमु न डिठमु कोई ॥
जिसु पति रखै सचा साहिबु नानक मेटि न सकै कोई ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ (हे प्रभू !) आपके सिमरन (की बरकति) से मैनें (मानो) हरेक पदार्थ ढूँढ लिया है (और जिंदगी में) कोई मुश्किल नहीं देखी। हे नानक ! जिस मनुष्य की इज्जत मालिक खुद रखे। (उसकी इज्जत को और) कोई नहीं मिटा सकता। 2।
होवै सुखु घणा दयि धिआइऐ ॥
पउड़ी ॥
होवै सुखु घणा दयि धिआइऐ ॥
वंञै रोगा घाणि हरि गुण गाइऐ ॥
अंदरि वरतै ठाढि प्रभि चिति आइऐ ॥
पूरन होवै आस नाइ मंनि वसाइऐ ॥
कोइ न लगै बिघनु आपु गवाइऐ ॥
गिआन पदारथु मति गुर ते पाइऐ ॥
तिनि पाए सभे थोक जिसु आपि दिवाइऐ ॥
तूं सभना का खसमु सभ तेरी छाइऐ ॥8॥
होवै सुखु घणा दयि धिआइऐ ॥
वंञै रोगा घाणि हरि गुण गाइऐ ॥
अंदरि वरतै ठाढि प्रभि चिति आइऐ ॥
पूरन होवै आस नाइ मंनि वसाइऐ ॥
कोइ न लगै बिघनु आपु गवाइऐ ॥
गिआन पदारथु मति गुर ते पाइऐ ॥
तिनि पाए सभे थोक जिसु आपि दिवाइऐ ॥
तूं सभना का खसमु सभ तेरी छाइऐ ॥8॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। यदि प्यारे प्रभू को सिमरें तो बहुत ही सुख होता है। अगर हरी के गुण गाएं तो रोगों के घाण (भाव। सारे ही रोग) नाश हो जाते हैं। अगर प्रभू चित्त में आ बसे तो चित्त में ठंड पड़ जाती है। अगर प्रभू का नाम मन में बस जाए तो आस पूरी हो जाती है (भाव। आशा-तृष्णा आदि मिट जाती है)। अगर स्वैभाव गवा दें तो (जिंदगी की राह में) कोई मुश्किल नहीं आती; अगर सतिगुरू की मति हासिल करें तो (प्रभू के) ज्ञान का खजाना (मिल जाता है)। पर ये सारे पदार्थ उस मनुष्य ने प्राप्त किए जिसको प्रभू ने खुद (गुरू के माध्यम से) दिलवाए हैं। (हे प्रभू !) आप सब जीवों के पति हैं। सारी सृष्टि आपके साए तले है। 8।
नदी तरंदड़ी मैडा खोजु न खुंभै मंझि मुहबति तेरी ॥
सलोक मः 5 ॥
नदी तरंदड़ी मैडा खोजु न खुंभै मंझि मुहबति तेरी ॥
तउ सह चरणी मैडा हीअड़ा सीतमु हरि नानक तुलहा बेड़ी ॥1॥
नदी तरंदड़ी मैडा खोजु न खुंभै मंझि मुहबति तेरी ॥
तउ सह चरणी मैडा हीअड़ा सीतमु हरि नानक तुलहा बेड़ी ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ (संसार-) नदी में तैरते हुआ मेरा पैर (मोह के कीचड़ में) नहीं फँसता। क्योंकि मेरे हृदय में आपकी प्रीति है। हे पति (प्रभू) ! मैंने अपना ये निमाणा सा दिल आपके चरणों में परो लिया है। हे हरी ! (संसार समुंद्र में से तैरने के लिए। आप ही) नानक का तुलहा हैं और बेड़ी हैं। 1।
जिन॑ा दिसंदड़िआ दुरमति वंञै मित्र असाडड़े सेई ॥
मः 5 ॥
जिन॑ा दिसंदड़िआ दुरमति वंञै मित्र असाडड़े सेई ॥
हउ ढूढेदी जगु सबाइआ जन नानक विरले केई ॥2॥
जिन॑ा दिसंदड़िआ दुरमति वंञै मित्र असाडड़े सेई ॥
हउ ढूढेदी जगु सबाइआ जन नानक विरले केई ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ हमारे (असल) मित्र वही मनुष्य हैं जिनका दीदार होने से बुरी मति दूर हो जाती है। पर। हे दास नानक ! मैंने सारा जगत तलाश के देख लिया है। कोई विरले (ऐसे मनुष्य मिलते हैं)। 2।
आवै साहिबु चिति तेरिआ भगता डिठिआ ॥
पउड़ी ॥
आवै साहिबु चिति तेरिआ भगता डिठिआ ॥
मन की कटीऐ मैलु साधसंगि वुठिआ ॥
जनम मरण भउ कटीऐ जन का सबदु जपि ॥
बंधन खोलनि॑ संत दूत सभि जाहि छपि ॥
तिसु सिउ लाइनि॑ रंगु जिस दी सभ धारीआ ॥
ऊची हूं ऊचा थानु अगम अपारीआ ॥
रैणि दिनसु कर जोड़ि सासि सासि धिआईऐ ॥
जा आपे होइ दइआलु तां भगत संगु पाईऐ ॥9॥
आवै साहिबु चिति तेरिआ भगता डिठिआ ॥
मन की कटीऐ मैलु साधसंगि वुठिआ ॥
जनम मरण भउ कटीऐ जन का सबदु जपि ॥
बंधन खोलनि॑ संत दूत सभि जाहि छपि ॥
तिसु सिउ लाइनि॑ रंगु जिस दी सभ धारीआ ॥
ऊची हूं ऊचा थानु अगम अपारीआ ॥
रैणि दिनसु कर जोड़ि सासि सासि धिआईऐ ॥
जा आपे होइ दइआलु तां भगत संगु पाईऐ ॥9॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ (हे प्रभू !) आपके भक्तों का दर्शन करने से आप मालिक हमारे मन में आ बसते हैं। साध-संगति में पहुँचने से मन की मैल काटी जाती है। (साध-संगति में रह के) सिफत-सालाह की बाणी पढ़ने से सेवक का जनम-मरण का (भाव। सारी उम्र का) डर काटा जाता है। क्योंकि संत (जिस मनुष्य के माया वाले) बंधन खोलते हैं (उसके विकार रूप) सारे जिंन-भूत भाग जाते हैं। ये सारी सृष्टि जिस प्रभू की टिकाई हुई है। जिसका स्थान सबसे ऊँचा है। जो अपहुँच और बेअंत है। संत उस परमात्मा के साथ (हमारा) प्यार जोड़ देते हैं। (हे भाई !) दिन-रात स्वास-स्वास हाथ जोड़ के प्रभू का सिमरन करना चाहिए। जब प्रभू स्वयं ही दयालु होता है तो उसके भक्तों की संगति प्राप्त होती है। 9।
बारि विडानड़ै हुंमस धुंमस कूका पईआ राही ॥
सलोक मः 5 ॥
बारि विडानड़ै हुंमस धुंमस कूका पईआ राही ॥
तउ सह सेती लगड़ी डोरी नानक अनद सेती बनु गाही ॥1॥
बारि विडानड़ै हुंमस धुंमस कूका पईआ राही ॥
तउ सह सेती लगड़ी डोरी नानक अनद सेती बनु गाही ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ (जगत-रूपी इस) बेगानी जूह में (फंस जाने के कारण। अगर तृष्णा की) आग के बड़े सेक के कारण राहों में आवाजें (चीख-पुकार) पड़ रही हैं (भाव। जीव घबराए हुए हैं) पर। हे पति (प्रभू) ! मैं नानक (के चित्त) की डोर आपके (चरणों) से लगी हुई है। (इस वास्ते) मैं आनंद से (इस संसार) जंगल में से गुजर रहा हूँ। 1।
सची बैसक तिन॑ा संगि जिन संगि जपीऐ नाउ ॥
मः 5 ॥
सची बैसक तिन॑ा संगि जिन संगि जपीऐ नाउ ॥
तिन॑ संगि संगु न कीचई नानक जिना आपणा सुआउ ॥2॥
सची बैसक तिन॑ा संगि जिन संगि जपीऐ नाउ ॥
तिन॑ संगि संगु न कीचई नानक जिना आपणा सुआउ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 5॥ उन मनुष्यों के साथ आखिर तक निभने वाली मुहब्बत (करनी चाहिए) जिनके साथ (बैठने से परमात्मा का) नाम सिमरा जा सके; हे नानक ! जिन को (हर समय) अपनी ही गरज हो। उनके साथ साथ नहीं करना चाहिए। 2।
सा वेला परवाणु जितु सतिगुरु भेटिआ ॥
पउड़ी ॥
सा वेला परवाणु जितु सतिगुरु भेटिआ ॥
होआ साधू संगु फिरि दूख न तेटिआ ॥
पाइआ निहचलु थानु फिरि गरभि न लेटिआ ॥
नदरी आइआ इकु सगल ब्रहमेटिआ ॥
ततु गिआनु लाइ धिआनु द्रिसटि समेटिआ ॥
सभो जपीऐ जापु जि मुखहु बोलेटिआ ॥
हुकमे बुझि निहालु सुखि सुखेटिआ ॥
परखि खजानै पाए से बहुड़ि न खोटिआ ॥10॥
सा वेला परवाणु जितु सतिगुरु भेटिआ ॥
होआ साधू संगु फिरि दूख न तेटिआ ॥
पाइआ निहचलु थानु फिरि गरभि न लेटिआ ॥
नदरी आइआ इकु सगल ब्रहमेटिआ ॥
ततु गिआनु लाइ धिआनु द्रिसटि समेटिआ ॥
सभो जपीऐ जापु जि मुखहु बोलेटिआ ॥
हुकमे बुझि निहालु सुखि सुखेटिआ ॥
परखि खजानै पाए से बहुड़ि न खोटिआ ॥10॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ वह घड़ी मंजूर हो गई समझें। जिस घड़ी मनुष्य को सतिगुरू मिल गया; जिस मनुष्य को गुरू की मेहर हो गई। वह दुबारा दुखों की गिरफत में नहीं आता। (गुरू मिलने से) जिस को पक्का टिकाना मिल गया। वह फिर (और और) जूनियों में नहीं पड़ता। उसे हर जगह एक ब्रहम ही दिखता है; (बाहर से अपनी) नजर को समेट के। (प्रभू में) ध्यान लगा के वह असल ऊँची समझ हासल कर लेता है; वह जो कुछ मुंह से बोलता है (प्रभू की सिफत सालाह का) जाप ही बोलता है। प्रभू की रजा को समझ के वह प्रसनन रहता है और सुखी ही सुखी रहता है। (गुरू की शरण आए जिन मनुष्यों को) परख के (प्रभू ने अपने) खजाने में डाला है वह दुबारा खोटे नहीं होते। 10।
विछोहे जंबूर खवे न वंञनि गाखड़े ॥
सलोकु मः 5 ॥
विछोहे जंबूर खवे न वंञनि गाखड़े ॥
जे सो धणी मिलंनि नानक सुख संबूह सचु ॥1॥
विछोहे जंबूर खवे न वंञनि गाखड़े ॥
जे सो धणी मिलंनि नानक सुख संबूह सचु ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 5॥ हे नानक ! (प्रभू के चरणों से) विछोड़े (का दुख) जंबूर (की पीड़ा) के जैसे मुश्किल है। बर्दाश्त नहीं किए जा सकते। अगर वह प्रभू मालिक जी मिल जाएं तो यकीनन सारे सुख ही सुख हो जाते हैं। 1।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 520 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।