प्रेम पटोला तै सहि दिता ढकण कू पति मेरी ॥
दाना बीना साई मैडा नानक सार न जाणा तेरी ॥1॥
तैडै सिमरणि हभु किछु लधमु बिखमु न डिठमु कोई ॥
जिसु पति रखै सचा साहिबु नानक मेटि न सकै कोई ॥2॥
होवै सुखु घणा दयि धिआइऐ ॥
वंञै रोगा घाणि हरि गुण गाइऐ ॥
अंदरि वरतै ठाढि प्रभि चिति आइऐ ॥
पूरन होवै आस नाइ मंनि वसाइऐ ॥
कोइ न लगै बिघनु आपु गवाइऐ ॥
गिआन पदारथु मति गुर ते पाइऐ ॥
तिनि पाए सभे थोक जिसु आपि दिवाइऐ ॥
तूं सभना का खसमु सभ तेरी छाइऐ ॥8॥
नदी तरंदड़ी मैडा खोजु न खुंभै मंझि मुहबति तेरी ॥
तउ सह चरणी मैडा हीअड़ा सीतमु हरि नानक तुलहा बेड़ी ॥1॥
जिन॑ा दिसंदड़िआ दुरमति वंञै मित्र असाडड़े सेई ॥
हउ ढूढेदी जगु सबाइआ जन नानक विरले केई ॥2॥
आवै साहिबु चिति तेरिआ भगता डिठिआ ॥
मन की कटीऐ मैलु साधसंगि वुठिआ ॥
जनम मरण भउ कटीऐ जन का सबदु जपि ॥
बंधन खोलनि॑ संत दूत सभि जाहि छपि ॥
तिसु सिउ लाइनि॑ रंगु जिस दी सभ धारीआ ॥
ऊची हूं ऊचा थानु अगम अपारीआ ॥
रैणि दिनसु कर जोड़ि सासि सासि धिआईऐ ॥
जा आपे होइ दइआलु तां भगत संगु पाईऐ ॥9॥
बारि विडानड़ै हुंमस धुंमस कूका पईआ राही ॥
तउ सह सेती लगड़ी डोरी नानक अनद सेती बनु गाही ॥1॥
सची बैसक तिन॑ा संगि जिन संगि जपीऐ नाउ ॥
तिन॑ संगि संगु न कीचई नानक जिना आपणा सुआउ ॥2॥
सा वेला परवाणु जितु सतिगुरु भेटिआ ॥
होआ साधू संगु फिरि दूख न तेटिआ ॥
पाइआ निहचलु थानु फिरि गरभि न लेटिआ ॥
नदरी आइआ इकु सगल ब्रहमेटिआ ॥
ततु गिआनु लाइ धिआनु द्रिसटि समेटिआ ॥
सभो जपीऐ जापु जि मुखहु बोलेटिआ ॥
हुकमे बुझि निहालु सुखि सुखेटिआ ॥
परखि खजानै पाए से बहुड़ि न खोटिआ ॥10॥
विछोहे जंबूर खवे न वंञनि गाखड़े ॥
जे सो धणी मिलंनि नानक सुख संबूह सचु ॥1॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 10 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्लोक महला 5॥ मेरी नानक की इज्जत ढक के रखने के लिए (हे प्रभू !) आपने ने मुझे अपना ‘प्यार’-रूप रेशमी कपड़ा दिया है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।