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नील वसत्र पहिरि होवहि परवाणु ॥
नील वसत्र पहिरि होवहि परवाणु ॥
मलेछ धानु ले पूजहि पुराणु ॥
अभाखिआ का कुठा बकरा खाणा ॥
चउके उपरि किसै न जाणा ॥
दे कै चउका कढी कार ॥
उपरि आइ बैठे कूड़िआर ॥
मतु भिटै वे मतु भिटै ॥ इहु अंनु असाडा फिटै ॥
तनि फिटै फेड़ करेनि ॥
मनि जूठै चुली भरेनि ॥
कहु नानक सचु धिआईऐ ॥
सुचि होवै ता सचु पाईऐ ॥2॥
मलेछ धानु ले पूजहि पुराणु ॥
अभाखिआ का कुठा बकरा खाणा ॥
चउके उपरि किसै न जाणा ॥
दे कै चउका कढी कार ॥
उपरि आइ बैठे कूड़िआर ॥
मतु भिटै वे मतु भिटै ॥ इहु अंनु असाडा फिटै ॥
तनि फिटै फेड़ करेनि ॥
मनि जूठै चुली भरेनि ॥
कहु नानक सचु धिआईऐ ॥
सुचि होवै ता सचु पाईऐ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: नीले रंग के कपड़े पहन के (तुर्क हाकिमों के पास जाते हैं।तभी) उनके पास जाने की आज्ञा मिलती है। (जिन्हें) मलेछ (कहते हैं।उनसे) ही रोजी लेते हैं।और (फिर भी) पुराण को पूजते हैं (भाव।फिर भी यही समझते हैं कि हम पुराण के मुताबिक चल रहे हैं)। (यहीं बस नहीं) खुराक भी इनकी वह बकरा है जो कलमा पढ़ के हलाल किया हुआ है (भाव।जो मुसलमानों के हाथों का तैयार किया हुआ है।पर कहते हैं कि) हमारे चौके पे कोई और मनुष्य ना आ चढ़े। चौका बना के (चारों तरफ) लकीर खींचते हैं। (पर इस) चौके में वह मनुष्य आ बैठते हैं जो खुद झूठे हैं। (औरों को कहते हैं, हमारे चौके के पास ना आना) कहीं चौका अपवित्र ना हो जाए और हमारा अन्न खराब ना हो जाए; (पर खुद ये लोग) अपवित्र शरीर से बुरे कर्म करते हैं और झूठे मन से ही (भाव।मन तो अंदर से मलीन है)चुल्लियां करते हैं। हे नानक ! कह।प्रभू का ध्यान करना चाहिए। तभी स्वच्छता-पवित्रता हो सकती है अगर सच्चा प्रभू मिल जाए। 2।
चितै अंदरि सभु को वेखि नदरी हेठि चलाइदा ॥
पउड़ी ॥
चितै अंदरि सभु को वेखि नदरी हेठि चलाइदा ॥
आपे दे वडिआईआ आपे ही करम कराइदा ॥
वडहु वडा वड मेदनी सिरे सिरि धंधै लाइदा ॥
नदरि उपठी जे करे सुलताना घाहु कराइदा ॥
दरि मंगनि भिख न पाइदा ॥16॥
चितै अंदरि सभु को वेखि नदरी हेठि चलाइदा ॥
आपे दे वडिआईआ आपे ही करम कराइदा ॥
वडहु वडा वड मेदनी सिरे सिरि धंधै लाइदा ॥
नदरि उपठी जे करे सुलताना घाहु कराइदा ॥
दरि मंगनि भिख न पाइदा ॥16॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ प्रभू हरेक जीव को अपने ध्यान में रखता है।और हरेक को अपनी नजर में रख के काम में लगाए रखता है। खुद ही (जीवों को) महानताएं बख्शता है और खुद ही उन्हें काम में लगाता है। प्रभू बड़ों से बड़ा है (भाव।सबसे बड़ा है)।(उसकी रची हुई) सृष्टि भी बेअंत है।(इतनी बेअंत सृष्टि होते हुए भी) हरेक जीव को प्रभू धांधों में जोड़े रखता है। अगर कभी दुनिया के बादशाहों पर भी गुस्से की नजर कर दे।तो उन्हें भी खर-पतवार से हल्का कर देता है (इतना हल्का कि) उन्हें मांगने पर भीख भी नहीं मिलती। 16।
जे मोहाका घरु मुहै घरु मुहि पितरी देइ ॥
सलोकु मः 1 ॥
जे मोहाका घरु मुहै घरु मुहि पितरी देइ ॥
अगै वसतु सिञाणीऐ पितरी चोर करेइ ॥
वढीअहि हथ दलाल के मुसफी एह करेइ ॥
नानक अगै सो मिलै जि खटे घाले देइ ॥1॥
जे मोहाका घरु मुहै घरु मुहि पितरी देइ ॥
अगै वसतु सिञाणीऐ पितरी चोर करेइ ॥
वढीअहि हथ दलाल के मुसफी एह करेइ ॥
नानक अगै सो मिलै जि खटे घाले देइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ अगर कोई ठॅग पराया घर ठॅगे।पराए घर को ठॅग के (वह पदार्थ) अपने पित्रों के नमित्त दे। तो (अगर सचमुच पिछलों का दिया पहुँचता है तो) परलोक में वह पदार्थ पहचान लिया जाता है।इस तरह मनुष्य अपने पित्रों को भी चोर बनाता है (क्योंकि उनके पास चोरी का माल निकल आता है)। (आगे) प्रभू ये न्याय करता है कि (ये चोरी का माल पहुँचाने वाले ब्राहमण) दलाल के हाथ काटे जाते हैं। हे नानक ! (किसी का पहुँचाया आगे क्या मिलना है।) आगे तो मनुष्य को वही कुछ मिलता है जो कमाता है और (हाथों से) देता है। 1।
जिउ जोरू सिरनावणी आवै वारो वार ॥
मः 1 ॥
जिउ जोरू सिरनावणी आवै वारो वार ॥
जूठे जूठा मुखि वसै नित नित होइ खुआरु ॥
सूचे एहि न आखीअहि बहनि जि पिंडा धोइ ॥
सूचे सेई नानका जिन मनि वसिआ सोइ ॥2॥
जिउ जोरू सिरनावणी आवै वारो वार ॥
जूठे जूठा मुखि वसै नित नित होइ खुआरु ॥
सूचे एहि न आखीअहि बहनि जि पिंडा धोइ ॥
सूचे सेई नानका जिन मनि वसिआ सोइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ जैसे स्त्री को हर महीने माहवारी आती है (और ये अपवित्रता सदा उसके अंदर से ही पैदा हो जाती है)। वैसे ही झूठे मनुष्य के मुंह में सदा झूठ ही रहता है और इस करके वह सदा दुखी ही रहता है। ऐसे मनुष्य स्वच्छ नहीं कहे जाते जो सिर्फ शरीर को ही धो के (अपनी ओर से पवित्र बन के) बैठ जाते हैं। हे नानक ! केवल वही मनुष्य स्वच्छ हैं।सुच्चे हैं जिनके मन में प्रभू बसता है। 2।
तुरे पलाणे पउण वेग हर रंगी हरम सवारिआ ॥
पउड़ी ॥
तुरे पलाणे पउण वेग हर रंगी हरम सवारिआ ॥
कोठे मंडप माड़ीआ लाइ बैठे करि पासारिआ ॥
चीज करनि मनि भावदे हरि बुझनि नाही हारिआ ॥
करि फुरमाइसि खाइआ वेखि महलति मरणु विसारिआ ॥
जरु आई जोबनि हारिआ ॥17॥
तुरे पलाणे पउण वेग हर रंगी हरम सवारिआ ॥
कोठे मंडप माड़ीआ लाइ बैठे करि पासारिआ ॥
चीज करनि मनि भावदे हरि बुझनि नाही हारिआ ॥
करि फुरमाइसि खाइआ वेखि महलति मरणु विसारिआ ॥
जरु आई जोबनि हारिआ ॥17॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी। जिनके पास काठियों समेत (भाव।सदा तैयार भर तैयार) घोड़े हवा जितनी तेज चाल वाले होते हैं।जो अपने हरमों को कई रंगों से सजाते हैं। जो मनुष्य कोठे-महल-माढ़ियां आदि पसारे पसार के (अहंकारी हुए) बैठे हैं। जो मनुष्य मन-मानियां रंग-रलियां करते हैं।पर प्रभू को नहीं पहचानते।वे अपना मानस जन्म हार बैठते हैं। जो मनुष्य (गरीबों पे) हुकम करके (पदार्थ) खाते हैं (भाव।मौजें करते हैं) और अपने महलों को देख के अपनी मौत को भुला देते हैं। उन जवानी से ठॅगे हुओं को (भाव।जवानी के नशे में मस्त हुए मनुष्यों को) (गफलत में ही।पता ही नहीं चलता कब) बुढ़ापा आ दबोचता है। 17।
जे करि सूतकु मंनीऐ सभ तै सूतकु होइ ॥
सलोकु मः 1 ॥
जे करि सूतकु मंनीऐ सभ तै सूतकु होइ ॥
गोहे अतै लकड़ी अंदरि कीड़ा होइ ॥
जेते दाणे अंन के जीआ बाझु न कोइ ॥
पहिला पाणी जीउ है जितु हरिआ सभु कोइ ॥
सूतकु किउ करि रखीऐ सूतकु पवै रसोइ ॥
नानक सूतकु एव न उतरै गिआनु उतारे धोइ ॥1॥
जे करि सूतकु मंनीऐ सभ तै सूतकु होइ ॥
गोहे अतै लकड़ी अंदरि कीड़ा होइ ॥
जेते दाणे अंन के जीआ बाझु न कोइ ॥
पहिला पाणी जीउ है जितु हरिआ सभु कोइ ॥
सूतकु किउ करि रखीऐ सूतकु पवै रसोइ ॥
नानक सूतकु एव न उतरै गिआनु उतारे धोइ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ अगर सूतक को मान लें (भाव।अगर मान लें कि सूतक का भ्रम रखना चाहिए।तो यह भी याद रखें कि इस तरह के) सूतक तो भरे पड़े हैं; (चूल्हे में जलाए जाने वाले सूखे) गोबर और लकड़ी में भी कीड़े होते हैं (वे भी पैदा होते मरते रहते हैं); अनाज के जितने भी दाने हैं। इनमें से कोई भी दाना जीवन के बगैर नहीं। खुद पानी भी जीव ही है।क्योंकि इसीसे हरेक जीव हरा-भरा (जीवन वाला) रहता है। सूतक कैसे रखा जा सकता है।(भाव।सूतक की रस्म पूरी तौर पर मानना बहुत कठिन है।क्योंकि इस तरह तो हर समय ही) रसोई में सूतक बना रहता है। हे नानक ! इस तरह (भाव।भ्रम में पड़ने से) सूतक (मन से) नहीं उतरता।इसे (प्रभू का) ज्ञान ही धो के उतार सकता है। 1।
मन का सूतकु लोभु है जिहवा सूतकु कूड़ु ॥
मः 1 ॥
मन का सूतकु लोभु है जिहवा सूतकु कूड़ु ॥
अखी सूतकु वेखणा पर त्रिअ पर धन रूपु ॥
कंनी सूतकु कंनि पै लाइतबारी खाहि ॥
नानक हंसा आदमी बधे जम पुरि जाहि ॥2॥
मन का सूतकु लोभु है जिहवा सूतकु कूड़ु ॥
अखी सूतकु वेखणा पर त्रिअ पर धन रूपु ॥
कंनी सूतकु कंनि पै लाइतबारी खाहि ॥
नानक हंसा आदमी बधे जम पुरि जाहि ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ मन का सूतक लोभ है (भाव।जिन मनुष्यों के मन में लोभ रूपी सूतक चिपका है);जीभ का सूतक झूठ बोलना है (भाव।जिन मनुष्यों की जीभ को झूठ-रूप सूतक है); (जिन मनुष्यों की) आँखों को पराया धन और पराई सि्त्रयों का रूप देखने का सूतक (चिपका हुआ है); (जिन मनुष्यों के) कान भी सूतक हैं कि कानों से बिफक्र हो के चुगली सुनते हैं; हे नानक ! (ऐसे) मनुष्य (देखने में भले ही) हंसों जैसे (सुंदर) हों (तो भी वह) बंधे हुए नर्क में जाते हैं। 2।
सभो सूतकु भरमु है दूजै लगै जाइ ॥
मः 1 ॥
सभो सूतकु भरमु है दूजै लगै जाइ ॥
जंमणु मरणा हुकमु है भाणै आवै जाइ ॥
खाणा पीणा पवित्रु है दितोनु रिजकु संबाहि ॥
नानक जिन॑ी गुरमुखि बुझिआ तिन॑ा सूतकु नाहि ॥3॥
सभो सूतकु भरमु है दूजै लगै जाइ ॥
जंमणु मरणा हुकमु है भाणै आवै जाइ ॥
खाणा पीणा पवित्रु है दितोनु रिजकु संबाहि ॥
नानक जिन॑ी गुरमुखि बुझिआ तिन॑ा सूतकु नाहि ॥3॥
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ सूतक निरा भ्रम ही है।ये (सूतक रूपी भ्रम) माया में फसे (मनुष्यों को) आ लगता है। (वैसे तो) जीवों का पैदा होना-मरना प्रभू का हुकम है।प्रभू की रजा में ही जीव पैदा होता और मरता है। (पदार्थों का) खाना-पीना भी पवित्र है (भाव।बुरा नहीं।क्योंकि) प्रभू ने स्वयं इकट्ठा करके जीवों को रिजक दिया है। हे नानक ! जिन गुरमुखों ने ये बात समझ ली है।उन्हें सूतक नहीं लगता। 3।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ४७२ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।