गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: (ऐसा जीव) नंगा (किया जाता है।भाव।उसके किए हुए पाप कर्मों का नक्शा उसके सामने रखा जाता है) नर्क में धकेला जाता है।और उस समय (उसे अपने आपको) बड़ा डरावना रूप दिखता है। बुरे काम करके अंत में पछताना ही पड़ता है। 14।
सलोकु मः 1 ॥ दइआ कपाह संतोखु सूतु जतु गंढी सतु वटु ॥ एहु जनेऊ जीअ का हई त पाडे घतु ॥ ना एहु तुटै ना मलु लगै ना एहु जलै न जाइ ॥ धंनु सु माणस नानका जो गलि चले पाइ ॥ चउकड़ि मुलि अणाइआ बहि चउकै पाइआ ॥ सिखा कंनि चड़ाईआ गुरु ब्राहमणु थिआ ॥ ओहु मुआ ओहु झड़ि पइआ वेतगा गइआ ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ ऐसा जनेऊ जिसकी कपास दया हैं।जिसका सूत संतोष का हो।जिसमें जत की गाँठें हों।और जिसका बॅट (वॅट) ऊँचा आचरण हो। हे पण्डित ! अगर (आपके पास) ये आत्मा के काम आने वाला जनेऊ है तो (मेरे गले में) डाल दे (हे पण्डित !) ऐसा जनेऊ ना टूटता है।ना ही इसे मैल लगती है।ना ये जलता है और ना ही ये गायब होता है। हे नानक ! वे मनुष्य भाग्यशाली हैं।जिन्होंने ऐसा जनेऊ अपने गले में पहन लिया है। (हे पण्डित ! ये जनेऊ जो आप पहनाता फिरता है।ये तो तूने) चार कौड़ी मूल्य दे के मंगवा लिया।(अपने जजमान के) चौके में बैठ के (उसके गले में) डाल दिया। (फिर तूने उसके) कान में उपदेश दिया (कि आज से आपका) गुरू ब्राहमण हैं गया। (समय पूरा होने पर) वह (जजमान) मर गया (तो) वह (जनेऊ उसके शरीर से) गिर गया (भाव।अलग हो गया अथवा जल गया।पर आत्मा के साथ ना निभा।इस वास्ते वह जजमान बेचारा) जनेऊ के बगैर ही (संसार से) चला गया। 1।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (मनुष्य) लाखों चोरियां और यारियां (यारियां।परस्त्री गमन) करता है; लाखों झूठ बोलता है और गालियां निकालता है। दिनरात लोगों से चोरी-चारी लाखों ठॅगी और पहनामियां करता है।(ये तो है मनुष्य की अंतरात्मा का हाल।पर बाहर से देखिए।लोकाचारी क्या कुछ हो रही है) कपास से (भाव।कपास ला के) धागा काता जाता है और ब्राहमण (जजमान के घर) आ के (उस धागे को) बॅट देता है। (घर आए हुए सारे सगे-संबंधियों को) बकरा मार के पका के खिलाया जाता है; (घर का) हरेक प्राणी कहता है ‘जनेऊ पहना गया है।जनेऊ पहना गया है’। जब ये जनेऊ पुराना हो जाता है तो फेंक दिया जाता है।और इसकी जगह और जनेऊ पहन लिया जाता है। हे नानक ! अगर धागे में जोर हो (भाव।अगर आत्मा के काम आने वाला आत्मा को बल देने वाला जनेऊ हो) तो वह धागा नहीं टूटता। 2।
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (कपास से काते हुए सूत का जनेऊ पहन के ईश्वर के दर पर सुर्खरू होने की आस रखनी व्यर्थ है।रॅब की दरगाह में तभी) आदर मिलता है अगर ईश्वर का नाम दिल में दृढ़ कर लें।(क्योंकि) ईश्वर की सिफत सालाह ही सच्चा जनेऊ है; (ये स्वच्छ जनेऊ धारण करने से) दरगाह में सम्मान मिलता है और ये (कभी) टूटता भी नहीं। 3।
मः 1 ॥ तगु न इंद्री तगु न नारी ॥ भलके थुक पवै नित दाड़ी ॥ तगु न पैरी तगु न हथी ॥ तगु न जिहवा तगु न अखी ॥ वेतगा आपे वतै ॥ वटि धागे अवरा घतै ॥ लै भाड़ि करे वीआहु ॥ कढि कागलु दसे राहु ॥ सुणि वेखहु लोका एहु विडाणु ॥ मनि अंधा नाउ सुजाणु ॥4॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: महला 1 ॥ (पण्डित ने अपने) इन्द्रियों और नाड़ियों को (ऐसा जनेऊ) नहीं पहनाया (कि वे इन्द्रियां विकारों की तरफ ना जाएं। इस वास्ते) हर रोज उसकी बेइज्जती होती है; पैरों को (ऐसा) जनेऊ नहीं पहनाया (कि वे बुरी तरफ ना ले जाएं)।हाथों को जनेऊ नहीं डाला (कि वे बुरे काम ना करें); जीभ को (कोई) जनेऊ नहीं डाला (कि वह पराई निंदा करने से हटी रहे)।आँखों को (ऐसा) जनेऊ नहीं डाला (कि वे पराई स्त्री की ओर ना देखें)। खुद तो ऐसे जनेऊ के बगैर भटकता फिरता है। पर (कपास के सूत के) धागे बॅट-बॅट के औरों को डालता है। अपने ही जजमानों की बेटियों के विवाह दक्षिणा ले-ले के करता है और पत्री देख-देख के उन्हें रास्ता दिखाता है। हे लोगो ! सुनो।देखो।ये आश्चर्यजनक तमाशा ! (पण्डित खुद तो) मन से अंधा है (भाव।अज्ञानी है)।(पर अपना) नाम (रखवाया हुआ है) ‘सियाना’। 4।
पउड़ी ॥ साहिबु होइ दइआलु किरपा करे ता साई कार कराइसी ॥ सो सेवकु सेवा करे जिस नो हुकमु मनाइसी ॥ हुकमि मंनिऐ होवै परवाणु ता खसमै का महलु पाइसी ॥ खसमै भावै सो करे मनहु चिंदिआ सो फलु पाइसी ॥ ता दरगह पैधा जाइसी ॥15॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (जिस सेवक पर प्रभू) मालिक दयालु हो जाए।मेहर करे।तो उससे वही काम करवाता है (जो उसे भाता है); जिस को अपनी रजा में चलाता है।वह सेवक (प्रभू पति की) सेवा करता है; प्रभू की रजा में राजी रहने के कारण सेवक (प्रभू के दर पर) कबूल हो जाता है और मालिक का घर ढूँढ लेता है। जब सेवक वही काम करता है जो मालिक को अच्छा लगता है तो उसे मन-भाता फल मिलता है। और वह प्रभू की दरगाह में इज्जत से जाता है। 15।
सलोक मः 1 ॥ गऊ बिराहमण कउ करु लावहु गोबरि तरणु न जाई ॥ धोती टिका तै जपमाली धानु मलेछां खाई ॥ अंतरि पूजा पड़हि कतेबा संजमु तुरका भाई ॥ छोडीले पाखंडा ॥ नामि लइऐ जाहि तरंदा ॥1॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ हे भाई ! (दरिया के पत्तन पे बैठ के) गऊ और ब्राहमण को तो आप महसूल लगाता है (भाव।गाय और ब्राहमण को पार लंघाने के लिए कर लगा लेता है)। (फिर आप ये नहीं सोचता कि जो गाय और ब्राहमण खुद नदी नहीं तैर सकते।उस गाय के) गोबर से (पोचा फेरने से।संसार-समुंदर से) पार नहीं लांघा जा सकता। धोती (पहनता है)।टीका (माथे पर लगाता है) और माला (फेरता है)।पर पदार्थ मलेछों के खाता है।(भाव।पदार्थ उन लोगों के खाता है।जिन्हें आप मलेछ कहता है)। अंदर बैठ के (भाव।तुर्क हाकिमों से चोरी-चोरी) पूजा करता है।(बाहर मुसलमानों को दिखाने के लिए) कुरान आदि पढ़ता है।और मुसलमानों वाली ही रहत तूने रखी हुई है। (इस) पाखण्ड को छोड़ दे। अगर प्रभू का नाम सिमरेगा।तो ही (संसार-समुंदर) पार लांघेगा। 1।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (काजी और मुसलमान हाकम) है तो रिश्वतखोर।पर पढ़ते हैं नमाजें। (इन हाकिमों के आगे मुंशी वह खत्री हैं जो) छुरी चलाते हैं (भाव।गरीबों पे जुल्म करते हैं)।पर उनके गले में जनेऊ है। इन (जालिम खत्रियों) के घर में ब्राहमण जा के संख बजाते हैं; तब तो उन ब्राहमणों को भी उन ही पदार्थों का स्वाद आता है (भाव।वे ब्राहमण भी जुल्म के कमाए हुए पदार्थ खाते हैं)। (इन लोगों की) यह झूठी पूँजी है और झूठ ही इनका (ये) व्यापार है। झूठ बोल-बोल के (ही) ये रोजी कमाते हैं। अब शर्म और धर्म की सभा उठ गई है (भाव।ये लोक ना अपनी शर्म-हया का ख्याल करते हैं और ना ही धर्म के काम करते हैं)। हे नानक ! सब जगह झूठ ही प्रधान हो रहा है। (ये खत्री) माथे पर तिलक लगाते हैं।कमर पे गेरूऐ रंग की धोती (बांधते हैं) पर हाथ में (जैसे) छुरी पकड़ी हुई है और (मौका मिलते ही) हरेक जीव पे जुल्म करते हैं।
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।