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अंग ४७१ · आसा

अंग
471
आसा
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  1. नंगा दोजकि चालिआ ता दिसै खरा डरावणा ॥
  2. दइआ कपाह संतोखु सूतु जतु गंढी सतु वटु ॥
  3. लख चोरीआ लख जारीआ लख कूड़ीआ लख गालि ॥
  4. नाइ मंनिऐ पति ऊपजै सालाही सचु सूतु ॥
  5. तगु न इंद्री तगु न नारी ॥
  6. साहिबु होइ दइआलु किरपा करे ता साई कार कराइसी ॥
  7. गऊ बिराहमण कउ करु लावहु गोबरि तरणु न जाई ॥
  8. माणस खाणे करहि निवाज ॥

नंगा दोजकि चालिआ ता दिसै खरा डरावणा ॥

अंग ४७० से चला आ रहा अंश

नंगा दोजकि चालिआ ता दिसै खरा डरावणा ॥
करि अउगण पछोतावणा ॥14॥

हिन्दी अर्थ: (ऐसा जीव) नंगा (किया जाता है।भाव।उसके किए हुए पाप कर्मों का नक्शा उसके सामने रखा जाता है) नर्क में धकेला जाता है।और उस समय (उसे अपने आपको) बड़ा डरावना रूप दिखता है। बुरे काम करके अंत में पछताना ही पड़ता है। 14।

दइआ कपाह संतोखु सूतु जतु गंढी सतु वटु ॥

सलोकु मः 1 ॥
दइआ कपाह संतोखु सूतु जतु गंढी सतु वटु ॥
एहु जनेऊ जीअ का हई त पाडे घतु ॥
ना एहु तुटै ना मलु लगै ना एहु जलै न जाइ ॥
धंनु सु माणस नानका जो गलि चले पाइ ॥
चउकड़ि मुलि अणाइआ बहि चउकै पाइआ ॥
सिखा कंनि चड़ाईआ गुरु ब्राहमणु थिआ ॥
ओहु मुआ ओहु झड़ि पइआ वेतगा गइआ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ ऐसा जनेऊ जिसकी कपास दया हैं।जिसका सूत संतोष का हो।जिसमें जत की गाँठें हों।और जिसका बॅट (वॅट) ऊँचा आचरण हो। हे पण्डित ! अगर (आपके पास) ये आत्मा के काम आने वाला जनेऊ है तो (मेरे गले में) डाल दे (हे पण्डित !) ऐसा जनेऊ ना टूटता है।ना ही इसे मैल लगती है।ना ये जलता है और ना ही ये गायब होता है। हे नानक ! वे मनुष्य भाग्यशाली हैं।जिन्होंने ऐसा जनेऊ अपने गले में पहन लिया है। (हे पण्डित ! ये जनेऊ जो आप पहनाते फिरते हैं।ये तो आपने) चार कौड़ी मूल्य दे के मंगवा लिया।(अपने जजमान के) चौके में बैठ के (उसके गले में) डाल दिया। (फिर आपने उसके) कान में उपदेश दिया (कि आज से आपका) गुरू ब्राहमण हो गया। (समय पूरा होने पर) वह (जजमान) मर गया (तो) वह (जनेऊ उसके शरीर से) गिर गया (भाव।अलग हो गया अथवा जल गया।पर आत्मा के साथ ना निभा।इस वास्ते वह जजमान बेचारा) जनेऊ के बगैर ही (संसार से) चला गया। 1।

लख चोरीआ लख जारीआ लख कूड़ीआ लख गालि ॥

मः 1 ॥
लख चोरीआ लख जारीआ लख कूड़ीआ लख गालि ॥
लख ठगीआ पहिनामीआ राति दिनसु जीअ नालि ॥
तगु कपाहहु कतीऐ बाम॑णु वटे आइ ॥
कुहि बकरा रिंनि॑ खाइआ सभु को आखै पाइ ॥
होइ पुराणा सुटीऐ भी फिरि पाईऐ होरु ॥
नानक तगु न तुटई जे तगि होवै जोरु ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (मनुष्य) लाखों चोरियां और यारियां (यारियां।परस्त्री गमन) करता है; लाखों झूठ बोलता है और गालियां निकालता है। दिनरात लोगों से चोरी-चारी लाखों ठॅगी और पहनामियां करता है।(ये तो है मनुष्य की अंतरात्मा का हाल।पर बाहर से देखिए।लोकाचारी क्या कुछ हो रही है) कपास से (भाव।कपास ला के) धागा काता जाता है और ब्राहमण (जजमान के घर) आ के (उस धागे को) बॅट देता है। (घर आए हुए सारे सगे-संबंधियों को) बकरा मार के पका के खिलाया जाता है; (घर का) हरेक प्राणी कहता है ‘जनेऊ पहना गया है।जनेऊ पहना गया है’। जब ये जनेऊ पुराना हो जाता है तो फेंक दिया जाता है।और इसकी जगह और जनेऊ पहन लिया जाता है। हे नानक ! अगर धागे में जोर हो (भाव।अगर आत्मा के काम आने वाला आत्मा को बल देने वाला जनेऊ हो) तो वह धागा नहीं टूटता। 2।

नाइ मंनिऐ पति ऊपजै सालाही सचु सूतु ॥

मः 1 ॥
नाइ मंनिऐ पति ऊपजै सालाही सचु सूतु ॥
दरगह अंदरि पाईऐ तगु न तूटसि पूत ॥3॥

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (कपास से काते हुए सूत का जनेऊ पहन के ईश्वर के दर पर सुर्खरू होने की आस रखनी व्यर्थ है।रॅब की दरगाह में तभी) आदर मिलता है अगर ईश्वर का नाम दिल में दृढ़ कर लें।(क्योंकि) ईश्वर की सिफत सालाह ही सच्चा जनेऊ है; (ये स्वच्छ जनेऊ धारण करने से) दरगाह में सम्मान मिलता है और ये (कभी) टूटता भी नहीं। 3।

तगु न इंद्री तगु न नारी ॥

मः 1 ॥
तगु न इंद्री तगु न नारी ॥
भलके थुक पवै नित दाड़ी ॥
तगु न पैरी तगु न हथी ॥
तगु न जिहवा तगु न अखी ॥
वेतगा आपे वतै ॥
वटि धागे अवरा घतै ॥
लै भाड़ि करे वीआहु ॥
कढि कागलु दसे राहु ॥
सुणि वेखहु लोका एहु विडाणु ॥
मनि अंधा नाउ सुजाणु ॥4॥

हिन्दी अर्थ: महला 1 ॥ (पण्डित ने अपने) इन्द्रियों और नाड़ियों को (ऐसा जनेऊ) नहीं पहनाया (कि वे इन्द्रियां विकारों की तरफ ना जाएं। इस वास्ते) हर रोज उसकी बेइज्जती होती है; पैरों को (ऐसा) जनेऊ नहीं पहनाया (कि वे बुरी तरफ ना ले जाएं)।हाथों को जनेऊ नहीं डाला (कि वे बुरे काम ना करें); जीभ को (कोई) जनेऊ नहीं डाला (कि वह पराई निंदा करने से हटी रहे)।आँखों को (ऐसा) जनेऊ नहीं डाला (कि वे पराई स्त्री की ओर ना देखें)। खुद तो ऐसे जनेऊ के बगैर भटकता फिरता है। पर (कपास के सूत के) धागे बॅट-बॅट के औरों को डालता है। अपने ही जजमानों की बेटियों के विवाह दक्षिणा ले-ले के करता है और पत्री देख-देख के उन्हें रास्ता दिखाता है। हे लोगो ! सुनो।देखो।ये आश्चर्यजनक तमाशा ! (पण्डित खुद तो) मन से अंधा है (भाव।अज्ञानी है)।(पर अपना) नाम (रखवाया हुआ है) ‘सियाना’। 4।

साहिबु होइ दइआलु किरपा करे ता साई कार कराइसी ॥

पउड़ी ॥
साहिबु होइ दइआलु किरपा करे ता साई कार कराइसी ॥
सो सेवकु सेवा करे जिस नो हुकमु मनाइसी ॥
हुकमि मंनिऐ होवै परवाणु ता खसमै का महलु पाइसी ॥
खसमै भावै सो करे मनहु चिंदिआ सो फलु पाइसी ॥
ता दरगह पैधा जाइसी ॥15॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (जिस सेवक पर प्रभू) मालिक दयालु हो जाए।मेहर करे।तो उससे वही काम करवाता है (जो उसे भाता है); जिस को अपनी रजा में चलाता है।वह सेवक (प्रभू पति की) सेवा करता है; प्रभू की रजा में राजी रहने के कारण सेवक (प्रभू के दर पर) कबूल हो जाता है और मालिक का घर ढूँढ लेता है। जब सेवक वही काम करता है जो मालिक को अच्छा लगता है तो उसे मन-भाता फल मिलता है। और वह प्रभू की दरगाह में इज्जत से जाता है। 15।

गऊ बिराहमण कउ करु लावहु गोबरि तरणु न जाई ॥

सलोक मः 1 ॥
गऊ बिराहमण कउ करु लावहु गोबरि तरणु न जाई ॥
धोती टिका तै जपमाली धानु मलेछां खाई ॥
अंतरि पूजा पड़हि कतेबा संजमु तुरका भाई ॥
छोडीले पाखंडा ॥
नामि लइऐ जाहि तरंदा ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 1॥ हे भाई ! (दरिया के पत्तन पे बैठ के) गऊ और ब्राहमण को तो आप महसूल लगाते हैं (भाव।गाय और ब्राहमण को पार लंघाने के लिए कर लगा लेते हैं)। (फिर आप ये नहीं सोचते कि जो गाय और ब्राहमण खुद नदी नहीं तैर सकते।उस गाय के) गोबर से (पोचा फेरने से।संसार-समुंदर से) पार नहीं लांघा जा सकता। धोती (पहनते हैं)।टीका (माथे पर लगाते हैं) और माला (फेरते हैं)।पर पदार्थ मलेछों के खाता है।(भाव।पदार्थ उन लोगों के खाता है।जिन्हें आप मलेछ कहते हैं)। अंदर बैठ के (भाव।तुर्क हाकिमों से चोरी-चोरी) पूजा करता है।(बाहर मुसलमानों को दिखाने के लिए) कुरान आदि पढ़ता है।और मुसलमानों वाली ही रहत आपने रखी हुई है। (इस) पाखण्ड को छोड़ दे। अगर प्रभू का नाम सिमरेगा।तो ही (संसार-समुंदर) पार लांघेगा। 1।

माणस खाणे करहि निवाज ॥

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मः 1 ॥
माणस खाणे करहि निवाज ॥
छुरी वगाइनि तिन गलि ताग ॥
तिन घरि ब्रहमण पूरहि नाद ॥
उन॑ा भि आवहि ओई साद ॥
कूड़ी रासि कूड़ा वापारु ॥
कूड़ु बोलि करहि आहारु ॥
सरम धरम का डेरा दूरि ॥
नानक कूड़ु रहिआ भरपूरि ॥
मथै टिका तेड़ि धोती कखाई ॥
हथि छुरी जगत कासाई ॥

हिन्दी अर्थ: महला 1॥ (काजी और मुसलमान हाकम) है तो रिश्वतखोर।पर पढ़ते हैं नमाजें। (इन हाकिमों के आगे मुंशी वह खत्री हैं जो) छुरी चलाते हैं (भाव।गरीबों पे जुल्म करते हैं)।पर उनके गले में जनेऊ है। इन (जालिम खत्रियों) के घर में ब्राहमण जा के संख बजाते हैं; तब तो उन ब्राहमणों को भी उन ही पदार्थों का स्वाद आता है (भाव।वे ब्राहमण भी जुल्म के कमाए हुए पदार्थ खाते हैं)। (इन लोगों की) यह झूठी पूँजी है और झूठ ही इनका (ये) व्यापार है। झूठ बोल-बोल के (ही) ये रोजी कमाते हैं। अब शर्म और धर्म की सभा उठ गई है (भाव।ये लोक ना अपनी शर्म-हया का ख्याल करते हैं और ना ही धर्म के काम करते हैं)। हे नानक ! सब जगह झूठ ही प्रधान हो रहा है। (ये खत्री) माथे पर तिलक लगाते हैं।कमर पे गेरूऐ रंग की धोती (बांधते हैं) पर हाथ में (जैसे) छुरी पकड़ी हुई है और (मौका मिलते ही) हरेक जीव पे जुल्म करते हैं।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला १: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ४७१ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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