ता मेरै मनि भइआ निधाना ॥1॥
रतन लाल जा का कछू न मोलु ॥ भरे भंडार अखूट अतोल ॥2॥
खावहि खरचहि रलि मिलि भाई ॥
तोटि न आवै वधदो जाई ॥3॥
कहु नानक जिसु मसतकि लेखु लिखाइ ॥
सु एतु खजानै लइआ रलाइ ॥4॥31॥100॥
डरि डरि मरते जब जानीऐ दूरि ॥
डरु चूका देखिआ भरपूरि ॥1॥
सतिगुर अपने कउ बलिहारै ॥
छोडि न जाई सरपर तारै ॥1॥ रहाउ ॥
दूखु रोगु सोगु बिसरै जब नामु ॥
सदा अनंदु जा हरि गुण गामु ॥2॥
बुरा भला कोई न कहीजै ॥
छोडि मानु हरि चरन गहीजै ॥3॥
कहु नानक गुर मंत्रु चितारि ॥
सुखु पावहि साचै दरबारि ॥4॥32॥101॥
जा का मीतु साजनु है समीआ ॥
तिसु जन कउ कहु का की कमीआ ॥1॥
जा की प्रीति गोबिंद सिउ लागी ॥
दूखु दरदु भ्रमु ता का भागी ॥1॥ रहाउ ॥
जा कउ रसु हरि रसु है आइओ ॥
सो अन रस नाही लपटाइओ ॥2॥
जा का कहिआ दरगह चलै ॥
सो किस कउ नदरि लै आवै तलै ॥3॥
जा का सभु किछु ता का होइ ॥
नानक ता कउ सदा सुखु होइ ॥4॥33॥102॥
जा कै दुखु सुखु सम करि जापै ॥
ता कउ काड़ा कहा बिआपै ॥1॥
सहज अनंद हरि साधू माहि ॥
आगिआकारी हरि हरि राइ ॥1॥ रहाउ ॥
जा कै अचिंतु वसै मनि आइ ॥
ता कउ चिंता कतहूं नाहि ॥2॥
जा कै बिनसिओ मन ते भरमा ॥
ता कै कछू नाही डरु जमा ॥3॥
जा कै हिरदै दीओ गुरि नामा ॥
कहु नानक ता कै सगल निधाना ॥4॥34॥103॥
अगम रूप का मन महि थाना ॥
गुर प्रसादि किनै विरलै जाना ॥1॥
सहज कथा के अंम्रित कुंटा ॥
जिसहि परापति तिसु लै भुंचा ॥1॥ रहाउ ॥
अनहत बाणी थानु निराला ॥
ता की धुनि मोहे गोपाला ॥2॥
तह सहज अखारे अनेक अनंता ॥
पारब्रहम के संगी संता ॥3॥
हरख अनंत सोग नही बीआ ॥
सो घरु गुरि नानक कउ दीआ ॥4॥35॥104॥
कवन रूपु तेरा आराधउ ॥
कवन जोग काइआ ले साधउ ॥1॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जब मैंने गुरू नानक देव से लेकर सारे गुरू साहिबान की बाणी का खजाना खोल के देखा, तब मेरे मन में आत्मिक आनंद का भण्डार भर गया।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।