अंग 186

अंग
186
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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पीऊ दादे का खोलि डिठा खजाना ॥
ता मेरै मनि भइआ निधाना ॥1॥
रतन लाल जा का कछू न मोलु ॥ भरे भंडार अखूट अतोल ॥2॥
खावहि खरचहि रलि मिलि भाई ॥
तोटि न आवै वधदो जाई ॥3॥
कहु नानक जिसु मसतकि लेखु लिखाइ ॥
सु एतु खजानै लइआ रलाइ ॥4॥31॥100॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जब मैंने गुरू नानक देव से लेकर सारे गुरू साहिबान की बाणी का खजाना खोल के देखा, तब मेरे मन में आत्मिक आनंद का भण्डार भर गया। 1। इस खजाने में परमात्मा की सिफत सालाह के अमोलक रत्नों-लालों के भण्डार भरे हुए (मैंने देखे), जो कभी खत्म नहीं हो सकते, जो तौले नहीं जा सकते। 2। हे भाई ! जो मनुष्य (सत्संग में) इकट्ठे हो के इन भण्डारों को खुद इस्तेमाल करते हैं व औरों को भी बाँटते हैं, उनके पास इस खजाने की कमी नहीं होती, बल्कि और और बढ़होत्तरी होती है। 3। (पर) हे नानक ! कह, जिस मनुष्य के माथे पे परमात्मा की बख्शिश का लेख लिखा होता है, वही इस (सिफत सालाह के) खजाने में भागीदार बनाया जाता है (भाव, वही साध-संगति में आ के सिफत सालाह की बाणी का आनंद पाता है)। 4। 31। 100।
गउड़ी महला 5 ॥
डरि डरि मरते जब जानीऐ दूरि ॥
डरु चूका देखिआ भरपूरि ॥1॥
सतिगुर अपने कउ बलिहारै ॥
छोडि न जाई सरपर तारै ॥1॥ रहाउ ॥
दूखु रोगु सोगु बिसरै जब नामु ॥
सदा अनंदु जा हरि गुण गामु ॥2॥
बुरा भला कोई न कहीजै ॥
छोडि मानु हरि चरन गहीजै ॥3॥
कहु नानक गुर मंत्रु चितारि ॥
सुखु पावहि साचै दरबारि ॥4॥32॥101॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ जब तक हम ये समझते हैं कि परमात्मा कहीं दूर बसता है, तब तक (दुनिया के दुख रोग फिक्रों से) सहम सहम के आत्मिक मौत मरते रहते हैं। जब उसे (सारे संसार में कण कण में) व्यापक देख लिया, (उस वक्त दुनिया के दुख आदिक का) भय खत्म हो गया। 1। मैं अपने गुरू से कुर्बान जाता हूँ, वह (दुख-रोग-सोग आदिक के समुंद्र में हम डूबतों को) छोड़ के नहीं जाता, वह (इस समुंद्र में से) जरूर पार लंघाता है। 1। रहाउ। (हे भाई !दुनिया का) दुख रोग फिक्र (तभी व्यापता) है जब परमात्मा का नाम भूल जाता है। जब परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाते हैं तो (मन में) सदा आनंद बना रहता है। 2। (हे भाई !) ना किसी की निंदा करनी चाहिए, ना किसी की खुशामद। (दुनिया का) मान त्याग के परमात्मा के चरण (हृदय में) टिका लेने चाहिए। 3। हे नानक ! कह, (हे भाई !) गुरू का उपदेश अपने चित्त में परोए रख, सदा कायम रहने वाले परमात्मा की दरगाह में आनंद पाऐगा। 4। 32। 101।
गउड़ी महला 5 ॥
जा का मीतु साजनु है समीआ ॥
तिसु जन कउ कहु का की कमीआ ॥1॥
जा की प्रीति गोबिंद सिउ लागी ॥
दूखु दरदु भ्रमु ता का भागी ॥1॥ रहाउ ॥
जा कउ रसु हरि रसु है आइओ ॥
सो अन रस नाही लपटाइओ ॥2॥
जा का कहिआ दरगह चलै ॥
सो किस कउ नदरि लै आवै तलै ॥3॥
जा का सभु किछु ता का होइ ॥
नानक ता कउ सदा सुखु होइ ॥4॥33॥102॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ जिस मनुष्य को (ये यकीन बन जाए कि उसका) सज्जन प्रभू, मित्र प्रभू हर जगह व्यापक है, (हे भाई !) बता, उस मनुष्य को (फिर) किस चीज की कमी रह जाती है?। 1। (हे भाई !) जिस मनुष्य का प्यार परमात्मा के साथ बन जाता है उसके हरेक दुख, हरेक दर्द, हरेक भरम-वहिम दूर हो जाते हैं। रहाउ। (हे भाई !) जिस मनुष्य को परमात्मा के नाम का आनंद आ जाता है, वह (दुनिया के) अन्य (पदार्थों के) स्वादों से नहीं चिपकता। 2। जिस मनुष्य के बोले हुए बोल परमात्मा की हजूरी में माने जाते हैं, उसे किसी और की मुथाजी (अधीनगी) नहीं रह जाती। 3। जिस परमातमा का रचा हुआ ये संसार है उस परमात्मा का सेवक जो मनुष्य बन जाता है हे नानक ! उसे सदा आनंद प्राप्त रहता है। 4। 33। 102।
गउड़ी महला 5 ॥
जा कै दुखु सुखु सम करि जापै ॥
ता कउ काड़ा कहा बिआपै ॥1॥
सहज अनंद हरि साधू माहि ॥
आगिआकारी हरि हरि राइ ॥1॥ रहाउ ॥
जा कै अचिंतु वसै मनि आइ ॥
ता कउ चिंता कतहूं नाहि ॥2॥
जा कै बिनसिओ मन ते भरमा ॥
ता कै कछू नाही डरु जमा ॥3॥
जा कै हिरदै दीओ गुरि नामा ॥
कहु नानक ता कै सगल निधाना ॥4॥34॥103॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (प्रभू की रजा में चलने के कारण) जिस मनुष्य के हृदय में हरेक दुख सुख एक जैसा ही प्रतीत होता है, उसे कोई चिंता-फिक्र कभी दबा नहीं सकती। 1। (हे भाई !) परमात्मा के भगत के हृदय में (सदा) आत्मिक अडोलता बनी रहती है, (सदा) आत्मिक आनंद बना रहता है। (हरी का भक्त) हरी-प्रभू की आज्ञा में ही चलता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) चिंता-रहित परमात्मा जिस मनुष्य के हृदय में आ बसता है, उसे कभी कोई चिंता नहीं सताती। 2। जिस मनुष्य के मन से भटकना खत्म हो जाती है, उसके मन में मौत का डर नहीं रह जाता। 3। हे नानक ! कह, गुरू ने जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम टिका दिया है उसके अंदर, जैसे, सारे खजाने आ जाते हैं। 4। 34। 103।
गउड़ी महला 5 ॥
अगम रूप का मन महि थाना ॥
गुर प्रसादि किनै विरलै जाना ॥1॥
सहज कथा के अंम्रित कुंटा ॥
जिसहि परापति तिसु लै भुंचा ॥1॥ रहाउ ॥
अनहत बाणी थानु निराला ॥
ता की धुनि मोहे गोपाला ॥2॥
तह सहज अखारे अनेक अनंता ॥
पारब्रहम के संगी संता ॥3॥
हरख अनंत सोग नही बीआ ॥
सो घरु गुरि नानक कउ दीआ ॥4॥35॥104॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 ॥ (जिस मन में सिफत सालाह के चश्मे जारी हो जाते हैं) उस मन में अपहुँच स्वरूप वाले परमात्मा का निवास हो जाता है। (पर) किसी विरले मनुष्य ने गुरू की कृपा से (ये भेद) समझा है। 1। आत्मिक अडोलता और सिफत सलाह के अमृत के चश्मों का आनंद जिस मनुष्य के भाग्यों में प्राप्ति का लेख होता है वह (गुरू की कृपा से) पाता है। 1। रहाउ। (जहाँ सिफत सालाह और आत्मिक अडोलता के चश्मे चल पड़ते हैं) उसका हृदय-स्थल एक-रस सिफत सालाह की बाणी की बरकति से अनोखा (सुंदर) हो जाता है। उसकी जुड़ी सुरति पर परमात्मा (भी) मोहित हो जाता है। 2। वहाँ- आत्मिक अडोलता के अनेकों और बेअंत अखाड़े रच के रखते हैं जहाँ – संत जन परमात्मा के चरणों में जुड़ जुड़ें होते हैं । 3। (उस अवस्था में) बेअंत खुशी ही खुशी बनी रहती है, किसी तरह की अन्य कोई चिंता फिक्र नहीं। (हे भाई !) गुरू ने वह आत्मिक ठिकाना (मुझे) नानक को (भी) बख्शा है। 4। 35। 104।
गउड़ी मः 5 ॥
कवन रूपु तेरा आराधउ ॥
कवन जोग काइआ ले साधउ ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी मः 5 ॥ मैं नहीं जानता कि) आपका वह कौन सा रूप है जिसका मैं ध्यान धरूँ। (हे प्रभू ! मुझे समझ नहीं कि) जोग का वह कौन सा साधन है जिससे मैं अपने शरीर को वश में ले आऊँ (और आपको प्रसन्न करूँ)। योग साधना के साथ आपको खुश नहीं किया जा सकता। 1।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जब मैंने गुरू नानक देव से लेकर सारे गुरू साहिबान की बाणी का खजाना खोल के देखा, तब मेरे मन में आत्मिक आनंद का भण्डार भर गया।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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