कवन बोल पारब्रहम रीझावउ ॥1॥ रहाउ ॥
कवन सु पूजा तेरी करउ ॥
कवन सु बिधि जितु भवजल तरउ ॥2॥
कवन तपु जितु तपीआ होइ ॥
कवनु सु नामु हउमै मलु खोइ ॥3॥
गुण पूजा गिआन धिआन नानक सगल घाल ॥
जिसु करि किरपा सतिगुरु मिलै दइआल ॥4॥
तिस ही गुनु तिन ही प्रभु जाता ॥
जिस की मानि लेइ सुखदाता ॥1॥ रहाउ दूजा ॥36॥105॥
आपन तनु नही जा को गरबा ॥
राज मिलख नही आपन दरबा ॥1॥
आपन नही का कउ लपटाइओ ॥
आपन नामु सतिगुर ते पाइओ ॥1॥ रहाउ ॥
सुत बनिता आपन नही भाई ॥
इसट मीत आप बापु न माई ॥2॥
सुइना रूपा फुनि नही दाम ॥
हैवर गैवर आपन नही काम ॥3॥
कहु नानक जो गुरि बखसि मिलाइआ ॥
तिस का सभु किछु जिस का हरि राइआ ॥4॥37॥106॥
गुर के चरण ऊपरि मेरे माथे ॥
ता ते दुख मेरे सगले लाथे ॥1॥
सतिगुर अपुने कउ कुरबानी ॥
आतम चीनि परम रंग मानी ॥1॥ रहाउ ॥
चरण रेणु गुर की मुखि लागी ॥
अहंबुधि तिनि सगल तिआगी ॥2॥
गुर का सबदु लगो मनि मीठा ॥
पारब्रहमु ता ते मोहि डीठा ॥3॥
गुरु सुखदाता गुरु करतारु ॥
जीअ प्राण नानक गुरु आधारु ॥4॥38॥107॥
रे मन मेरे तूं ता कउ आहि ॥ जा कै ऊणा कछहू नाहि ॥1॥
हरि सा प्रीतमु करि मन मीत ॥
प्रान अधारु राखहु सद चीत ॥1॥ रहाउ ॥
रे मन मेरे तूं ता कउ सेवि ॥
आदि पुरख अपरंपर देव ॥2॥
तिसु ऊपरि मन करि तूं आसा ॥
आदि जुगादि जा का भरवासा ॥3॥
जा की प्रीति सदा सुखु होइ ॥
नानकु गावै गुर मिलि सोइ ॥4॥39॥108॥
मीतु करै सोई हम माना ॥
मीत के करतब कुसल समाना ॥1॥
एका टेक मेरै मनि चीत ॥
जिसु किछु करणा सु हमरा मीत ॥1॥ रहाउ ॥
मीतु हमारा वेपरवाहा ॥
गुर किरपा ते मोहि असनाहा ॥2॥
मीतु हमारा अंतरजामी ॥
समरथ पुरखु पारब्रहमु सुआमी ॥3॥
हम दासे तुम ठाकुर मेरे ॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अर्थ: हे पारब्रह्म प्रभू ! (आपके बेअंत गुण हैं, मुझे समझ नहीं आती कि) मैं आपका कौन सा गुण ले के आपकी सिफत सालाह करूँ, और कौन से बोल बोल के आपको प्रसन्न करूँ? (हे प्रभू ! जगत के सार।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।