अंग 185

अंग
185
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हरि हरि नामु जीअ प्रान अधारु ॥
साचा धनु पाइओ हरि रंगि ॥
दुतरु तरे साध कै संगि ॥3॥
सुखि बैसहु संत सजन परवारु ॥
हरि धनु खटिओ जा का नाहि सुमारु ॥
जिसहि परापति तिसु गुरु देइ ॥
नानक बिरथा कोइ न हेइ ॥4॥27॥96॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हरी का नाम ही उस मनुष्य की जिंदगी के प्राणों का आसरा बन जाता है। वह मनुष्य हरी के प्रेम रंग में (मस्त हो के) सदा साथ निभने वाला नाम-धन हासिल कर लेता है। जो मनुष्य गुरू की संगति में रहता है, वह इस मुश्किल से तैरे जाने वाले संसार समुंद्र से पार लांघ जाता है। हे संत जनो ! प्रिवार बन के (मेर-तेर दूर करके, पूर्ण प्रेम से) आत्मिक आनंद में मिल बैठो। (जो मनुष्य गुरमुखों की संगति में बैठता है उसने) वह हरी-नाम धन कमा लिया जिसका अंदाजा नहीं लग सकता। हे नानक ! (प्रभू की मेहर से) जिसके भाग्यों में (नाम धन) लिखा हुआ है, उसे गुरू (नाम-धन) देता है, (गुरू के दर पर आ के) कोई मनुष्य खाली नहीं रह जाता। 4। 27। 96।
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
हसत पुनीत होहि ततकाल ॥
बिनसि जाहि माइआ जंजाल ॥
रसना रमहु राम गुण नीत ॥
सुखु पावहु मेरे भाई मीत ॥1॥
लिखु लेखणि कागदि मसवाणी ॥
राम नाम हरि अंम्रित बाणी ॥1॥ रहाउ ॥
इह कारजि तेरे जाहि बिकार ॥
सिमरत राम नाही जम मार ॥
धरम राइ के दूत न जोहै ॥
माइआ मगन न कछूऐ मोहै ॥2॥
उधरहि आपि तरै संसारु ॥
राम नाम जपि एकंकारु ॥
आपि कमाउ अवरा उपदेस ॥
राम नाम हिरदै परवेस ॥3॥
जा कै माथै एहु निधानु ॥
सोई पुरखु जपै भगवानु ॥
आठ पहर हरि हरि गुण गाउ ॥
कहु नानक हउ तिसु बलि जाउ ॥4॥28॥97॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ उस वक्त आपके हाथ पवित्र हैं जाएंगे, आपके (माया के मोह के) बंधन दूर हैं जाएंगे हे मेरे भाई ! हे मेरे मित्र ! अपनी जीभ से सदा परमात्मा की सिफत सालाह के गुण गाता रह, आप आत्मिक आनंद पाएगा। 1। (हे मेरे भाई ! अपनी ‘सुरति’ की) कलम (ले के अपनी ‘करणी’ के) कागज़ पर (‘मन’ की) दवात से परमात्मा का नाम लिख। आत्मिक जीवन देने वाली सिफत सालाह की बाणी लिख। 1। रहाउ। (हे मेरे वीर ! हे मेरे मित्र !) इस काम को करने से आपके (अंदर से) विकार भाग जाएंगे। परमात्मा का नाम सिमरने से (आपके वास्ते) आत्मिक मौत नहीं रहेगी। (कामादिक) दूत जो धर्मराज के वश में डालते हैं आपकी तरफ देख भी नहीं सकेंगे। आप माया (के मोह) में नहीं डूबेगा, कोई भी चीज आपको मोह नहीं सकेगी। 2। आप खुद (विकारों से) बच जाएगा, (आपकी संगति में) जगत भी (विकारों के समुंद्र से) पार लांघ जाएगा। (हे मेरे वीर ! हे मेरे मित्र !) परमात्मा का नाम जप। इक ओअंकार को सिमरता रह। (हे मेरे वीर !) आप स्वयं नाम सिमरन की कमाई कर, औरों को भी उपदेश कर। परमात्मा का नाम अपने हृदय में बसा। 3। जिसके माथे पे (भगवान की कृपा से) ये खजाना (प्राप्त करने का लेख लिखा हुआ) है। (पर हे मेरे वीर !) वही मनुष्य भगवान को याद करता है जो आठों पहर (हर वक्त) परमात्मा के गुण गाता रहता है हे नानक कह, मैं उस मनुष्य से कुर्बान जाता हूँ। 4। 28। 97।
रागु गउड़ी गुआरेरी महला 5 चउपदे दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जो पराइओ सोई अपना ॥
जो तजि छोडन तिसु सिउ मनु रचना ॥1॥
कहहु गुसाई मिलीऐ केह ॥
जो बिबरजत तिस सिउ नेह ॥1॥ रहाउ ॥
झूठु बात सा सचु करि जाती ॥
सति होवनु मनि लगै न राती ॥2॥
बावै मारगु टेढा चलना ॥
सीधा छोडि अपूठा बुनना ॥3॥
दुहा सिरिआ का खसमु प्रभु सोई ॥
जिसु मेले नानक सो मुकता होई ॥4॥29॥98॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी गुआरेरी महला 5 चउपदे दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (माल धन आदिक) जो (अंत में) बेगाना हो जाना है, उसे हम अपना माने बैठे हैं, हमारा मन उस (माल धन) से मस्त रहता है, जिसे (आखिर) छोड़ जाना है। 1। अर्थ: (हे भाई !) बताओ, हम प्रभू-पति से कैसे मिल सकते हैं, अगर हमारा (सदा) उस माया से प्यार है, जिससे हमें मना किया हुआ है? । 1। रहाउ। (ये ख्याल झूठा है कि हमने यहाँ सदा बैठे रहना है, पर यह) जो झूठी बात है इसे हमने ठीक समझा हुआ है। (मौत) जो अवश्यंभावी है, हमारे मन को रत्ती भर नहीं जचती। 2। (बुरी तरफ प्यार डालने के कारण) हमने बुरी तरफ जीवन का रास्ता पकड़ा हुआ है, हम जीवन की टेढ़ी चाल चल रहे हैं। जीवन का सीधा राह छोड़ के हम जीवन डोर की उल्टी बुनाई कर रहे हैं। 3। (पर) हे नानक ! (जीवों के भी क्या वश?) (जीवन के अच्छे और बुरे) दोनों तरफ का मालिक परमात्मा स्वयं ही है। जिस मनुष्य को परमात्मा (अपने चरणों में) जोड़ता है, वे बुरे राह से बच जाते हैं। 4। 29। 98।
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
कलिजुग महि मिलि आए संजोग ॥
जिचरु आगिआ तिचरु भोगहि भोग ॥1॥
जलै न पाईऐ राम सनेही ॥
किरति संजोगि सती उठि होई ॥1॥ रहाउ ॥
देखा देखी मनहठि जलि जाईऐ ॥
प्रिअ संगु न पावै बहु जोनि भवाईऐ ॥2॥
सील संजमि प्रिअ आगिआ मानै ॥
तिसु नारी कउ दुखु न जमानै ॥3॥
कहु नानक जिनि प्रिउ परमेसरु करि जानिआ ॥
धंनु सती दरगह परवानिआ ॥4॥30॥99॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ इस कलेशों भरी दुनिया में (स्त्री और पति) पिछले सम्बंधों के कारण मिल के आ इकट्ठे होते हैं। जितना वक्त (परमात्मा से) हुकम मिलता है उतना समय (दोनों मिल के जगत के) पदार्थ भोगते हैं। 1। (पति की चिता में जल मरती है, पर आग में) जलने से प्यार करने वाला पति नहीं मिल सकता (अपने मरे पति के साथ दुबारा) किए जा सकने वाले मिलाप की खातिर (स्त्री) उठ के सती हैं जाती है। 1। रहाउ। एक दूसरी को देख के मन के हठ के साथ (ही) जल जाते हैं (पर मरे पति की चिता में जल के स्त्री अपने) प्यारे का साथ नहीं प्राप्त कर सकती। (इस तरह बल्कि) कई जूनियों में भटकते हैं। 2। जो स्त्री मीठे स्वभाव की जुगति में रह के (अपने) प्यारे (पति) का हुकम मानती है, उस स्त्री को यमों का दुख नहीं छू सकता। 3। हे नानक ! कह, जिस (स्त्री) ने अपने पति को ही एक पति कर के समझा है (भाव, सिर्फ अपने पति में ही पति-भावना रखी है) जैसे भक्त का पति एक परमात्मा है। वह स्त्री असली सती है, वह भाग्यशाली है, वह परमात्मा की हजूरी में कबूल है। 4। 30। 99।
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
हम धनवंत भागठ सच नाइ ॥
हरि गुण गावह सहजि सुभाइ ॥1॥ रहाउ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ (ज्यों ज्यों) हम परमात्मा के गुण (मिल के) गाते हैं, सदा स्थिर प्रभू के नाम की बरकति से हम (परमात्मा के नाम धन के) धनी बनते जा रहे हैं। भाग्यशाली बनते जा रहे हैं, आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं, प्रेम में मगन रहते हैं। 1। रहाउ।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हरी का नाम ही उस मनुष्य की जिंदगी के प्राणों का आसरा बन जाता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
English