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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 184 · गउड़ी

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अंग
184
गउड़ी
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  1. जन की टेक एक गोपाल ॥
  2. जिसु मनि वसै तरै जनु सोइ ॥
  3. जीअ जुगति जा कै है हाथ ॥
  4. गुर परसादि नामि मनु लागा ॥

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग गउड़ी

जन की टेक एक गोपाल ॥

अंग 183 से चला आ रहा अंश

जन की टेक एक गोपाल ॥
एका लिव एको मनि भाउ ॥
सरब निधान जन कै हरि नाउ ॥3॥
पारब्रहम सिउ लागी प्रीति ॥
निरमल करणी साची रीति ॥
गुरि पूरै मेटिआ अंधिआरा ॥
नानक का प्रभु अपर अपारा ॥4॥24॥93॥

हिन्दी अर्थ: एक गोपाल प्रभू ही सेवक की जिंदगी का आसरा बन जाता है। (गुरू की शरण आए मनुष्य को) एक परमात्मा की ही लगन लग जाती है, उसके मन में एक परमात्मा का ही प्यार (टिक जाता है)। सेवक के दिल में परमात्मा का नाम ही (दुनिया के) सारे खजाने बन जाता है। 3। उसकी प्रीति परमात्मा के साथ पक्की बन जाती है, उसका जीवन पवित्र हो जाता है, उसकी जीवन मर्यादा (विकारों के आक्रमण से) अडोल हो जाती है। (परमात्मा की मेहर से) पूरे गुरू ने (जिस मनुष्य के अंदर से माया के मोह का) अंधेरा दूर कर दिया, (हे भाई ! ये सारी मेहर परमात्मा की ही है) नानक का प्रभू परे से परे है और बेअंत है। 4। 24। 93।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग गउड़ी

जिसु मनि वसै तरै जनु सोइ ॥

गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
जिसु मनि वसै तरै जनु सोइ ॥
जा कै करमि परापति होइ ॥
दूखु रोगु कछु भउ न बिआपै ॥
अंम्रित नामु रिदै हरि जापै ॥1॥
पारब्रहमु परमेसुरु धिआईऐ ॥
गुर पूरे ते इह मति पाईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
करण करावनहार दइआल ॥
जीअ जंत सगले प्रतिपाल ॥
अगम अगोचर सदा बेअंता ॥
सिमरि मना पूरे गुर मंता ॥2॥
जा की सेवा सरब निधानु ॥
प्रभ की पूजा पाईऐ मानु ॥
जा की टहल न बिरथी जाइ ॥
सदा सदा हरि के गुण गाइ ॥3॥
करि किरपा प्रभ अंतरजामी ॥
सुख निधान हरि अलख सुआमी ॥
जीअ जंत तेरी सरणाई ॥
नानक नामु मिलै वडिआई ॥4॥25॥94॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ वह परमात्मा जिस मनुष्य के मन में बस जाता है वह (वह दुखों रोगों विकारों के समुंद्र में से) पार लांघ जाता है। जिस (परमात्मा) की कृपा से (उसके नाम की) प्राप्ति होती है, (संसार का) कोई दुख, कोई रागे, कोई डर उस पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकता (क्योंकि) वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला हरि नाम अपने दिल में जपता रहता है। 1। (हे भाई !) अकाल पुरख परमेश्वर का सिमरन करना चाहिए। (सिमरन की) ये सूझ गुरू के पास से मिलती है। 1। रहाउ। जो सब कुछ करने की स्मर्था रखता है, जो जीवों से सब कुछ करवाने की ताकत रखता है। जो दया का घर है, जो सारे जीव-जंतुओं की पालना करता है, जो अपहुँच है, जिस तक मनुष्य की ज्ञानेंद्रियों की पहुँच नहीं हो सकती, जिसके गुणों का कभी अंत नहीं पाया जा सकता हे (मेरे) मन ! पूरे गुरू के उपदेश पर चल के उस (परमात्मा) को सिमर। 2। जिसकी सेवा-भक्ति में ही (जगत के) सारे खजाने हैं। जिस हरी की पूजा करने से (हर जगह) आदर सत्कार मिलता है, और जिसकी की हुई सेवा निष्फल नहीं जाती (हे भाई !) सदा ही सदा उस हरी के गुण गाता रह। 3। हे नानक ! (प्रभू दर पर प्रार्थना कर और कह) हे अंतरजामी प्रभू ! हे सुखों के खजाने प्रभू ! हे अदृष्ट स्वामी ! सारे जीव-जंतु आपकी शरण हैं (आपके ही आसरे हैं, मैं भी आपकी शरण आया हूँ) मेहर कर, मुझे आपका नाम मिल जाए (आपका नाम ही मेरे वास्ते) बड़प्पन है। 4।25।94।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग गउड़ी

जीअ जुगति जा कै है हाथ ॥

गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
जीअ जुगति जा कै है हाथ ॥
सो सिमरहु अनाथ को नाथु ॥
प्रभ चिति आए सभु दुखु जाइ ॥
भै सभ बिनसहि हरि कै नाइ ॥1॥
बिनु हरि भउ काहे का मानहि ॥
हरि बिसरत काहे सुखु जानहि ॥1॥ रहाउ ॥
जिनि धारे बहु धरणि अगास ॥
जा की जोति जीअ परगास ॥
जा की बखस न मेटै कोइ ॥
सिमरि सिमरि प्रभु निरभउ होइ ॥2॥
आठ पहर सिमरहु प्रभ नामु ॥
अनिक तीरथ मजनु इसनानु ॥
पारब्रहम की सरणी पाहि ॥
कोटि कलंक खिन महि मिटि जाहि ॥3॥
बेमुहताजु पूरा पातिसाहु ॥
प्रभ सेवक साचा वेसाहु ॥
गुरि पूरै राखे दे हाथ ॥
नानक पारब्रहम समराथ ॥4॥26॥95॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ जिसके हाथों में सब जीवों की जीवन मर्यादा है। (हे भाई !) उस अनाथों के नाथ परमात्मा का सिमरन करें, (हे भाई !) यदि परमात्मा (मनुष्य के) मन में बस जाए तो (उसका) हरेक दुख दूर हो जाता है। परमात्मा के नाम की बरकति के साथ सारे डर नाश हो जाते हैं। 1। (हे भाई !) आप परमात्मा के बिना और किसी का डर क्यूँ मानते हैं? परमात्मा को भुला के और कौन सा सुख समझते हैं?। 1। रहाउ। जिसने अनेकों धरतियों, आकाशों को सहारा दिया हुआ है। जिसकी ज्योति सारे जीवों में प्रकाश कर रही है, और जिस की (की हुई कृपा को कोई मिटा नहीं सकता) (कोई रोक नहीं सकता)। (हे भाई !) उस प्रभू को सदा सिमरें, (जो मनुष्य उस प्रभू को सिमरता है वह दुनिया के डरों से) निडर हो जाता है। 2। (हे भाई !) आठों पहर (हर वक्त) प्रभू का नाम सिमरते रहें। (ये सिमरन ही) अनेकों तीर्थों का स्नान है। यदि आप परमात्मा की शरण पड़ जाएँ तो आपके करोड़ों पाप एक पल में नाश हो जाएं। 3। हे नानक ! परमात्मा को किसी की मुथाजी नहीं, किसी के आसरे नहीं। वह सब गुणों का मालिक है, वह सब गुणों का बादशाह है। प्रभू के सेवकों को प्रभू का अटॅल भरोसा रहता है। (हे भाई !) परमात्मा पूरे गुरू के द्वारा (अपने सेवकों को सब कलंकों से) हाथ दे कर बचाता है। परमात्मा सब ताकतों का मालिक है। 4। 26। 95।

गुरु अर्जन देव जी · शबद · राग गउड़ी

गुर परसादि नामि मनु लागा ॥

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गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
गुर परसादि नामि मनु लागा ॥
जनम जनम का सोइआ जागा ॥
अंम्रित गुण उचरै प्रभ बाणी ॥
पूरे गुर की सुमति पराणी ॥1॥
प्रभ सिमरत कुसल सभि पाए ॥
घरि बाहरि सुख सहज सबाए ॥1॥ रहाउ ॥
सोई पछाता जिनहि उपाइआ ॥
करि किरपा प्रभि आपि मिलाइआ ॥
बाह पकरि लीनो करि अपना ॥
हरि हरि कथा सदा जपु जपना ॥2॥
मंत्रु तंत्रु अउखधु पुनहचारु ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ प्रभू की (सिफत सालाह की) बाणी उचारता है वह जन्मों जन्मांतरों का (माया के मोह की नींद में) सोया हुआ (भी) जाग पड़ता है। वह प्रभू के आत्मिक जीवन देने वाले गुण उचारता है, जिस प्राणी को पूरे गुरू की श्रेष्ठ मति प्राप्त होती है । 1। (जो मनुष्य परमात्मा का सिमरन करता है) प्रभू का सिमरन करते हुए उसने सारे सुख प्राप्त कर लिए, उसके हृदय में (भी) आत्मिक अडोलता के सारे आनंद, जगत से बरतते हुए भी उसे आत्मिक अडोलता के सारे आनंद प्राप्त होते हैं। 1। रहाउ। उस मनुष्य ने उसी प्रभू से गहरी सांझ डाल ली, जिस प्रभू ने उसे पैदा किया है। प्रभू ने मेहर करके जिस मनुष्य को स्वयं (अपने चरणों में) जोड़ लिया, जिस मनुष्य को प्रभू ने बाँह पकड़ कर अपना बना लिया, वह मनुष्य सदैव प्रभू की सिफत सालाह की बातें करता है। प्रभू के नाम का जाप जपता है। 2। (मोह की नींद दूर करने के लिए परमात्मा का नाम ही उसके वास्ते) मंत्र है। नाम ही जादू है, नाम ही दवाई है और नाम ही प्रायश्चित कर्म है। 3।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 184 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।