अंग 184

अंग
184
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जन की टेक एक गोपाल ॥
एका लिव एको मनि भाउ ॥
सरब निधान जन कै हरि नाउ ॥3॥
पारब्रहम सिउ लागी प्रीति ॥
निरमल करणी साची रीति ॥
गुरि पूरै मेटिआ अंधिआरा ॥
नानक का प्रभु अपर अपारा ॥4॥24॥93॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: एक गोपाल प्रभू ही सेवक की जिंदगी का आसरा बन जाता है। (गुरू की शरण आए मनुष्य को) एक परमात्मा की ही लगन लग जाती है, उसके मन में एक परमात्मा का ही प्यार (टिक जाता है)। सेवक के दिल में परमात्मा का नाम ही (दुनिया के) सारे खजाने बन जाता है। 3। उसकी प्रीति परमात्मा के साथ पक्की बन जाती है, उसका जीवन पवित्र हो जाता है, उसकी जीवन मर्यादा (विकारों के आक्रमण से) अडोल हो जाती है। (परमात्मा की मेहर से) पूरे गुरू ने (जिस मनुष्य के अंदर से माया के मोह का) अंधेरा दूर कर दिया, (हे भाई ! ये सारी मेहर परमात्मा की ही है) नानक का प्रभू परे से परे है और बेअंत है। 4। 24। 93।
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
जिसु मनि वसै तरै जनु सोइ ॥
जा कै करमि परापति होइ ॥
दूखु रोगु कछु भउ न बिआपै ॥
अंम्रित नामु रिदै हरि जापै ॥1॥
पारब्रहमु परमेसुरु धिआईऐ ॥
गुर पूरे ते इह मति पाईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
करण करावनहार दइआल ॥
जीअ जंत सगले प्रतिपाल ॥
अगम अगोचर सदा बेअंता ॥
सिमरि मना पूरे गुर मंता ॥2॥
जा की सेवा सरब निधानु ॥
प्रभ की पूजा पाईऐ मानु ॥
जा की टहल न बिरथी जाइ ॥
सदा सदा हरि के गुण गाइ ॥3॥
करि किरपा प्रभ अंतरजामी ॥
सुख निधान हरि अलख सुआमी ॥
जीअ जंत तेरी सरणाई ॥
नानक नामु मिलै वडिआई ॥4॥25॥94॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ वह परमात्मा जिस मनुष्य के मन में बस जाता है वह (वह दुखों रोगों विकारों के समुंद्र में से) पार लांघ जाता है। जिस (परमात्मा) की कृपा से (उसके नाम की) प्राप्ति होती है, (संसार का) कोई दुख, कोई रागे, कोई डर उस पर अपना प्रभाव नहीं डाल सकता (क्योंकि) वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला हरि नाम अपने दिल में जपता रहता है। 1। (हे भाई !) अकाल पुरख परमेश्वर का सिमरन करना चाहिए। (सिमरन की) ये सूझ गुरू के पास से मिलती है। 1। रहाउ। जो सब कुछ करने की स्मर्था रखता है, जो जीवों से सब कुछ करवाने की ताकत रखता है। जो दया का घर है, जो सारे जीव-जंतुओं की पालना करता है, जो अपहुँच है, जिस तक मनुष्य की ज्ञानेंद्रियों की पहुँच नहीं हो सकती, जिसके गुणों का कभी अंत नहीं पाया जा सकता हे (मेरे) मन ! पूरे गुरू के उपदेश पर चल के उस (परमात्मा) को सिमर। 2। जिसकी सेवा-भक्ति में ही (जगत के) सारे खजाने हैं। जिस हरी की पूजा करने से (हर जगह) आदर सत्कार मिलता है, और जिसकी की हुई सेवा निष्फल नहीं जाती (हे भाई !) सदा ही सदा उस हरी के गुण गाता रह। 3। हे नानक ! (प्रभू दर पर प्रार्थना कर और कह) हे अंतरजामी प्रभू ! हे सुखों के खजाने प्रभू ! हे अदृष्ट स्वामी ! सारे जीव-जंतु आपकी शरण हैं (आपके ही आसरे हैं, मैं भी आपकी शरण आया हूँ) मेहर कर, मुझे आपका नाम मिल जाए (आपका नाम ही मेरे वास्ते) बड़प्पन है। 4। 24। 94।
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
जीअ जुगति जा कै है हाथ ॥
सो सिमरहु अनाथ को नाथु ॥
प्रभ चिति आए सभु दुखु जाइ ॥
भै सभ बिनसहि हरि कै नाइ ॥1॥
बिनु हरि भउ काहे का मानहि ॥
हरि बिसरत काहे सुखु जानहि ॥1॥ रहाउ ॥
जिनि धारे बहु धरणि अगास ॥
जा की जोति जीअ परगास ॥
जा की बखस न मेटै कोइ ॥
सिमरि सिमरि प्रभु निरभउ होइ ॥2॥
आठ पहर सिमरहु प्रभ नामु ॥
अनिक तीरथ मजनु इसनानु ॥
पारब्रहम की सरणी पाहि ॥
कोटि कलंक खिन महि मिटि जाहि ॥3॥
बेमुहताजु पूरा पातिसाहु ॥
प्रभ सेवक साचा वेसाहु ॥
गुरि पूरै राखे दे हाथ ॥
नानक पारब्रहम समराथ ॥4॥26॥95॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ जिसके हाथों में सब जीवों की जीवन मर्यादा है। (हे भाई !) उस अनाथों के नाथ परमात्मा का सिमरन कर, (हे भाई !) यदि परमात्मा (मनुष्य के) मन में बस जाए तो (उसका) हरेक दुख दूर हो जाता है। परमात्मा के नाम की बरकति के साथ सारे डर नाश हो जाते हैं। 1। (हे भाई !) आप परमात्मा के बिना और किसी का डर क्यूँ मानता है? परमात्मा को भुला के और कौन सा सुख समझता है?। 1। रहाउ। जिसने अनेकों धरतियों, आकाशों को सहारा दिया हुआ है। जिसकी ज्योति सारे जीवों में प्रकाश कर रही है, और जिस की (की हुई कृपा को कोई मिटा नहीं सकता) (कोई रोक नहीं सकता)। (हे भाई !) उस प्रभू को सदा सिमर, (जो मनुष्य उस प्रभू को सिमरता है वह दुनिया के डरों से) निडर हो जाता है। 2। (हे भाई !) आठों पहर (हर वक्त) प्रभू का नाम सिमरता रह। (ये सिमरन ही) अनेकों तीर्थों का स्नान है। यदि आप परमात्मा की शरण पड़ जाए तो आपके करोड़ों पाप एक पल में नाश हैं जाएं। 3। हे नानक ! परमात्मा को किसी की मुथाजी नहीं, किसी के आसरे नहीं। वह सब गुणों का मालिक है, वह सब गुणों का बादशाह है। प्रभू के सेवकों को प्रभू का अटॅल भरोसा रहता है। (हे भाई !) परमात्मा पूरे गुरू के द्वारा (अपने सेवकों को सब कलंकों से) हाथ दे कर बचाता है। परमात्मा सब ताकतों का मालिक है। 4। 26। 95।
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
गुर परसादि नामि मनु लागा ॥
जनम जनम का सोइआ जागा ॥
अंम्रित गुण उचरै प्रभ बाणी ॥
पूरे गुर की सुमति पराणी ॥1॥
प्रभ सिमरत कुसल सभि पाए ॥
घरि बाहरि सुख सहज सबाए ॥1॥ रहाउ ॥
सोई पछाता जिनहि उपाइआ ॥
करि किरपा प्रभि आपि मिलाइआ ॥
बाह पकरि लीनो करि अपना ॥
हरि हरि कथा सदा जपु जपना ॥2॥
मंत्रु तंत्रु अउखधु पुनहचारु ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ प्रभू की (सिफत सालाह की) बाणी उचारता है वह जन्मों जन्मांतरों का (माया के मोह की नींद में) सोया हुआ (भी) जाग पड़ता है। वह प्रभू के आत्मिक जीवन देने वाले गुण उचारता है, जिस प्राणी को पूरे गुरू की श्रेष्ठ मति प्राप्त होती है । 1। (जो मनुष्य परमात्मा का सिमरन करता है) प्रभू का सिमरन करते हुए उसने सारे सुख प्राप्त कर लिए, उसके हृदय में (भी) आत्मिक अडोलता के सारे आनंद, जगत से बरतते हुए भी उसे आत्मिक अडोलता के सारे आनंद प्राप्त होते हैं। 1। रहाउ। उस मनुष्य ने उसी प्रभू से गहरी सांझ डाल ली, जिस प्रभू ने उसे पैदा किया है। प्रभू ने मेहर करके जिस मनुष्य को स्वयं (अपने चरणों में) जोड़ लिया, जिस मनुष्य को प्रभू ने बाँह पकड़ कर अपना बना लिया, वह मनुष्य सदैव प्रभू की सिफत सालाह की बातें करता है। प्रभू के नाम का जाप जपता है। 2। (मोह की नींद दूर करने के लिए परमात्मा का नाम ही उसके वास्ते) मंत्र है। नाम ही जादू है, नाम ही दवाई है और नाम ही प्रायश्चित कर्म है। 3।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “एक गोपाल प्रभू ही सेवक की जिंदगी का आसरा बन जाता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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