एका लिव एको मनि भाउ ॥
सरब निधान जन कै हरि नाउ ॥3॥
पारब्रहम सिउ लागी प्रीति ॥
निरमल करणी साची रीति ॥
गुरि पूरै मेटिआ अंधिआरा ॥
नानक का प्रभु अपर अपारा ॥4॥24॥93॥
जिसु मनि वसै तरै जनु सोइ ॥
जा कै करमि परापति होइ ॥
दूखु रोगु कछु भउ न बिआपै ॥
अंम्रित नामु रिदै हरि जापै ॥1॥
पारब्रहमु परमेसुरु धिआईऐ ॥
गुर पूरे ते इह मति पाईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
करण करावनहार दइआल ॥
जीअ जंत सगले प्रतिपाल ॥
अगम अगोचर सदा बेअंता ॥
सिमरि मना पूरे गुर मंता ॥2॥
जा की सेवा सरब निधानु ॥
प्रभ की पूजा पाईऐ मानु ॥
जा की टहल न बिरथी जाइ ॥
सदा सदा हरि के गुण गाइ ॥3॥
करि किरपा प्रभ अंतरजामी ॥
सुख निधान हरि अलख सुआमी ॥
जीअ जंत तेरी सरणाई ॥
नानक नामु मिलै वडिआई ॥4॥25॥94॥
जीअ जुगति जा कै है हाथ ॥
सो सिमरहु अनाथ को नाथु ॥
प्रभ चिति आए सभु दुखु जाइ ॥
भै सभ बिनसहि हरि कै नाइ ॥1॥
बिनु हरि भउ काहे का मानहि ॥
हरि बिसरत काहे सुखु जानहि ॥1॥ रहाउ ॥
जिनि धारे बहु धरणि अगास ॥
जा की जोति जीअ परगास ॥
जा की बखस न मेटै कोइ ॥
सिमरि सिमरि प्रभु निरभउ होइ ॥2॥
आठ पहर सिमरहु प्रभ नामु ॥
अनिक तीरथ मजनु इसनानु ॥
पारब्रहम की सरणी पाहि ॥
कोटि कलंक खिन महि मिटि जाहि ॥3॥
बेमुहताजु पूरा पातिसाहु ॥
प्रभ सेवक साचा वेसाहु ॥
गुरि पूरै राखे दे हाथ ॥
नानक पारब्रहम समराथ ॥4॥26॥95॥
गुर परसादि नामि मनु लागा ॥
जनम जनम का सोइआ जागा ॥
अंम्रित गुण उचरै प्रभ बाणी ॥
पूरे गुर की सुमति पराणी ॥1॥
प्रभ सिमरत कुसल सभि पाए ॥
घरि बाहरि सुख सहज सबाए ॥1॥ रहाउ ॥
सोई पछाता जिनहि उपाइआ ॥
करि किरपा प्रभि आपि मिलाइआ ॥
बाह पकरि लीनो करि अपना ॥
हरि हरि कथा सदा जपु जपना ॥2॥
मंत्रु तंत्रु अउखधु पुनहचारु ॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “एक गोपाल प्रभू ही सेवक की जिंदगी का आसरा बन जाता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।