जिसु सिमरत डूबत पाहन तरे ॥3॥ संत सभा कउ सदा जैकारु ॥ हरि हरि नामु जन प्रान अधारु ॥ कहु नानक मेरी सुणी अरदासि ॥ संत प्रसादि मो कउ नाम निवासि ॥4॥21॥90॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: जिसका नाम सिमरने से पत्थर दिल व्याक्ति (कठोरता के समुंद्र में) डूबने से बच जाते हैं, (आप भी गुरू की शरण पड़ कर उसका नाम सिमर)। 3। (हे भाई !) साध-संगति के आगे हमेशा सिर झुकाओ, क्योंकि परमात्मा का नाम साध जनों (गुरमुखों) की जिंदगी का आसरा होता है, (उनकी संगति में आपको भी नाम की प्राप्ति होगी)। हे नानक ! कह, (करतार ने) मेरी विनती सुन ली और उसने गुरू की कृपा से मुझे अपने नाम के घर में (टिका दिया) है। 4। 21। 90।
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ (हे भाई !) गुरू के दीदार की बरकति से (मनुष्य अपने अंदर से तृष्णा की आग) बुझा लेता है। गुरू को मिल के (अपने मन में से) अहम् को मार लेता है। गुरू की संगति में रह के (मनुष्य का) मन (विकारों की तरफ) डोलता नहीं (क्योंकि) गुरू की शरण पड़ कर मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाली गुरबाणी उचारता रहता है। 1। (हे भाई !) जब गुरू के द्वारा प्रभू के साथ गहरी सांझ डाल लेते हैं, जब सदा सिथर प्रभू के प्रेम रंग में रंगे जाते हैं, तब हृदय ठंडा-ठार हो जाता है, तब (मन में) शांति पैदा हो जाती है, तब सारा जगत सदा स्थिर परमात्मा का रूप दिखता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) गुरू की कृपा से मनुष्य परमात्मा का नाम जपता है, गुरू की कृपा से हरि कीर्तन गायन करता है। (इसका परिणाम ये निकलता है कि) सतिगुरू की कृपा से मनुष्य के सारे दुख कलेश मिट जाते हैं (क्योंकि) गुरू की मेहर से मनुष्य (माया के मोह के) बंधनों से निजात पा लेता है। 2। (हे भाई !) गुरू की कृपा से माया का मोह और माया खातिर भटकना दूर हो जाती है। गुरू के चरणों की धूड़ी का स्नान ही सारे धर्मों का (सार) है। (जिस मनुष्य पर गुरू के सन्मुख रहने वाले) गुरमुख दयावान होते हैं, उस पर परमात्मा भी दयावान हो जाता है। (हे भाई !) मेरी जीवात्मा भी गुरमुखों के चरणों पे वारी जाती है। 3। गुरू की मेहर से जब मैं कृपा के खजाने, कृपा के घर का नाम सिमरता हूँ, साध-संगति में मेरा जीअ लगता है। हे नानक ! (कह, हे भाई !) मुझ गुणहीन पर प्रभू ने दया की, साध-संगति में मैं प्रभू का नाम जपने लग पड़ा। 4। 22। 91।
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ साधसंगि जपिओ भगवंतु ॥ केवल नामु दीओ गुरि मंतु ॥ तजि अभिमान भए निरवैर ॥ आठ पहर पूजहु गुर पैर ॥1॥ अब मति बिनसी दुसट बिगानी ॥ जब ते सुणिआ हरि जसु कानी ॥1॥ रहाउ ॥ सहज सूख आनंद निधान ॥ राखनहार रखि लेइ निदान ॥ दूख दरद बिनसे भै भरम ॥ आवण जाण रखे करि करम ॥2॥ पेखै बोलै सुणै सभु आपि ॥ सदा संगि ता कउ मन जापि ॥ संत प्रसादि भइओ परगासु ॥ पूरि रहे एकै गुणतासु ॥3॥ कहत पवित्र सुणत पुनीत ॥ गुण गोविंद गावहि नित नीत ॥ कहु नानक जा कउ होहु क्रिपाल ॥ तिसु जन की सभ पूरन घाल ॥4॥23॥92॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ (गुरू की कृपा से जिन मनुष्यों ने) साध-संगति में भगवान का सिमरन किया है, जिन्हें गुरू ने परमात्मा के नाम का मंत्र दिया है (उस मंत्र की बरकति से) वे अहंकार त्याग के निर्वैर हो गए हैं (हे भाई !) आठों पहर (हर वक्त) गुरू के पैर पूजो। 1। हे भाई ! तब से मेरी बुरी व बेसमझी वाली मति दूर हो गई है जब से परमात्मा की सिफत सालाह मैंने कानों से सुनी है। 1। रहाउ। (हे भाई ! जिन मनुष्यों ने हरी-जस कानों से सुना है) आत्मिक अडोलता, सुख, आनंद के खजाने रखने वाले परमात्मा ने आखिर उनकी सदा रक्षा की है। उनके दुख-दर्द-डर-वहिम सारे नाश हो जाते हैं। परमात्मा मेहर करके उनके जनम मरण के चक्र भी खत्म कर देता है। 2। हे (मेरे) मन ! जो परमात्मा हर जगह (सब जीवों में व्यापक हो के) स्वयं देखता है, खुद ही बोलता है, खुद ही सुनता है, जो हर वक्त आपके अंग संग है, उसका भजन कर। गुरू की कृपा से जिस मनुष्य के अंदर आत्मिक जीवन वाला प्रकाश पैदा होता है, उसे गुणों का खजाना एक परमात्मा ही हर जगह व्यापक दिखाई देता है। 3। वे सिफत सालाह करने वाले और सिफत सालाह सुनने वाले सभी पवित्र जीवन वाले बन जाते हैं, (हे भाई !) जो मनुष्य सदा ही गोबिंद के गुण गाते हैं । हे नानक ! कह, (हे प्रभू !) जिस मनुष्य पे आप दयावान होता है (वह आपकी सिफत सालाह करता है) उसकी सारी ये मेहनत सफल हैं जाती है। 4। 23। 92।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ (हे भाई !) गुरू (मनुष्य के माया के मोह के) बंधन तोड़ के (उससे) परमात्मा का सिमरन करवाता है। (जिस मनुष्य पर गुरू मेहर करता है उसके) मन में (प्रभू चरणों की) अॅटल सुरति बंध जाती है। (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ने से मन के सारे) कलेश मिट जाते हैं, सुखी जीवन वाले हो जाते हैं। सो, गुरू ऐसी ऊँची दाति बख्शने वाला कहा जाता है। 1। (हे भाई !) वह सत्गुरू आत्मिक आनंद की दाति बख्शने वाला है क्योंकि वह परमात्मा का नाम जपाता है, और मेहर करके उस परमात्मा के साथ जोड़ता है। 1। रहाउ। (पर) परमात्मा जिस मनुष्य पर दयावान हो उसे खुद (ही) गुरू मिलाता है, वह मनुष्य (फिर) गुरू से (आत्मिक जीवन के) सारे खजाने हासिल कर लेता है। वह (गुरू की शरण पड़ कर) स्वैभाव त्याग देता है, और उसके जनम मरण का चक्र समाप्त हो जाता है। गुरू की संगति में (रह के) वह मनुष्य परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल लेता है। 2। (हे भाई ! गुरू की शरण की बरकति से) प्रभू जी सेवक पर दयावान हो जाते हैं,
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिसका नाम सिमरने से पत्थर दिल व्याक्ति (कठोरता के समुंद्र में) डूबने से बच जाते हैं, (आप भी गुरू की शरण पड़ कर उसका नाम सिमर)।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।