बिआपत सुरग नरक अवतार ॥
बिआपत धन निरधन पेखि सोभा ॥
मूलु बिआधी बिआपसि लोभा ॥1॥
माइआ बिआपत बहु परकारी ॥
संत जीवहि प्रभ ओट तुमारी ॥1॥ रहाउ ॥
बिआपत अहंबुधि का माता ॥
बिआपत पुत्र कलत्र संगि राता ॥
बिआपत हसति घोड़े अरु बसता ॥
बिआपत रूप जोबन मद मसता ॥2॥
बिआपत भूमि रंक अरु रंगा ॥
बिआपत गीत नाद सुणि संगा ॥
बिआपत सेज महल सीगार ॥
पंच दूत बिआपत अंधिआर ॥3॥
बिआपत करम करै हउ फासा ॥
बिआपति गिरसत बिआपत उदासा ॥
आचार बिउहार बिआपत इह जाति ॥
सभ किछु बिआपत बिनु हरि रंग रात ॥4॥
संतन के बंधन काटे हरि राइ ॥
ता कउ कहा बिआपै माइ ॥
कहु नानक जिनि धूरि संत पाई ॥ ता कै निकटि न आवै माई ॥5॥19॥88॥
नैनहु नीद पर द्रिसटि विकार ॥
स्रवण सोए सुणि निंद वीचार ॥
रसना सोई लोभि मीठै सादि ॥
मनु सोइआ माइआ बिसमादि ॥1॥
इसु ग्रिह महि कोई जागतु रहै ॥
साबतु वसतु ओहु अपनी लहै ॥1॥ रहाउ ॥
सगल सहेली अपनै रस माती ॥
ग्रिह अपुने की खबरि न जाती ॥
मुसनहार पंच बटवारे ॥
सूने नगरि परे ठगहारे ॥2॥
उन ते राखै बापु न माई ॥
उन ते राखै मीतु न भाई ॥
दरबि सिआणप ना ओइ रहते ॥
साधसंगि ओइ दुसट वसि होते ॥3॥
करि किरपा मोहि सारिंगपाणि ॥
संतन धूरि सरब निधान ॥
साबतु पूंजी सतिगुर संगि ॥
नानकु जागै पारब्रहम कै रंगि ॥4॥
सो जागै जिसु प्रभु किरपालु ॥
इह पूंजी साबतु धनु मालु ॥1॥ रहाउ दूजा ॥20॥89॥
जा कै वसि खान सुलतान ॥
जा कै वसि है सगल जहान ॥
जा का कीआ सभु किछु होइ ॥
तिस ते बाहरि नाही कोइ ॥1॥
कहु बेनंती अपुने सतिगुर पाहि ॥
काज तुमारे देइ निबाहि ॥1॥ रहाउ ॥
सभ ते ऊच जा का दरबारु ॥
सगल भगत जा का नामु अधारु ॥
सरब बिआपित पूरन धनी ॥
जा की सोभा घटि घटि बनी ॥2॥
जिसु सिमरत दुख डेरा ढहै ॥
जिसु सिमरत जमु किछू न कहै ॥
जिसु सिमरत होत सूके हरे ॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “कहीं खुशी कहीं गमीं का पसारा है, कहीं जीव नरकों में पड़ते हैं, कहीं स्वर्गों में पहुँचते हैं, कहीं कोई धन वाले हैं, कहीं कंगाल हैं, कहीं कोई अपनी शोभा देख के (खुश हैं) – कहीं सारे ।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।