इस ही मधे बसतु अपार ॥ इस ही भीतरि सुनीअत साहु ॥ कवनु बापारी जा का ऊहा विसाहु ॥1॥ नाम रतन को को बिउहारी ॥ अंम्रित भोजनु करे आहारी ॥1॥ रहाउ ॥ मनु तनु अरपी सेव करीजै ॥ कवन सु जुगति जितु करि भीजै ॥ पाइ लगउ तजि मेरा तेरै ॥ कवनु सु जनु जो सउदा जोरै ॥2॥ महलु साह का किन बिधि पावै ॥ कवन सु बिधि जितु भीतरि बुलावै ॥ तूं वड साहु जा के कोटि वणजारे ॥ कवनु सु दाता ले संचारे ॥3॥ खोजत खोजत निज घरु पाइआ ॥ अमोल रतनु साचु दिखलाइआ ॥ करि किरपा जब मेले साहि ॥ कहु नानक गुर कै वेसाहि ॥4॥16॥85॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: इस मन-मंदिर के अंदर ही बेअंत प्रभू की नाम-पूँजी है। इस मन-मंदिर में ही वह प्रभू शाहूकार बसता सुना जाता है। कोई विरला नाम-वणजारा है, जिसका उस शाह की हजूरी में विश्वास बना हुआ है। 1। जो कोई परमात्मा के नाम-रत्न का (असल) व्यापारी है, वह आत्मिक जीवन देने वाले नाम-भोजन को अपनी जिंदगी का आहार बनाता है। 1। रहाउ। मैं अपना मन तन उसे भेट करता हूँ। उसकी सेवा करने को तैयार हूँ। (मैं उस हरी-जन से पूछना चाहता हूँ कि) वह कौन सा तरीका है जिससे प्रभू प्रसन्न हो जाए? मेर-तेर छोड़ के मैं उसके पाँव लगता हूं। वह कौन सा (विरला प्रभू का) सेवक है जो (मुझे भी) नाम का सौदा करा दे? 2। (मैं उस नाम-रतन व्यापारी से पूछता हूँ कि) नाम-रस के शाह का महल मनुष्य किस ढंग से ढूँढ सकता है? वह कौन सा तरीका है जिस करके वह शाह वणजारे को अपनी हजूरी में बुलाता है? हे प्रभू ! आप सबसे बड़ा है, करोड़ों जीव आपके वणजारे हैं। नाम की दाति करने वाला वह कौन है जो मुझे पकड़ के आपके चरणों तक पहुँचा दे?। 3। तलाश करते करते अपना (वह असली) घर ढूँढ लिया (जहां प्रभू शाह बसता है) (गुरू ने ही उस भाग्यशाली वणजारे को) सदा कायम रहने वाला (अमोलक नाम-रत्न) दिखा दिया है। जब भी शाह प्रभू ने कृपा करके (किसी जीव वणजारे को अपने चरणों में) मिलाया है। हे नानक ! कह, गुरु की सहमती से (ऐतबार से / हामी से उस वणजारे ने) ऐसा किया है । 4। 16। 85।
गउड़ी महला 5 गुआरेरी ॥ रैणि दिनसु रहै इक रंगा ॥ प्रभ कउ जाणै सद ही संगा ॥ ठाकुर नामु कीओ उनि वरतनि ॥ त्रिपति अघावनु हरि कै दरसनि ॥1॥ हरि संगि राते मन तन हरे ॥ गुर पूरे की सरनी परे ॥1॥ रहाउ ॥ चरण कमल आतम आधार ॥ एकु निहारहि आगिआकार ॥ एको बनजु एको बिउहारी ॥ अवरु न जानहि बिनु निरंकारी ॥2॥ हरख सोग दुहहूं ते मुकते ॥ सदा अलिपतु जोग अरु जुगते ॥ दीसहि सभ महि सभ ते रहते ॥ पारब्रहम का ओइ धिआनु धरते ॥3॥ संतन की महिमा कवन वखानउ ॥ अगाधि बोधि किछु मिति नही जानउ ॥ पारब्रहम मोहि किरपा कीजै ॥ धूरि संतन की नानक दीजै ॥4॥17॥86॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 5 गुआरेरी ॥ (पूरे गुरू की शरण पड़ने वाला मनुष्य) दिन रात एक परमात्मा के प्रेम में (मस्त) रहता है। वह मनुष्य परमात्मा को सदा ही अपने अंग-संग (बसता) समझता है। उस मनुष्य ने ठाकुर (परमात्मा) के नाम को सदा इस्तेमाल होने वाला बनाया है परमात्मा के दर्शन से वह (सदा) तृप्त रहता है, संतुष्ट रहता है। 1। वे परमात्मा के साथ रंगे रहते हैं (प्रभू की याद में मस्त रहते हैं) उनके मन खिले रहते हैं, उनके तन खिले रहते हैं (हे भाई !) जो मनुष्य पूरे गुरू की शरण पड़ते हैं । 1। रहाउ। (पूरे गुरू की शरण पड़ने वाला मनुष्य) परमात्मा के सुंदर चरणों को अपनी जीवात्मा का आसरा बनाए रखते हैं, वह (हर जगह) एक परमात्मा को ही (बसा हुआ) देखते हैं, परमात्मा के हुकम में ही वे सदा चलते हैं। परमात्मा का नाम ही उनका वणज है। परमात्मा के नाम के ही वे सदा व्यापारी बने रहते हैं। परमात्मा के बिना वे किसी और के साथ गहरी सांझ नहीं डालते। 2। (पूरे गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य) खुशी ग़मी दोनों से ही स्वतंत्र रहते हैं, वे सदा (माया से) निर्लिप है। परमात्मा (की याद) में जुड़े रहते हैं और अच्छी जीवन-जुगति वाले होते हैं। वे मनुष्य सबसे प्रेम करते भी दिखते हैं और सबसे अलग (निर्मोह) भी दिखाई देते हैं। वे मनुष्य सदा परमात्मा की याद में सुरति जोड़े रखते हैं। 3। (पूरे गुरू की शरण पड़ने वाले उन) संत जनों का मैं कौन सा बड़प्पन बयान करूँ ? उनकी आत्मिक उच्चता मानवी सोच-समझ से परे है, मैं कोई अंदाजा नहीं लगा सकता। हे अकाल पुरख ! मेरे पर कृपा कर, और मुझ नानक को उन संत जनों के चरणों की धूड़ बख्श। 4। 17। 86।
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ (हे प्रभू !) आप ही मेरा साथी है, आप ही मेरा मित्र है, आप ही मेरा प्रीतम है, मेरा आपके साथ ही प्यार है। (हे प्रभू !) आप ही मेरी इज्जत है, आप ही मेरा गहना है। आपके बगैर मैं पलक झपकने जितना समय भी नहीं रह सकता। 1। अर्थ: (हे प्रभू !) आप मेरा सुंदर लाल है, आप मेरी जीवात्मा (का सहारा) है। आप मेरा साहिब है, आप मेरा ख़ान है। 1। रहाउ। (हे प्रभू !) जैसे आप मुझे रखता है वैसे ही मैं रहता हूँ। मैं वही करता हूँ जो आप मुझे हुकम करता है। मैं जिधर देखता हूँ उधर ही मुझे आप ही बसता दिखाई देता है। मैं अपनी जीभ से आपका नाम जपता रहता हूँ, जो दुनिया के डरों से बचा के रखने वाला है। 2। (हे प्रभू !) आप ही मेरे वास्ते दुनिया के नौ खजाने है, आप ही मेरा खजाना है। आप ही मेरे वास्ते दुनिया के रंग और रस है, आप ही मेरे मन का सहारा है। हे प्रभू ! आप ही मेरे वास्ते शोभा-बड़प्पन है, मेरी सुरति आपके (चरणों) में ही जुड़ी हुई है। आप ही मेरी ओट है आप ही मेरा आसरा है। 3। (हे प्रभू !) मैं अपने मन में अपने हृदय में तूझे ही सिमरता रहता हूँ। आपका भेद मैंने गुरू से पा लिया है। हे नानक ! जिस मनुष्य ने गुरू की ओर सेएक परमात्मा का नाम ही हृदय में पक्का करने के लिए प्राप्त किया है, उस सेवक को सदा हरी नाम का ही सहारा हो जाता है। 4। 18। 87।
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “इस मन-मंदिर के अंदर ही बेअंत प्रभू की नाम-पूँजी है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।