बहुरि बहुरि उआहू लपटेरा ॥
पुत्र कलत्र गिरसत का फासा ॥
होनु न पाईऐ राम के दासा ॥1॥
कवन सु बिधि जितु राम गुण गाइ ॥
कवन सु मति जितु तरै इह माइ ॥1॥ रहाउ ॥
जो भलाई सो बुरा जानै ॥
साचु कहै सो बिखै समानै ॥
जाणै नाही जीत अरु हार ॥
इहु वलेवा साकत संसार ॥2॥
जो हलाहल सो पीवै बउरा ॥
अंम्रितु नामु जानै करि कउरा ॥
साधसंग कै नाही नेरि ॥
लख चउरासीह भ्रमता फेरि ॥3॥
एकै जालि फहाए पंखी ॥
रसि रसि भोग करहि बहु रंगी ॥
कहु नानक जिसु भए क्रिपाल ॥ गुरि पूरै ता के काटे जाल ॥4॥13॥82॥
तउ किरपा ते मारगु पाईऐ ॥
प्रभ किरपा ते नामु धिआईऐ ॥
प्रभ किरपा ते बंधन छुटै ॥
तउ किरपा ते हउमै तुटै ॥1॥
तुम लावहु तउ लागह सेव ॥
हम ते कछू न होवै देव ॥1॥ रहाउ ॥
तुधु भावै ता गावा बाणी ॥
तुधु भावै ता सचु वखाणी ॥
तुधु भावै ता सतिगुर मइआ ॥
सरब सुखा प्रभ तेरी दइआ ॥2॥
जो तुधु भावै सो निरमल करमा ॥
जो तुधु भावै सो सचु धरमा ॥
सरब निधान गुण तुम ही पासि ॥
तूं साहिबु सेवक अरदासि ॥3॥
मनु तनु निरमलु होइ हरि रंगि ॥
सरब सुखा पावउ सतसंगि ॥
नामि तेरै रहै मनु राता ॥
इहु कलिआणु नानक करि जाता ॥4॥14॥83॥
आन रसा जेते तै चाखे ॥
निमख न त्रिसना तेरी लाथे ॥
हरि रस का तूं चाखहि सादु ॥
चाखत होइ रहहि बिसमादु ॥1॥
अंम्रितु रसना पीउ पिआरी ॥
इह रस राती होइ त्रिपतारी ॥1॥ रहाउ ॥
हे जिहवे तूं राम गुण गाउ ॥
निमख निमख हरि हरि हरि धिआउ ॥
आन न सुनीऐ कतहूं जाईऐ ॥
साधसंगति वडभागी पाईऐ ॥2॥
आठ पहर जिहवे आराधि ॥ पारब्रहम ठाकुर आगाधि ॥
ईहा ऊहा सदा सुहेली ॥
हरि गुण गावत रसन अमोली ॥3॥
बनसपति मउली फल फुल पेडे ॥
इह रस राती बहुरि न छोडे ॥
आन न रस कस लवै न लाई ॥
कहु नानक गुर भए है सहाई ॥4॥15॥84॥
मनु मंदरु तनु साजी बारि ॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(माया के मोह में फंसा) मनुष्य समझता है कि ये शरीर (सदा) मेरा (अपना ही रहना) है, मुड़ मुड़ इस शरीर के साथ ही चिपकता है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।