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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 180 · गउड़ी

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अंग
180
गउड़ी
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  1. प्राणी जाणै इहु तनु मेरा ॥
  2. तउ किरपा ते मारगु पाईऐ ॥
  3. आन रसा जेते तै चाखे ॥
  4. मनु मंदरु तनु साजी बारि ॥

प्राणी जाणै इहु तनु मेरा ॥

अंग 179 से चला आ रहा अंश

प्राणी जाणै इहु तनु मेरा ॥
बहुरि बहुरि उआहू लपटेरा ॥
पुत्र कलत्र गिरसत का फासा ॥
होनु न पाईऐ राम के दासा ॥1॥
कवन सु बिधि जितु राम गुण गाइ ॥
कवन सु मति जितु तरै इह माइ ॥1॥ रहाउ ॥
जो भलाई सो बुरा जानै ॥
साचु कहै सो बिखै समानै ॥
जाणै नाही जीत अरु हार ॥
इहु वलेवा साकत संसार ॥2॥
जो हलाहल सो पीवै बउरा ॥
अंम्रितु नामु जानै करि कउरा ॥
साधसंग कै नाही नेरि ॥
लख चउरासीह भ्रमता फेरि ॥3॥
एकै जालि फहाए पंखी ॥
रसि रसि भोग करहि बहु रंगी ॥
कहु नानक जिसु भए क्रिपाल ॥ गुरि पूरै ता के काटे जाल ॥4॥13॥82॥

हिन्दी अर्थ: (माया के मोह में फंसा) मनुष्य समझता है कि ये शरीर (सदा) मेरा (अपना ही रहना) है, मुड़ मुड़ इस शरीर के साथ ही चिपकता है। जब तक पुत्र-स्त्री गृहस्त के (मोह का) फंदा (गले में पड़ा रहता) है, परमात्मा के सेवक बन नहीं सकते। 1। (हे भाई !) वह कौन सा तरीका है जिससे मनुष्य परमात्मा के गुण गा सकता है? वह कौन सा शिक्षा मति है जिससे मनुष्य इस माया (के प्रभाव) से पार लांघ सकता है?। 1। रहाउ। जो काम इसकी भलाई (का) है उसे बुरा समझता है। जो कोई इसे सच कहे, वह इसे जहर जैसा लगता है। ये नहीं समझता कि कौन सा काम जीवन-बाजी की जीत के लिए है और कौन सा हार के वास्ते। माया के आँगन में संसार का ये बरतण व्यवहार है । 2। जो जहर है उसे माया ग्रसित मनुष्य (खुशी से) पीता है। परमात्मा का नाम आत्मिक जीवन देने वाला है, इसे मनुष्य कड़वा जानता है। (माया ग्रसित मनुष्य) साध-संगति के नजदीक नहीं फटकता, (इस तरह) चौरासी लाख जोनियों के चक्कर में भटकता फिरता है। 3। जीव-पंछी इस माया के जाल में ही (परमात्मा ने) बसाए हुए हैं। स्वाद लगा लगा के ये अनेकों रंगों के भोग भोगते रहते हैं। हे नानक ! कह, जिस मनुष्य पर परमात्मा कृपालु होता है, पूरे गुरू ने उस मनुष्य के (माया के मोह के) बंधन काट दिए हैं। 4। 13। 82।

तउ किरपा ते मारगु पाईऐ ॥

गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
तउ किरपा ते मारगु पाईऐ ॥
प्रभ किरपा ते नामु धिआईऐ ॥
प्रभ किरपा ते बंधन छुटै ॥
तउ किरपा ते हउमै तुटै ॥1॥
तुम लावहु तउ लागह सेव ॥
हम ते कछू न होवै देव ॥1॥ रहाउ ॥
तुधु भावै ता गावा बाणी ॥
तुधु भावै ता सचु वखाणी ॥
तुधु भावै ता सतिगुर मइआ ॥
सरब सुखा प्रभ तेरी दइआ ॥2॥
जो तुधु भावै सो निरमल करमा ॥
जो तुधु भावै सो सचु धरमा ॥
सरब निधान गुण तुम ही पासि ॥
तूं साहिबु सेवक अरदासि ॥3॥
मनु तनु निरमलु होइ हरि रंगि ॥
सरब सुखा पावउ सतसंगि ॥
नामि तेरै रहै मनु राता ॥
इहु कलिआणु नानक करि जाता ॥4॥14॥83॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ (हे प्रभू !) आपकी कृपा से (जीवन का सही) रास्ता मिलता है। (हे भाई !) प्रभू की कृपा से (प्रभू का) नाम सिमरा जा सकता है। (इस तरह) प्रभू की कृपा से माया के बंधनों का जाल टूट जाता है। हे प्रभू ! आपकी कृपा से (हम जीवों का) अहंकार दूर हो जाता है। 1। आप (खुद ही हमें) सेवा भक्ति में लगाएँ तो हम लग सकते हैं। हे प्रकाश-रूप प्रभू ! हमसे (जीवों से हमारे अपने प्रयासों से आपकी सेवा भक्ति) कुछ भी नहीं हो सकती। रहाउ। (हे प्रभू !) अगर आपको ठीक लगे तो मैं आपकी सिफत सालाह की बाणी गा सकता हूँ। आपको पसंद आए तो मैं आपका सदा स्थिर रहने वाला नाम उच्चार सकता हूँ। (हे प्रभू !) अगर आपको ठीक लगे तो (जीवों पर) गुरू की कृपा होती है। हे प्रभू ! सारे सुख आपकी मेहर में ही हैं। 2। हे प्रभू ! जो काम आपको ठीक लग जाएं वही पवित्र हैं। जो जीवन मर्यादा आपको पसंद आ जाए वही अटॅल मर्यादा है। हे प्रभू ! सारे गुण सारे खजाने आपके ही वश में हैं। आप ही मेरे मालिक हैं, मुझ सेवक की (आपके आगे ही) प्रार्थना है। 3। (हे प्रभू !) परमात्मा के प्यार में (टिके रहने से) मन पवित्र हो जाता है, शरीर पवित्र हो जाता है। साध-संगति में टिके रहने से (मुझे ऐसे प्रतीत होता है कि) मैं सारे सुख तलाश लेता हूँ। हे नानक ! (कह, हे प्रभू ! जिस मनुष्य का) मन आपके नाम में रंगा जाता है वह इसी को ही श्रेष्ठ आनंद करके समझता है। 4। 14। 83।

आन रसा जेते तै चाखे ॥

गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
आन रसा जेते तै चाखे ॥
निमख न त्रिसना तेरी लाथे ॥
हरि रस का तूं चाखहि सादु ॥
चाखत होइ रहहि बिसमादु ॥1॥
अंम्रितु रसना पीउ पिआरी ॥
इह रस राती होइ त्रिपतारी ॥1॥ रहाउ ॥
हे जिहवे तूं राम गुण गाउ ॥
निमख निमख हरि हरि हरि धिआउ ॥
आन न सुनीऐ कतहूं जाईऐ ॥
साधसंगति वडभागी पाईऐ ॥2॥
आठ पहर जिहवे आराधि ॥ पारब्रहम ठाकुर आगाधि ॥
ईहा ऊहा सदा सुहेली ॥
हरि गुण गावत रसन अमोली ॥3॥
बनसपति मउली फल फुल पेडे ॥
इह रस राती बहुरि न छोडे ॥
आन न रस कस लवै न लाई ॥
कहु नानक गुर भए है सहाई ॥4॥15॥84॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ (हे मेरी जीभ ! परमात्मा के नाम-रस के बिना) और जितने भी रस आप चखती रहती हैं (उनसे) आपकी तृष्णा एक निमख मात्र भी दूर नहीं होती। अगर आप परमात्मा के नाम-रस का स्वाद चखें, चखते ही आप मस्त हो जाएँगी। 1। हे (मेरी) प्यारी जीभ ! आप आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पिएँ। जो जीभ इस नाम रस में मस्त हो जाती है, वह (अन्य रसों की तरफ से) संतुष्ट हो जाती है। 1। रहाउ। हे (मेरी) जीभ ! आप परमात्मा के गुण गाएँ। पल पल हर वक्त परमात्मा का नाम सिमरें। (अगर दुनिया के रसों की तरफ से संतुष्ट होना है, तो परमातमा की सिफत सालाह के बिना) अन्य (फीके बोल) नहीं सुनने चाहिए, (साध-संगति के बिना) और कहीं (विकार पैदा करने वाली जगहों पे) नहीं जाना चाहिए। (पर) साध-संगति बड़े भाग्यों से ही मिलती है। 2। हे (मेरी) जीभ ! आठों पहर आराधना करें (सिमरन करें)- अथाह (गुणों वाले) ठाकुर परमात्मा का (सिमरन करने वाली की जिंदगी) इस लोक में व परलोक में सदा सुखी हो जाती है परमात्मा के गुण गाते हुए जीभ बड़ी कीमती बन जाती है। 3। (ये ठीक है कि परमात्मा की कुदरति में सारी) बनस्पति खिली रहती है, वृक्ष-पौधों को फूल-फल लगे होते हैं, पर जिस मनुष्य की जीभ नाम-रस में मस्त है वह (बाहर दिखाई देती सुंदरता को देख के नाम-रस को) कभी नहीं छोड़ता। हे नानक! कहें, जिसका सहायक सतिगुरु होता है, उसके लिए संसार के दूसरे स्वाद नाम-रस की बराबरी नहीं कर सकते।4। 15। 84।

मनु मंदरु तनु साजी बारि ॥

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गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
मनु मंदरु तनु साजी बारि ॥

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ (परमात्मा शाहूकार ने अपने रहने के लिए मनुष्य के) मन को सुंदर घर बनाया हुआ है और मनुष्य के शरीर को (भाव, ज्ञानेंद्रियों को, उस घर की रक्षा के लिए) वाड़ बनाया है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 180 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।