तुझै न लागै ताता झोला ॥1॥ रहाउ ॥
जिउ बोहिथु भै सागर माहि ॥
अंधकार दीपक दीपाहि ॥
अगनि सीत का लाहसि दूख ॥
नामु जपत मनि होवत सूख ॥2॥
उतरि जाइ तेरे मन की पिआस ॥
पूरन होवै सगली आस ॥
डोलै नाही तुमरा चीतु ॥
अंम्रित नामु जपि गुरमुखि मीत ॥3॥
नामु अउखधु सोई जनु पावै ॥
करि किरपा जिसु आपि दिवावै ॥
हरि हरि नामु जा कै हिरदै वसै ॥
दूखु दरदु तिह नानक नसै ॥4॥10॥79॥
बहुतु दरबु करि मनु न अघाना ॥
अनिक रूप देखि नह पतीआना ॥
पुत्र कलत्र उरझिओ जानि मेरी ॥
ओह बिनसै ओइ भसमै ढेरी ॥1॥
बिनु हरि भजन देखउ बिललाते ॥
ध्रिगु तनु ध्रिगु धनु माइआ संगि राते ॥1॥ रहाउ ॥
जिउ बिगारी कै सिरि दीजहि दाम ॥
ओइ खसमै कै ग्रिहि उन दूख सहाम ॥
जिउ सुपनै होइ बैसत राजा ॥
नेत्र पसारै ता निरारथ काजा ॥2॥
जिउ राखा खेत ऊपरि पराए ॥
खेतु खसम का राखा उठि जाए ॥
उसु खेत कारणि राखा कड़ै ॥
तिस कै पालै कछू न पड़ै ॥3॥
जिस का राजु तिसै का सुपना ॥
जिनि माइआ दीनी तिनि लाई त्रिसना ॥
आपि बिनाहे आपि करे रासि ॥
नानक प्रभ आगै अरदासि ॥4॥11॥80॥
बहु रंग माइआ बहु बिधि पेखी ॥
कलम कागद सिआनप लेखी ॥
महर मलूक होइ देखिआ खान ॥
ता ते नाही मनु त्रिपतान ॥1॥
सो सुखु मो कउ संत बतावहु ॥
त्रिसना बूझै मनु त्रिपतावहु ॥1॥ रहाउ ॥
असु पवन हसति असवारी ॥
चोआ चंदनु सेज सुंदरि नारी ॥
नट नाटिक आखारे गाइआ ॥
ता महि मनि संतोखु न पाइआ ॥2॥
तखतु सभा मंडन दोलीचे ॥
सगल मेवे सुंदर बागीचे ॥
आखेड़ बिरति राजन की लीला ॥
मनु न सुहेला परपंचु हीला ॥3॥
करि किरपा संतन सचु कहिआ ॥
सरब सूख इहु आनंदु लहिआ ॥
साधसंगि हरि कीरतनु गाईऐ ॥
कहु नानक वडभागी पाईऐ ॥4॥
जा कै हरि धनु सोई सुहेला ॥
प्रभ किरपा ते साधसंगि मेला ॥1॥ रहाउ दूजा ॥12॥81॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे मन ! परमात्मा के नाम का आसरा ले, आपको (दुनिया के दुख-कलेशों की) गर्म हवा का झोका छू नहीं सकेगा।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।