अंग 179

अंग
179
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
मन मेरे गहु हरि नाम का ओला ॥
तुझै न लागै ताता झोला ॥1॥ रहाउ ॥
जिउ बोहिथु भै सागर माहि ॥
अंधकार दीपक दीपाहि ॥
अगनि सीत का लाहसि दूख ॥
नामु जपत मनि होवत सूख ॥2॥
उतरि जाइ तेरे मन की पिआस ॥
पूरन होवै सगली आस ॥
डोलै नाही तुमरा चीतु ॥
अंम्रित नामु जपि गुरमुखि मीत ॥3॥
नामु अउखधु सोई जनु पावै ॥
करि किरपा जिसु आपि दिवावै ॥
हरि हरि नामु जा कै हिरदै वसै ॥
दूखु दरदु तिह नानक नसै ॥4॥10॥79॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: हे मेरे मन ! परमात्मा के नाम का आसरा ले, आपको (दुनिया के दुख-कलेशों की) गर्म हवा का झोका छू नहीं सकेगा। 1। रहाउ। (हे भाई !) जैसे डरावने समुंद्र में जहाज (मनुष्य को डूबने से बचाता है, जैसे अंधेरे में दीपक प्रकाश करता है और ठोकर खाने से बचाता है), जैसे, आग ठंड-पाले का दुख दूर कर देती है, ऐसे ही परमात्मा का नाम सिमरने से मन में आनंद पैदा होता है। 2। (जप की बरकति से) आपके मन की (माया की) तृष्णा उतर जाएगी। आपकी ही आस पूरी हैं जाएगी (दुनियावी आशाएं सताने से हट जाएंगी), और आपका मन (माया की लालसा में) डोलेगा नहीं हे मित्र ! गुरू की शरण पड़ कर आत्मिक जीवन देने वाला हरी नाम जप । 3। (पर यह) हरी-नाम की दवा वही मनुष्य हासिल करता है जिसको प्रभू मेहर करके खुद (गुरू से) दिलवाता है। जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम बस जाता है हे नानक !, उसका सारा दुख-दर्द दूर हो जाता है। 4। 10। 79।
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
बहुतु दरबु करि मनु न अघाना ॥
अनिक रूप देखि नह पतीआना ॥
पुत्र कलत्र उरझिओ जानि मेरी ॥
ओह बिनसै ओइ भसमै ढेरी ॥1॥
बिनु हरि भजन देखउ बिललाते ॥
ध्रिगु तनु ध्रिगु धनु माइआ संगि राते ॥1॥ रहाउ ॥
जिउ बिगारी कै सिरि दीजहि दाम ॥
ओइ खसमै कै ग्रिहि उन दूख सहाम ॥
जिउ सुपनै होइ बैसत राजा ॥
नेत्र पसारै ता निरारथ काजा ॥2॥
जिउ राखा खेत ऊपरि पराए ॥
खेतु खसम का राखा उठि जाए ॥
उसु खेत कारणि राखा कड़ै ॥
तिस कै पालै कछू न पड़ै ॥3॥
जिस का राजु तिसै का सुपना ॥
जिनि माइआ दीनी तिनि लाई त्रिसना ॥
आपि बिनाहे आपि करे रासि ॥
नानक प्रभ आगै अरदासि ॥4॥11॥80॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ बहुत धन जोड़ के भी मन भरता नहीं, अनेकों (सुंदर सि्त्रयों के) रूप देख के भी मन की तसल्ली नहीं होती। मनुष्य, ये समझ के कि ये मेरी स्त्री है ये मेरा पुत्र है, माया के मोह में फंसा रहता है। (सि्त्रयों का) सौंदर्य नाश हो जाता है, (वह अपने निहित) स्त्री-पुत्र राख की ढेरी हो जाते हैं (किसी के साथ भी साथ नहीं निभता)। 1। मैं देखता हूँ कि परमात्मा के भजन के बिना जीव बिलखते हैं। जो मनुष्य माया के मोह में व्यस्त रहते हैं उनका शरीर धिक्कारयोग्य है। 1। रहाउ। जैसे किसी बगार करने वाले (भार उठाने वाले) के सिर पर पैसे-रुपए रखे जाएं, वह पैसे-रुपए मालिक के घर में जा पहुँचते हैं, उस बिगारी ने (भार उठाने का) दुख ही सहा होता है। जैसे कोई मनुष्य सपने में राजा बन बैठता है (पर नींद खत्म होने पर जब) आँखें खोलता है तो (सुपनें में मिले राज की सारी सच्चाई) ध्वस्त हो जाती है। 2। जैसे कोई रक्षक किसी और के खेत की (रखवाली करता है), (फसल पकने पर) फसल मालिक की मल्कियत हो जाती है और रखवाले का काम खत्म हो जाता है। रखवाला उस (पराए) खेत की (रखवाली की) खातिर दुखी होता रहता है, पर उसे (आखिर) कुछ भी नहीं मिलता। 3। (पर जीव के भी क्या वश? सुपने में) जिस प्रभू का (दिया हुआ) राज मिलता है, उसी का दिया हुआ सपना भी होता है। जिस प्रभू ने मनुष्य को माया दी है, उसी ने माया की तृष्णा भी चिपकाई हुई है। हे नानक ! प्रभू खुद ही (तृष्णा चिपका के) आत्मिक मौत देता है, खुद ही (अपने नाम की दाति दे के) मानस जीवन का मनोरथ सफल करता है। प्रभू के दर पर ही (सदा नाम की दाति के वास्ते) अरदास करनी चाहिए। 4। 11। 80।
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
बहु रंग माइआ बहु बिधि पेखी ॥
कलम कागद सिआनप लेखी ॥
महर मलूक होइ देखिआ खान ॥
ता ते नाही मनु त्रिपतान ॥1॥
सो सुखु मो कउ संत बतावहु ॥
त्रिसना बूझै मनु त्रिपतावहु ॥1॥ रहाउ ॥
असु पवन हसति असवारी ॥
चोआ चंदनु सेज सुंदरि नारी ॥
नट नाटिक आखारे गाइआ ॥
ता महि मनि संतोखु न पाइआ ॥2॥
तखतु सभा मंडन दोलीचे ॥
सगल मेवे सुंदर बागीचे ॥
आखेड़ बिरति राजन की लीला ॥
मनु न सुहेला परपंचु हीला ॥3॥
करि किरपा संतन सचु कहिआ ॥
सरब सूख इहु आनंदु लहिआ ॥
साधसंगि हरि कीरतनु गाईऐ ॥
कहु नानक वडभागी पाईऐ ॥4॥
जा कै हरि धनु सोई सुहेला ॥
प्रभ किरपा ते साधसंगि मेला ॥1॥ रहाउ दूजा ॥12॥81॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ मैंने बहु-रंगी माया कई ढंग-तरीकों से मोहती देखी है। कागज कलम (ले कर कईयों ने) अनेकों विद्वता वाले लेख लिखे हैं (माया उन्हें विद्वता के रूप में मोह रही है)। (कईयों ने) चौधरी खान-सुल्तान बन के देख लिया है। इनसे (किसी का) मन तृप्त नहीं हो सका। 1। हे संत जनों ! मुझे वह आत्मिक आनंद बताओ (जिससे मेरी माया की) तृष्णा मिट जाए। हे संत जनों ! मेरे मन को संतोखी बना दो। 1। रहाउ। हाथियों की और हवा जैसे तेज घोड़ों की सवारी (कईयों ने कर के देखी है), इत्र और चंदन (इस्तेमाल करके देखा है), सुंदर स्त्री की सेज (ले के देखी) है, मैंने रंग भूमि में नटों के नाटक देखे हैं, और उनके गीत गाए हुए सुने हैं। इनमें व्यस्त हो के भी (किसी के) मन ने शांति प्राप्त नहीं की। 2। राज-दरबार की सजावटें, तख्त (ऊपर बैठना), दुलीचे, सब किस्म के फल, सुंदर फुलवाड़ियां, शिकार खेलने वाली रुची, राजाओं की खेलें (इन सब से भी) मन सुखी नहीं होता। ये सारा यत्न छल ही साबत होता है। 3। (दुनिआ के रंग तमाशों में से सुख तलाशते को) संतों ने मेहर करके सच बताया कि (सिर्फ इसी उद्यम से ही) सारे सुखों का मूल ये आत्मिक आनंद मिलता है की साध-संगति में परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाने चाहिए। हे नानक ! कह, सिफत सालाह की ये दाति बड़े भाग्यों से मिलती है। 4। जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम धन मौजूद है वही आसान है। साध-संगति में मिल बैठना परमात्मा की कृपा से ही नसीब होता है। 1। रहाउ दूजा।
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मेरे मन ! परमात्मा के नाम का आसरा ले, आपको (दुनिया के दुख-कलेशों की) गर्म हवा का झोका छू नहीं सकेगा।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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