अंग 178

अंग
178
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुर का सबदु अंम्रित रसु चाखु ॥
अवरि जतन कहहु कउन काज ॥
करि किरपा राखै आपि लाज ॥2॥
किआ मानुख कहहु किआ जोरु ॥
झूठा माइआ का सभु सोरु ॥
करण करावनहार सुआमी ॥
सगल घटा के अंतरजामी ॥3॥
सरब सुखा सुखु साचा एहु ॥
गुर उपदेसु मनै महि लेहु ॥
जा कउ राम नाम लिव लागी ॥
कहु नानक सो धंनु वडभागी ॥4॥7॥76॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) गुरू के शबद का आनंद ले। (गुरू का शबद) आत्मिक जीवन देने वाला रस है। (हे भाई !) बता (परमात्मा को भुला के) अन्य किए गए उद्यम प्रयास किस काम आ सकते हैं? (इसलिए, प्रभू की शरण पड़, वह प्रभू) मिहर करके (जीव की) इज्जत स्वयं रखता है। 2। बताओ, ये लोग क्या करने के लायक हैं? इनके गुरूर (का) कितना (आधार) है? (हे भाई !) माया की सारी फूँ-फां झूठी है (चार दिनों की है)। मालिक प्रभू (सब जीवों में व्यापक हो के खुद ही) सब कुछ करने के स्मर्थ है। खुद ही जीवों से सब कुछ कराता है। वह प्रभू सब जीवों के दिलों की जानता है। 3। यही है सारे सुखों से श्रेष्ठ सुख, और, सदा कायम रहने वाला सुख (की) (हे भाई !) सत्गुरू का उपदेश अपने मन में टिका के रख, जिस मनुष्य को परमात्मा के नाम की लगन लग जाती है, हे नानक ! कह,वह धन्य है वह भाग्यशाली है। 4। 7। 76।
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
सुणि हरि कथा उतारी मैलु ॥
महा पुनीत भए सुख सैलु ॥
वडै भागि पाइआ साधसंगु ॥
पारब्रहम सिउ लागो रंगु ॥1॥
हरि हरि नामु जपत जनु तारिओ ॥
अगनि सागरु गुरि पारि उतारिओ ॥1॥ रहाउ ॥
करि कीरतनु मन सीतल भए ॥
जनम जनम के किलविख गए ॥
सरब निधान पेखे मन माहि ॥
अब ढूढन काहे कउ जाहि ॥2॥
प्रभ अपुने जब भए दइआल ॥
पूरन होई सेवक घाल ॥
बंधन काटि कीए अपने दास ॥
सिमरि सिमरि सिमरि गुणतास ॥3॥
एको मनि एको सभ ठाइ ॥
पूरन पूरि रहिओ सभ जाइ ॥
गुरि पूरै सभु भरमु चुकाइआ ॥
हरि सिमरत नानक सुखु पाइआ ॥4॥8॥77॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ जिन मनुष्यों ने (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा की सिफत सालाह सुन के (अपने मन से विकारों की) मैल उतार ली वे बड़े ही पवित्र (जीवन वाले) हो गए। उन्होंने अनेकों ही सुख प्राप्त कर लिए। उन्होंने बड़ी किस्मत से गुरू का मिलाप हासिल कर लिया। उनका परमात्मा से प्रेम बन गया। 1। हरि नाम सिमरते सेवक को (गुरू ने संसार समुंद्र से) पार लंघा लिया है। गुरू ने (सेवक को) तृष्णा की आग के समुंद्र से पार लंघा लिया है। 1। रहाउ। परमातमा की सिफत सालाह करके जिनके मन शीतल हो गए (उनके अंदर से) जन्मों जन्मांतरों के पाप दूर हो गए। उन्होंने सारे खजाने अपने मन में ही देख लिए, (इस वास्ते सुख) तलाशने के लिए अब वह (कहीं और) क्यूँ जाएं? (भाव, सुख की तलाश बाहर जगत के पदार्थों में से करने की उन्हें जरूरत नहीं रहती)। 2। जब प्रभू जी अपने दासों पर दयाल होते हैं, तब दासों की (की हुई सेवा-सिमरन की) मिहनत सफल हो जाती है। (सेवकों के माया के मोह के) बंधन काट के उनको अपना दास बना लेता है। गुणों के खजाने परमात्मा का नाम सिमर-सिमर के (सेवक परमात्मा में लीन हो जाते हैं)। 3। पूरे गुरू ने जिस मनुष्य के मन की सारी भटकन दूर कर दी, उसे हर जगह परमात्मा ही परमात्मा व्यापक भरपूर दिखता है। एक परमात्मा ही हरेक जगह पर दिखाई देता है। हे नानक ! परमात्मा का सिमरन करके उस मनुष्य ने आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया हैं4। 8। 77।
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
अगले मुए सि पाछै परे ॥
जो उबरे से बंधि लकु खरे ॥
जिह धंधे महि ओइ लपटाए ॥
उन ते दुगुण दिड़ी उन माए ॥1॥
ओह बेला कछु चीति न आवै ॥
बिनसि जाइ ताहू लपटावै ॥1॥ रहाउ ॥
आसा बंधी मूरख देह ॥
काम क्रोध लपटिओ असनेह ॥
सिर ऊपरि ठाढो धरम राइ ॥
मीठी करि करि बिखिआ खाइ ॥2॥
हउ बंधउ हउ साधउ बैरु ॥ हमरी भूमि कउणु घालै पैरु ॥
हउ पंडितु हउ चतुरु सिआणा ॥
करणैहारु न बुझै बिगाना ॥3॥
अपुनी गति मिति आपे जानै ॥
किआ को कहै किआ आखि वखानै ॥
जितु जितु लावहि तितु तितु लगना ॥
अपना भला सभ काहू मंगना ॥4॥
सभ किछु तेरा तूं करणैहारु ॥
अंतु नाही किछु पारावारु ॥
दास अपने कउ दीजै दानु ॥
कबहू न विसरै नानक नामु ॥5॥9॥78॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ अपने बड़े पूर्वज जो मर चुके हैं वह भूल जाते हैं (भाव, ये बात भूल जाती है कि जोड़ी हुई माया वे यहीं छोड़ गए), जो अब जीवित हैं वह (माया जोड़ने के लिए) कमर कस के खड़े हो जाते हैं। जिस धंधे में वह (मर चुके बड़े पूर्वज) फसे हुए थे, उनसे दुगनी माया की पकड़ वह जीवित मनुष्य अपने मन में बना लेते हैं। 1। (मूर्ख मनुष्य को) वह समय रत्ती भर भी याद नहीं आता (जब बड़े पूर्वजों की तरह सब कुछ यहीं छोड़ जाना है)। मनुष्य (बार बार) उसी (माया) के साथ चिपकता है जिस ने नाश हो जाना है (जिसने साथ नहीं निभना)। 1। रहाउ। मूर्ख मनुष्य का शरीर (भाव, हरेक ज्ञानेंद्रियां माया की) आशाओं से जकड़ी रहती हैं, मूर्ख मनुष्य काम-क्रोध-मोह के बंधनों में फसा रहता है। सिर पर धर्मराज खड़ा हुआ है (भाव, मौत का समय नजदीक , पर) मूर्ख मनुष्य (आत्मिक मौत लाने वाली) माया (-जहर) मीठी जानबूझ कर खाता रहता है। 2। (माया में मद्होश मूर्ख मनुष्य ऐसी अहंकार भरी बातें करता है) मैं (उसको) बांध लूँगा, मैं (उससे अपने) वैर (का बदला) लूँगा, मेरी जमीन पर कौन पैर रखता है? मैं विद्वान हूँ, मैं चतुर हूँ, मैं सुजान हूँ। (अपने अहंकार में) मूर्ख मनुष्य अपने पैदा करने वाले परमात्मा को को भी नहीं समझता (याद रखता)। 3। (पर, जीव के भी क्या वश?) परमात्मा स्वयं ही जानता है कि वह कैसा है और कितना बड़ा है। जीव (उस परमात्मा की गति मिति बारे, स्वाभाव बारे) कुछ भी नहीं कह सकता, कुछ भी कह के बयान नहीं कर सकता। हे प्रभू ! आप जीव को जिस जिस तरफ लगाता है, उधर उधर ही ये लग सकता है। हरेक जीव ने आपके से ही अपने भले की माँग माँगनी है। 4। हे प्रभू ! ये सब कुछ आपका ही पैदा किया हुआ है, आप ही सारे जगत को बनाने वाला है। आपके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। आपके स्वरूप का उरला-परला छोर नहीं ढूँढा जा सकता। हे प्रभू ! अपने दास नानक को ये दाति बख्श कि मुझे कभी भी आपका नाम ना भूले। 5। 9। 78।
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
अनिक जतन नही होत छुटारा ॥
बहुतु सिआणप आगल भारा ॥
हरि की सेवा निरमल हेत ॥
प्रभ की दरगह सोभा सेत ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ (हे मन !) अनेकों प्रयत्नों से भी (माया के मोह के कारण पैदा हुए दुख कलेशों से) छुटकारा नहीं हो सकता, (बल्कि, माया के कारण की हुई) ज्यादा चतुराई (अन्य दुखों का) ज्यादा भार (सिर पर डाल देती है)। अगर पवित्र प्यार से हरी की सेवा-भक्ति करें, तो हरी की दरगाह में आदर-सत्कार के साथ पहुँचते हैं। 1।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) गुरू के शबद का आनंद ले।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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