संत जना की चरणी लागु ॥2॥
सरब जीअ हहि जा कै हाथि ॥
कदे न विछुड़ै सभ कै साथि ॥
उपाव छोडि गहु तिस की ओट ॥
निमख माहि होवै तेरी छोटि ॥3॥
सदा निकटि करि तिस नो जाणु ॥
प्रभ की आगिआ सति करि मानु ॥
गुर कै बचनि मिटावहु आपु ॥
हरि हरि नामु नानक जपि जापु ॥4॥4॥73॥
गुर का बचनु सदा अबिनासी ॥
गुर कै बचनि कटी जम फासी ॥
गुर का बचनु जीअ कै संगि ॥
गुर कै बचनि रचै राम कै रंगि ॥1॥
जो गुरि दीआ सु मन कै कामि ॥
संत का कीआ सति करि मानि ॥1॥ रहाउ ॥
गुर का बचनु अटल अछेद ॥
गुर कै बचनि कटे भ्रम भेद ॥
गुर का बचनु कतहु न जाइ ॥
गुर कै बचनि हरि के गुण गाइ ॥2॥
गुर का बचनु जीअ कै साथ ॥
गुर का बचनु अनाथ को नाथ ॥
गुर कै बचनि नरकि न पवै ॥
गुर कै बचनि रसना अंम्रितु रवै ॥3॥
गुर का बचनु परगटु संसारि ॥
गुर कै बचनि न आवै हारि ॥
जिसु जन होए आपि क्रिपाल ॥ नानक सतिगुर सदा दइआल ॥4॥5॥74॥
जिनि कीता माटी ते रतनु ॥
गरभ महि राखिआ जिनि करि जतनु ॥
जिनि दीनी सोभा वडिआई ॥
तिसु प्रभ कउ आठ पहर धिआई ॥1॥
रमईआ रेनु साध जन पावउ ॥
गुर मिलि अपुना खसमु धिआवउ ॥1॥ रहाउ ॥
जिनि कीता मूड़ ते बकता ॥
जिनि कीता बेसुरत ते सुरता ॥
जिसु परसादि नवै निधि पाई ॥
सो प्रभु मन ते बिसरत नाही ॥2॥
जिनि दीआ निथावे कउ थानु ॥
जिनि दीआ निमाने कउ मानु ॥
जिनि कीनी सभ पूरन आसा ॥
सिमरउ दिनु रैनि सास गिरासा ॥3॥
जिसु प्रसादि माइआ सिलक काटी ॥
गुर प्रसादि अंम्रितु बिखु खाटी ॥
कहु नानक इस ते किछु नाही ॥
राखनहारे कउ सालाही ॥4॥6॥75॥
तिस की सरणि नाही भउ सोगु ॥
उस ते बाहरि कछू न होगु ॥
तजी सिआणप बल बुधि बिकार ॥
दास अपने की राखनहार ॥1॥
जपि मन मेरे राम राम रंगि ॥
घरि बाहरि तेरै सद संगि ॥1॥ रहाउ ॥
तिस की टेक मनै महि राखु ॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अपनी दलीलें अपनी समझदारिआं सारी छोड़ दे, और गुरमुखों की शरण पड़।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।