अंग 177

अंग
177
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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उकति सिआणप सगली तिआगु ॥
संत जना की चरणी लागु ॥2॥
सरब जीअ हहि जा कै हाथि ॥
कदे न विछुड़ै सभ कै साथि ॥
उपाव छोडि गहु तिस की ओट ॥
निमख माहि होवै तेरी छोटि ॥3॥
सदा निकटि करि तिस नो जाणु ॥
प्रभ की आगिआ सति करि मानु ॥
गुर कै बचनि मिटावहु आपु ॥
हरि हरि नामु नानक जपि जापु ॥4॥4॥73॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: अपनी दलीलें अपनी समझदारिआं सारी छोड़ दे, और गुरमुखों की शरण पड़ । 2। (हे भाई !) सारे जीव जंतु जिस परमात्मा के वश में (हाथ में) है, जो प्रभू कभी भी (जीवों से) अलग नहीं होता, (सदा) सब जीवों के साथ रहता है, अपने प्रयत्नों-कोशिशों को छोड़ के उस परमात्मा का आसरा-परना पकड़। आँख की एक झपक में (माया के मोह के बंधनों से) आपकी मुक्ति हैं जाएगी। 3। हे नानक ! उस परमात्मा को सदा अपने नजदीक बसता समझ। ये दृढ़ करके मान कि परमात्मा की रजा अटॅल है। गुरू के बचन में (जुड़ के अपने अंदर से) स्वैभाव दूर कर, सदा परमात्मा का नाम जप, सदा प्रभू (के गुणों) का जाप जप। 4। 4। 73।
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
गुर का बचनु सदा अबिनासी ॥
गुर कै बचनि कटी जम फासी ॥
गुर का बचनु जीअ कै संगि ॥
गुर कै बचनि रचै राम कै रंगि ॥1॥
जो गुरि दीआ सु मन कै कामि ॥
संत का कीआ सति करि मानि ॥1॥ रहाउ ॥
गुर का बचनु अटल अछेद ॥
गुर कै बचनि कटे भ्रम भेद ॥
गुर का बचनु कतहु न जाइ ॥
गुर कै बचनि हरि के गुण गाइ ॥2॥
गुर का बचनु जीअ कै साथ ॥
गुर का बचनु अनाथ को नाथ ॥
गुर कै बचनि नरकि न पवै ॥
गुर कै बचनि रसना अंम्रितु रवै ॥3॥
गुर का बचनु परगटु संसारि ॥
गुर कै बचनि न आवै हारि ॥
जिसु जन होए आपि क्रिपाल ॥ नानक सतिगुर सदा दइआल ॥4॥5॥74॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ गुरू का वचन (उपदेश) हमेशा आत्मिक जीवन के काम आने वाला है सदा अविनाशी है। गुरू के वचन से आत्मिक मौत लाने वाला मोह रूपी फंदा कट जाता है। गुरू का वचन हमेशा जीव के संग है। गुरू के उपदेश से आदमी परमात्मा के प्रेम-रंग में जुड़ा रहता है। 1। (हे भाई !) जो (उपदेश) गुरू ने दिया है, वह (हरेक मनुष्य के) मन के काम आता है। (इस वास्ते हे भाई !) गुरू के किए हुए इस उपकार को सदा साथ निभने वाला समझ। 1। रहाउ। वाला (पुराना होने वाला) नहीं। गुरू के उपदेश के द्वारा मनुष्य की भटकना मनुष्य के भेदभाव कट जाते हैं। गुरू का उपदेश कभी व्यर्थ नहीं जाता। गुरू के उपदेश (की बरकति) से मनुष्य परमात्मा के गुण गाता (रहता) है। 2। गुरू का उपदेश जीवात्मा के साथ निभता है। गुरू का उपदेश निआसरी जीवात्माओं का सहारा बनता है। गुरू के उपदेश की बरकति से मनुष्य नर्क में नहीं जाता, और, गुरू के उपदेश की बरकति से मनुष्य अपनी जीभ से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पीता है। 3। गुरू का उपदेश मनुष्य को संसार में प्रसिद्ध कर देता है। गुरू के उपदेश की बरकति से मनुष्य जीवन-बाजी हार के नहीं आता। हे नानक ! जिस मनुष्य पर परमात्मा खुद मेहरबान होता है उस पर सतिगुरू सदैव दया-दृष्टि करता रहता है। 4। 5। 74।
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
जिनि कीता माटी ते रतनु ॥
गरभ महि राखिआ जिनि करि जतनु ॥
जिनि दीनी सोभा वडिआई ॥
तिसु प्रभ कउ आठ पहर धिआई ॥1॥
रमईआ रेनु साध जन पावउ ॥
गुर मिलि अपुना खसमु धिआवउ ॥1॥ रहाउ ॥
जिनि कीता मूड़ ते बकता ॥
जिनि कीता बेसुरत ते सुरता ॥
जिसु परसादि नवै निधि पाई ॥
सो प्रभु मन ते बिसरत नाही ॥2॥
जिनि दीआ निथावे कउ थानु ॥
जिनि दीआ निमाने कउ मानु ॥
जिनि कीनी सभ पूरन आसा ॥
सिमरउ दिनु रैनि सास गिरासा ॥3॥
जिसु प्रसादि माइआ सिलक काटी ॥
गुर प्रसादि अंम्रितु बिखु खाटी ॥
कहु नानक इस ते किछु नाही ॥
राखनहारे कउ सालाही ॥4॥6॥75॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ (हे भाई !) जिस (प्रभू) ने मिट्टी से (मेरा) अमुल्य मानव शरीर बना दिया है। जिसने यतन करके माँ के पेट में मेरी रक्षा की है, जिसने मुझे शोभा दी है, आदर बख्शी है, उस प्रभू को मैं (उसकी मेहर से) आठों पहर सिमरता हूँ। 1। हे सुंदर राम ! (कृपा कर) मैं गुरमुखों के चरणों की धूड़ प्राप्त कर लूँ, और गुरू को मिल के (आपको) अपने पति को सिमरता रहूँ। 1। रहाउ। (हे भाई !) जिस (करतार) ने (मुझ) मूर्ख-अंजान को सुंदर बोल बोलने वाला बना दिया है, जिसने (मुझे) बेसमझ से समझदार बना दिया है, जिस (प्रभू) की कृपा से मैं (धरती के सारे) नौ ही खजाने हासिल कर रहा हूँ, वह प्रभू मेरे मन से भूलता नहीं। 2। (हे भाई !) जिस (प्रभू) ने (मुझ) निआसरे को आसरा दिया है, जिसने (मुझ) निमाणे को मान-आदर दिया है, जिस (करतार) ने मेरी हरेक आस (अब तक) पूरी की है, उसे मैं दिन रात हरेक श्वास-ग्रास सिमरता रहता हूँ। 3। हे नानक ! कह, (हे भाई !) जिस (प्रभू) की कृपा से (मेरे गले से) माया (के मोह) की फांसी कॅट गयी है, (जिसके कारण) गुरू की कृपा से (मुझे) अमृत (जैसी मीठी लगने वाली माया अब) कड़वी जहर प्रतीत हो रही है, इस जीव के वश कुछ नहीं कि (अपने प्रयासों से प्रभू की सिफत सालाह कर सके) मैं उस प्रतिपालक प्रभू की सिफत सालाह करता हूँ । 4। 6। 75।
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
तिस की सरणि नाही भउ सोगु ॥
उस ते बाहरि कछू न होगु ॥
तजी सिआणप बल बुधि बिकार ॥
दास अपने की राखनहार ॥1॥
जपि मन मेरे राम राम रंगि ॥
घरि बाहरि तेरै सद संगि ॥1॥ रहाउ ॥
तिस की टेक मनै महि राखु ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ (हे भाई !) उस राम की शरण पड़ने से कोई भय छू नहीं सकता। कोई चिंता नहीं व्याप सकती। (क्योंकि कोई डर कोई चिंता) कुछ भी उस राम से आकी नहीं हो सकते। (इस वास्ते हे भाई !) मैंने अपनी अक्ल का आसरा रखने की बुराई त्याग दी है (और उस राम का दास बन गया हूँ, वह राम) अपने दास की इज्जत रखने के स्मर्थ है। 1। हे मेरे मन ! प्रेम से राम का नाम जप। वह नाम आपके घर में (हृदय में) और बाहर हर जगह सदा आपके साथ रहता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) अपने मन में उस परमात्मा का आसरा रख।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अपनी दलीलें अपनी समझदारिआं सारी छोड़ दे, और गुरमुखों की शरण पड़।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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