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177
गउड़ी
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उकति सिआणप सगली तिआगु ॥
उकति सिआणप सगली तिआगु ॥
संत जना की चरणी लागु ॥2॥
सरब जीअ हहि जा कै हाथि ॥
कदे न विछुड़ै सभ कै साथि ॥
उपाव छोडि गहु तिस की ओट ॥
निमख माहि होवै तेरी छोटि ॥3॥
सदा निकटि करि तिस नो जाणु ॥
प्रभ की आगिआ सति करि मानु ॥
गुर कै बचनि मिटावहु आपु ॥
हरि हरि नामु नानक जपि जापु ॥4॥4॥73॥
संत जना की चरणी लागु ॥2॥
सरब जीअ हहि जा कै हाथि ॥
कदे न विछुड़ै सभ कै साथि ॥
उपाव छोडि गहु तिस की ओट ॥
निमख माहि होवै तेरी छोटि ॥3॥
सदा निकटि करि तिस नो जाणु ॥
प्रभ की आगिआ सति करि मानु ॥
गुर कै बचनि मिटावहु आपु ॥
हरि हरि नामु नानक जपि जापु ॥4॥4॥73॥
हिन्दी अर्थ: अपनी दलीलें अपनी समझदारिआं सारी छोड़ दे, और गुरमुखों की शरण पड़ । 2। (हे भाई !) सारे जीव जंतु जिस परमात्मा के वश में (हाथ में) है, जो प्रभू कभी भी (जीवों से) अलग नहीं होता, (सदा) सब जीवों के साथ रहता है, अपने प्रयत्नों-कोशिशों को छोड़ के उस परमात्मा का आसरा-परना पकड़। आँख की एक झपक में (माया के मोह के बंधनों से) आपकी मुक्ति हो जाएगी। 3। हे नानक ! उस परमात्मा को सदा अपने नजदीक बसता समझ। ये दृढ़ करके मान कि परमात्मा की रजा अटॅल है। गुरू के बचन में (जुड़ के अपने अंदर से) स्वैभाव दूर कर, सदा परमात्मा का नाम जप, सदा प्रभू (के गुणों) का जाप जप। 4। 4। 73।
गुर का बचनु सदा अबिनासी ॥
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
गुर का बचनु सदा अबिनासी ॥
गुर कै बचनि कटी जम फासी ॥
गुर का बचनु जीअ कै संगि ॥
गुर कै बचनि रचै राम कै रंगि ॥1॥
जो गुरि दीआ सु मन कै कामि ॥
संत का कीआ सति करि मानि ॥1॥ रहाउ ॥
गुर का बचनु अटल अछेद ॥
गुर कै बचनि कटे भ्रम भेद ॥
गुर का बचनु कतहु न जाइ ॥
गुर कै बचनि हरि के गुण गाइ ॥2॥
गुर का बचनु जीअ कै साथ ॥
गुर का बचनु अनाथ को नाथ ॥
गुर कै बचनि नरकि न पवै ॥
गुर कै बचनि रसना अंम्रितु रवै ॥3॥
गुर का बचनु परगटु संसारि ॥
गुर कै बचनि न आवै हारि ॥
जिसु जन होए आपि क्रिपाल ॥ नानक सतिगुर सदा दइआल ॥4॥5॥74॥
गुर का बचनु सदा अबिनासी ॥
गुर कै बचनि कटी जम फासी ॥
गुर का बचनु जीअ कै संगि ॥
गुर कै बचनि रचै राम कै रंगि ॥1॥
जो गुरि दीआ सु मन कै कामि ॥
संत का कीआ सति करि मानि ॥1॥ रहाउ ॥
गुर का बचनु अटल अछेद ॥
गुर कै बचनि कटे भ्रम भेद ॥
गुर का बचनु कतहु न जाइ ॥
गुर कै बचनि हरि के गुण गाइ ॥2॥
गुर का बचनु जीअ कै साथ ॥
गुर का बचनु अनाथ को नाथ ॥
गुर कै बचनि नरकि न पवै ॥
गुर कै बचनि रसना अंम्रितु रवै ॥3॥
गुर का बचनु परगटु संसारि ॥
गुर कै बचनि न आवै हारि ॥
जिसु जन होए आपि क्रिपाल ॥ नानक सतिगुर सदा दइआल ॥4॥5॥74॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ गुरू का वचन (उपदेश) हमेशा आत्मिक जीवन के काम आने वाला है सदा अविनाशी है। गुरू के वचन से आत्मिक मौत लाने वाला मोह रूपी फंदा कट जाता है। गुरू का वचन हमेशा जीव के संग है। गुरू के उपदेश से आदमी परमात्मा के प्रेम-रंग में जुड़ा रहता है। 1। (हे भाई !) जो (उपदेश) गुरू ने दिया है, वह (हरेक मनुष्य के) मन के काम आता है। (इस वास्ते हे भाई !) गुरू के किए हुए इस उपकार को सदा साथ निभने वाला समझ। 1। रहाउ। वाला (पुराना होने वाला) नहीं। गुरू के उपदेश के द्वारा मनुष्य की भटकना मनुष्य के भेदभाव कट जाते हैं। गुरू का उपदेश कभी व्यर्थ नहीं जाता। गुरू के उपदेश (की बरकति) से मनुष्य परमात्मा के गुण गाता (रहता) है। 2। गुरू का उपदेश जीवात्मा के साथ निभता है। गुरू का उपदेश निआसरी जीवात्माओं का सहारा बनता है। गुरू के उपदेश की बरकति से मनुष्य नर्क में नहीं जाता, और, गुरू के उपदेश की बरकति से मनुष्य अपनी जीभ से आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस पीता है। 3। गुरू का उपदेश मनुष्य को संसार में प्रसिद्ध कर देता है। गुरू के उपदेश की बरकति से मनुष्य जीवन-बाजी हार के नहीं आता। हे नानक ! जिस मनुष्य पर परमात्मा खुद मेहरबान होता है उस पर सतिगुरू सदैव दया-दृष्टि करता रहता है। 4। 5। 74।
जिनि कीता माटी ते रतनु ॥
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
जिनि कीता माटी ते रतनु ॥
गरभ महि राखिआ जिनि करि जतनु ॥
जिनि दीनी सोभा वडिआई ॥
तिसु प्रभ कउ आठ पहर धिआई ॥1॥
रमईआ रेनु साध जन पावउ ॥
गुर मिलि अपुना खसमु धिआवउ ॥1॥ रहाउ ॥
जिनि कीता मूड़ ते बकता ॥
जिनि कीता बेसुरत ते सुरता ॥
जिसु परसादि नवै निधि पाई ॥
सो प्रभु मन ते बिसरत नाही ॥2॥
जिनि दीआ निथावे कउ थानु ॥
जिनि दीआ निमाने कउ मानु ॥
जिनि कीनी सभ पूरन आसा ॥
सिमरउ दिनु रैनि सास गिरासा ॥3॥
जिसु प्रसादि माइआ सिलक काटी ॥
गुर प्रसादि अंम्रितु बिखु खाटी ॥
कहु नानक इस ते किछु नाही ॥
राखनहारे कउ सालाही ॥4॥6॥75॥
जिनि कीता माटी ते रतनु ॥
गरभ महि राखिआ जिनि करि जतनु ॥
जिनि दीनी सोभा वडिआई ॥
तिसु प्रभ कउ आठ पहर धिआई ॥1॥
रमईआ रेनु साध जन पावउ ॥
गुर मिलि अपुना खसमु धिआवउ ॥1॥ रहाउ ॥
जिनि कीता मूड़ ते बकता ॥
जिनि कीता बेसुरत ते सुरता ॥
जिसु परसादि नवै निधि पाई ॥
सो प्रभु मन ते बिसरत नाही ॥2॥
जिनि दीआ निथावे कउ थानु ॥
जिनि दीआ निमाने कउ मानु ॥
जिनि कीनी सभ पूरन आसा ॥
सिमरउ दिनु रैनि सास गिरासा ॥3॥
जिसु प्रसादि माइआ सिलक काटी ॥
गुर प्रसादि अंम्रितु बिखु खाटी ॥
कहु नानक इस ते किछु नाही ॥
राखनहारे कउ सालाही ॥4॥6॥75॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ (हे भाई !) जिस (प्रभू) ने मिट्टी से (मेरा) अमुल्य मानव शरीर बना दिया है। जिसने यतन करके माँ के पेट में मेरी रक्षा की है, जिसने मुझे शोभा दी है, आदर बख्शी है, उस प्रभू को मैं (उसकी मेहर से) आठों पहर सिमरता हूँ। 1। हे सुंदर राम ! (कृपा कर) मैं गुरमुखों के चरणों की धूड़ प्राप्त कर लूँ, और गुरू को मिल के (आपको) अपने पति को सिमरता रहूँ। 1। रहाउ। (हे भाई !) जिस (करतार) ने (मुझ) मूर्ख-अंजान को सुंदर बोल बोलने वाला बना दिया है, जिसने (मुझे) बेसमझ से समझदार बना दिया है, जिस (प्रभू) की कृपा से मैं (धरती के सारे) नौ ही खजाने हासिल कर रहा हूँ, वह प्रभू मेरे मन से भूलता नहीं। 2। (हे भाई !) जिस (प्रभू) ने (मुझ) निआसरे को आसरा दिया है, जिसने (मुझ) निमाणे को मान-आदर दिया है, जिस (करतार) ने मेरी हरेक आस (अब तक) पूरी की है, उसे मैं दिन रात हरेक श्वास-ग्रास सिमरता रहता हूँ। 3। हे नानक ! कह, (हे भाई !) जिस (प्रभू) की कृपा से (मेरे गले से) माया (के मोह) की फांसी कॅट गयी है, (जिसके कारण) गुरू की कृपा से (मुझे) अमृत (जैसी मीठी लगने वाली माया अब) कड़वी जहर प्रतीत हो रही है, इस जीव के वश कुछ नहीं कि (अपने प्रयासों से प्रभू की सिफत सालाह कर सके) मैं उस प्रतिपालक प्रभू की सिफत सालाह करता हूँ । 4। 6। 75।
तिस की सरणि नाही भउ सोगु ॥
गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥
तिस की सरणि नाही भउ सोगु ॥
उस ते बाहरि कछू न होगु ॥
तजी सिआणप बल बुधि बिकार ॥
दास अपने की राखनहार ॥1॥
जपि मन मेरे राम राम रंगि ॥
घरि बाहरि तेरै सद संगि ॥1॥ रहाउ ॥
तिस की टेक मनै महि राखु ॥
तिस की सरणि नाही भउ सोगु ॥
उस ते बाहरि कछू न होगु ॥
तजी सिआणप बल बुधि बिकार ॥
दास अपने की राखनहार ॥1॥
जपि मन मेरे राम राम रंगि ॥
घरि बाहरि तेरै सद संगि ॥1॥ रहाउ ॥
तिस की टेक मनै महि राखु ॥
हिन्दी अर्थ: गउड़ी गुआरेरी महला 5 ॥ (हे भाई !) उस राम की शरण पड़ने से कोई भय छू नहीं सकता। कोई चिंता नहीं व्याप सकती। (क्योंकि कोई डर कोई चिंता) कुछ भी उस राम से आकी नहीं हो सकते। (इस वास्ते हे भाई !) मैंने अपनी अक्ल का आसरा रखने की बुराई त्याग दी है (और उस राम का दास बन गया हूँ, वह राम) अपने दास की इज्जत रखने के स्मर्थ है। 1। हे मेरे मन ! प्रेम से राम का नाम जप। वह नाम आपके घर में (हृदय में) और बाहर हर जगह सदा आपके साथ रहता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) अपने मन में उस परमात्मा का आसरा रख।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 177 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।