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अंग 1328

अंग
1328
राग प्रभाती
राग: प्रभाती · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
दूखा ते सुख ऊपजहि सूखी होवहि दूख ॥
जितु मुखि तू सालाहीअहि तितु मुखि कैसी भूख ॥3॥
नानक मूरखु एकु तू अवरु भला सैसारु ॥
जितु तनि नामु न ऊपजै से तन होहि खुआर ॥4॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: (दुनियां वाले दुख-कलेश भी प्रभू की बख्शिश का वसीला हैं क्योंकि इन) दुखों से (इन दुखों के कारण विषौ-विकारों से पलटने पर वापस लौटने पर) आत्मिक सुख पैदा हो जाते हैं। (और दुनियावी भोगों के) सुखों से (आत्मिक और शारीरिक) रोग उपजते हैं। हे प्रभू ! जिस मुँह से आपकी सिफत-सालाह की जाती है। उस मुँह में माया की भूख नहीं रह जाती (और माया की भूख दूर होने पर सारे दुख-रोग नाश हो जाते हैं)। 3। हे नानक ! (अगर आपके अंदर परमात्मा का नाम नहीं है तो) सिर्फ आप ही मूर्ख है। आपके से कहीं ज्यादा संसार अच्छा है। जिस जिस शरीर में प्रभू का नाम नहीं। वह शरीर (विकारों में पड़ कर) दुखी होते हैं। 4। 2।
प्रभाती महला 1 ॥
जै कारणि बेद ब्रहमै उचरे संकरि छोडी माइआ ॥
जै कारणि सिध भए उदासी देवी मरमु न पाइआ ॥1॥
बाबा मनि साचा मुखि साचा कहीऐ तरीऐ साचा होई ॥
दुसमनु दूखु न आवै नेड़ै हरि मति पावै कोई ॥1॥ रहाउ ॥
अगनि बिंब पवणै की बाणी तीनि नाम के दासा ॥
ते तसकर जो नामु न लेवहि वासहि कोट पंचासा ॥2॥
जे को एक करै चंगिआई मनि चिति बहुतु बफावै ॥
एते गुण एतीआ चंगिआईआ देइ न पछोतावै ॥3॥
तुधु सालाहनि तिन धनु पलै नानक का धनु सोई ॥
जे को जीउ कहै ओना कउ जम की तलब न होई ॥4॥3॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 1 ॥ जिस परमात्मा के मिलाप की खातिर ब्रहमा ने वेद उचारे। और शिव जी ने दुनिया की माया त्यागी। जिस प्रभू को प्राप्त करने के लिए जोग-साधना में माहिर जोगी (दुनिया से) विरक्त हो गए (वह बड़ा बेअंत है)। देवताओं ने (भी) उस (के गुणों) का भेद नहीं पाया। 1। हे भाई ! अपने मन में सदा कायम रहने वाले परमात्मा को बसाना चाहिए। मुँह से सदा-स्थिर प्रभू की सिफतें करनी चाहिए। (इस तरह संसार-समुंद्र की विकार-लहरों से) पार लांघा जाता है। उस सदा-स्थिर प्रभू का रूप हो जाया जाता है। जो कोई मनुष्य परमात्मा का सिमरन करने की बुद्धि सीख लेता है। कोई वैरी उस पर जोर नहीं डाल सकता। कोई दुख-कलेश उसको दबा नहीं सकता। 1। यह सारा जगत तमो गुण। सतो गुण और रजो गुण की रचना है (सारे जीव-जंतु इन गुणों के अधीन हैं)। पर यह तीनों गुण प्रभू के नाम के दास हैं (जो लोग नाम जपते हैं। उन पर ये तीन गुण अपना जोर नहीं डाल सकते)। (पर हाँ।) जो जीव प्रभू का नाम नहीं सिमरते वे (इन तीन गुणों के) चोर हैं (इनसे मार खाते हैं। क्योंकि) वह सदा (कामादिक) शेरों के घुरनों में बसते हैं। 2। (हे भाई ! देखो। उस परमात्मा की दरिया-दिली) अगर कोई व्यक्ति (किसी के साथ) कोई एक भलाई करता है; तो वह अपने मन में चित्त में बड़ी डींगे मारता है (बड़ा गुमान करता है। पर) परमात्मा में इतने बेअंत गुण हैं। वह इतने भले कार्य करता है। वह (सब जीवों को दातें) देता है। पर दातें दे दे के कभी अफसोस नहीं करता (कि जीव दातें लेकर कद्र नहीं करते)। 3। हे प्रभू ! जो लोग आपकी सिफत-सालाह करते हैं। उनके हृदय में आपका नाम-धन है (वह असली धन है)। मुझ नानक का धन भी आपका नाम ही है। (जिनके पल्ले नाम-धन है) यदि कोई उनके साथ आदर-सत्कार के बोल बोलता है। तो जमराज (भी) उनसे कर्मों का लेखा नहीं पूछता (भाव। वे बुराई से हट जाते हैं)। 4। 3।
प्रभाती महला 1 ॥
जा कै रूपु नाही जाति नाही नाही मुखु मासा ॥
सतिगुरि मिले निरंजनु पाइआ तेरै नामि है निवासा ॥1॥
अउधू सहजे ततु बीचारि ॥
जा ते फिरि न आवहु सैसारि ॥1॥ रहाउ ॥
जा कै करमु नाही धरमु नाही नाही सुचि माला ॥
सिव जोति कंनहु बुधि पाई सतिगुरू रखवाला ॥2॥
जा कै बरतु नाही नेमु नाही नाही बकबाई ॥
गति अवगति की चिंत नाही सतिगुरू फुरमाई ॥3॥
जा कै आस नाही निरास नाही चिति सुरति समझाई ॥
तंत कउ परम तंतु मिलिआ नानका बुधि पाई ॥4॥4॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 1 ॥ (हे जोगी !) जिनके पास रूप नहीं। जिनकी ऊँची जाति नहीं। जिनके सुंदर नक्श नहीं। जिनके पास शारीरिक बल नहीं। जब वे गुरू-चरणों में जुड़े। तो उनको माया-रहित प्रभू मिल गया। (हे प्रभू ! गुरू की शरण पड़ने से) उनका निवास आपके नाम में हैं गया। 1। हे जोगी ! (आप घर-बार छोड़ के तन पर राख मल के ही यह समझे बैठा है कि आप जनम-मरण के चक्करों में से निकल गया है। आपको भुलेखा है)। अडोल आत्मिक अवस्था में टिक के प्रभू की सिफत-सालाह में सुरति जोड़। (यही तरीका है) जिससे आप दोबारा जनम-मरण के चक्कर में नहीं आएगा। 1। रहाउ। (हे जोगी !) जो लोग शास्त्रों का बताया हुआ कोई कर्म-धर्म नहीं करते। जिन्होंने चौके आदि की कोई सुचि नहीं रखी। जिनके गले में (तुलसी आदि की) माला नहीं। जब उनका रखवाला गुरू बन गया। उनको कल्याण-रूप निरंकारी ज्योति से (उसकी सिफतसालाह में जुड़ने की) बुद्धि मिल गई। 2। (हे जोगी !) जिन लोगों ने कभी कोई व्रत नहीं रखा। कोई (इस तरह का और) नियम नहीं रखा। जो शास्त्र-चर्चा के कोई चतुराई भरे बोल नहीं बोलने जानते। जब गुरू का उपदेश उनको मिला। तो मुक्ति अथवा नर्क का उनको कोई फिक्र सहम नहीं रह गया। 3। हे नानक ! जिस जीव के पास धन-पदार्थ नहीं कि वह दुनिया की आशाएं चित्त में बनाए रखे। जिस जीव के चित्त में माया से उपराम हो के गृहस्थ-त्याग के ख्याल भी नहीं उठते। जिसको ऐसी कोई सुरति नहीं समझ नहीं। जब उसको (सतिगुरू से प्रभू की सिफत-सालाह में जुड़ने की) अकल मिलती है। तो उस जीव को परमात्मा मिल जाता है। 4। 4।
प्रभाती महला 1 ॥
ता का कहिआ दरि परवाणु ॥
बिखु अंम्रितु दुइ सम करि जाणु ॥1॥
किआ कहीऐ सरबे रहिआ समाइ ॥
जो किछु वरतै सभ तेरी रजाइ ॥1॥ रहाउ ॥
प्रगटी जोति चूका अभिमानु ॥
सतिगुरि दीआ अंम्रित नामु ॥2॥
कलि महि आइआ सो जनु जाणु ॥
साची दरगह पावै माणु ॥3॥
कहणा सुनणा अकथ घरि जाइ ॥
कथनी बदनी नानक जलि जाइ ॥4॥5॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 1 ॥ (परमात्मा की रज़ा के बारे में) उस मनुष्य का बोला हुआ वचन परमात्मा के दर पर ठीक माना जाता है जो मनुष्य जहर और अमृत (दुख और सुख) दोनों को एक-समान समझने के लायक हो जाता है (क्योंकि वह मनुष्य अच्छी तरह जानता है कि जिनको सुख व दुख मिलता है उन सबमें परमात्मा स्वयं मौजूद है)। 1। (किसी को सुख है किसी को दुख मिल रहा है। पर इसके उलट) कुछ कहा नहीं जा सकता क्योंकि आप सब जीवों में मौजूद है हे प्रभू (जगत में) जो कुछ घटित हैं रहा है सब आपके हुकम अनुसार घटित हैं रहा है।(जिनको सुख अथवा दुख मिलता है उनमें भी आप स्वयं ही व्यापक है। और स्वयं ही उस सुख अथवा दुख को भोग रहा है)। 1। रहाउ। उसके अंदर परमात्मा की ज्योति कभी रौशनी हो जती है (उस रौशनी की बरकति से उसको अपनी विक्त की समझ पड़ जाती है। इस वास्ते उसके अंदर से) अहंकार दूर हो जाता है। जिस मनुष्य को सतिगुरू ने आत्मिक जीवन देने वाला प्रभू का नाम दिया है ।2। (हे भाई !) उसी मनुष्य को जगत में जन्मा समझो (भाव। उसी व्यक्ति का जगत में आना सफल है। जो सर्व-व्यापक परमात्मा की रजा को समझता है। और इस वास्ते) सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू की दरगाह में इज्जत हासिल करता है। 3। हे नानक ! वही वचन बोलने और सुनने सफल हैं जिनसे मनुष्य बेअंत गुणों वाले परमात्मा के चरणों में जुड़ सकता है। (परमातमा की रज़ा से परे जाने वाली। परमात्मा के चरणों से दूर रखने वाली) और-और कहनी-कथनी व्यर्थ जाती है। 4। 5।
प्रभाती महला 1 ॥
अंम्रितु नीरु गिआनि मन मजनु अठसठि तीरथ संगि गहे ॥
गुर उपदेसि जवाहर माणक सेवे सिखु सोु खोजि लहै ॥1॥
गुर समानि तीरथु नही कोइ ॥
सरु संतोखु तासु गुरु होइ ॥1॥ रहाउ ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 1 ॥ (गुरू से मिलने वाला) प्रभू-नाम (गुरू-तीर्थ का) जल है। गुरू से मिले आत्मिक प्रकाश में मन की डुबकी (उस गुरू-तीर्थ का) स्नान है। (गुरू-तीर्थ के) साथ ही अढ़सठ तीर्थों (के स्नान) मिल जाते हैं। गुरू के उपदेश (-रूप गहरे पानियों में परमात्मा की सिफतसालाह के) मोती और जवाहर है। जो सिख (गुरू-तीर्थ को) सेवता है (श्रद्धा से आता है) वह तलाश करके पा लेता है। 1। गुरू के बराबर का और कोई तीर्थ नहीं। वह गुरू ही संतोख-रूप सरोवर है। 1। रहाउ।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(दुनियां वाले दुख-कलेश भी प्रभू की बख्शिश का वसीला हैं क्योंकि इन) दुखों से (इन दुखों के कारण विषौ-विकारों से पलटने पर वापस लौटने पर) आत्मिक सुख पैदा हो जाते हैं।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।