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अंग 1328 · प्रभाती

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अंग
1328
प्रभाती
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  1. दूखा ते सुख ऊपजहि सूखी होवहि दूख ॥
  2. जै कारणि बेद ब्रहमै उचरे संकरि छोडी माइआ ॥
  3. जा कै रूपु नाही जाति नाही नाही मुखु मासा ॥
  4. ता का कहिआ दरि परवाणु ॥
  5. अंम्रितु नीरु गिआनि मन मजनु अठसठि तीरथ संगि गहे ॥

गुरु नानक देव जी · शबद · राग प्रभाती

दूखा ते सुख ऊपजहि सूखी होवहि दूख ॥

अंग 1327 से चला आ रहा अंश

दूखा ते सुख ऊपजहि सूखी होवहि दूख ॥
जितु मुखि तू सालाहीअहि तितु मुखि कैसी भूख ॥3॥
नानक मूरखु एकु तू अवरु भला सैसारु ॥
जितु तनि नामु न ऊपजै से तन होहि खुआर ॥4॥2॥

हिन्दी अर्थ: (दुनियां वाले दुख-कलेश भी प्रभू की बख्शिश का वसीला हैं क्योंकि इन) दुखों से (इन दुखों के कारण विषौ-विकारों से पलटने पर वापस लौटने पर) आत्मिक सुख पैदा हो जाते हैं। (और दुनियावी भोगों के) सुखों से (आत्मिक और शारीरिक) रोग उपजते हैं। हे प्रभू! जिस मुँह से आपकी सिफत-सालाह की जाती है। उस मुँह में माया की भूख नहीं रह जाती (और माया की भूख दूर होने पर सारे दुख-रोग नाश हो जाते हैं)। 3। हे नानक! (अगर आपके अंदर परमात्मा का नाम नहीं है तो) सिर्फ आप ही मूर्ख हैं। आपसे कहीं ज्यादा संसार अच्छा है। जिस जिस शरीर में प्रभू का नाम नहीं। वे शरीर (विकारों में पड़ कर) दुखी होते हैं। 4। 2।

गुरु नानक देव जी · शबद · राग प्रभाती

जै कारणि बेद ब्रहमै उचरे संकरि छोडी माइआ ॥

प्रभाती महला 1 ॥
जै कारणि बेद ब्रहमै उचरे संकरि छोडी माइआ ॥
जै कारणि सिध भए उदासी देवी मरमु न पाइआ ॥1॥
बाबा मनि साचा मुखि साचा कहीऐ तरीऐ साचा होई ॥
दुसमनु दूखु न आवै नेड़ै हरि मति पावै कोई ॥1॥ रहाउ ॥
अगनि बिंब पवणै की बाणी तीनि नाम के दासा ॥
ते तसकर जो नामु न लेवहि वासहि कोट पंचासा ॥2॥
जे को एक करै चंगिआई मनि चिति बहुतु बफावै ॥
एते गुण एतीआ चंगिआईआ देइ न पछोतावै ॥3॥
तुधु सालाहनि तिन धनु पलै नानक का धनु सोई ॥
जे को जीउ कहै ओना कउ जम की तलब न होई ॥4॥3॥

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 1 ॥ जिस परमात्मा के मिलाप की खातिर ब्रहमा ने वेद उचारे। और शिव जी ने दुनिया की माया त्यागी। जिस प्रभू को प्राप्त करने के लिए जोग-साधना में माहिर जोगी (दुनिया से) विरक्त हो गए (वह बड़ा बेअंत है)। देवताओं ने (भी) उस (के गुणों) का भेद नहीं पाया। 1। हे भाई! अपने मन में सदा कायम रहने वाले परमात्मा को बसाना चाहिए। मुँह से सदा-स्थिर प्रभू की सिफतें करनी चाहिए। (इस तरह संसार-समुंद्र की विकार-लहरों से) पार लांघा जाता है। उस सदा-स्थिर प्रभू का रूप हो जाया जाता है। जो कोई मनुष्य परमात्मा का सिमरन करने की बुद्धि सीख लेता है। कोई वैरी उस पर जोर नहीं डाल सकता। कोई दुख-कलेश उसको दबा नहीं सकता। 1। यह सारा जगत तमो गुण। सतो गुण और रजो गुण की रचना है (सारे जीव-जंतु इन गुणों के अधीन हैं)। पर ये तीनों गुण प्रभू के नाम के दास हैं (जो लोग नाम जपते हैं। उन पर ये तीन गुण अपना जोर नहीं डाल सकते)। (पर हाँ।) जो जीव प्रभू का नाम नहीं सिमरते वे (इन तीन गुणों के) चोर हैं (इनसे मार खाते हैं। क्योंकि) वे सदा (कामादिक) शेरों के घुरनों में बसते हैं। 2। (हे भाई! देखें, उस परमात्मा की दरिया-दिली) अगर कोई व्यक्ति (किसी के साथ) कोई एक भलाई करता है; तो वह अपने मन में चित्त में बड़ी डींगे मारता है (बड़ा गुमान करता है। पर) परमात्मा में इतने बेअंत गुण हैं। वह इतने भले कार्य करता है। वह (सब जीवों को दातें) देता है। पर दातें दे दे के कभी अफसोस नहीं करता (कि जीव दातें लेकर कद्र नहीं करते)। 3। हे प्रभू! जो लोग आपकी सिफत-सालाह करते हैं। उनके हृदय में आपका नाम-धन है (वह असली धन है)। मुझ नानक का धन भी आपका नाम ही है। (जिनके पल्ले नाम-धन है) यदि कोई उनके साथ आदर-सत्कार के बोल बोलता है, तो जमराज (भी) उनसे कर्मों का लेखा नहीं पूछता (भाव, वे बुराई से हट जाते हैं)। 4। 3।

गुरु नानक देव जी · शबद · राग प्रभाती

जा कै रूपु नाही जाति नाही नाही मुखु मासा ॥

प्रभाती महला 1 ॥
जा कै रूपु नाही जाति नाही नाही मुखु मासा ॥
सतिगुरि मिले निरंजनु पाइआ तेरै नामि है निवासा ॥1॥
अउधू सहजे ततु बीचारि ॥
जा ते फिरि न आवहु सैसारि ॥1॥ रहाउ ॥
जा कै करमु नाही धरमु नाही नाही सुचि माला ॥
सिव जोति कंनहु बुधि पाई सतिगुरू रखवाला ॥2॥
जा कै बरतु नाही नेमु नाही नाही बकबाई ॥
गति अवगति की चिंत नाही सतिगुरू फुरमाई ॥3॥
जा कै आस नाही निरास नाही चिति सुरति समझाई ॥
तंत कउ परम तंतु मिलिआ नानका बुधि पाई ॥4॥4॥

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 1 ॥ (हे जोगी!) जिनके पास रूप नहीं। जिनकी ऊँची जाति नहीं। जिनके सुंदर नक्श नहीं। जिनके पास शारीरिक बल नहीं। जब वे गुरू-चरणों में जुड़े, तो उनको माया-रहित प्रभू मिल गया। (हे प्रभू! गुरू की शरण पड़ने से) उनका निवास आपके नाम में हो गया। 1। हे जोगी! (आप घर-बार छोड़ के तन पर राख मल के ही यह समझे बैठे हैं कि आप जनम-मरण के चक्करों में से निकल गए हैं। आपको भुलेखा है)। अडोल आत्मिक अवस्था में टिक के प्रभू की सिफत-सालाह में सुरति जोड़ें। (यही तरीका है) जिससे आप दोबारा जनम-मरण के चक्कर में नहीं आएँगे। 1। रहाउ। (हे जोगी!) जो लोग शास्त्रों का बताया हुआ कोई कर्म-धर्म नहीं करते। जिन्होंने चौके आदि की कोई सुचि नहीं रखी। जिनके गले में (तुलसी आदि की) माला नहीं। जब उनका रखवाला गुरू बन गया। उनको कल्याण-रूप निरंकारी ज्योति से (उसकी सिफतसालाह में जुड़ने की) बुद्धि मिल गई। 2। (हे जोगी!) जिन लोगों ने कभी कोई व्रत नहीं रखा। कोई (इस तरह का और) नियम नहीं रखा। जो शास्त्र-चर्चा के कोई चतुराई भरे बोल नहीं बोलने जानते। जब गुरू का उपदेश उनको मिला, तो मुक्ति अथवा नर्क का उनको कोई फिक्र सहम नहीं रह गया। 3। हे नानक! जिस जीव के पास धन-पदार्थ नहीं कि वह दुनिया की आशाएं चित्त में बनाए रखे। जिस जीव के चित्त में माया से उपराम हो के गृहस्थ-त्याग के ख्याल भी नहीं उठते। जिसको ऐसी कोई सुरति नहीं समझ नहीं। जब उसको (सतिगुरू से प्रभू की सिफत-सालाह में जुड़ने की) अकल मिलती है, तो उस जीव को परमात्मा मिल जाता है। 4। 4।

गुरु नानक देव जी · शबद · राग प्रभाती

ता का कहिआ दरि परवाणु ॥

प्रभाती महला 1 ॥
ता का कहिआ दरि परवाणु ॥
बिखु अंम्रितु दुइ सम करि जाणु ॥1॥
किआ कहीऐ सरबे रहिआ समाइ ॥
जो किछु वरतै सभ तेरी रजाइ ॥1॥ रहाउ ॥
प्रगटी जोति चूका अभिमानु ॥
सतिगुरि दीआ अंम्रित नामु ॥2॥
कलि महि आइआ सो जनु जाणु ॥
साची दरगह पावै माणु ॥3॥
कहणा सुनणा अकथ घरि जाइ ॥
कथनी बदनी नानक जलि जाइ ॥4॥5॥

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 1 ॥ (परमात्मा की रज़ा के बारे में) उस मनुष्य का बोला हुआ वचन परमात्मा के दर पर ठीक माना जाता है जो मनुष्य जहर और अमृत (दुख और सुख) दोनों को एक-समान समझने के लायक हो जाता है (क्योंकि वह मनुष्य अच्छी तरह जानता है कि जिनको सुख व दुख मिलता है उन सबमें परमात्मा स्वयं मौजूद है)। 1। (किसी को सुख है किसी को दुख मिल रहा है। पर इसके उलट) कुछ कहा नहीं जा सकता क्योंकि आप सब जीवों में मौजूद हैं हे प्रभू (जगत में) जो कुछ घटित हो रहा है सब आपके हुकम अनुसार घटित हो रहा है। (जिनको सुख अथवा दुख मिलता है उनमें भी आप स्वयं ही व्यापक हैं। और स्वयं ही उस सुख अथवा दुख को भोग रहे हैं)। 1। रहाउ। उसके अंदर परमात्मा की ज्योति कभी रौशनी हो जती है (उस रौशनी की बरकति से उसको अपनी विक्त की समझ पड़ जाती है। इस वास्ते उसके अंदर से) अहंकार दूर हो जाता है। जिस मनुष्य को सतिगुरू ने आत्मिक जीवन देने वाला प्रभू का नाम दिया है। 2। (हे भाई!) उसी मनुष्य को जगत में जन्मा समझें (भाव, उसी व्यक्ति का जगत में आना सफल है। जो सर्व-व्यापक परमात्मा की रजा को समझता है। और इस वास्ते) सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू की दरगाह में इज्जत हासिल करता है। 3। हे नानक! वही वचन बोलने और सुनने सफल हैं जिनसे मनुष्य बेअंत गुणों वाले परमात्मा के चरणों में जुड़ सकता है। (परमातमा की रज़ा से परे जाने वाली। परमात्मा के चरणों से दूर रखने वाली) और-और कहनी-कथनी व्यर्थ जाती है। 4। 5।

गुरु नानक देव जी · शबद · राग प्रभाती

अंम्रितु नीरु गिआनि मन मजनु अठसठि तीरथ संगि गहे ॥

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प्रभाती महला 1 ॥
अंम्रितु नीरु गिआनि मन मजनु अठसठि तीरथ संगि गहे ॥
गुर उपदेसि जवाहर माणक सेवे सिखु सोु खोजि लहै ॥1॥
गुर समानि तीरथु नही कोइ ॥
सरु संतोखु तासु गुरु होइ ॥1॥ रहाउ ॥

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 1 ॥ (गुरू से मिलने वाला) प्रभू-नाम (गुरू-तीर्थ का) जल है। गुरू से मिले आत्मिक प्रकाश में मन की डुबकी (उस गुरू-तीर्थ का) स्नान है। (गुरू-तीर्थ के) साथ ही अढ़सठ तीर्थों (के स्नान) मिल जाते हैं। गुरू के उपदेश (-रूप गहरे पानियों में परमात्मा की सिफतसालाह के) मोती और जवाहर हैं। जो सिख (गुरू-तीर्थ को) सेवता है (श्रद्धा से आता है) वह तलाश करके पा लेता है। 1। गुरू के बराबर का और कोई तीर्थ नहीं। वह गुरू ही संतोख-रूप सरोवर है। 1। रहाउ।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1328 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।