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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1320 · कल्याण

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अंग
1320
कल्याण
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  1. मेरे मन जपु जपि जगंनाथे ॥
  2. मेरे मन जपि हरि गुन अकथ सुनथई ॥
  3. हमरी चितवनी हरि प्रभु जानै ॥

मेरे मन जपु जपि जगंनाथे ॥

अंग 1319 से चला आ रहा अंश

मेरे मन जपु जपि जगंनाथे ॥
गुर उपदेसि हरि नामु धिआइओ सभि किलबिख दुख लाथे ॥1॥ रहाउ ॥
रसना एक जसु गाइ न साकै बहु कीजै बहु रसुनथे ॥
बार बार खिनु पल सभि गावहि गुन कहि न सकहि प्रभ तुमनथे ॥1॥
हम बहु प्रीति लगी प्रभ सुआमी हम लोचह प्रभु दिखनथे ॥
तुम बड दाते जीअ जीअन के तुम जानहु हम बिरथे ॥2॥
कोई मारगु पंथु बतावै प्रभ का कहु तिन कउ किआ दिनथे ॥
सभु तनु मनु अरपउ अरपि अरापउ कोई मेलै प्रभ मिलथे ॥3॥
हरि के गुन बहुत बहुत बहु सोभा हम तुछ करि करि बरनथे ॥
हमरी मति वसगति प्रभ तुमरै जन नानक के प्रभ समरथे ॥4॥3॥

हिन्दी अर्थ: हे मेरे मन ! जगत के नाथ (के नाम) का जाप जपा कर। (जिस मनुष्य ने) गुरू के उपदेश से परमात्मा का नाम सिमरा। उसके सारे पाप सारे दुख दूर हो गए। 1। रहाउ। हे प्रभू ! (मनुष्य की) एक जीभ (आपका) यश (पूरे तौर पर) गा नहीं सकती। (इसको) बहुत जीभों वाला बना दे। हे प्रभू ! सारे जीव बार-बार हरेक पल आपके गुण गाते हैं। पर आपके (सारे) गुण बयान नहीं कर सकते। 1। हे मेरे मालिक प्रभू ! मेरे अंदर आपके प्रति बहुत सारी प्रीति पैदा हो चुकी है; मैं आपको देखने की तमन्ना रखता हूँ। हे प्रभू ! आप सारे जीवों को जिंद देने वाले हैं। आप ही हम जीवों के दिल की पीड़ा जानते हैं। 2। हे भाई ! अगर कोई (संत जन मुझे) प्रभू (के मिलाप) का रास्ता बता दे। तो ऐसे (संत-) जनों को क्या देना चाहिए। अगर प्रभू को मिला हुआ कोई प्यारा मुझे प्रभू से मिला दे तो मैं तो अपना सारा तन सारा मन सदा के लिए भेट कर दूँ। 3। हे भाई ! परमात्मा के गुण बहुत ही बेअंत हैं। बहुत बेअंत हैं। हम जीव बहुत ही कम बयान करते हैं (पर जीवों के वश की बात नहीं है)। हे दास नानक के समर्थ प्रभू ! हम जीवों की मति आपके वश में है (जितनी मति आप देते हैं उतनी ही आपकी शोभा हम बयान कर सकते हैं)। 4। 3।

मेरे मन जपि हरि गुन अकथ सुनथई ॥

कलिआन महला 4 ॥
मेरे मन जपि हरि गुन अकथ सुनथई ॥
धरमु अरथु सभु कामु मोखु है जन पीछै लगि फिरथई ॥1॥ रहाउ ॥
सो हरि हरि नामु धिआवै हरि जनु जिसु बडभाग मथई ॥
जह दरगहि प्रभु लेखा मागै तह छुटै नामु धिआइथई ॥1॥
हमरे दोख बहु जनम जनम के दुखु हउमै मैलु लगथई ॥
गुरि धारि क्रिपा हरि जलि नावाए सभ किलबिख पाप गथई ॥2॥
जन कै रिद अंतरि प्रभु सुआमी जन हरि हरि नामु भजथई ॥
जह अंती अउसरु आइ बनतु है तह राखै नामु साथई ॥3॥
जन तेरा जसु गावहि हरि हरि प्रभ हरि जपिओ जगंनथई ॥
जन नानक के प्रभ राखे सुआमी हम पाथर रखु बुडथई ॥4॥4॥

हिन्दी अर्थ: कलिआनु महला 4 ॥ हे मेरे मन ! उस परमात्मा के गुण याद किया कर जो अकथ सुना जा रहा है। धर्म अर्थ काम मोक्ष- (यही है) सारा (मनुष्य का उद्देश्य। पर इनमें से हरेक ही परमात्मा के) भगत के पीछे-पीछे लगा फिरता है। 1। रहाउ। हे भाई ! जिस मनुष्य के माथे पर बड़े भाग्य (जाग उठते) हैं। वह भगत-जन परमात्मा का नाम सदा सिमरता है। जहाँ (अपनी) दरगाह में परमात्मा (मनुष्य के किए कर्मों का) लेखा माँगता है परमात्मा का नाम सिमर के ही वहाँ मनुष्य सुर्ख-रू होता है। 1। हम जीवों के (अंदर) अनेकों जनमों के ऐब इकठ्ठा हुए पड़े हैं। (हमारे अंदर) दुख (टिका रहता है)। अहंकार की मैल लगी रहती है। (जिन भाग्यवान को) गुरू ने मेहर कर कर हरि-नाम-जल में स्नान करा दिया। (उनके अंदर से) पापों विकारों की सारी (मैल) दूर हो गई । 2। हे भाई ! भगत-जनों के हृदय में मालिक-प्रभू बसा रहता है। भगत-जनों ने सदा परमात्मा का नाम जपा है। जहाँ आखिरी वक्त आ बनता है। वहाँ परमात्मा का नाम साथी (बन के) रक्षा करता है। 3। हे हरी ! (आपके) भगत आपका यश (सदा) गाते रहते हैं। हे जगत के नाथ प्रभू ! (आपके भक्तों ने) सदा आपका नाम जपा है। हे दास नानक के रखवाले मालिक प्रभू ! हम पत्थरों (की तरह) डूबते जीवों की रक्षा कर। 4। 4।

हमरी चितवनी हरि प्रभु जानै ॥

कलिआन महला 4 ॥
हमरी चितवनी हरि प्रभु जानै ॥
अउरु कोई निंद करै हरि जन की प्रभु ता का कहिआ इकु तिलु नही मानै ॥1॥ रहाउ ॥
अउर सभ तिआगि सेवा करि अचुत जो सभ ते ऊच ठाकुरु भगवानै ॥
हरि सेवा ते कालु जोहि न साकै चरनी आइ पवै हरि जानै ॥1॥
जा कउ राखि लेइ मेरा सुआमी ता कउ सुमति देइ पै कानै ॥
ता कउ कोई अपरि न साकै जा की भगति मेरा प्रभु मानै ॥2॥
हरि के चोज विडान देखु जन जो खोटा खरा इक निमख पछानै ॥
ता ते जन कउ अनदु भइआ है रिद सुध मिले खोटे पछुतानै ॥3॥
तुम हरि दाते समरथ सुआमी इकु मागउ तुझ पासहु हरि दानै ॥
जन नानक कउ हरि क्रिपा करि दीजै सद बसहि रिदै मोहि हरि चरानै ॥4॥5॥

हिन्दी अर्थ: कलिआनु महला 4 ॥ हे भाई ! हम जीवों की (हरेक) भावनी को परमात्मा (स्वयं) जानता है। अगर कोई और (निंदक मनुष्य) परमात्मा के भगत की निंदा करता हैं। परमात्मा उसका कहा हुआ (निंदा का वचन) रक्ती भर भी नहीं मानता। 1। रहाउ। हे भाई ! और हरेक (उम्मीद) छोड़ के उस अविनाशी परमात्मा की भक्ति किया कर। जो सब से ऊँचा मालिक भगवान है। हे भाई ! परमात्मा की सेवा-भक्ति की बरकति से आत्मिक मौत (भगत की ओर) देख भी नहीं सकती। वह तो भगत के चरणों में आ गिरती है (भगत के अधीन हो जाती है)। 1। हे भाई ! प्यारा मालिक-प्रभू जिस मनुष्य की रक्षा करता है। उसको प्यार से ध्यान से श्रेष्ठ मति बख्शता है। हे भाई ! परमात्मा जिस मनुष्य की भगती परवान कर लेता है। कोई और मनुष्य उसकी बराबरी नहीं कर सकता। 2। हे सज्जन ! देख। उस परमात्मा के करिश्मे बड़े हैरान करने वाले हैं जो आँख झपकने जितने समय में ही खोटे-खरे मनुष्य को पहचान लेता है। शुद्ध हृदय वाले मनुष्य उसको मिल जाते हैं। खोटे मनुष्य पछताते ही रह जाते हैं। तभी भगत के अंदर आनंद बना रहता है (क्योंकि भगत को प्रभू अपने चरणों में जोड़े रखता है)। 3। हे हरी ! आप सभ दातें देने वाले सभ ताकतों के मालिक हैं। हे हरी ! मैं आपसे एक ख़ैर माँगता हूँ। मेहर करके (अपने) दास नानक को (यह दान) दे कि। हे हरी ! आपके चरण मेरे हृदय में सदा बसते रहें। 4। 5।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1320 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।