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अंग 1321

अंग
1321
राग कल्याण
राग: कल्याण · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
कलिआन महला 4 ॥
प्रभ कीजै क्रिपा निधान हम हरि गुन गावहगे ॥
हउ तुमरी करउ नित आस प्रभ मोहि कब गलि लावहिगे ॥1॥ रहाउ ॥
हम बारिक मुगध इआन पिता समझावहिगे ॥
सुतु खिनु खिनु भूलि बिगारि जगत पित भावहिगे ॥1॥
जो हरि सुआमी तुम देहु सोई हम पावहगे ॥
मोहि दूजी नाही ठउर जिसु पहि हम जावहगे ॥2॥
जो हरि भावहि भगत तिना हरि भावहिगे ॥
जोती जोति मिलाइ जोति रलि जावहगे ॥3॥
हरि आपे होइ क्रिपालु आपि लिव लावहिगे ॥
जनु नानकु सरनि दुआरि हरि लाज रखावहिगे ॥4॥6॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: कलिआनु महला 4 ॥ हे कृपा के खजाने प्रभू ! मेहर कर। हम (जीव) आपके गुण गाते रहें। हे प्रभू ! मैं सदा आपकी (मेहर की ही) आस करता रहता हूँ कि प्रभू जी मुझे कब (अपने) गले से लगाएंगे। 1। रहाउ। हे भाई ! हम जीव मूर्ख अंजान बच्चे हैं। प्रभू पिता जी (हमें सदा) समझाते रहते हैं। पुत्र बार-बार हर वक्त भूलता है बिगड़ता है। पर जगत के पिता को (जीव बच्चे फिर भी) प्यारे (ही) लगते हैं। 1। हे हरी ! हे स्वामी ! जो कुछ आप (स्वयं) देता है। वही कुछ हम ले सकते हैं। (आपके बिना) मुझे कोई और जगह नहीं सूझती। जिसके पास हम जीव जा सकें। 2। हे भाई ! जो भगत प्रभू को प्यारे लगते हैं। उनको प्रभू जी प्यारे लगते हैं। (वह भगत) प्रभू की जोति में अपनी जिंद मिला के प्रभू की जोति से एक-मेक हुए रहते हैं। 3। हे भाई ! प्रभू जी स्वयं ही दयालु हो के (जीवों के अंदर) स्वयं (ही अपना) प्यार पैदा करते हैं। दास नानक प्रभू की शरण पड़ा रहता है। प्रभू के दर पर (गिरा) रहता है। (प्रभू जी दर पर पड़े हुए की) खुद ही इज्जत रखते हैं। 4। 6। छका । 1।
छका 1 ॥
कलिआनु भोपाली महला 4
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
पारब्रहमु परमेसुरु सुआमी दूख निवारणु नाराइणे ॥
सगल भगत जाचहि सुख सागर भव निधि तरण हरि चिंतामणे ॥1॥ रहाउ ॥
दीन दइआल जगदीस दमोदर हरि अंतरजामी गोबिंदे ॥
ते निरभउ जिन स्रीरामु धिआइआ गुरमति मुरारि हरि मुकंदे ॥1॥
जगदीसुर चरन सरन जो आए ते जन भव निधि पारि परे ॥
भगत जना की पैज हरि राखै जन नानक आपि हरि क्रिपा करे ॥2॥1॥7॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: कलिआनु भोपाली महला 4 सतिगुर प्रसादि ॥ हे नारायण ! हे स्वामी ! आप (सभ जीवों के) दुख दूर करने वाला पारब्रहम परमेश्वर है। हे हरी ! हे सबकी मनोकामना पूरी करने वाले ! हे सुखों के समुंद्र ! हे संसार-समुद्र के जहाज़ ! सारे ही भगत (आपके दर से दातें) माँगते हैं। 1। रहाउ। हे दीनों पर दया करने वाले ! हे जगत के ईश्वर ! हे दामोदर ! हे अंतजामी हरी ! हे गोबिंद ! हे मुरारी ! हे मुक्ति दाते हरी ! जिन मनुष्यों ने गुरू की मति ले के (आपको) श्री राम को सिमरा। उनको कोई डर छू नहीं सकता। 1। जो मनुष्य जगत के मालिक के चरणों की शरण में आते हैं। वे मनुष्य संसार-समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। हे दास नानक ! (कह- हे भाई !) प्रभू स्वयं मेहर करके अपने भगतों की लाज रखता है। 2। 1। 7।
रागु कलिआनु महला 5 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हमारै एह किरपा कीजै ॥
अलि मकरंद चरन कमल सिउ मनु फेरि फेरि रीझै ॥1॥ रहाउ ॥
आन जला सिउ काजु न कछूऐ हरि बूंद चात्रिक कउ दीजै ॥1॥
बिनु मिलबे नाही संतोखा पेखि दरसनु नानकु जीजै ॥2॥1॥
कलिआन महला 5 ॥
जाचिकु नामु जाचै जाचै ॥
सरब धार सरब के नाइक सुख समूह के दाते ॥1॥ रहाउ ॥
केती केती मांगनि मागै भावनीआ सो पाईऐ ॥1॥
सफल सफल सफल दरसु रे परसि परसि गुन गाईऐ ॥
नानक तत तत सिउ मिलीऐ हीरै हीरु बिधाईऐ ॥2॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: रागु कलिआनु महला 5 घरु 1 सतिगुर प्रसादि ॥ हे प्रभू ! मेरे ऊपर मेहर कर कि (जैसे) भौरा फूल के रस से रीझा रहता है। (वैसे ही मेरा मन) (आपके) सुंदर चरणों के साथ बार-बार लिपटा रहे। 1। रहाउ। हे प्रभू ! (जैसे) पपीहे को (वर्षा की बूँद के बिना) और पानियों से कोई गरज नहीं होती। वैसे ही मुझे पपीहे को (अपने नाम-अमृत की) बूँद दे। 1। हे प्रभू ! आपके मिलाप के बिना (मेरे अंदर) ठंढक नहीं पड़ती। (मेहर कर; आपका दास) नानक (आपके) दर्शन कर के आत्मिक जीवन हासिल करता रहे। 2। 1। कलिआन महला 5 ॥ (आपके दर का) मँगता (आपके दर से) नित्य माँगता रहता है। हे सब जीवों के आसरे प्रभू ! हे सभ जीवों के मालिक ! हे सारे सुखों के देने वाले ! 1। रहाउ। हे भाई ! बेअंत लुकाई (प्रभू के दर से) हरेक माँग माँगती रहती है। जो भी मन की मुराद होती है वह हासिल कर ली जाती है। 1। हे भाई ! प्रभू ऐसा है जिसका दर्शन सारे फल देने वाला है। आएँ। उसके चरण सदा छू-छू के उसके गुण गाते रहें। हे नानक ! (जैसे पानी आदि) तत्व (पानी) तत्व से मिल जाता है (वैसे ही गुण गाने की बरकति से) मन-हीरा प्रभू-हीरे से भेद लिया जाता है। 2। 2।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “कलिआनु महला 4 ॥ हे कृपा के खजाने प्रभू ! मेहर कर।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।