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1257
मलार
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नित नित लेहु न छीजै देह ॥
नित नित लेहु न छीजै देह ॥
अंत कालि जमु मारै ठेह ॥1॥
ऐसा दारू खाहि गवार ॥
जितु खाधै तेरे जाहि विकार ॥1॥ रहाउ ॥
राजु मालु जोबनु सभु छांव ॥
रथि फिरंदै दीसहि थाव ॥
देह न नाउ न होवै जाति ॥
ओथै दिहु ऐथै सभ राति ॥2॥
साद करि समधां त्रिसना घिउ तेलु ॥
कामु क्रोधु अगनी सिउ मेलु ॥
होम जग अरु पाठ पुराण ॥
जो तिसु भावै सो परवाण ॥3॥
तपु कागदु तेरा नामु नीसानु ॥
जिन कउ लिखिआ एहु निधानु ॥
से धनवंत दिसहि घरि जाइ ॥
नानक जननी धंनी माइ ॥4॥3॥8॥
अंत कालि जमु मारै ठेह ॥1॥
ऐसा दारू खाहि गवार ॥
जितु खाधै तेरे जाहि विकार ॥1॥ रहाउ ॥
राजु मालु जोबनु सभु छांव ॥
रथि फिरंदै दीसहि थाव ॥
देह न नाउ न होवै जाति ॥
ओथै दिहु ऐथै सभ राति ॥2॥
साद करि समधां त्रिसना घिउ तेलु ॥
कामु क्रोधु अगनी सिउ मेलु ॥
होम जग अरु पाठ पुराण ॥
जो तिसु भावै सो परवाण ॥3॥
तपु कागदु तेरा नामु नीसानु ॥
जिन कउ लिखिआ एहु निधानु ॥
से धनवंत दिसहि घरि जाइ ॥
नानक जननी धंनी माइ ॥4॥3॥8॥
हिन्दी अर्थ: (हे भाई ! यह तैयार हुआ कुश्ता) अगर आप सदा खाते रहें, तो इस तरह मनुष्य-जनम से नीचे की जूनियों में नहीं जाया जाता। ना ही अंत के समय मौत (का डर) पटक के मारता है। 1। हे मूर्ख जीव ! ऐसी दवाई खाएँ। जिसके खाने से आपके बुरे कर्म (सारे) नाश हो जाएँ। 1। रहाउ। (हे गवार जीव !) दुनिया का राज धन-पदार्थ और जवानी (जिनके नशे ने आपकी आँखों के आगे अंधेरा किया हुआ है) यह सब कुछ असलियत की परछाइयाँ हैं। जब सूरज चढ़ता है तो (अंधेरा दूर हो के) असली जगह (प्रत्यक्ष) दिख जाती है। (आप जवानी का। मशहूरी का, नाम का। उच्च जाति का मान करते हैं। प्रभू के दर पर) ना शरीर, ना नाम। ना ऊँची जाति कोई भी कबूल नहीं। क्योंकि उसकी हजूरी में (ज्ञान का) दिन चढ़ा रहता है। और यहाँ दुनिया में (माया के मोह की) रात हुई रहती है। 2। (हे गवार जीव !) दुनिया के पदार्थों के स्वादों को हवन की लकड़ी बनाएँ। माया की तृष्णा को (हवन के लिए) घी और तेल बनाएँ; काम और क्रोध को आग बनाएँ। इन सबको इकट्ठा करें (और जला के हवन कर दें)। जो कुछ परमात्मा को भाता है उसको सिर-माथे पर मानना ही हवन है, यही यज्ञ है और यही पुराण आदिकों का पाठ है। 3। हे प्रभू ! (आपके चरणों में जुड़ने के लिए उद्यम आदि) तप (जीव के करणी-रूप) कागज़ है। आपके नाम का सिमरन उस कागज़ पर लिखी राहदारी है। यह खजाना। ये लिखा हुआ परवाना जिन व्यक्तियों को मिल जाता है वे लोग प्रभू के दर पर पहुँच के धनवान दिखते हैं। हे नानक ! ऐसे व्यक्ति को पैदा करने वाली माँ (बहुत) भाग्यशाली है। 4। 3। 8।
बागे कापड़ बोलै बैण ॥
मलार महला 1 ॥
बागे कापड़ बोलै बैण ॥
लंमा नकु काले तेरे नैण ॥
कबहूं साहिबु देखिआ भैण ॥1॥
ऊडां ऊडि चड़ां असमानि ॥ साहिब संम्रिथ तेरै ताणि ॥
जलि थलि डूंगरि देखां तीर ॥
थान थनंतरि साहिबु बीर ॥2॥
जिनि तनु साजि दीए नालि खंभ ॥
अति त्रिसना उडणै की डंझ ॥
नदरि करे तां बंधां धीर ॥
जिउ वेखाले तिउ वेखां बीर ॥3॥
न इहु तनु जाइगा न जाहिगे खंभ ॥
पउणै पाणी अगनी का सनबंध ॥
नानक करमु होवै जपीऐ करि गुरु पीरु ॥
सचि समावै एहु सरीरु ॥4॥4॥9॥
बागे कापड़ बोलै बैण ॥
लंमा नकु काले तेरे नैण ॥
कबहूं साहिबु देखिआ भैण ॥1॥
ऊडां ऊडि चड़ां असमानि ॥ साहिब संम्रिथ तेरै ताणि ॥
जलि थलि डूंगरि देखां तीर ॥
थान थनंतरि साहिबु बीर ॥2॥
जिनि तनु साजि दीए नालि खंभ ॥
अति त्रिसना उडणै की डंझ ॥
नदरि करे तां बंधां धीर ॥
जिउ वेखाले तिउ वेखां बीर ॥3॥
न इहु तनु जाइगा न जाहिगे खंभ ॥
पउणै पाणी अगनी का सनबंध ॥
नानक करमु होवै जपीऐ करि गुरु पीरु ॥
सचि समावै एहु सरीरु ॥4॥4॥9॥
हिन्दी अर्थ: मलार महला 1 ॥ (जैसे) सफेद पंखों वाली (कूँज मीठे) बोल बोलती है (वैसे) हे बहन ! (आपका भी सुंदर रंग है। बोल भी मीठे हैं। आपके नैन-नक्श भी तीखे हैं) आपकी नाक लंबी है। आपके नेत्र काले हैं (भाव। हे जीव-स्त्री ! आपको परमात्मा ने सुंदर तीखे नैन-नक्शों वाला सुंदर शरीर दिया है। पर जिस ने ये दाति दी है) आपने कभी उस मालिक के दर्शन भी किए हैं (कि नहीं)? 1। हे सारी ताकतों के मालिक प्रभू ! मैं (कूँज) आपकी दी हुई ताकत से (आपके दिए हुए पंखों से) उड़ती हूँ और उड़ के आसमान में पहुँचती हूँ (भाव: हे प्रभू ! अगर मैं जीव-स्त्री इन सुंदर अंगों का इस सुंदर शरीर का मान भी करती हूँ, तो भी ये सुंदर अंग आपके ही दिए हुए हैं। ये सुंदर शरीर आपका ही बख्शा हुआ है)। हे वीर ! (उस दाते की मेहर से) मैं पानी में, धरती में, पहाड़ों में, दरियाओं के किनारे (जिधर भी) देखती हूँ, वह मालिक हर जगह में मौजूद है। 2। हे वीर ! जिस (मालिक) ने यह शरीर बना के इसके साथ ये सुंदर (तीखे नैन-नक्श वाले) अंग दिए हैं, (माया की) बहुत सारी तृष्णा भी उसी ने लगाई है। भटकने की चाहत भी उसी ने ही (मेरे अंदर) पैदा की है। जब वह मालिक मेहर की नजर करता है, तब मैं (माया की तृष्णा से) धीरज पाती हूँ (मैं भटकने से हट जाती हूँ)। और जैसे-जैसे वह मुझे अपने दर्शन करवाता है, वैसे-वैसे मैं दर्शन करती हूँ। 3। (हे वीर !) ना यह शरीर सदा साथ निभेगा, ना ही ये सुंदर अंग ही सदा कायम रहेंगे। यह तो हवा पानी आग आदि तत्वों का मेल है (जब तत्व बिखर जाएंगे, शरीर गिर जाएगा)। हे नानक ! जब मालिक की मेहर की निगाह होती है, तब गुरू पीर का पल्ला पकड़ के मालिक-प्रभू को सिमरा जा सकता है, तब यह शरीर उस सदा-स्थिर मालिक में लीन रहता है (तब ये सुंदर ज्ञान-इन्द्रियाँ भटकने से हट के प्रभू में टिकी रहती हैं)। 4। 4। 9।
निरंकारु आकारु है आपे आपे भरमि भुलाए ॥
मलार महला 3 चउपदे घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
निरंकारु आकारु है आपे आपे भरमि भुलाए ॥
करि करि करता आपे वेखै जितु भावै तितु लाए ॥
सेवक कउ एहा वडिआई जा कउ हुकमु मनाए ॥1॥
आपणा भाणा आपे जाणै गुर किरपा ते लहीऐ ॥
एहा सकति सिवै घरि आवै जीवदिआ मरि रहीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
वेद पड़ै पड़ि वादु वखाणै ब्रहमा बिसनु महेसा ॥
एह त्रिगुण माइआ जिनि जगतु भुलाइआ जनम मरण का सहसा ॥
गुर परसादी एको जाणै चूकै मनहु अंदेसा ॥2॥
हम दीन मूरख अवीचारी तुम चिंता करहु हमारी ॥
होहु दइआल करि दासु दासा का सेवा करी तुमारी ॥
एकु निधानु देहि तू अपणा अहिनिसि नामु वखाणी ॥3॥
कहत नानकु गुर परसादी बूझहु कोई ऐसा करे वीचारा ॥
जिउ जल ऊपरि फेनु बुदबुदा तैसा इहु संसारा ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
निरंकारु आकारु है आपे आपे भरमि भुलाए ॥
करि करि करता आपे वेखै जितु भावै तितु लाए ॥
सेवक कउ एहा वडिआई जा कउ हुकमु मनाए ॥1॥
आपणा भाणा आपे जाणै गुर किरपा ते लहीऐ ॥
एहा सकति सिवै घरि आवै जीवदिआ मरि रहीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
वेद पड़ै पड़ि वादु वखाणै ब्रहमा बिसनु महेसा ॥
एह त्रिगुण माइआ जिनि जगतु भुलाइआ जनम मरण का सहसा ॥
गुर परसादी एको जाणै चूकै मनहु अंदेसा ॥2॥
हम दीन मूरख अवीचारी तुम चिंता करहु हमारी ॥
होहु दइआल करि दासु दासा का सेवा करी तुमारी ॥
एकु निधानु देहि तू अपणा अहिनिसि नामु वखाणी ॥3॥
कहत नानकु गुर परसादी बूझहु कोई ऐसा करे वीचारा ॥
जिउ जल ऊपरि फेनु बुदबुदा तैसा इहु संसारा ॥
हिन्दी अर्थ: मलार महला 3 चउपदे घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! यह सारा दिखाई देता संसार निरंकार का अपना ही स्वरूप है। परमात्मा स्वयं ही (जीवों को) भटकना के द्वारा गलत राह पर डालता है। (सारे काम) कर कर के करतार स्वयं ही (उन कामों को) देखता है। जिस (काम) में उसकी रजा होती है (हरेक जीव को) उस (काम) में लगाता है। जिस सेवक से अपना हुकम मनवाता है (उसको हुकम मीठा लगवाता है। आज्ञा में चलाता है), उसको वह यही इज्जत बख्शता है। 1। हे भाई ! (परमात्मा) खुद ही अपनी मर्जी जानता है। (उसकी रज़ा को) गुरू की मेहर से समझा जा सकता है। (जब प्रभू की रज़ा की समझ आ जाती है, तब) यह माया वाली बिरती परमात्मा (के चरणों) में जुड़ती है और दुनिया की किरत-कार करते हुए ही अपने अंदर से अहंभाव खत्म कर लिया जाता है। 1। रहाउ। (हे भाई ! गुरू की शरण पड़ कर प्रभू की रज़ा समझने की जगह, पण्डित निरे) वेद (ही) पढ़ता रहता है और पढ़ के (उनकी) चर्चा ही (औरों को) सुनाता रहता है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव (आदि देवताओं की कथा-कहानियाँ ही सुनाता रहता है। इसका नतीजा यह होता है कि) यह त्रैगुणी माया, जिसने सारे जगत को भटका रखा है (गलत राह पर डाला हुआ है), उस पण्डित के अंदर जनम-मरण (के चक्कर) का सहम बनाए रखती है। हाँ, जो मनुष्य (गुरू की शरण आ के) गुरू की मेहर से एक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालता है, उसके मन में से (हरेक) फिक्र दूर हो जाता है। 2। हे प्रभू ! हम जीव दीन, मूर्ख, बेसमझ हैं। आप खुद ही हमारा ध्यान रखा करें। हे प्रभू ! (मेरे पर) दयावान हों, (मुझे अपने) दासों का दास बना लें (ताकि) मैं आपकी भगती करता रहूँ। हे प्रभू ! आप मुझे अपना नाम-खजाना दें, मैं दिन-रात (आपका) नाम जपता रहूँ। 3। नानक कहता है- हे भाई ! आप गुरू की कृपा से ही (सही जीवन-मार्ग) को समझ सकते हैं। जो मनुष्य समझता है, वह जगत के बारे में यह ख्याल बनाता है कि जैसे पानी के ऊपर झाग है, बुलबुला है (जो जल्द ही मिट जाता है), वैसे ही यह जगत है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 3: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1257 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।