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1258
मलार
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· शबद · राग मलार
जिस ते होआ तिसहि समाणा चूकि गइआ पासारा ॥4॥1॥
जिस ते होआ तिसहि समाणा चूकि गइआ पासारा ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: जिस (परमात्मा) से (जगत) पैदा होता है (जब) उसमें लीन हो जाता है, तब ये सारा जगत-पसारा समाप्त हो जाता है। 4। 1।
· शबद · राग मलार
जिनी हुकमु पछाणिआ से मेले हउमै सबदि जलाइ ॥
मलार महला 3 ॥
जिनी हुकमु पछाणिआ से मेले हउमै सबदि जलाइ ॥
सची भगति करहि दिनु राती सचि रहे लिव लाइ ॥
सदा सचु हरि वेखदे गुर कै सबदि सुभाइ ॥1॥
मन रे हुकमु मंनि सुखु होइ ॥
प्रभ भाणा अपणा भावदा जिसु बखसे तिसु बिघनु न कोइ ॥1॥ रहाउ ॥
त्रै गुण सभा धातु है ना हरि भगति न भाइ ॥
गति मुकति कदे न होवई हउमै करम कमाहि ॥
साहिब भावै सो थीऐ पइऐ किरति फिराहि ॥2॥
सतिगुर भेटिऐ मनु मरि रहै हरि नामु वसै मनि आइ ॥
तिस की कीमति ना पवै कहणा किछू न जाइ ॥
चउथै पदि वासा होइआ सचै रहै समाइ ॥3॥
मेरा हरि प्रभु अगमु अगोचरु है कीमति कहणु न जाइ ॥
गुर परसादी बुझीऐ सबदे कार कमाइ ॥
नानक नामु सलाहि तू हरि हरि दरि सोभा पाइ ॥4॥2॥
जिनी हुकमु पछाणिआ से मेले हउमै सबदि जलाइ ॥
सची भगति करहि दिनु राती सचि रहे लिव लाइ ॥
सदा सचु हरि वेखदे गुर कै सबदि सुभाइ ॥1॥
मन रे हुकमु मंनि सुखु होइ ॥
प्रभ भाणा अपणा भावदा जिसु बखसे तिसु बिघनु न कोइ ॥1॥ रहाउ ॥
त्रै गुण सभा धातु है ना हरि भगति न भाइ ॥
गति मुकति कदे न होवई हउमै करम कमाहि ॥
साहिब भावै सो थीऐ पइऐ किरति फिराहि ॥2॥
सतिगुर भेटिऐ मनु मरि रहै हरि नामु वसै मनि आइ ॥
तिस की कीमति ना पवै कहणा किछू न जाइ ॥
चउथै पदि वासा होइआ सचै रहै समाइ ॥3॥
मेरा हरि प्रभु अगमु अगोचरु है कीमति कहणु न जाइ ॥
गुर परसादी बुझीऐ सबदे कार कमाइ ॥
नानक नामु सलाहि तू हरि हरि दरि सोभा पाइ ॥4॥2॥
हिन्दी अर्थ: मलार महला 3 ॥ हे भाई! जिन मनुष्यों ने परमात्मा की रजा को मीठा करके माना है। प्रभू ने गुरू के शबद द्वारा (उनके अंदर से) अहंकार जला के उनको (अपने चरणों में) जोड़ लिया है। वह मनुष्य दिन-रात सदा-स्थिर प्रभू की भक्ति करते हैं। वे लिव लगा के सदा-स्थिर हरी में टिके रहते हैं। वे मनुष्य गुरू के शबद द्वारा प्रभू-प्रेम में (टिक के) सदा-स्थिर हरी को हर जगह बसता देखते हैं। 1। हे मन! (परमात्मा की) रजा में चला करें। (इस तरह) आत्मिक आनंद बना रहता है। हे मन! प्रभू को अपनी मर्जी प्यारी लगती है। जिस मनुष्य पर मेहर करता है (वह उसकी रजा में चलता है)। उसके जीवन-राह में कोई रुकावट नहीं आती। 1। रहाउ। हे भाई! त्रैगुणी (माया में सदा जुड़े रहना) निरी भटकना ही है (इसमें फसे रहने से) ना प्रभू की भगती हो सकती है। ना ही उसके प्यार में लीन हुआ जा सकता है। (त्रैगुणी माया के मोह के कारण) ऊँची आत्मिक अवस्था नहीं हो सकती। विकारों से खलासी कभी नहीं हो सकती। मनुष्य अहंकार (बढ़ाने वाले) काम (ही करते रहते हैं)। (पर जीवों के भी क्या वश में।) जो कुछ मालिक-हरी को अच्छा लगता है वही होता है। पिछले किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार जीव भटकते फिरते हैं। 2। हे भाई! अगर गुरू मिल जाए, तो मनुष्य का मन (अंदर से) स्वै भाव दूर कर लेता है। उसके मन में हरी-नाम बसता है। (फिर उसका जीवन इतना ऊँचा हो जाता है कि) उसका मूल्य नहीं पड़ सकता। उसका बयान नहीं किया जा सकता। वह मनुष्य उस अवस्था में जहाँ माया के तीन गुणों का जोर नहीं पड़ सकता। वह सदा कायम रहने वाले प्रभू में लीन हुआ रहता है। 3। हे भाई! मेरा हरी-प्रभू अपहुँच है ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच से परे है। किसी दुनियावी पदार्थ के बदले में नहीं मिल सकता। गुरू की मेहर से ही उसकी जान-पहचान होती है (जिसको जान-पहचान हो जाती है। वह मनुष्य) गुरू के शबद अनुसार (हरेक) कार करता है। हे नानक! आप सदा हरी-नाम सिमरते रहें। (जो सिमरता है) वह प्रभू के दर पर शोभा पाता है। 4। 2।
· शबद · राग मलार
गुरमुखि कोई विरला बूझै जिस नो नदरि करेइ ॥
मलार महला 3 ॥
गुरमुखि कोई विरला बूझै जिस नो नदरि करेइ ॥
गुर बिनु दाता कोई नाही बखसे नदरि करेइ ॥
गुर मिलिऐ सांति ऊपजै अनदिनु नामु लएइ ॥1॥
मेरे मन हरि अंम्रित नामु धिआइ ॥
सतिगुरु पुरखु मिलै नाउ पाईऐ हरि नामे सदा समाइ ॥1॥ रहाउ ॥
मनमुख सदा विछुड़े फिरहि कोइ न किस ही नालि ॥
हउमै वडा रोगु है सिरि मारे जमकालि ॥
गुरमति सतसंगति न विछुड़हि अनदिनु नामु सम॑ालि ॥2॥
सभना करता एकु तू नित करि देखहि वीचारु ॥
इकि गुरमुखि आपि मिलाइआ बखसे भगति भंडार ॥
तू आपे सभु किछु जाणदा किसु आगै करी पूकार ॥3॥
हरि हरि नामु अंम्रितु है नदरी पाइआ जाइ ॥
अनदिनु हरि हरि उचरै गुर कै सहजि सुभाइ ॥
नानक नामु निधानु है नामे ही चितु लाइ ॥4॥3॥
गुरमुखि कोई विरला बूझै जिस नो नदरि करेइ ॥
गुर बिनु दाता कोई नाही बखसे नदरि करेइ ॥
गुर मिलिऐ सांति ऊपजै अनदिनु नामु लएइ ॥1॥
मेरे मन हरि अंम्रित नामु धिआइ ॥
सतिगुरु पुरखु मिलै नाउ पाईऐ हरि नामे सदा समाइ ॥1॥ रहाउ ॥
मनमुख सदा विछुड़े फिरहि कोइ न किस ही नालि ॥
हउमै वडा रोगु है सिरि मारे जमकालि ॥
गुरमति सतसंगति न विछुड़हि अनदिनु नामु सम॑ालि ॥2॥
सभना करता एकु तू नित करि देखहि वीचारु ॥
इकि गुरमुखि आपि मिलाइआ बखसे भगति भंडार ॥
तू आपे सभु किछु जाणदा किसु आगै करी पूकार ॥3॥
हरि हरि नामु अंम्रितु है नदरी पाइआ जाइ ॥
अनदिनु हरि हरि उचरै गुर कै सहजि सुभाइ ॥
नानक नामु निधानु है नामे ही चितु लाइ ॥4॥3॥
हिन्दी अर्थ: मलार महला 3 ॥ हे भाई! जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर की निगाह करता है। वह कोई विरला गुरू के सन्मुख हो के (यह) समझता है (कि) गुरू के बिना और कोई (नाम की) दाति देने वाला नहीं। जिस पर मेहर की निगाह करता है। उसको (नाम) बख्शता है। अगर गुरू मिल जाए, तो (मन में) शांति पैदा हो जाती है (और मनुष्य) हर वक्त परमात्मा का नाम सिमरता रहता है। 1। हे मेरे मन! परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम चेते किया करें। जब गुरू मर्द मिल जाता है, तब हरी-नाम प्राप्त होता है (जिसको गुरू मिलता है) वह सदा हरी-नाम में लीन रहता है। 1। रहाउ। हे भाई! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (परमात्मा से) विछुड़ के सदा भटकते फिरते हैं (वे यह नहीं समझते कि जिनके साथ मोह है। उनमें से) कोई भी किसी के साथ सदा साथ नहीं निभा सकता। उनके अंदर अहंकार का बड़ा रोग टिका रहता है। आत्मिक मौत ने उनको सिर के भार पटखनी दी होती है। जो मनुष्य गुरू की मति लेते हैं। वे हर वक्त परमात्मा का नाम (हृदय में) बसा के साध-संगति से कभी नहीं विछुड़ते। 2। हे प्रभू! सब जीवों को पैदा करने वाले सिर्फ आप ही हैं। और विचार करके आप सदा संभाल भी करते हैं। कई जीवों को गुरू के द्वारा आपने स्वयं (अपने साथ) जोड़ा हुआ है। (गुरू उनको आपकी) भगती के खजाने बख्शता है। हे प्रभू! मैं और किस के आगे फरियाद करूँ। आप स्वयं ही (हमारे दिलों की) हरेक माँग जानते हैं। 3। हे भाई! परमात्मा का नाम आत्मिक जीवन देने वाला है। पर उसकी मेहर की निगाह से ही मिलता है। (जिस पर मेहर की निगाह होती है। वह मनुष्य) गुरू के माध्यम से आत्मिक अडोलता में टिक के हर वक्त परमात्मा का नाम उचारता है। हे नानक! (उस मनुष्य के लिए) हरी-नाम ही खजाना है। वह नाम में ही चित्त जोड़े रखता है। 4। 3।
· शबद · राग मलार
गुरु सालाही सदा सुखदाता प्रभु नाराइणु सोई ॥
मलार महला 3 ॥
गुरु सालाही सदा सुखदाता प्रभु नाराइणु सोई ॥
गुर परसादि परम पदु पाइआ वडी वडिआई होई ॥
अनदिनु गुण गावै नित साचे सचि समावै सोई ॥1॥
मन रे गुरमुखि रिदै वीचारि ॥
तजि कूड़ु कुटंबु हउमै बिखु त्रिसना चलणु रिदै सम॑ालि ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुरु दाता राम नाम का होरु दाता कोई नाही ॥
गुरु सालाही सदा सुखदाता प्रभु नाराइणु सोई ॥
गुर परसादि परम पदु पाइआ वडी वडिआई होई ॥
अनदिनु गुण गावै नित साचे सचि समावै सोई ॥1॥
मन रे गुरमुखि रिदै वीचारि ॥
तजि कूड़ु कुटंबु हउमै बिखु त्रिसना चलणु रिदै सम॑ालि ॥1॥ रहाउ ॥
सतिगुरु दाता राम नाम का होरु दाता कोई नाही ॥
हिन्दी अर्थ: मलार महला 3 ॥ हे भाई! मैं तो सदा (अपने) गुरू को ही सलाहता हॅूँ। वह सारे सुख देने वाला है (मेरे लिए) वह नारायण प्रभू है। (जिस मनुष्य ने) गुरू की कृपा से सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लिया। उसकी (लोक-परलोक में) बड़ी इज्जत बन गई। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू के सदा गुण गाता है। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभू में लीन रहता है। 1। हे (मेरे) मन! गुरू की शरण पड़ कर हृदय में (परमात्मा के गुणों को) विचारा करें। हे भाई! झूठ छोड़ें, कुटंब (का मोह) छोड़ें, अहंकार त्यागें। आत्मिक मौत लाने वाली तृष्णा छोड़ें। हृदय में सदा याद रखें (कि यहाँ से) कूच करना (है)। 1। रहाउ। हे भाई! परमात्मा के नाम की दाति देने वाला (सिर्फ) गुरू (ही) है। (नाम की दाति) देने वाला (गुरू के बिना) और कोई नहीं।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1258 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।