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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1250 · सारंग

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अंग
1250
सारंग
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  1. अंति होवै वैर विरोधु को सकै न छडाइआ ॥
  2. गुरमुखि अंम्रितु नामु है जितु खाधै सभ भुख जाइ ॥
  3. जीआ अंदरि जीउ सबदु है जितु सह मेलावा होइ ॥
  4. इसत्री पुरखै अति नेहु बहि मंदु पकाइआ ॥
  5. माइआ मोहि विसारिआ गुर का भउ हेतु अपारु ॥
  6. नानक जिसु बिनु घड़ी न जीवणा विसरे सरै न बिंद ॥
  7. सावणु आइआ झिमझिमा हरि गुरमुखि नामु धिआइ ॥
  8. गुर पूरे की दाति नित देवै चड़ै सवाईआ ॥

गुरु राम दास जी · सारंग की वार, पउड़ी · राग सारंग

अंति होवै वैर विरोधु को सकै न छडाइआ ॥

अंग 1249 से चला आ रहा अंश

अंति होवै वैर विरोधु को सकै न छडाइआ ॥
नानक विणु नावै ध्रिगु मोहु जितु लगि दुखु पाइआ ॥32॥

हिन्दी अर्थ: आखिर। ये धन वैर-विरोध पैदा कर देता है (और धन की खातिर किए पापों से) कोई बचा नहीं सकता। हे नानक! नाम से वंचित रह के ये मोह धिक्कार-योग्य है। क्योंकि इस मोह में लग के मनुष्य दुख पाता है। 32।

गुरु अमर दास जी · सारंग की वार, सलोक · राग सारंग

गुरमुखि अंम्रितु नामु है जितु खाधै सभ भुख जाइ ॥

सलोक मः 3 ॥
गुरमुखि अंम्रितु नामु है जितु खाधै सभ भुख जाइ ॥
त्रिसना मूलि न होवई नामु वसै मनि आइ ॥
बिनु नावै जि होरु खाणा तितु रोगु लगै तनि धाइ ॥
नानक रस कस सबदु सलाहणा आपे लए मिलाइ ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ गुरू के पास प्रभू का नाम एक ऐसा पवित्र भोजन है जिसके खाने से (माया की) भूख सारी दूर हो जाती है। (माया की) तृष्णा बिल्कुल ही नहीं रहती। मन में प्रभू का नाम आ बसता है। प्रभू का नाम बिसार के खाने-पीने का जो भी कोई और चस्का (मनुष्य को लगता) है उससे (तृष्णा का) रोग शरीर में बड़ा गहरा असर डाल के आ ग्रसता है। हे नानक! अगर मनुष्य (माया के) अनेकों किस्म के स्वादों की जगह गुरू के शबद को प्रभू की सिफत-सालाह को ग्रहण करे तो प्रभू स्वयं ही इसको अपने साथ मिला लेता है। 1।

गुरु अमर दास जी · सारंग की वार, सलोक · राग सारंग

जीआ अंदरि जीउ सबदु है जितु सह मेलावा होइ ॥

मः 3 ॥
जीआ अंदरि जीउ सबदु है जितु सह मेलावा होइ ॥
बिनु सबदै जगि आन॑ेरु है सबदे परगटु होइ ॥
पंडित मोनी पड़ि पड़ि थके भेख थके तनु धोइ ॥
बिनु सबदै किनै न पाइओ दुखीए चले रोइ ॥
नानक नदरी पाईऐ करमि परापति होइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ प्रभू की सिफतसालाह ही जीवों के अंदर जिंदगी है। इस सिफतसालाह से पति-प्रभू से (जीव का) मिलाप होता है; प्रभू की सिफतसालाह से टूट के जगत में (आत्मिक जीवन से) अंधेरा है। शबद से ही (अंधेरा दूर हो के, आत्मिक जीवन की सूझ का) प्रकाश होता है। मुनि जन और पंडित (धार्मिक पुस्तकें) पढ़-पढ़ के हार गए। भेषधारी साधू तीर्थों पर स्नान कर-कर के थक गए। पर सिफत-सालाह की बाणी के बिना किसी को भी पति-प्रभू नहीं मिला। सब दुखी हो के रो के यहाँ से गए। हे नानक! सिफतसालाह भी प्रभू की मेहर की नजर से मिलती है। प्रभू की बख्शिश से ही प्राप्त होती है। 2।

गुरु राम दास जी · सारंग की वार, पउड़ी · राग सारंग

इसत्री पुरखै अति नेहु बहि मंदु पकाइआ ॥

पउड़ी ॥
इसत्री पुरखै अति नेहु बहि मंदु पकाइआ ॥
दिसदा सभु किछु चलसी मेरे प्रभ भाइआ ॥
किउ रहीऐ थिरु जगि को कढहु उपाइआ ॥
गुर पूरे की चाकरी थिरु कंधु सबाइआ ॥
नानक बखसि मिलाइअनु हरि नामि समाइआ ॥33॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ (अगर) मनुष्य का (अपनी) स्त्री के साथ बहुत प्यार है (तो इसका नतीजा आम तौर पर यही निकलता है कि) बैठ के कोई विकार की चितवनी ही चितवता है (और नाशवंत से मोह बढ़ता जाता है); पर, मेरे प्रभू की रज़ा यह है कि जो कुछ (आँखों से) दिखता है ये सब नाश हो जाना है। फिर कोई ऐसा उपाय तलाशें जिससे जगत में हमेशा टिके रह सकें (भाव, सदा टिके रहने वाले प्रभू से एक-सुर हो सकें)। (वह उपाय) पूरे सतिगुरू की (बताई हुई) सेवा-भगती ही है जिस के कारण सारा शरीर (भाव, सारी ज्ञानेन्द्रियां) (विकारों के मुकाबले में) अडोल रह सकती हैं। हे नानक! जिन पर उस प्रभू ने मेहर करके (अपने साथ) मिलाया है वे उस हरी के नाम में लीन रहते हैं। 33।

गुरु अमर दास जी · सारंग की वार, सलोक · राग सारंग

माइआ मोहि विसारिआ गुर का भउ हेतु अपारु ॥

सलोक मः 3 ॥
माइआ मोहि विसारिआ गुर का भउ हेतु अपारु ॥
लोभि लहरि सुधि मति गई सचि न लगै पिआरु ॥
गुरमुखि जिना सबदु मनि वसै दरगह मोख दुआरु ॥
नानक आपे मेलि लए आपे बखसणहारु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ माया के मोह में पड़ के मनुष्य गुरू का अदब भुला देता है। और (यह भी) बिसार देता है कि गुरू (कितना) बेअंत प्यार (इससे करता है); लोभ-लहर में फंस के इसकी अकल-होश गुम हो जाती है। सदा-स्थिर प्रभू में इसका प्यार नहीं बनता। गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों के मन में गुरू का शबद बसता है। उनको प्रभू की हजूरी प्राप्त हो जाती है। उनको माया के मोह से बचने का राह मिल जाता है; हे नानक! बख्शणहार प्रभू स्वयं ही गुरमुखों को अपने साथ मिला लेता है। 1।

गुरु राम दास जी · सारंग की वार, सलोक · राग सारंग

नानक जिसु बिनु घड़ी न जीवणा विसरे सरै न बिंद ॥

मः 4 ॥
नानक जिसु बिनु घड़ी न जीवणा विसरे सरै न बिंद ॥
तिसु सिउ किउ मन रूसीऐ जिसहि हमारी चिंद ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ हे नानक! कहें: जिस प्रभू के बिना एक घड़ी भी नहीं जीया जा सकता। जिसको एक घड़ी के लिए भी बिसार के नहीं निभती। हे मन! जिस प्रभू को हमारा (हर वक्त) फिकर है। उससे रूठना ठीक नहीं। 2।

गुरु राम दास जी · सारंग की वार, सलोक · राग सारंग

सावणु आइआ झिमझिमा हरि गुरमुखि नामु धिआइ ॥

मः 4 ॥
सावणु आइआ झिमझिमा हरि गुरमुखि नामु धिआइ ॥
दुख भुख काड़ा सभु चुकाइसी मीहु वुठा छहबर लाइ ॥
सभ धरति भई हरीआवली अंनु जंमिआ बोहल लाइ ॥
हरि अचिंतु बुलावै क्रिपा करि हरि आपे पावै थाइ ॥
हरि तिसहि धिआवहु संत जनहु जु अंते लए छडाइ ॥
हरि कीरति भगति अनंदु है सदा सुखु वसै मनि आइ ॥
जिन॑ा गुरमुखि नामु अराधिआ तिना दुख भुख लहि जाइ ॥
जन नानकु त्रिपतै गाइ गुण हरि दरसनु देहु सुभाइ ॥3॥

हिन्दी अर्थ: महला 4॥ जो मनुष्य गुरू के सन्मुख हो के हरी का नाम सिमरता है (उसके लिए। जैसे) झिमझिम बरसने वाला सावन (का महीना) आ जाता है। जब झड़ी लगा के वर्षा होती है। गर्मी और लोगों की भूख और दुख सब दूर कर देता है। (क्योंकि) सारी धरती पर हरियाली ही दिखती है और ढेरों के ढेर अन्न पैदा होता है। (इसी तरह, गुरमुख को) अचिंत प्रभू खुद ही मेहर करके अपने नजदीक लाता है। उसकी मेहनत को खुद ही प्रवान करता है। हे संत जनो! उस प्रभू को याद करें जो आखिर (इन दुखों-भूखों से) खलासी दिलाता है। प्रभू की सिफतसालाह और बँदगी में ही (असल) आनंद है। सदा के लिए मन में सुख आ बसता है। जिन गुरमुखों ने नाम सिमरा है उनके दुख दूर हो जाते हैं। उनकी तृष्णा समाप्त हो जाती है। दास नानक भी प्रभू के गुण गा-गा के ही (माया की ओर से) तृप्त है (और अरज़ोई करता है-) हे हरी! मेहर कर के दीदार दें। 3।

गुरु राम दास जी · सारंग की वार, पउड़ी · राग सारंग

गुर पूरे की दाति नित देवै चड़ै सवाईआ ॥

पउड़ी ॥
गुर पूरे की दाति नित देवै चड़ै सवाईआ ॥
तुसि देवै आपि दइआलु न छपै छपाईआ ॥
हिरदै कवलु प्रगासु उनमनि लिव लाईआ ॥
जे को करे उस दी रीस सिरि छाई पाईआ ॥
नानक अपड़ि कोइ न सकई पूरे सतिगुर की वडिआईआ ॥34॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ पूरे सतिगुरू की दी हुई (नाम की) दाति जो वह सदा देता है बढ़ती रहती है; (गुरू की मेहर की नजर के कारण यह दाति) दयालु प्रभू खुद प्रसन्न हो के देता है। और किसी के छुपाने से छुपती नहीं; (जिस मनुष्य पर गुरू की तरफ से बख्शिश हो उसके) हृदय का कमल फूल खिल उठता है। वह पूरन खिलाव में टिका रहता है (उसके हृदय में आनंदमयी अवस्था बनी रहती है); जो मनुष्य उसकी बराबरी करने का यतन करता है वह नामोशी ही कमाता है। हे नानक! पूरे गुरू की बख्शी हुई वडिआई की कोई मनुष्य बराबरी नहीं कर सकता। 34।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1250 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।