Lulla Family

अंग 1249

अंग
1249
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नानक गुर सरणाई उबरे हरि गुर रखवालिआ ॥30॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (आशाओं के इस लंबे जाल में से) वही बचते हैं जो गुरू की शरण पड़ते हैं जिनका रखवाला गुरू अकाल-पुरख स्वयं बनता है। 30।
सलोक मः 3 ॥
पड़ि पड़ि पंडित वादु वखाणदे माइआ मोह सुआइ ॥
दूजै भाइ नामु विसारिआ मन मूरख मिलै सजाइ ॥
जिनि॑ कीते तिसै न सेवन॑ी देदा रिजकु समाइ ॥
जम का फाहा गलहु न कटीऐ फिरि फिरि आवहि जाइ ॥
जिन कउ पूरबि लिखिआ सतिगुरु मिलिआ तिन आइ ॥
अनदिनु नामु धिआइदे नानक सचि समाइ ॥1॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ पंडित (धर्म-पुस्तकें) पढ़-पढ़ के (सिर्फ) चर्चा ही करते हैं और माया के मोह के चस्के में (फसे रहते हैं; माया के प्यार में) प्रभू का नाम भुलाए रखते हैं (इस वास्ते) मूर्ख मन को सजा मिलती है; जिस (प्रभू) ने पैदा किया है जो (सदा) रिज़क पहुँचाता है उसको याद नहीं करते। (इस कारण) उनके गले से जमों की फाही काटी नहीं जाती। वे (जगत में) बार-बार पैदा होते (मरते) हैं। जिनके भाग्यों में धुर से (सिमरन का लेख) लिखा हुआ है उन्हें गुरू आ मिलता है। हे नानक ! वे सदा-स्थिर प्रभू में लीन रह के हर रोज नाम सिमरते हैं। 1।
मः 3 ॥
सचु वणजहि सचु सेवदे जि गुरमुखि पैरी पाहि ॥
नानक गुर कै भाणै जे चलहि सहजे सचि समाहि ॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ के (गुरू के) चरणों में लगते हैं। वे प्रभू के नाम का व्यापार करते हैं। नाम सिमरते हैं। हे नानक ! जो गुरू के हुकम में चलते हैं। वे आत्मिक अडोलता में टिक के सच्चे नाम में लीन हो जाते हैं। (नोट। ऊपर दिए गए ‘समाइ’ और यहाँ के ‘समाहि’ में अंतर है। याद रखें)।
पउड़ी ॥
आसा विचि अति दुखु घणा मनमुखि चितु लाइआ ॥
गुरमुखि भए निरास परम सुखु पाइआ ॥
विचे गिरह उदास अलिपत लिव लाइआ ॥
ओना सोगु विजोगु न विआपई हरि भाणा भाइआ ॥
नानक हरि सेती सदा रवि रहे धुरि लए मिलाइआ ॥31॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ मन के पीछे चलने वाला मनुष्य आशाओं में चित्त जोड़ता है (भाव। आशाएं बनाता रहता है। पर) आशाओं (चितवनी) में बहुत ज्यादा दुख होता है। जो मनुष्य गुरू के बताए हुए राह पर चलते हैं वे आशाएं नहीं चितवते। इसलिए उन्हें बहुत ही ऊँचा सुख मिलता है; वे गृहस्त में रहते हुए ही (प्रभू चरणों में) सुरति जोड़ते हैं और आशाओं से ऊपर रहते हैं। उन पर माया का प्रभाव नहीं पड़ता। सो। उनको (माया का) विछोड़ा नहीं सताता और ना ही (इस वियोग से पैदा होने वाला) ग़म आ के दबाव डालता है। उन्हें प्रभू की रज़ा अच्छी लगती है; हे नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य परमात्मा के साथ रले-मिले रहते हैं। उनको धुर से ही प्रभू ने अपने साथ मिला लिया होता है। 31।
सलोक मः 3 ॥
पराई अमाण किउ रखीऐ दिती ही सुखु होइ ॥
गुर का सबदु गुर थै टिकै होर थै परगटु न होइ ॥
अंन॑े वसि माणकु पइआ घरि घरि वेचण जाइ ॥
ओना परख न आवई अढु न पलै पाइ ॥
जे आपि परख न आवई तां पारखीआ थावहु लइओु परखाइ ॥
जे ओसु नालि चितु लाए तां वथु लहै नउ निधि पलै पाइ ॥
घरि होदै धनि जगु भुखा मुआ बिनु सतिगुर सोझी न होइ ॥
सबदु सीतलु मनि तनि वसै तिथै सोगु विजोगु न कोइ ॥
वसतु पराई आपि गरबु करे मूरखु आपु गणाए ॥
नानक बिनु बूझे किनै न पाइओ फिरि फिरि आवै जाए ॥1॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ बेगानी अमानत संभाल नहीं लेनी चाहिए। इसके देने से ही सुख मिलता है; सतिगुरू का शबद सतिगुरू में ही टिक सकता है। किसी और के अंदर (पूरे जोबन में) नहीं चमकता; (क्योंकि) अगर एक मोती किसी अंधे को मिल जाए तो वह उसको बेचने के लिए घर-घर फिरता है। आगे से उन लोगों को उस मोती की कद्र नहीं होती। (इस लिए इस अंधे को) आधी कौड़ी भी नहीं मिलती। मोती की कद्र यदि स्वयं करनी ना आती हैं। तो बेशक कोई पक्ष किसी पारखी से (उसका) मूल्यांकन करवा के देख ले। उस पारखी से प्रेम लगाने से वह नाम-मोती मिला रहता है (भाव। हाथ से व्यर्थ नहीं जाता) और (जैसे) नौ खजाने प्राप्त हो जाते हैं। (हृदय) घर में (नाम) धन होते हुए भी जगत भूखा (भाव। तृष्णा का मारा) मर रहा है। ये समझ गुरू के बिना नहीं आती; जिसके मन में तन में ठंड डालने वाला शबद बसता है उसको (प्रभू से) विछोड़ा नहीं होता और ना ही सोग व्यापता है। (पर। यह नाम-) वस्तु मूर्ख के लिए तो बेगानी रहती है (भाव। मूर्ख के हृदय में नहीं बसती) वह अहंकार करता हैऔर अपने आप को बड़ा जताता है। हे नानक ! जब तक (गुरू-शबद के द्वारा) समझ नहीं पड़ती। तब तक किसी ने (ये नाम धन) प्राप्त नहीं किया (और इस नाम-धन के बिना जीव) बार-बार पैदा होता मरता रहता है। 1।
मः 3 ॥
मनि अनदु भइआ मिलिआ हरि प्रीतमु सरसे सजण संत पिआरे ॥
जो धुरि मिले न विछुड़हि कबहू जि आपि मेले करतारे ॥
अंतरि सबदु रविआ गुरु पाइआ सगले दूख निवारे ॥
हरि सुखदाता सदा सलाही अंतरि रखां उर धारे ॥
मनमुखु तिन की बखीली कि करे जि सचै सबदि सवारे ॥
ओना दी आपि पति रखसी मेरा पिआरा सरणागति पए गुर दुआरे ॥
नानक गुरमुखि से सुहेले भए मुख ऊजल दरबारे ॥2॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ वे गुरमुख प्यारे संत खिले माथे रहते हैं। उनके मन में खुशी बनी रहती है। जिनको प्रीतम प्रभू मिल जाता है; जो धुर से प्रभू के साथ मिले हुए होते हैं। जिनको करतार ने खुद अपने साथ मिलाया है। वे कभी उससे विछुड़ते नहीं हैं। जिनके अंदर गुरू का शबद बसता है। जिनको गुरू मिल जाता है। उनके सारे दुख दूर हो जाते हैं। (उनके अंदर यह तमन्ना होती है-) मैं सुख देने वाले प्रभू की सदा सिफत-सालाह करूँ। मैं प्रभू को सदा हृदय में संभाल के रखूँ। जिनको गुरू-शबद के द्वारा सच्चे प्रभू ने खुद सुंदर बना दिया है। कोई मनमुख उनकी क्या निंदा कर सकता है। प्यारा प्रभू उनकी लाज खुद रखता है। वह सदा गुरू के दर पर प्रभू की शरण में टिके रहते हैं। 2।
पउड़ी ॥
इसतरी पुरखै बहु प्रीति मिलि मोहु वधाइआ ॥
पुत्रु कलत्रु नित वेखै विगसै मोहि माइआ ॥
देसि परदेसि धनु चोराइ आणि मुहि पाइआ ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ मनुष्य की (अपनी) पत्नी के साथ बड़ी प्रीत होती है। (पत्नी को) मिल के बड़ा मोह करता है; नित्य (अपने) पुत्र को और (अपनी) पत्नी को देखता है और माया के मोह के कारण खुश होता है; देस-परदेस से धन ठॅग के ला के उनको खिलाता है;

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (आशाओं के इस लंबे जाल में से) वही बचते हैं जो गुरू की शरण पड़ते हैं जिनका रखवाला गुरू अकाल-पुरख स्वयं बनता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।