अमरु वेपरवाहु है तिसु नालि सिआणप न चलई न हुजति करणी जाइ ॥
आपु छोडि सरणाइ पवै मंनि लए रजाइ ॥
गुरमुखि जम डंडु न लगई हउमै विचहु जाइ ॥
नानक सेवकु सोई आखीऐ जि सचि रहै लिव लाइ ॥1॥
दाति जोति सभ सूरति तेरी ॥
बहुतु सिआणप हउमै मेरी ॥
बहु करम कमावहि लोभि मोहि विआपे हउमै कदे न चूकै फेरी ॥
नानक आपि कराए करता जो तिसु भावै साई गल चंगेरी ॥2॥
सचु खाणा सचु पैनणा सचु नामु अधारु ॥
गुरि पूरै मेलाइआ प्रभु देवणहारु ॥
भागु पूरा तिन जागिआ जपिआ निरंकारु ॥
साधू संगति लगिआ तरिआ संसारु ॥
नानक सिफति सलाह करि प्रभ का जैकारु ॥35॥
सभे जीअ समालि अपणी मिहर करु ॥
अंनु पाणी मुचु उपाइ दुख दालदु भंनि तरु ॥
अरदासि सुणी दातारि होई सिसटि ठरु ॥
लेवहु कंठि लगाइ अपदा सभ हरु ॥
नानक नामु धिआइ प्रभ का सफलु घरु ॥1॥
वुठे मेघ सुहावणे हुकमु कीता करतारि ॥
रिजकु उपाइओनु अगला ठांढि पई संसारि ॥
तनु मनु हरिआ होइआ सिमरत अगम अपार ॥
करि किरपा प्रभ आपणी सचे सिरजणहार ॥
कीता लोड़हि सो करहि नानक सद बलिहार ॥2॥
वडा आपि अगंमु है वडी वडिआई ॥
गुर सबदी वेखि विगसिआ अंतरि सांति आई ॥
सभु आपे आपि वरतदा आपे है भाई ॥
आपि नाथु सभ नथीअनु सभ हुकमि चलाई ॥
नानक हरि भावै सो करे सभ चलै रजाई ॥36॥1॥ सुधु ॥
कबीर जी ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
कहा नर गरबसि थोरी बात ॥
मन दस नाजु टका चारि गांठी ऐंडौ टेढौ जातु ॥1॥ रहाउ ॥
बहुतु प्रतापु गांउ सउ पाए दुइ लख टका बरात ॥
दिवस चारि की करहु साहिबी जैसे बन हर पात ॥1॥
ना कोऊ लै आइओ इहु धनु ना कोऊ लै जातु ॥
रावन हूं ते अधिक छत्रपति खिन महि गए बिलात ॥2॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।