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सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 1248 · सारंग

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अंग
1248
सारंग
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  1. पाप बिकार मनूर सभि लदे बहु भारी ॥
  2. विणु सतिगुर सेवे सुखु नही मरि जंमहि वारो वार ॥
  3. माइआ मोहि विसारिआ सचु मरणा हरि नामु ॥
  4. लेखा पड़ीऐ हरि नामु फिरि लेखु न होई ॥
  5. गुर का कहिआ जे करे सुखी हू सुखु सारु ॥
  6. सचु पुराणा ना थीऐ नामु न मैला होइ ॥
  7. मंगत जनु जाचै दानु हरि देहु सुभाइ ॥
  8. मनमुख बोलि न जाणन॑ी ओना अंदरि कामु क्रोधु अहंकारु ॥
  9. हरि गुरमुखि तिन॑ी अराधिआ जिन॑ करमि परापति होइ ॥
  10. आस करे सभु लोकु बहु जीवणु जाणिआ ॥

पाप बिकार मनूर सभि लदे बहु भारी ॥

अंग 1247 से चला आ रहा अंश

पाप बिकार मनूर सभि लदे बहु भारी ॥
मारगु बिखमु डरावणा किउ तरीऐ तारी ॥
नानक गुरि राखे से उबरे हरि नामि उधारी ॥27॥

हिन्दी अर्थ: पापों और दुष्कर्मों के व्यर्थ व बोझल भार से लदे हुए जीवों के लिए जिंदगी का रास्ता बहुत मुश्किल और डरावना हो जाता है (इस संसार-समुंद्र में से) उनके द्वारा तैरा नहीं जा सकता। हे नानक ! जिनकी सहायता गुरू ने की है वे बच निकलते हैं। प्रभू के नाम ने उनको बचा लिया होता है। 27।

विणु सतिगुर सेवे सुखु नही मरि जंमहि वारो वार ॥

सलोक मः 3 ॥
विणु सतिगुर सेवे सुखु नही मरि जंमहि वारो वार ॥
मोह ठगउली पाईअनु बहु दूजै भाइ विकार ॥
इकि गुर परसादी उबरे तिसु जन कउ करहि सभि नमसकार ॥
नानक अनदिनु नामु धिआइ तू अंतरि जितु पावहि मोख दुआर ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ सतिगुरू के बताए हुए राह पर चले बिना सुख नहीं मिलता (गुरू से टूटे हुए जीव) बार-बार पैदा होते मरते हैं। मोह की ठग-बूटी उस प्रभू ने (ऐसी) डाली है कि (ईश्वर से बे-सुरति हो के) माया के प्यार में (फस के) बहुत सारे बुरे कर्म करते हैं। पर कई (भाग्यशाली लोग) सतिगुरू की कृपा से (इस ठग-बूटी से) बच जाते हैं। (जो जो बचता है) उसको सारे लोग सिर झुकाते हैं। हे नानक ! आप भी हर रोज (अपने) हृदय में प्रभू का नाम सिमरें, जिस (सिमरन की) बरकति से आप (इस 'मोह ठगउली' से) बचने का वसीला हासिल कर लेंगे। 1।

माइआ मोहि विसारिआ सचु मरणा हरि नामु ॥

मः 3 ॥
माइआ मोहि विसारिआ सचु मरणा हरि नामु ॥
धंधा करतिआ जनमु गइआ अंदरि दुखु सहामु ॥
नानक सतिगुरु सेवि सुखु पाइआ जिन॑ पूरबि लिखिआ करामु ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ मौत अटल है। प्रभू का नाम सदा-स्थिर रहने वाला है- पर। यह बात जिस मनुष्य ने माया के मोह में (फस के) भुला दी है। उसका सारा जीवन माया के धंधे करते हुए गुजर जाता है और वह अपने मन में दुख सहता है। हे नानक ! आदि से जिनके माथे पर (गुरू सेवा का लेख) लिखा हुआ है उन्होंने गुरू के हुकम में चल के आत्मिक आनंद पाया है। 2।

लेखा पड़ीऐ हरि नामु फिरि लेखु न होई ॥

पउड़ी ॥
लेखा पड़ीऐ हरि नामु फिरि लेखु न होई ॥
पुछि न सकै कोइ हरि दरि सद ढोई ॥
जमकालु मिलै दे भेट सेवकु नित होई ॥
पूरे गुर ते महलु पाइआ पति परगटु लोई ॥
नानक अनहद धुनी दरि वजदे मिलिआ हरि सोई ॥28॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ अगर हरी-नाम (सिमरन-रूपी) लेखा पढ़ें तो फिर विकार आदि के संस्कारों का चित्र मन में नहीं बनता; प्रभू की हजूरी में सदा पहुँच बनी रहती है। किसी विकार के बारे में कोई पूछ नहीं सकता (भाव। कोई भी ऐसा बुरा कर्म नहीं किया होता जिस के बाबत कोई उंगली उठा सके); जम काल (चोट करने की जगह) आदर-सत्कार करता है और सदा के लिए सेवक बन जाता है। पर यह मेल वाली अवस्था पूरे गुरू से हासिल होती है और जगत में इज्जत बन जाती है। हे नानक ! जब वह प्रभू मिल जाता है। उसकी हजूरी में (टिके रहने पर। अंदर। जैसे) एक-रस सुर वाले बाजे बजने लग जाते हैं। 28।

गुर का कहिआ जे करे सुखी हू सुखु सारु ॥

सलोक मः 3 ॥
गुर का कहिआ जे करे सुखी हू सुखु सारु ॥
गुर की करणी भउ कटीऐ नानक पावहि पारु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ अगर मनुष्य सतिगुरू के बताए हुए हुकम की पालना करे तो सुखों में से चुनिंदा श्रेष्ठ सुख मिलता है। सतिगुरू के द्वारा बताया हुआ कर्म करने से डर दूर हो जाता है। हे नानक ! (यदि आप गुरू वाली 'करणी' करेंगे तो) आप ('भउ' का) उस पार का किनारा पा लेंगे (भाव। 'भउ'-सागर से पार लांघ जाएँगे)। 1।

सचु पुराणा ना थीऐ नामु न मैला होइ ॥

मः 3 ॥
सचु पुराणा ना थीऐ नामु न मैला होइ ॥
गुर कै भाणै जे चलै बहुड़ि न आवणु होइ ॥
नानक नामि विसारिऐ आवण जाणा दोइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ (हे भाई ! यदि मनुष्य सदा-स्थिर परमात्मा के साथ प्यार डाल ले तो) परमात्मा के साथ बना हुआ वह प्यार कभी कमजोर नहीं होता। (जिस हृदय में) परमात्मा का नाम (बसता है, वह हृदय कभी) विकारों से गंदा नहीं होता। अगर मनुष्य गुरू की रज़ा में चले तो दोबारा उसको जनम (मरन का चक्कर) नहीं होता। हे नानक ! अगर नाम बिसार दें तो जनम-मरण दोनों बने रहते हैं (भाव। जनम-मरण के चक्करों में पड़े रहते हैं)। 2।

मंगत जनु जाचै दानु हरि देहु सुभाइ ॥

पउड़ी ॥
मंगत जनु जाचै दानु हरि देहु सुभाइ ॥
हरि दरसन की पिआस है दरसनि त्रिपताइ ॥
खिनु पलु घड़ी न जीवऊ बिनु देखे मरां माइ ॥
सतिगुरि नालि दिखालिआ रवि रहिआ सभ थाइ ॥
सुतिआ आपि उठालि देइ नानक लिव लाइ ॥29॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ हे प्रभू ! मैं जाचक (मैं मँगता) एक ख़ैर माँगता हूँ। अपने हाथ से (वह ख़ैर) मुझे दें। मुझे। हे हरी ! आपके दीदार की प्यास है। दीदार से ही (मेरे अंदर) शीतलता आ सकती है। हे माँ ! मैं हरी के दर्शनों के बिना मरता हूँ एक पल भर घड़ी भर भी जी नहीं सकता। जब मेरे गुरू ने मेरा प्रभू मेरे अंदर ही दिखा दिया तो वह सब जगह व्यापक दिखाई देने लग पड़ा। हे नानक ! (अपने नाम की) लगन लगा के वह स्वयं ही (माया में) सोए हुओं को जगा के (नाम की) दाति देता है। 29।

मनमुख बोलि न जाणन॑ी ओना अंदरि कामु क्रोधु अहंकारु ॥

सलोक मः 3 ॥
मनमुख बोलि न जाणन॑ी ओना अंदरि कामु क्रोधु अहंकारु ॥
थाउ कुथाउ न जाणनी सदा चितवहि बिकार ॥
दरगह लेखा मंगीऐ ओथै होहि कूड़िआर ॥
आपे स्रिसटि उपाईअनु आपि करे बीचारु ॥
नानक किस नो आखीऐ सभु वरतै आपि सचिआरु ॥1॥

हिन्दी अर्थ: श्लोक महला 3॥ अपने मन के पीछे चलने वाले लोग सही बात करनी भी नहीं जानते क्योंकि उनके मन में काम क्रोध और अहंकार (प्रबल) होता है; वे सदा ही बुरी बातें ही सोचते हैं। उचित-अनुचित जगह भी नहीं समझते (भाव। उन्हें यह समझ भी नहीं होती कि यह काम यहाँ करना फबता भी है अथवा नहीं); जब प्रभू की हजूरी में किए कर्मों का हिसाब पूछा जाता है तब वे झूठे साबित होते हैं। पर हे नानक ! उस प्रभू ने स्वयं ही सारी सृष्टि पैदा की है। (भाव। सबमें व्यापक हो के) वह स्वयं ही हरेक विचार कर रहा है। सब जगह वह सच का स्रोत प्रभू स्वयं (ही) मौजूद है, सो किसी (मनमुख) को (भी बुरा) नहीं कहा जा सकता। 1।

हरि गुरमुखि तिन॑ी अराधिआ जिन॑ करमि परापति होइ ॥

मः 3 ॥
हरि गुरमुखि तिन॑ी अराधिआ जिन॑ करमि परापति होइ ॥
नानक हउ बलिहारी तिन॑ कउ जिन॑ हरि मनि वसिआ सोइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: महला 3॥ गुरू के सन्मुख रह के उन मनुष्यों ने प्रभू को सिमरा है जिनके भाग्यों में प्रभू की मेहर से 'सिमरन' लिखा हुआ है। हे नानक ! (कहें-) मैं उन लोगों से सदके हूँ। जिनके मन में वह प्रभू बसता है। 2।

आस करे सभु लोकु बहु जीवणु जाणिआ ॥

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पउड़ी ॥
आस करे सभु लोकु बहु जीवणु जाणिआ ॥
नित जीवण कउ चितु गड़॑ मंडप सवारिआ ॥
वलवंच करि उपाव माइआ हिरि आणिआ ॥
जमकालु निहाले सास आव घटै बेतालिआ ॥

हिन्दी अर्थ: पउड़ी॥ लंबी जिंदगी समझ के सारा जग (भाव। हरेक दुनियादार मनुष्य) आशाएं बनाता है। सदा जीने की तमन्ना (रखता है और) किले-मड़ियां आदि सजाता (रहता) है। ठगियाँ और अन्य कई उपाय कर कर के (दूसरों का) माल ठग के ले के आता है। (ऊपर से) जमराज (इसकी) सांसें गिनता जा रहा है। जीवन-ताल से टूटे हुए इस मनुष्य की उम्र घटती चली जा रही है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी; महला 4: गुरु राम दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1248 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।