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काष्ठमौन मुनि, व्याध और घायल मृग

कथा · 20

काष्ठमौन मुनि, व्याध और घायल मृग

एक व्याध अपने बाण से घायल मृग का पीछा करते हुए वन में बैठे काष्ठमौन मुनि तक पहुँचा। उसे केवल यह जानना था कि मृग किस दिशा में गया है। मुनि का उत्तर इन्द्रियों के काम, उन्हें अपना कहने वाले अहंकार और तुरीय में स्थिर चित्त का ऐसा विवेचन बन गया, जिसे उस समय व्याध समझ न सका। उसने प्रणाम किया और अपनी दिशा में आगे बढ़ गया।

जीवन्मुक्त और सिद्ध पुरुष

श्रीराम ने वसिष्ठ से पूछा कि आत्मज्ञान में स्थित जीवन्मुक्त और मन्त्र, तप अथवा दूसरे साधनों से असाधारण सिद्धियाँ पाने वाले पुरुष में क्या अन्तर है। दोनों ही अलौकिक सामर्थ्य रखते दिखाई दे सकते हैं। तब आत्मज्ञानी की विशेषता कहाँ प्रकट होती है?

वसिष्ठ ने कहा कि जीवन्मुक्त की विशेषता उसका तत्त्वज्ञान है। सिद्धि किसी शक्ति का परिचय दे सकती है, पर जीवन्मुक्त की बुद्धि अपने स्वरूप में विश्राम पाती है। बाहरी वस्तुओं में उसका आग्रह क्रमशः शान्त हो चुका होता है। काम, क्रोध, विषाद, मोह और लोभ की पकड़ प्रतिदिन क्षीण होती जाती है। वह वर्तमान में आए उचित कर्म को पूरा करता है, बीती वस्तु का शोक और भावी फल की चिन्ता अपने भीतर नहीं पालता।

उन्होंने राग और बन्धन का सम्बन्ध समझाया। इन्द्रियाँ जिस विषय की ओर बार बार दौड़ती हैं, मन उसी में रुचि बाँध लेता है। रुचि स्वामित्व और अपेक्षा को जन्म देती है। विवेक उस सम्बन्ध को पहचानकर चित्त को विषय और इन्द्रिय, दोनों का साक्षी बनने की शिक्षा देता है। स्थूल शरीर और संकल्पमय सूक्ष्म मन से परे जीव का तीसरा स्वरूप आदि और अन्त से रहित चैतन्य है। वसिष्ठ ने राम को उसी परम पवित्र तुरीयपद में स्थिति दृढ़ करने को कहा।

श्रीराम ने पूछा, “गुरुदेव, जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति में विद्यमान होकर भी उनसे स्पष्ट न दिखाई देने वाले तुरीय का स्वरूप क्या है?”

वसिष्ठ ने कहा कि अहंभाव, सत् और असत् के विकल्प तथा संकल्प की गति शान्त होने पर जो सम, स्वच्छ और अपने स्वरूप में स्थित बोध रहता है, वही तुरीय है। वह जाग्रत की बाहरी व्यस्तता, स्वप्न की मानसिक रचना और सुषुप्ति की जड़ता में सीमित नहीं होता। जीवन्मुक्त व्यवहार के बीच भी उसी साक्षिभाव में रहता है। इस कथन को अधिक स्पष्ट करने के लिए उन्होंने वन का एक छोटा दृष्टान्त सुनाया।

वन में काष्ठमौन मुनि

एक विस्तृत और घने वन में काष्ठमौन नाम के मुनि रहते थे। उनका नाम काष्ठ की तरह अचल मौन का संकेत देता था। वे गहन शान्ति में बैठे थे और व्यवहार को अपने इर्द-गिर्द बाँधने वाला अहंकार उनके चित्त से बहुत पहले निवृत्त हो चुका था।

एक दिन व्याध ने एक मृग पर बाण चलाया। घायल मृग भागा और व्याध उसके पीछे दौड़ता गया। कुछ दूर जाने पर मृग उसकी दृष्टि से ओझल हो गया। वन में बैठे तपस्वी को देखकर वह उनके पास पहुँचा और पूछा, “मुनीश्वर, मेरे बाण से घायल एक मृग यहाँ आया था। वह किस ओर गया? आपने देखा हो तो मुझे बताइए।”

वन में मृग का पीछा कर उस पर बाण चलाता व्याध

व्याध का प्रश्न वन के रास्ते से जुड़ा था। उत्तर दाएँ अथवा बाएँ में दिया जा सकता था। काष्ठमौन ने उसके प्रश्न को सुना और उस आधार की ओर देखा, जिसके सहारे कोई मनुष्य कहता है, “मैंने देखा” और फिर देखी हुई वस्तु को वाणी से बताता है।

मुनि बोले, “साधो, हम वनवासी मुनि समता और शील में स्थित रहते हैं। व्यवहार को चलाने वाला अहंकार हममें शेष नहीं है। सम्पूर्ण इन्द्रियों के काम को अकेला अहंकाररूप मन अपना कहता है। मेरा वह मन बहुत पहले गल चुका है।”

इन्द्रियाँ अपना काम कैसे करती हैं

काष्ठमौन ने कहा कि सूर्य के प्रकाश में लोग अनेक काम करते हैं और दीपक के प्रकाश में भी गतिविधि चलती है। सूर्य अथवा दीपक उन कामों का कर्ता नहीं बनता। वह उन्हें प्रकाशित करता है। उसी प्रकार ज्ञानी इन्द्रियों के व्यापार का साक्षी रहता है। आँख रूप ग्रहण करती है, कान शब्द सुनते हैं और वाणी बोलती है। इन क्रियाओं को जोड़कर “मैंने किया” कहने वाला अभिमान शान्त हो चुका होता है।

मुनि ने अहंकार की तुलना उस धागे से की, जिस पर माला के अलग अलग दाने टिके रहते हैं। धागा टूट जाए तो दाने बिखर जाते हैं। राजा के न रहने पर सेना, गोपाल के न रहने पर गौएँ और पिता के न रहने पर बालक जैसे अपने पुराने संगठन से विचलित हो जाते हैं, उसी प्रकार अहंकार का सूत्र हटने पर इन्द्रियों के कार्य किसी एक स्वामी की सम्पत्ति बनकर नहीं जुड़ते।

“आँख ने मृग को देखा होगा,” काष्ठमौन ने कहा, “पर आँख बोल नहीं सकती। वाणी ने उसे देखा नहीं। प्रत्येक इन्द्रिय अपने विषय को ग्रहण करती है, किसी दूसरी इन्द्रिय की शक्ति उसके पास नहीं। जो इन सब अनुभवों को अपना कहकर एक साथ रखता था, वह अहंकार अब नहीं रहा। तब तुम्हें दिशा कौन बताए?”

मुनि इन्द्रियों की स्वाभाविक क्रिया और उनसे हटे अभिमान का वर्णन कर रहे थे। इन्द्रियाँ अपने अपने विषय में काम करती हैं और उनके कार्य पर स्वामित्व का दावा नहीं जुड़ता। वे दीवार पर बनी आकृतियों जैसी दिखाई देती हैं। चित्र उपस्थित रहता है, उससे किसी स्वतन्त्र कर्ता का व्यवहार आरम्भ नहीं होता।

तीन अवस्थाओं से परे

मुनि ने व्याध को अपने अनुभव की स्थिति बताई, “मैं जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति नाम की किसी दशा को नहीं जानता। इन तीनों से रहित तुरीयपद में स्थित हूँ। वहाँ दृश्य का आग्रह नहीं रहता।”

जाग्रत में मन बाहरी विषयों को दृढ़ मानता है। स्वप्न में वही मन अपने संस्कारों से दूसरा दृश्य बनाता है। सुषुप्ति में दृश्य और विचार शान्त होते हैं, साथ में अज्ञान की जड़ता रहती है। तुरीय को वसिष्ठ चेतन, निर्मल और सम कहते हैं। उसमें संसार के व्यवहार का निषेध करके देह को निष्क्रिय बनाने की माँग नहीं है। परिवर्तन इतना है कि इन्द्रिय और मन की गतिविधि आत्मस्वरूप पर स्वामित्व का चिह्न नहीं लगा पाती।

व्याध के सामने कठिनाई यही थी। उसने एक दिशा पूछी थी और उसे ऐसी चेतना का वर्णन सुनने को मिला जिसमें देखने वाले, देखी हुई वस्तु और उनके बीच बने अहंकार का सम्बन्ध ही जाँच का विषय था। मुनि के वचन उसकी तत्काल समझ से परे रहे। उसने सम्मानपूर्वक प्रणाम किया, उठा और अपनी अभीष्ट दिशा में आगे चला गया।

घायल मृग कहीं आगे वन में था और व्याध की खोज उसे मौन तपस्वी से दूर ले गयी। उसने गहन उत्तर का सम्मान किया, यद्यपि उस समय उसका आशय उसकी समझ से आगे था।

वसिष्ठ ने दृष्टान्त क्यों सुनाया

वसिष्ठ ने श्रीराम से कहा कि निर्विकल्प चित् ही तुरीय है। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति चित्त की तीन दशाएँ हैं। रजोगुण प्रधान होने पर जाग्रत चित्त को घोर, संस्कारों में चलता स्वप्नचित्त शान्त और तमोगुण से ढकी सुषुप्ति को मूढ़ कहा गया है। चित्त जब इन तीनों की सीमित पहचान से मुक्त होता है, तब उसे “मृत चित्त” कहा जाता है। यहाँ मृत्यु रज और तम के आग्रह की निवृत्ति का पद है। शुद्ध सत्त्व और चेतना समभाव से स्थित रहते हैं।

काष्ठमौन का उत्तर इसी स्थिति से निकला था। उनके लिए इन्द्रियों का होना और उन्हें अपना मानना एक बात नहीं थी। दृश्य उपस्थित हो सकता था, उसे पकड़कर बने कर्तृत्व का सूत्र शान्त था। व्याध ने मृग की दिशा पूछकर अनजाने में उसी सूत्र को सम्बोधित किया, जो मुनि के भीतर टूट चुका था।

यह दृष्टान्त उपदेश ग्रहण करने की पात्रता भी दिखाता है। वचन सुनना और उसका अर्थ खुलना अलग क्षण हो सकते हैं। व्याध का प्रश्न वनमार्ग की व्यावहारिक दिशा से जुड़ा था और मुनि का उत्तर चेतना की अधिक गहरी जाँच तक गया। उस समय दोनों के बीच की दूरी बनी रही।

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