← संग्रह
क्रियाएँ
योग और वेदान्तमन, जागरण और अद्वैत

शुक्र की देह-यात्रा

कथा · 10

शुक्र की देह-यात्रा

मन्दराचल पर भृगु की देह समाधि में स्थिर थी और उनके पुत्र शुक्र का मन एक अप्सरा की झलक से स्वर्ग, प्रेम, पतन और असंख्य जन्मों का संसार रच रहा था। एक हजार दिव्य वर्ष बाद पिता ने केवल सूखा कंकाल देखा। तब काल ने उन्हें उस जीवित यात्रा तक पहुँचाया, जहाँ स्मृति, वासना, नियति और आत्मबोध एक ही कथा में खुलते हैं।

मन में संसार कैसे ठहरता है

श्रीराम ने वसिष्ठ से पूछा, “भगवन्, यह इतना विस्तृत संसार मन में किस प्रकार स्थित रहता है? कृपा करके कोई ऐसा दृष्टान्त कहिए जिसमें यह बात अनुभव के क्रम सहित साफ़ दिखाई दे।” वसिष्ठ ने पहले मन से उदित दूसरे जगतों का संकेत किया, फिर बोले, “रघुनन्दन, अब भृगुपुत्र शुक्र का वृत्तान्त सुनिए। उनके सामने जो कुछ घटा, वह मन की रचना, उसकी दृढ़ता और उसके निवृत्त होने की सामर्थ्य को बहुत स्पष्ट कर देता है।”

प्राचीन समय में महर्षि भृगु मन्दराचल के एक पुष्पाच्छादित शिखर पर तप कर रहे थे। तमाल और दूसरी वनस्पतियों से हरा वह प्रदेश पर्वतीय नीरवता से भरा था। भृगु निर्विकल्प समाधि में ऐसे निश्चल बैठे रहते, जैसे किसी शिला से उनकी आकृति तराशी गई हो। उनके पुत्र शुक्र तब बालक थे। वे पिता की सेवा करते, वन में रहते और कभी फूलों की शय्याओं, स्वर्ण तथा रजत वेदियों और पर्वत के बड़े हिंडोलों के आसपास खेलते थे।

मन्दराचल पर भृगु की समाधि के निकट सेवा करते युवा शुक्र

शुक्र की अवस्था भीतर से बहुत सूक्ष्म थी। आत्मतत्त्व की कुछ पहचान उन्हें मिली थी और लोक को ठोस तथा आकर्षक मानने वाला संस्कार अब भी सक्रिय था। वसिष्ठ ने उनकी दशा की तुलना त्रिशंकु से की है, जो पृथ्वी और द्युलोक के बीच ठहरा था। शुक्र भी परम दृष्टि और सामान्य जगत-दृष्टि के बीच थे। ज्ञान की रोशनी उपस्थित थी और राग को जड़ से समझ लेने वाली परिपक्वता विकसित हो रही थी।

एक दिन भृगु गहन समाधि में थे। शुक्र का चित्त बाहरी विषयों से कुछ हटा हुआ था। तभी उन्होंने आकाश-पथ से जाती हुई एक अप्सरा को देखा। उसके गले और केशों में मन्दार के फूल थे। हल्की हवा से अलकें हिल रही थीं और फूलों की सुगन्ध उस ऊँचे प्रदेश तक उतर रही थी। वह आकाश में आगे बढ़ती गई, पर एक क्षण के लिए उसकी दृष्टि शुक्र से मिली। शुक्र को देखकर उसका मन भी आकृष्ट हुआ।

उस अप्सरा को देखते शुक्र जिसकी छवि में उनका मन एकाग्र हो गया

उस एक दृष्टि के बाद शुक्र का चित्त चंचल हो उठा। उन्होंने विवेक से अपने को सँभालना चाहा। शरीर को उठकर उसके पीछे जाने से रोका, नेत्र बन्द किए और आसन पर बैठे रहे। बाहरी गति रुक गई, पर मन उसी रूप के चारों ओर सिमट गया। ध्यान का विषय आत्मतत्त्व से हटकर अप्सरा हो गई। जिस एकाग्रता से साधक सत्य को खोज सकता है, उसी एकाग्रता ने अब मन में दूसरी दुनिया का द्वार खोल दिया।

वसिष्ठ इसे स्पष्ट रूप से मनोराज्य कहते हैं। शुक्र ने देह से बाहर निकलने की कोई क्रिया नहीं की थी। मन्दराचल पर उनका शरीर पिता के निकट ही रहा। बन्द आँखों के भीतर उन्हें लगा कि अप्सरा आगे जा रही है और वे उसका अनुसरण करते हुए इन्द्रलोक पहुँच गए हैं। अनुभव इतना सघन था कि मन को वह स्वप्न, कल्पना या अनुमान नहीं लगा। वह एक पूरा लोक था, जिसमें दिशा, समय, लोग, सम्मान, इच्छा और परिणाम सब उपस्थित थे।

शुक्र के सामने स्वर्ग का विस्तार खुला। मन्दार के फूलों से सजे देवगण, मन्दाकिनी में खिले स्वर्णकमल, उद्यानों में विश्राम करते देवता, लोकपालों की प्रभा और ऐरावत की विशाल आकृति दिखाई दी। नन्दनवन की वीथियों में गिरी मन्दार-मंजरियाँ बिछी थीं। पारिजात की हवा कुन्द और मन्दार के मकरन्द से सुगन्धित थी। नारद और तुम्बुरु के संगीत पर देवांगनाएँ नृत्य कर रही थीं। आकाश में विमान चल रहे थे और कल्पवृक्षों पर इन्द्रनील तथा चिन्तामणि जैसी दीप्ति झलक रही थी।

उस मानसिक स्वर्ग में हर दृश्य दूसरे दृश्य से जुड़ा था। शुक्र ने सिंहासन पर बैठे शचीपति इन्द्र को प्रणाम किया। इन्द्र उठे, उनका आदरपूर्वक पूजन किया, हाथ पकड़कर अपने पास ले गए और आसन दिया। उन्होंने कहा, “शुक्राचार्य, आपके शुभ आगमन से स्वर्ग की शोभा बढ़ी है। कृपया यहाँ चिरकाल निवास कीजिए।” देवगणों के बीच बैठे शुक्र को ऐसा मान मिला जैसे वे इन्द्र के अपने पुत्र हों। मन ने अतिथि, यजमान, सभा और प्रतिष्ठा का ऐसा क्रम बनाया जिसमें किसी कड़ी की कमी अनुभव नहीं हुई।

मन से रचे हुए स्वर्ग का अनुभव करते शुक्र

विश्वाची और मन का स्वर्ग

इन्द्र के पास एक मुहूर्त ठहरने के बाद शुक्र ने उसी अप्सरा को फिर देखा। बाद में काल ने उसका नाम विश्वाची बताया। इस बार दोनों की आकांक्षा पहले से प्रबल थी। स्वर्ग में संकल्प तत्काल फलित होता था। शुक्र ने नन्दनवन के उस भाग पर घना अन्धकार छा जाने का संकल्प किया। प्रकाश दब गया, साथ आई अप्सराएँ अपने-अपने स्थान को लौट गईं और विश्वाची अकेली उनकी ओर बढ़ी।

वह लज्जा और आकुलता के साथ उनके निकट आई। उसके शब्दों में विनय भी था और अपनी दशा की साफ़ स्वीकृति भी। उसने कहा, “चन्द्रवदन, कामदेव ने मुझे व्याकुल कर दिया है। आप मेरी रक्षा कीजिए। इस समय आप ही मेरी शरण हैं। किसी असहाय को धीरज देना सज्जनों का धर्म है। हमारे बीच जो स्नेह जागा है, उसका आदर कीजिए और मुझे अपने हृदय में स्थान दीजिए।”

अन्धकार से घिरे सजे हुए भवन में यह संवाद हुआ। दोनों एक-दूसरे को पहले ही देख चुके थे, इच्छा परस्पर थी और अन्धकार स्वयं शुक्र के संकल्प से बना था। विश्वाची ने अपनी प्रीति खुलकर व्यक्त की। उसने कहा कि अनुरक्त हृदयों का मिलन त्रिलोकी के ऐश्वर्य से भी अधिक आनन्द देता है। इतना कहकर वह शुक्र के वक्ष पर झुक गई। दोनों भवन के भीतर गए और उनकी संयुक्त मानसिक कथा आगे बढ़ी।

शुक्र और विश्वाची का साथ किसी एक उद्यान तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने मन्दाकिनी के तटों पर हंसों, चारणों और किन्नरों के बीच विहार किया। पारिजात के निकुंजों में देवताओं के साथ रसायन पिया। कुबेर के चैत्ररथ उद्यान में लताओं से बने हिंडोलों पर क्रीड़ा की। नन्दनवन के एक छोर से दूसरे छोर तक शिव के पार्षदों के साथ घूमे। सुमेरु की सुवर्णलताओं से घिरी भूमियों, कैलास के चाँदनी भरे कुंजों, गन्धमादन के शिखरों और लोकालोक के आश्चर्यपूर्ण प्रदेशों में उनका समय बीता।

वसिष्ठ इस यात्रा की अवधियाँ स्पष्ट देते हैं। मन्दराचल के जलमय, शीतल भागों में मन से बनाए गए देवमन्दिरों में वे साठ वर्ष रहे। क्षीरसागर के तट पर श्वेतद्वीप के निवासियों के साथ उनका आधा सत्ययुग बीता। फिर वे विश्वाची के साथ स्वर्ग में आठ चौकड़ियों तक रहे। मन ने प्रेम के लिए स्थान बनाए, उन स्थानों में समय फैलाया और उसी समय में सुख की लम्बी जीवनी रच दी।

भोग का क्रम चलता रहा तो पुण्य के क्षीण होने की कल्पना भी उसी संसार में पकने लगी। फूलों की मालाएँ मुरझाईं, दिव्य शरीरों की कान्ति घटने लगी और स्वर्ग से गिरने का भय सामने आया। अन्ततः शुक्र और विश्वाची उस अवस्था से नीचे गिरे। उनके कल्पित दिव्य शरीर टूटे और उनके सूक्ष्म शरीर आकाश में भटकते पक्षियों की तरह रह गए। वे चन्द्रमा की किरणों में पहुँचे, ओस की बूँद बने और फिर धान में प्रविष्ट हुए। कथा इस बिन्दु से विशेष रूप से शुक्र की अगली देहों का क्रम कहती है।

दशार्ण देश के एक ब्राह्मण ने वह पका हुआ धान खाया। उसी से शुक्र ब्राह्मण की पत्नी के गर्भ में पुत्र बने। उस जीवन में मुनियों का संग मिला और उनका मन फिर तप की ओर मुड़ा। वे मेरु के गहन वन में गए और एक मन्वन्तर तक घोर साधना करते रहे। स्वर्ग का दीर्घ सुख पीछे छूट चुका था, फिर भी उससे बनी वासना का सूक्ष्म सूत्र समाप्त नहीं हुआ था।

विश्वाची किसी शाप के कारण मृगी हुई थी। उसी मृगी से शुक्र को मनुष्याकार पुत्र प्राप्त हुआ। पुत्र के प्रति स्नेह शीघ्र ही तीव्र चिन्ता में बदल गया। वे उसके धन, गुण, आयु और भविष्य की कामना में इतने डूबे कि ध्यान की स्थिरता छूट गई। मृत्यु के समय भी पुत्र की समृद्धि की इच्छा मन में चल रही थी। वही इच्छा अगले जन्म की दिशा बनी।

शुक्र मद्रदेश के अधिपति के पुत्र हुए और समय आने पर मद्रदेश के शासक बने। उन्होंने चिरकाल तक राज्य किया और वृद्धावस्था पाई। अन्तिम समय में मन राजभोग से हटकर वानप्रस्थ और तप की ओर था। उस संस्कार से अगला जन्म एक तपस्वी के पुत्र के रूप में मिला। वे स्वयं तपस्वी बने और अन्ततः समंगा नाम की महानदी के तट पर पहुँचे। वहाँ अनेक देहों और दिशाओं में दौड़ता मन एक दृढ़ वृक्ष की तरह स्थिर होने लगा।

मन्दराचल पर दूसरी तस्वीर बनी रही। शुक्र की पहली देह उसी आसन के निकट थी जहाँ भृगु समाधिस्थ थे। मानसिक यात्रा के वर्षों में उसकी सुध लेने वाला कोई नहीं था। समय बीता, देह भूमि पर गिरी और धूप तथा हवा से सूखती गई। उस पवित्र आश्रम में हिंसक जीव उसे खाने नहीं आए। उस प्रदेश की पवित्रता और राग-द्वेष की गन्ध के अभाव ने उसे सुरक्षित रखा। वर्षा ने उसे भिगोया, हवा ने शिलाओं पर लुढ़काया और धीरे-धीरे त्वचा तथा अस्थियों का ढाँचा भर रह गया।

उस शरीर के रिक्त भागों में हवा चलती तो महीन ध्वनि उठती। आँखों और उदर की खाली जगहों में छोटे जीव बस गए, पसलियों में मकड़ियों ने जाला बना लिया। वसिष्ठ का वर्णन देह की नश्वरता को सामने रखता है। जिस शरीर को मन अपनी स्थायी पहचान मान लेता है, वही चेतना का आग्रह हटते ही प्रकृति के पदार्थों में लौटने लगता है। इधर कंकाल मौन पड़ा था, उधर उसी शुक्र का मन स्वर्ग, राज्य, परिवार, वन और तप का लम्बा इतिहास अनुभव कर चुका था।

कंकाल के सामने काल

एक हजार दिव्य वर्ष पूरे होने पर भृगु समाधि से उठे। उन्होंने सामने पुत्र को सेवा में खड़ा देखने की स्वाभाविक अपेक्षा की थी। वहाँ केवल सूखा अस्थिपंजर पड़ा था। एक क्षण में उनका ध्यान उस दृश्य पर जम गया। योगदृष्टि खोलने से पहले उन्होंने यही मान लिया कि काल ने उनके पुत्र की आयु पूरी होने से पहले उसका अन्त कर दिया है। तपस्वी पिता का स्नेह क्रोध बन उठा और वे काल को शाप देने के लिए तैयार हो गए।

तभी निराकार काल ने दृश्य शरीर धारण किया। उसके हाथों में खड्ग और पाश थे, शरीर पर कवच और कानों में कुण्डल थे। उसकी भुजाओं में वर्ष के बारह मासों का संकेत था और छह मुखों में छह ऋतुओं का। उसके तेज से दिशाएँ दीप्त हुईं। वह भृगु के सामने आया और संयत, गम्भीर स्वर में महर्षि को उनके अपने ज्ञान तथा मर्यादा की याद दिलाई।

काल ने कहा, “मुनिवर, आप महान तपस्वी हैं। अपने तप को क्षणिक रोष में व्यर्थ मत कीजिए। आपके पुत्र की गति किसी निजी द्वेष, राग या मनमाने निर्णय से नहीं हुई। मैं भी महानियति के विधान में स्थित हूँ। अग्नि ऊपर उठती है, जल नीचे बहता है और उत्पन्न वस्तु अपने समय पर बदलती है। इसी प्रकार मन अपनी वासना के अनुसार अनुभव और शरीर ग्रहण करता है।”

भृगु के सामने पड़े कंकाल की ओर संकेत करते हुए काल ने समझाया कि प्राणी के दो शरीर कहे जाते हैं। एक स्थूल शरीर है, जो जड़ है और थोड़े से कारण से नष्ट हो सकता है। दूसरा मन से बना सूक्ष्म शरीर है, जिसमें संकल्प, वासना, स्मृति और अहंभाव चलते हैं। स्थूल शरीर के टूटने से मन का क्रम तत्काल समाप्त नहीं होता। वह जिस रूप का दृढ़ निश्चय करता है, उसी के अनुसार एक नई अनुभूति और नई देह का संसार बना लेता है।

काल ने बालक के मिट्टी के खिलौने का उदाहरण दिया। बालक एक आकृति बनाता है, फिर उसे मिटाकर दूसरी बना लेता है। मन भी “यह मेरा शरीर है, यह मेरा सिर है, यह मेरी अवस्था है” जैसी धारणाओं से रूप बनाता और छोड़ता है। उसी से मन बुद्धि, अहंकार, कर्ता और भोक्ता के भिन्न नाम ग्रहण करता है। सत्य का साक्षात्कार होने तक देह की यह कल्पना चलती रहती है। साक्षात्कार में मन अपने बनाए हुए बन्धन से निवृत्त होकर अपने आधार में शान्त होता है।

काल ने भृगु से कहा कि मन्दराचल की कन्दरा में भार्गव शरीर छोड़कर शुक्र का मन अपने मनोरथ के मार्ग पर बहुत दूर चला गया था। वह आठ चौकड़ियों तक विश्वाची नाम की अप्सरा के साथ स्वर्गीय प्रदेशों में रहा। पुण्य के क्षय, गिरने, धान और दशार्ण के जन्म का सारा क्रम उसी मनोविलास का विस्तार था। भृगु ने एक शरीर की दशा देखी थी; काल उन्हें उस मन की निरन्तर गति दिखाने आया था जो अब भी जीवित अनुभव में लगा था।

इसके बाद काल ने उन जन्मों का अधिक विस्तृत लेखा दिया जिन्हें पहले संक्षेप में कहा गया था। शुक्र दशार्ण देश में ब्राह्मण हुए, कोसल देश में राजा बने, महाटवी में धीवर हुए और गंगा के तट पर हंस बने। फिर सूर्यवंश में पौण्ड्र देश के राजा हुए। सौरशाल्व देश में मन्त्रसिद्ध होकर दूसरों को उपदेश दिया। अपने मन्त्राभ्यास के संस्कार से वे विद्याधर हुए और एक कल्प तक उस दिव्य अवस्था में रहे।

काल के कथन में कई और देह-दशाएँ भी आती हैं। शुक्र विन्ध्य में किरात हुए, कैकट नगर में फिर किरात हुए और सौवीर देश में सामन्त बने। उस जीवन के कर्मों से त्रिगर्त देश में गधे की देह मिली। किरात देश में बाँस का गुल्म हुए, चीन के जंगल में हरिण हुए, ताड़ के वृक्ष में साँप की अवस्था मिली और तमाल-वृक्ष में मृग की दशा आई। काल ने इन संक्षिप्त वृत्तान्तों को वासना के अनुसार बदलती पहचान की सूची के रूप में रखा।

विद्याधर का एक कल्प पूरा हुआ तो प्रलय के समय एक साथ उदित बारह सूर्यों की ज्वाला में वह शरीर भस्म हो गया। संसार की रचना थमी तो शरीर ग्रहण करने की भूमि भी नहीं रही। शेष वासना विशाल आकाश में जैसे प्रतीक्षा करती रही। अगले सृजन के सत्ययुग में वह ब्राह्मणकुमार वासुदेव के रूप में प्रकट हुई। वासुदेव ने समस्त वेदों का अध्ययन किया और समंगा नदी के तट पर तप में बैठ गए। काल ने भृगु को बताया कि उनका पुत्र उस स्थान पर आठ सौ वर्षों से अटल साधना में स्थित है।

“यदि आप उसका पूरा चरित्र देखना चाहते हैं,” काल ने कहा, “तो योगदृष्टि खोलकर देखिए।” भृगु भीतर उतरे। एक ही क्षण में उनके बुद्धिरूपी दर्पण पर पुत्र की सारी यात्रा आरम्भ से वर्तमान तक दिखाई दे गई। उन्होंने समझ लिया कि सामने पड़े कंकाल को देखकर स्नेह ने निर्णय को ढक लिया था। पुत्र का चित्त समाप्त नहीं हुआ था और काल ने किसी निजी आग्रह से उसे नहीं छीना था। भृगु का रोष शान्त हुआ।

भृगु ने स्वीकार किया, “देव, स्नेह से हमारा चित्त मलिन हो गया था। मैं पुत्र की आयु जानता था, फिर भी सूखी देह देखकर मोह में पड़ गया। अब योगदृष्टि से उसके चरित्र को देख चुका हूँ। आपके प्रति जो क्रोध उठा, वह उचित नहीं था।” यह स्वीकार पिता की संवेदना को छोटा नहीं करता। वह दिखाता है कि व्यापक ज्ञान रखने वाला ऋषि भी किसी निकट सम्बन्ध के दृश्य से क्षणभर आवृत हो सकता है और फिर विवेक से अपनी दृष्टि सुधार सकता है।

काल ने उनकी समझ की प्रशंसा की और मन की शिक्षा आगे बढ़ाई। मन ही अनुभव के लिए देह का रूप बनाता है। वह अपने को दुर्बल माने तो दुर्बलता का संसार रचता है, दुःखी माने तो दुःख की कथा गाढ़ी होती जाती है, और किसी पद या शरीर में अपनी पूर्ण पहचान रखे तो उसी सीमा में जीवन का अर्थ बाँध देता है। वासना के क्षीण होने और आत्मतत्त्व की पहचान होने पर यही मन अपनी कृत्रिम संज्ञाओं से विश्राम पाता है।

उन्होंने समुद्र और तरंग का दृष्टान्त भी दिया। छोटी और बड़ी तरंगें अपने आकार, गति और प्रतिबिम्ब के अनुसार अलग-अलग दशाएँ अनुभव करती हुई लगती हैं। जल से उनका कोई पृथक आधार नहीं है। इसी प्रकार स्त्री, पुरुष, देव, पशु, वृक्ष, राजा और तपस्वी के रूप चेतना में उठते हैं। व्यवहार में उनके कर्म और फल का क्रम चलता है; आत्मदृष्टि में उनका आधार एक ही सत्ता है। इस समझ से व्यवहार समाप्त नहीं होता, उसके भीतर का अज्ञानपूर्ण स्वामित्व ढीला पड़ता है।

भृगु और काल का संवाद कई सर्गों तक चला। नियति, कर्तृत्व, मन, वासना, ज्ञान और लोकव्यवहार की परतें खुलती रहीं। उस दिन सभा में सूर्य अस्त हुआ तो वसिष्ठ ने कथन रोक दिया। अगली सुबह श्रीराम और मुनियों के बैठने पर उन्होंने वहीं से वृत्तान्त आगे बढ़ाया, जहाँ काल ने भृगु से कहा था कि अब समंगा के तट पर तप करते पुत्र के पास चलना चाहिए।

समंगा के तट पर वासुदेव

काल और भृगु मन्दराचल से नीचे उतरे। मार्ग में पर्वत की स्वर्णाभ लताएँ, पुष्पों से लदे वृक्ष, झरनों की धाराएँ, पक्षियों से भरे उपवन, सिद्धों के आश्रम, गाँव और नगर आए। कहीं चन्दन और मनोहर वृक्षों की सुगन्ध थी, कहीं जलप्रवाह के पास मृग विचर रहे थे। कई प्रदेश पार करने के बाद वे समंगा पहुँचे। नदी की लहरों पर फूल बह रहे थे और तट का वन तप के लिए शान्त स्थान देता था।

वहाँ उन्होंने वासुदेव को देखा। आठ सौ वर्षों की साधना से शरीर कृश था, जटाएँ बँधी थीं और हाथों में रुद्राक्ष के कंकण थे। इन्द्रियाँ विषयों से लौट चुकी थीं। वे इतने निश्चल बैठे थे कि आसपास के परिवर्तन से उनकी स्थिति में कोई विक्षेप नहीं आता था। चित्त संकल्प और विकल्प से ऊपर उठकर निर्विकल्प समाधि में विश्राम कर रहा था।

काल ने भृगु से कहा, “यही आपके पुत्र का वर्तमान शरीर है।” फिर उन्होंने तपस्वी को पुकारा, “जागो।” वासुदेव ने तत्काल उत्तर नहीं दिया। पुकार धीरे-धीरे उनके प्राण और मन तक पहुँची। आँखें खुलीं तो सामने दो तेजस्वी पुरुष दिखाई दिए। वे उठे, प्रणाम किया और दोनों को शिला पर सम्मानपूर्वक बैठाया। तीनों की प्रभा उस क्षण ब्रह्मा, विष्णु और महेश जैसी लग रही थी।

वासुदेव ने कहा, “आपके दर्शन से भीतर का वह आवरण हट रहा है जिसे अध्ययन, तप और उपासना भी पूरी तरह दूर नहीं कर पाए थे। कृपया बताइए, आप कौन हैं और मेरे पास किस प्रयोजन से आए हैं?” उनकी विनय में ज्ञान था, पर पूर्व देहों की व्यक्तिगत स्मृति अभी सामने नहीं आई थी। समंगा का तपस्वी अपने वर्तमान नाम और साधना को जानता था; भृगुपुत्र होने का पूरा इतिहास उस क्षण आवृत था।

भृगु ने स्नेह और संयम से कहा, “पुत्र, आप ज्ञानी हैं। अपने को स्मरण कीजिए। भीतर देखेंगे तो अपने आने का क्रम स्वयं पहचान लेंगे।” वासुदेव ने नेत्र मूँदे और ध्यान में उतरे। एक क्षण में जन्मों का दीर्घ सिलसिला खुल गया। स्वर्ग के उद्यान, विश्वाची, पतन, ब्राह्मण और राजदेहें, पशु तथा स्थावर अवस्थाएँ, विद्या, प्रलय, समंगा और सामने बैठे पिता, सब एक ही चित्त-प्रवाह में जुड़ गए।

उन्होंने आँखें खोलीं और कहा, “ये महर्षि भृगु मेरे पिता हैं और आप काल हैं। मैंने अनेक जन्मों में सुख और दुःख, मित्र और शत्रु, ऊँचे लोक और कठिन अवस्थाएँ देखी हैं। जो भोगना था वह क्रम पूरा हो चुका है। अब मेरा मन आत्मतत्त्व में विश्राम पा रहा है। पिता, मुझे मन्दराचल पर पड़ी वह पहली देह दिखाइए जिसे मैं बहुत पहले छोड़ आया था।”

स्मृति लौटने पर वे उस शरीर का वर्तमान रूप देखकर शेष नियति को समझना चाहते थे। ज्ञान ने उन्हें यात्रा से भागने की आवश्यकता से मुक्त किया था। काल और भृगु के साथ वे आकाशमार्ग से मन्दराचल की ओर चले। तीनों उस स्थान पर पहुँचे जहाँ धूप, वर्षा और समय से सूखा शरीर शिला पर पड़ा था।

वासुदेव ने कंकाल को देखा तो बीते जीवन का संस्कार जागा। उन्होंने कहा, “यही वह शरीर है जिसे कभी चन्दन और आभूषणों से सँवारा गया था। इसी ने पुष्पवन, संगीत और प्रिय संग का अनुभव किया। आज इसके रिक्त भागों में छोटे जीव घूम रहे हैं, त्वचा सूख चुकी है और मुख की कान्ति का चिह्न नहीं बचा। जिसे मन ने इतना प्रिय माना था, समय ने उसकी वास्तविक निर्भरता सामने रख दी है।”

उनकी वाणी में करुणा थी, साथ ही देह के स्वभाव पर गहरा विचार था। उन्होंने देखा कि मन की चपलता हट जाने पर वही शरीर पूर्ण शान्त पड़ा है। कामना, भय, आशा, गर्व, हर्ष और शोक का कोई स्पन्दन उसमें नहीं था। शरीर अकेले सुख या दुःख की कहानी नहीं बनाता। भीतर का मन उसमें सम्बन्ध, अधिकार, भविष्य और स्मृति का संसार जोड़ता है। मन की गति थमे तो देह के बारे में बनी कथा भी मौन हो जाती है।

श्रीराम ने यहाँ पूछा, “भगवन्, शुक्र अनेक देहों में रहे। इस एक शरीर को देखकर उनके भीतर इतना भाव क्यों उठा? दूसरी देहों के प्रति ऐसा स्नेह क्यों नहीं दिखाई दिया?” वसिष्ठ ने कहा कि भृगु से उत्पन्न यह शरीर इस चक्र की पहली और सबसे दृढ़ देह-वृत्ति से जुड़ा था। उसके साथ दीर्घ अभ्यास, प्रारम्भिक पहचान और शेष प्रारब्ध का सम्बन्ध था। दूसरी देहें अनेक वासनाओं के बीच आईं और चली गईं; इस शरीर से भविष्य का नियत कार्य अभी पूरा होना था।

वसिष्ठ ने ज्ञान और व्यवहार का सूक्ष्म सम्बन्ध समझाया। ज्ञानी व्यक्ति प्रिय को देखकर स्नेह अनुभव कर सकता है, दुःखद दृश्य पर उसकी आँख नम हो सकती है और समाज में उचित संस्कार पूरा कर सकता है। उस भाव को स्थायी आत्मपहचान बनाने वाली आसक्ति क्षीण हो चुकी होती है। शुक्र का अपने पुराने शरीर से बोलना नये बन्धन का आरम्भ नहीं था। वह स्मृति, करुणा और विवेक से सम्पन्न क्षण था, जिसे वे आते-जाते देख रहे थे।

पहली देह में वापसी

शुक्र और भृगु के बीच संवाद चल रहा था कि काल ने आगे का विधान बताया। उन्होंने कहा, “भृगुपुत्र, समंगा के तट पर तप करने वाले वासुदेव शरीर को छोड़कर इस पूर्व देह में प्रवेश कीजिए, जैसे राजा अपनी राजधानी में लौटता है। इसी शरीर से फिर तप कीजिए। समय आने पर आपको दैत्यों के आचार्य और ग्रहपति का अधिकार प्राप्त होगा। ब्रह्मा के दिन के अन्त तक, जो एक हजार चतुर्युग का काल है, यह शरीर रहेगा। उसके बाद दूसरी देह ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं होगी।”

काल का आदेश शेष कर्म की दिशा थी। समंगा का जीवन इस क्रम की फलित अवस्था था। उसी में वेदाध्ययन, आठ सौ वर्षों का तप और आत्मतत्त्व की स्थिर पहचान फली थी। अब उस ज्ञान के साथ भृगु से उत्पन्न शरीर का नियत कार्य पूरा होना था। शुक्र ने काल के कथन पर विचार किया, उसके अवश्यंभावी क्रम को स्वीकार किया और वासुदेव शरीर से चेतना समेट ली।

समंगा-तट का तपस्वी शरीर जड़ से कटी लता की तरह धरती पर गिर पड़ा। उसी क्षण शुक्र का चित्त मन्दराचल के सूखे शरीर में प्रविष्ट हुआ। भीतर उपस्थिति लौट आई, पर अस्थियों और सूखी नाड़ियों को फिर जीवनयोग्य बनाना था। भृगु ने कमण्डलु उठाया, मन्त्रों से जल को अभिमन्त्रित किया और पुत्र की देह पर छिड़का।

जल पड़ते ही सूखी नाड़ियों में प्रवाह आया। अंगों ने आकार ग्रहण किया, श्वास चली और देह में यौवन तथा कान्ति लौट आई। शुक्र उठे, सामने पिता को देखा और विधिपूर्वक उनके चरणों में प्रणाम किया। भृगु ने पुत्र को आलिंगन में भर लिया। एक हजार दिव्य वर्ष की समाधि, कंकाल के सामने उठा रोष, योगदृष्टि में देखी दीर्घ यात्रा और समंगा तक का मार्ग उस आलिंगन में आकर शान्त हुआ।

पिता और पुत्र ने वासुदेव की छोड़ी हुई देह का स्वीकृत विधि के अनुसार दाह-संस्कार किया। वह शरीर आठ सौ वर्षों की तपस्या का साधन रहा था और उसी में स्मृति से पहले आत्मबोध स्थिर हुआ था। अन्त्येष्टि लोकाचार के सम्मान और उस देह के प्रति कृतज्ञता का कर्म बनी। उन्होंने उचित व्यवहार पूरा किया और स्वामित्व की पकड़ से मुक्त रहे।

इसके बाद भृगु और शुक्र जीवन्मुक्त भाव से साथ रहे। अनुकूल और प्रतिकूल दशाओं में उनकी आत्मस्थिति सम रही। समय आने पर शुक्राचार्य ने दैत्यराजों के आचार्य और ग्रहपति का पद ग्रहण किया। भृगु अपने निरामय आत्मस्वरूप में स्थित रहे। प्रमाणित भविष्य-वृत्त इन्हीं पदों तक है। यहीं शुक्र की मानसिक यात्रा अपने दार्शनिक फल तक पहुँचती है।

वसिष्ठ सर्ग के अन्त में पूरे वृत्तान्त को एक संक्षिप्त दृष्टि से देखते हैं। सत्य आत्मतत्त्व से उदित शुक्र का चित्त स्मरण में आई अप्सरा के कारण अपने ही संकल्प से रचे आकाश में निकला और अनेक दिशाओं में घूमता रहा। शरीर मन्दराचल पर पड़ा था, पर अनुभव का संसार स्वर्ग से प्रलय और समंगा से पुनरागमन तक फैल गया। आत्मबोध ने उस फैलाव का आधार स्पष्ट किया। तब स्मृति लौट सकी, प्रारब्ध स्वीकार हुआ और शेष कार्य अनासक्त होकर पूरा किया गया।

English