कथा · 11
इन्दु के दस पुत्र: मन से उपजी दस सृष्टियाँ
सृष्टि रचने को ब्रह्मा ने दृष्टि उठाई तो चिदाकाश में दस पूर्ण जगत विद्यमान थे। एक सूर्य ने उनका रहस्य बताया। वे कैलास पर तप करने वाले इन्दु के दस पुत्रों की सृष्टियाँ थीं। उनके स्थूल शरीर बहुत पहले नष्ट हो चुके थे, पर चित्त जिस निश्चय में अडिग रहा, उसने प्रत्येक को एक ब्रह्मा और एक जगत का आधार बना दिया।
ब्रह्मा ने दस जगत देखे
श्रीवसिष्ठ ने श्रीराम से कहा, “राम, सृष्टि के आरम्भ का एक वृत्तान्त ब्रह्मा ने स्वयं मुझसे कहा था। उसे ध्यान से सुनिए।”
एक कल्प का दिन समाप्त होने पर ब्रह्मा ने सम्पूर्ण सृष्टि को समेट लिया और ब्रह्मरात्रि में एकाग्र होकर विश्राम किया। रात्रि पूरी हुई तो वे जागे, अपने प्रातःकालीन कर्म सम्पन्न किए और नई सृष्टि रचने का संकल्प लेकर विस्तृत आकाश की ओर देखा। वहाँ अन्धकार और प्रकाश का भेद नहीं था। शुद्ध चिदाकाश में चित्त स्थिर करते ही उन्हें दस विशाल सृष्टियाँ दिखाई दीं।
हर सृष्टि अपने क्रम में पूर्ण थी। प्रत्येक में एक ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र थे। देवता, गन्धर्व, किन्नर, मनुष्य और पाताल के जीव थे। सुमेरु, मन्दराचल, कैलास और हिमालय जैसे पर्वत थे। पृथ्वी, नदियाँ और सातों समुद्र अपने-अपने विस्तार में स्थित थे। सूर्य और चन्द्रमा उदय होते, वायु बहती, कालचक्र चलता और जीव अपनी वासनाओं के अनुसार कर्म तथा उनके फल अनुभव करते थे। कहीं प्रकाश स्थिर था, कहीं सृष्टि विद्युत की चमक की तरह प्रकट होकर मिटती थी।
ब्रह्मा ने इन जगतों को अन्तर्वाहक दृष्टि से स्पष्ट देखा। सामान्य नेत्रों से देखने पर वहाँ कुछ भी पकड़ में नहीं आता था। वे बहुत समय तक इस दृश्य का विचार करते रहे। फिर उन्होंने एक सृष्टि के सूर्य का आवाहन किया। सूर्य निकट आया तो ब्रह्मा ने पूछा, “भास्कर, आप कौन हैं? यह सृष्टि कहाँ से आई? यहाँ एक नहीं, अनेक जगत दिखाई दे रहे हैं। इनका क्रम आप जानते हों तो बताइए।”
त्रिकालज्ञ सूर्य ने प्रणाम करके कहा, “भगवन्, आप सब जानते हैं। यदि यह प्रश्न लीला के लिए है, तो जो हुआ है उसे निवेदन करता हूँ। व्यवहारों से भरा यह दृश्य जगत मन के स्फुरण में स्थित है। इन दस सृष्टियों का सम्बन्ध कैलास पर रहने वाले इन्दु और उनके पुत्रों से है।”
कैलास की कन्दरा में
भानु ने कहा, “आपके पिछले कल्प-दिन में जम्बूद्वीप के एक कोने पर कैलास पर्वत था। उसकी एक कन्दरा में आपका सुवर्णज्येष्ठ नामक पुत्र रहता था। उसने वहाँ एक कुटी बनाई थी, जिसमें साधुजन निवास करते थे।”
कश्यप ऋषि के कुल में उत्पन्न इन्दु नाम के एक शान्त, वेदवेत्ता ब्राह्मण अपनी पत्नी के साथ उसी कुटी में रहने आए। दोनों के बीच गहरा स्नेह था, पर उनके यहाँ सन्तान नहीं हुई। इस अभाव ने उन्हें दीर्घ तप का निश्चय दिया।
पुत्र की कामना लेकर वे कैलास के ऊपरी शिखर पर पहुँचे। वह स्थान प्राणियों से रहित और निर्जन था। वहाँ दोनों वृक्षों की तरह निश्चल खड़े होकर घोर तप करने लगे। आरम्भ में उनका आहार केवल जल था। आगे चलकर वे सायंकाल एक चुल्लू जल ग्रहण करते और फिर उसी अचल मुद्रा में स्थित हो जाते। उनके इसी साधना-काल में त्रेता और द्वापर युग, दोनों बीत गए।
इतने दीर्घ तप से प्रसन्न होकर उमासहित चन्द्रशेखर वहाँ प्रकट हुए। वृषभ पर आरूढ़ शिव को देखते ही दम्पती के मुख खिल उठे। दोनों ने श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया। भगवान शंकर ने मृदु वाणी में इन्दु को सम्बोधित किया।
शंकर ने कहा, “ब्राह्मण, मैं तुम पर प्रसन्न हूँ। अपने मन का वर माँगो।”
इन्दु ने निवेदन किया, “देवदेवेश, मेरे दस पुत्र हों। वे महामति हों और उनके कर्म मंगलमय हों, जिससे सन्तान के अभाव का शोक मुझे फिर न सताए।”
शंकर ने कहा, “आपकी कामना पूर्ण होगी।” इतना कहकर वे उमासहित अन्तर्धान हो गए। वर पाकर इन्दु और उनकी पत्नी प्रसन्नतापूर्वक अपने घर लौट आए।
सात वर्ष के दस भाई
इन्दु की पत्नी ने गर्भ धारण किया। दसवें महीने में उसने दस कोमल बालकों को जन्म दिया। ब्राह्मण-संस्कारों से सम्पन्न वे पुत्र वर्षा के नये मेघों की तरह शीघ्र बढ़े। सात वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते उन्होंने सम्पूर्ण शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर लिया। अपने तेज और मेधा से वे ऐसे शोभित होते थे जैसे निर्मल आकाश में नक्षत्र।
बहुत समय बीतने पर माता और पिता, दोनों ने देह त्याग दी। ब्रह्म के ज्ञाता होने के कारण वे उत्तम गति को प्राप्त हुए। माता-पिता के देहावसान से दसों भाई गहरे दुःख में पड़ गए। उन्होंने घर छोड़ा और कैलास के शिखर पर जाकर विचार किया कि मनुष्य के लिए कौन-सा पद ग्रहण करने योग्य है। वे ऐसा ऐश्वर्य खोज रहे थे जो स्थायी हो, जिसके परिणाम में दुःख न आए और जिसका अधिकार सर्वोपरि हो।
एक भाई ने मण्डलेश्वर का पद सबसे बड़ा कहा, क्योंकि उसके प्रदेश में उसकी आज्ञा चलती है। दूसरे ने स्मरण कराया कि मण्डलेश्वर भी राजा के अधीन होता है। तीसरे ने चक्रवर्ती को राजा से बड़ा माना। चौथे ने कहा कि चक्रवर्ती भी यम के अधिकार से बाहर नहीं। पाँचवें ने इन्द्र को यम से अधिक सामर्थ्यवान बताया। छठे ने कहा कि ब्रह्मा के एक मुहूर्त में इन्द्र का पद भी समाप्त हो जाता है।
सबसे बड़े भाई ने उनकी बात सुनकर कहा, “ब्रह्मा के एक कल्प में ये सभी विभूतियाँ नष्ट हो जाती हैं। इसलिए ब्रह्मा का ऐश्वर्य इनसे बड़ा है।”
भाइयों ने उसकी सम्मति स्वीकार की। उन्होंने पूछा, “तात, जगत में पूजित और दुःख का अन्त करने वाला ब्राह्मपद हमें किस उपाय से मिल सकता है?”
एक ही निश्चय
ज्येष्ठ भाई ने कहा, “अन्य सभी भावनाएँ छोड़ दीजिए। अपने भीतर यह दृढ़ निश्चय रखिए कि हम ब्रह्मा हैं और कमलासन पर स्थित हैं। सृष्टि के कर्ता, पालक और संहारकर्ता हम ही हैं। सम्पूर्ण जगत हमारे भीतर स्थित है। इसी एकरूप भावना में चिरकाल तक स्थिर रहने से ब्रह्मा का पद प्राप्त होगा।”
सभी भाइयों ने कहा, “तात, आपने यथार्थ कहा। हम ऐसा ही करेंगे।”
वे ध्यान में इस प्रकार स्थिर हुए जैसे चित्रपट पर अंकित मूर्तियाँ हों। प्रत्येक के भीतर एक ही चिन्तन चलता रहा, “मैं ब्रह्मा हूँ। पूर्ण विकसित कमल मेरा आसन है। सृष्टि का कर्ता, भोक्ता और नियन्ता मैं हूँ। सरस्वती, गायत्री और सांगोपांग वेद मेरे सम्मुख स्थित हैं। स्वर्ग, पृथ्वी, पाताल, पर्वत, द्वीप, नदियाँ और समुद्र मेरे भीतर हैं। वज्रधारी इन्द्र और जगत की मर्यादा रखने वाले लोकपाल मेरी आज्ञा में हैं। सूर्य मेरी आज्ञा से तपता है। क्षण, दिन, मास, वर्ष और युग मेरे बनाए काल-विभाग हैं। मैं दिन प्रकट करता हूँ और रात्रि में उसे समेट लेता हूँ। मैं आत्मपद में स्थित पूर्ण परमेश्वर हूँ।”
यह चिन्तन किसी क्षणिक आकांक्षा की तरह नहीं आया। दसों भाई उसी में निरन्तर स्थित रहे। धूप और हवा से उनके शरीर सूखकर गिर गए। वनचर उन शरीरों को खींच ले गए और उनका भक्षण किया। बाहरी देह का यह अन्त भी उनके चित्त को ध्यान से हटा न सका। उनका निश्चय शरीर की स्मृति में वापस नहीं लौटा।
प्रलय के पार
चारों युग समाप्त हुए और ब्रह्मा का कल्प-दिन क्षय होने लगा। बारह सूर्य तपने लगे। प्रलयकारी पुष्करावर्त मेघ प्रचण्ड गर्जना के साथ बरसे। पृथ्वी काँपी, कल्पान्त की वायु चली और समुद्र अपनी सीमाओं से उठने लगे। अन्ततः एक ही महार्णव रह गया और समस्त प्राणी लीन हो गए।
उस महाप्रलय में भाइयों के स्थूल शरीरों का कोई अवशेष नहीं रहा। उनकी पुर्यष्टक, अर्थात सूक्ष्म अन्तःसत्ता, आकाश में आकाश जैसी होकर उसी एक संकल्प में स्थित रही। ब्रह्मा की रात्रि बीतने तक भी वे अपनी कल्पित सृष्टियों के व्यापार में तल्लीन रहे। जब ब्रह्मा फिर जागे, तब वे दस ऐन्दव दस ब्रह्मा हो चुके थे और उनके मनोरूप आकाशों में दस पृथक ब्रह्माण्ड स्थित थे।
भानु ने कहा, “भगवन्, मैं उन्हीं दस सृष्टियों में से एक का सूर्य हूँ। आकाश में मेरा मन्दिर है। क्षण, दिन, पक्ष, मास और युग की गति का कार्य उन्होंने मुझे दिया है। आपने जो दस ब्रह्मा और दस जगत देखे हैं, उनका क्रम यही है। वे सृष्टियाँ मनोमात्र हैं और चित्त की कल्पना के अनुसार विस्तृत दिखाई देती हैं।”

ब्रह्मा का प्रश्न
सूर्य की बात सुनकर ब्रह्मा ने पूछा, “भानु, जब दस ब्रह्मा अपनी दस सृष्टियाँ रच चुके हैं, तो मेरी रचना से अब क्या सिद्ध होगा?”
भानु ने कहा, “प्रभो, आपकी कोई निजी कामना नहीं है। सृष्टि-रचना आपके लिए किसी लाभ का साधन नहीं। यह आपके स्वभाव में सहज घटने वाली क्रिया है। जल में सूर्य का प्रतिबिम्ब किसी इच्छा के कारण नहीं पड़ता। सूर्य से दिन होता है और उसके अस्त होने पर दिन समाप्त होता है, फिर भी सूर्य इन परिणामों से बँधता नहीं। इसी प्रकार अपने स्वाभाविक आचार में स्थित रहिए।”
उन्होंने समझाया कि ज्ञानी के लिए प्राप्त कर्म किसी निजी फल की कामना से प्रेरित नहीं होता। इन्दु के पुत्रों की सृष्टियाँ ब्रह्मा के कार्य में बाधा नहीं थीं। ब्रह्मा उन सृष्टियों को चित्तरूपी नेत्र से देखते थे। अपनी रचना को प्रत्यक्ष अनुभव करने वाला प्रत्येक ऐन्दव स्वयं था। जिस चित्त ने जिस सृष्टि का निश्चय किया था, वह सृष्टि उसी के अनुभव-क्रम में विस्तृत थी।
भानु ने कहा, “इन्द्रियों द्वारा किये हुए कर्म को रोका जा सकता है, पर मन के दृढ़ निश्चय को कोई बाहरी उपाय नष्ट नहीं कर सकता। वह तभी निवृत्त होता है जब उसे धारण करने वाले के भीतर उसका बोध बदलता है। देह मिट जाने पर भी चिरकाल से बद्धमूल निश्चय बना रह सकता है। आप अपने स्वभाव के अनुसार सृष्टि कीजिए और उन दस सृष्टियों को उनके क्रम में रहने दीजिए।”