इंदु के दस पुत्र

कथा · 13

इंदु के दस पुत्र

कश्मीर का राजा निःसंतान था। तप करके दस बेटे पाए। बेटे बड़े हुए तो राज्य छोड़कर पहाड़ पर चढ़ गए। फिर हर एक अपने भीतर एक ब्रह्मांड रच गया। दस बेटे, दस ब्रह्मा, दस सृष्टियाँ।

कश्मीर के एक छोर पर इंदु नाम के राजा थे। राज्य अच्छा था, मगर एक चीज़ की कमी थी। बेटा नहीं था।

राजा पच्चीस की उम्र से ही प्रतीक्षा कर रहे थे। तीस के हुए, चालीस के हुए। हर बार कोई न कोई बात होती – रानी गर्भवती हुई, मगर बच्चा नहीं हुआ। फिर रानी फिर गर्भवती हुई, मगर बच्चा फिर नहीं हुआ।

पचास के होते-होते राजा-रानी ने तय किया – अब तप करेंगे। हिमालय में एक छोटी सी कुटिया बनाई। वहाँ चले गए।

तपस्या

हिमालय की ठंड कठोर थी। ओले गिरते। बर्फ़ की हवा। राजा-रानी एक छोटी सी आग के पास बैठते। वर्षों बीते।

उनके चेहरे पर झुर्रियाँ बढ़ीं। बाल सफ़ेद हुए। मगर तप जारी रहा।

एक दिन ब्रह्मा प्रकट हुए। हंस पर बैठे, चार हाथों में कमंडल, माला, वेद, अमृत-कलश।

“वर माँगो।”

राजा ने हाथ जोड़े। उनकी आवाज़ काँप रही थी, मगर मन स्थिर था।

“प्रभु, मुझे एक नहीं, मुझे दस बेटे चाहिए। साधारण बेटे नहीं। ज्ञानी बेटे।”

ब्रह्मा ने एक पल सोचा। फिर मुस्कुराए।

“तथास्तु। मगर एक बात याद रखना – ज्ञानी बेटे साधारण रास्ते नहीं चलते।”

राजा ने सिर हिलाया। “स्वीकार है।”

ब्रह्मा अंतर्ध्यान हो गए।

दस बेटे

राजा-रानी राज्य लौटे। समय आया। दस बेटे हुए। एक के बाद एक। हर साल एक।

सब स्वस्थ, सब बुद्धिमान। बड़े होने लगे।

मगर वो दूसरे राजकुमारों जैसे नहीं थे।

दूसरे राजकुमार खेलते-कूदते, घुड़सवारी सीखते, युद्ध की कलाएँ। यह दस अलग थे।

सबसे बड़ा – देवदत्त – बहुत चुप रहता। शास्त्र पढ़ता।

दूसरा – देवप्रिय – प्रकृति देखता। पेड़, फूल, पंछी। उन्हें घंटों देखता।

तीसरा – देवेश्वर – ध्यान करता। बैठा रहता।

चौथा – देवराज – प्रश्न पूछता। हर बात के बारे में।

पाँचवाँ – देवचंद्र – संगीत प्रिय।

छठा – देवसिंह – नक्षत्र देखता। आसमान।

सातवाँ – देवशर्मा – कविता लिखता।

आठवाँ – देवनाथ – मौन रहता।

नवाँ – देवप्रकाश – दूसरों की मदद करता।

दसवाँ – देवानंद – सबसे शांत। सिर्फ़ मुस्कुराता।

हर बेटा अलग था। मगर सब के सब अंदर की तरफ़ देखते।

वन की बात

जब बीस की उम्र के हुए, तो एक दिन सब साथ आए। राजा से बोले।

“पिताजी, हमें राज्य नहीं चाहिए। हम वन में जा रहे हैं।”

राजा हैरान। उन्होंने ब्रह्मा की चेतावनी याद की – “ज्ञानी बेटे साधारण रास्ते नहीं चलते।”

“क्यों?”

सबसे बड़े देवदत्त ने कहा, “राज्य चलाना मन का काम है। हम मन से बाहर जाना चाहते हैं।”

“मगर बाहर क्या मिलेगा?”

“पता नहीं। मगर मन के भीतर रहना अब असहनीय है। हम जैसे हैं, ऐसे हम नहीं रह सकते।”

राजा ने रोकने की कोशिश नहीं की। वो ख़ुद तपस्वी रह चुके थे।

उन्होंने हर बेटे को एक छोटी पोटली दी – एक चटाई, एक कमंडल, थोड़े फल। पाँव छुए दसों ने।

राजा-रानी ने आँसू पोंछे।

दस पहाड़

दस भाई वन में गए। हिमालय की ओर बढ़े।

एक दिन वो एक चोटी पर पहुँचे जहाँ से आगे दस अलग पहाड़ दिखते थे। हर एक एक रास्ते पर। वो रुक गए।

देवदत्त ने कहा, “हम सब साथ नहीं जा सकते। ध्यान अकेले होता है।”

हर भाई ने एक चोटी चुनी। हर भाई एक चोटी पर। एक-दूसरे को आख़िरी बार देखा। फिर अलग हो गए।

देवदत्त की रचना

सबसे बड़े बेटे, देवदत्त, अपनी चोटी पर बैठे। आँखें मूँदीं।

कुछ साल साधारण ध्यान किया। साँस को साधा, मन को थामा। फिर एक दिन उनके मन में एक प्रश्न उठा।

“अगर सब चेतना है, तो मैं अपने मन में एक ब्रह्मांड बना सकता हूँ?”

उन्होंने सोचना शुरू किया।

पहले एक ख़ाली आकाश। फिर उस आकाश में एक सूरज। फिर एक चाँद। फिर तारे।

फिर पृथ्वी। उसमें समुद्र। उसमें मछलियाँ। फिर ज़मीन। उसमें पेड़। उसमें फूल।

फिर जीव। पहले छोटे, फिर बड़े। फिर मनुष्य।

हर सोच को उन्होंने स्थिर किया। बार-बार सोचा। हज़ारों साल लगातार सोचा।

एक पूरा ब्रह्मांड बन गया। उनके मन के भीतर। मगर उनके लिए वो बाहर भी था।

उस ब्रह्मांड में देवता थे, मनुष्य थे, असुर थे। और उस ब्रह्मांड के सब प्राणी अपने को असली मानते थे।

देवदत्त उस ब्रह्मांड के ब्रह्मा बन गए। बिना घोषणा के, बिना ताज़े के।

और नौ ब्रह्मांड

दूसरे भाइयों ने भी ऐसा ही किया।

देवप्रिय ने एक प्रकृति-प्रेमी ब्रह्मांड बनाया। हरियाली ही हरियाली। सब प्राणी पेड़ों के साथ बात करते थे। मनुष्य भी।

देवेश्वर का ब्रह्मांड शांत था। लोग कम बोलते थे। ध्यान ज़्यादा करते थे।

देवराज का ब्रह्मांड सवालों से भरा था। हर मनुष्य प्रश्न पूछता। उत्तर ढूँढता।

देवचंद्र का ब्रह्मांड संगीत से भरा था। हर पत्ता हिले तो सुर निकले।

देवसिंह का ब्रह्मांड नक्षत्रों का था। आसमान बहुत क़रीब, ज़मीन एक छोटी सी जगह।

देवशर्मा का ब्रह्मांड कवियों का था। हर बात में लय।

देवनाथ का ब्रह्मांड मौन था। शब्द कम, अनुभव ज़्यादा।

देवप्रकाश का ब्रह्मांड सेवा का था। हर मनुष्य दूसरे की मदद करता।

देवानंद का ब्रह्मांड – सबसे विचित्र। वहाँ कोई दुख नहीं था। हर प्राणी मुस्कुराता।

दस भाई, दस ब्रह्मांड। हर ब्रह्मांड अपने में पूरा। हर ब्रह्मांड अपने नियमों के साथ।

और हर भाई अपने ब्रह्मांड का ब्रह्मा बना बैठा था। चुपचाप। बिना किसी को बताए।

पिता की खोज

राजा इंदु बहुत समय बाद बेटों को देखने आए।

हिमालय चढ़े। एक चोटी पर पहुँचे, देखा – बड़ा बेटा बैठा था, पत्थर सा। आँखें मूँदी। शरीर पर बेल चढ़ी। पंछियों ने सिर पर घोंसला बनाया था।

पिता ने हिलाया, बेटा हिला नहीं।

दूसरी चोटी पर गए। वैसा ही। तीसरी, वैसा ही। दसों चोटियों पर एक-एक बेटा, एक-एक मूर्ति बना बैठा था।

राजा रोने लगे। उन्हें लगा बेटे मर गए।

तभी एक ऋषि आए। नाम वशिष्ठ (यह वो वशिष्ठ नहीं जो राम को कथा सुना रहे हैं। उनसे पहले के, या उनके किसी पूर्व जन्म के)।

“राजन, रोते क्यों हो? तुम्हारे बेटे जी रहे हैं।”

“मगर देखिए, हिल नहीं रहे।”

“बाहर से नहीं हिल रहे। भीतर बहुत कुछ हो रहा है।”

वशिष्ठ ने अपनी योग-दृष्टि से दिखाया। राजा ने देखा – हर बेटे के भीतर एक पूरा ब्रह्मांड था। उसमें असंख्य प्राणी, असंख्य कथाएँ। हर बेटा अपने ब्रह्मांड का ब्रह्मा बना बैठा था।

“राजन, तुम्हारे एक बेटे ने एक ब्रह्मांड रचा है। दस ने दस ब्रह्मांड। तुमने दस ब्रह्मा पाले हैं।”

राजा को कुछ समझ नहीं आया। फिर समझ आया। फिर हँसने लगे। फिर रोने लगे।

सबसे बड़ा प्रश्न

“तो मेरा अपना ब्रह्मांड भी ऐसा ही है? किसी का सोचा हुआ?”

वशिष्ठ बोले, “हो सकता है। यह जो हम ‘असली’ ब्रह्मांड कह रहे हैं, यह भी किसी ब्रह्मा की रचना है। और वो ब्रह्मा भी शायद किसी और का बेटा है, जो किसी और चोटी पर बैठा है।”

राजा ने सिर हिलाया।

“तो असली कहाँ है?”

“असली कहीं ठहरा हुआ नहीं। असली वो है जो सब रचनाओं को देख रहा है। तुम्हारे बेटे जो ब्रह्मांड रच रहे हैं, उन ब्रह्मांडों में भी कोई ‘देखने वाला’ है। वो देखने वाला हर जगह एक है।

“बेटे, ब्रह्मांड कभी असली नहीं होते। ब्रह्मांड को रचने वाला और देखने वाला असली होता है। और वो सब में एक है।”

राजा बेटों के पास बैठे। चुप। उन्होंने उन्हें जगाया नहीं।

हज़ारों साल बीते। जब-जब राजा हिमालय आते, बेटे वहीं होते। हर एक अपने ब्रह्मांड में।

आख़िर एक दिन उनकी समाधियाँ छूटीं। दसों भाई आँखें खोलकर उठे। मगर अब वो पहले जैसे नहीं थे।

हर एक एक ब्रह्मांड को रच चुका था और उसकी पूरी ज़िंदगी अपने भीतर देख चुका था।

दसों ने आपस में देखा। फिर मुस्कुराए। एक-दूसरे को पहचाना नहीं – इतने युग जो बीते थे। मगर भीतर से वो भाई थे ही।

दसों लौटे राज्य। मगर वो राजा नहीं बने। सलाहकार बने। हर एक ने अपने अनुभव से शासन में योगदान दिया।

वसिष्ठ जी ने राम से कहा, “हे राम, हर मन में एक ब्रह्मांड बनने की क्षमता है। हम जिसे जगत कहते हैं, वो भी किसी मन की रचना है। और हम भी, उस रचना में, अपनी छोटी रचनाएँ करते हैं।

“और एक बात – रचनाएँ बनाओ ज़रूर, मगर उन्हें असली मत मानो। दस भाइयों ने ब्रह्मांड बनाए, मगर बाद में जागे और उनसे मुक्त हुए। तुम भी बनाओ, मगर मुक्त रहो।”

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