कथा · 13
इंदु के दस पुत्र

इन्दु ऋषि निःसंतान थे, और बहुत तप के बाद उन्होंने दस बेटे पाए। बेटे बड़े हुए तो उन्होंने राज्य छोड़कर पहाड़ पर तप शुरू कर दिया, और फिर हर एक ने अपने भीतर एक पूरा ब्रह्माण्ड रच डाला। दस बेटे, दस ब्रह्मा, दस सृष्टियाँ।

सरयू पर सुबह उतर रही थी, जब राम ने पूछा – “गुरुदेव, क्या एक ही समय में कई सृष्टियाँ हो सकती हैं?”
वसिष्ठ बोले – “राम, चेतना की यह एक विचित्र शक्ति है कि वो ख़ुद को कई बार रच सकती है। इस पर एक कथा है, इंदु नाम के एक ऋषि और उनके दस बेटों की। सुनो।”
दस
इंदु एक ऋषि थे, और उनकी पत्नी का नाम शास्त्र में नहीं आता।

उन्होंने बहुत तप किया, और ब्रह्मा प्रसन्न हुए। ब्रह्मा ने पूछा – “क्या वर माँगते हो?”
इंदु ने कहा – “मुझे दस पुत्र चाहिए।”
ब्रह्मा बोले – “बहुत अच्छा, तुम्हें दस पुत्र मिलेंगे।”
और इंदु को दस बेटे हुए।
वो दस बेटे बड़े हुए, और दसों ही ऋषि बनकर तप करने लगे।
फिर इंदु बूढ़े हुए और एक दिन चल बसे, और उनके पीछे उनकी पत्नी भी।
अब दस बेटे अकेले रह गए।
उन्होंने आपस में बात की – “भाइयों, अब हम क्या करें?”
सबसे बड़े ने कहा – “हम तप करेंगे, हर एक अपनी इच्छा से।”
तब सब अपने-अपने स्थान पर बैठ गए।
सबने एक ही तप शुरू किया।

और सबने एक ही वर माँगा – “हमें ब्रह्मा बनना है।”
इस तरह बहुत बरस बीत गए।
आख़िर ब्रह्मा प्रसन्न हुए, और एक-एक के सामने प्रकट होकर हर एक से एक ही प्रश्न किया – “बेटा, क्या वर माँगते हो?”
और हर एक ने एक ही जवाब दिया – “भगवन्, मुझे ब्रह्मा बनना है, मुझे सृष्टि रचनी है।”
यह सुनकर ब्रह्मा ठिठक गए।
दस बेटे, दस ब्रह्मा, दस सृष्टियाँ।
ब्रह्मा ने मन में सोचा कि मेरा वचन है, मैं मना नहीं कर सकता।
और उन्होंने हाथ बढ़ाकर कहा – “बेटा, तू ब्रह्मा है।”
दस बार ब्रह्मा ने यही कहा, और दसों बेटे ब्रह्मा बन गए।
अब हर ब्रह्मा ने अपनी सृष्टि शुरू कर दी।
एक ब्रह्मा ने एक संसार रचा, जिसमें पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चन्द्र, मनुष्य और जीव-जन्तु थे।
दूसरे ब्रह्मा ने दूसरा संसार रचा, उसमें भी पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चन्द्र, मनुष्य और जीव-जन्तु।
इसी तरह तीसरे ने तीसरा रचा, चौथे ने चौथा, और पाँचवें ने पाँचवाँ।
छठे ने छठा, सातवें ने सातवाँ, आठवें ने आठवाँ, नवें ने नवाँ और दसवें ने दसवाँ रचा।
इस तरह दस संसार साथ-साथ चल पड़े।
हर एक में अपने लोग थे, अपने ऋषि, अपने राजा, अपने पंछी, अपनी नदियाँ और अपने पहाड़।
हर एक संसार के लोग सोचते हैं कि उनका संसार ही असली है।
हर एक संसार के लोग सोचते हैं कि उनका ब्रह्मा ही असली है।
पर असल में, हर ब्रह्मा का अपना संसार है, और हर संसार अपनी जगह असली है, फिर भी कोई एक संसार सबसे असली नहीं।
राम ने पूछा – “तो गुरुदेव, हमारा यह संसार?”
वसिष्ठ बोले – “राम, हमारा संसार एक ब्रह्मा का है, पर ऐसे बहुत संसार हैं और बहुत ब्रह्मा हैं। हम सोचते हैं कि बस हमारा ही संसार है, और यह सोचना गलत नहीं, बस अधूरा है।”
“और इन सब संसारों के पीछे?”
“उन सबके पीछे एक चेतना है। वही चेतना हर ब्रह्मा को रच सकती है, हर संसार को रच सकती है, हर हम-तुम को रच सकती है। उसकी कोई सीमा नहीं।”
राम ने पानी की ओर देखा, जहाँ सुबह की रोशनी फैल रही थी, और ऊपर आकाश में एक अकेला बादल तैर रहा था।
साहित्यिक-संदर्भ
यह कथा योग वासिष्ठ के उत्पत्ति प्रकरण, सर्ग 3.86-87 पर आधारित है। इंदु के दस पुत्रों का साथ-साथ ब्रह्मा बनना और दस समानान्तर सृष्टियों का रचा जाना, यह बहु-ब्रह्माण्ड के दार्शनिक प्रस्ताव का सबसे पुराना उदाहरण है। यह कथा छोटी है, पर इसका दार्शनिक आघात गहरा है।
दर्शन-दृष्टि
इन्दु के दस बेटे एक साथ तप करते हैं। हर एक ब्रह्मा बनने का वर माँगता है। और हर एक ब्रह्मा बनता है, अपने-अपने ब्रह्माण्ड का। दस ब्रह्मा, दस ब्रह्माण्ड, सब साथ-साथ, सब बराबर के असली। कथा यह कहती है कि सृष्टि एक नहीं अनेक हो सकती है, और जिसे हम एकमात्र ब्रह्माण्ड कहते हैं वो असल में अनगिनत में से एक है।
आधुनिक भौतिकी में ह्यू एवरेट (Hugh Everett III, 1930-1982) ने अपनी डॉक्टरेट थीसिस “Relative State Formulation of Quantum Mechanics” (1957) में many-worlds interpretation रखी, कि हर क्वान्टम संभावना अपना एक अलग ब्रह्माण्ड खोलती है, और सब ब्रह्माण्ड साथ-साथ चलते हैं। इन्दु की कथा इसी विचार की प्राचीन देह है, बस वहाँ चेतना के संकल्प से ब्रह्माण्ड खुलते हैं, यहाँ क्वान्टम मापन से। दोनों एक बात की दो भाषाएँ हैं, कि एकमात्रता एक भ्रम है।